निर्गुण और सगुण में भेद होने के बावजूद ईश्वर एक है

सुमेर की आशाओं पर पानी फिर गया। वह सोचकर आया था कि भगवान के साथ सेल्फी लेगा। परंतु मंदिर में मोबाइल फोन लेकर जाना मना था। उसने मंदिर कार्यालय में जाकर कोशिश की लेकिन अनुमति नहीं मिली। वह दर्शन करने के बाद अपना सा मुंह लेकर लौट रहा था कि बाबा मिल गया। ‘उदास क्यों हो वत्स !’ साधु ने टोका- ‘ईश्वर के घर से कोई दुखी नहीं लौटता।’

सुमेर ने पूरी बात बताई। बाबा हंस दिया- ‘बस ! इतनी सी बात?’ ‘आप नहीं समझेंगे।’ सुमेर को साधु का फक्कड़पन प्रभावित नहीं कर पाया था। ‘भगवान सर्वत्र हैं, उनके साथ कहीं भी सेल्फी ली जा सकती है।’ बाबा हंसा- ‘एक बार कोशिश कर लो।’ सुमेर ने बाबा को ऐसे देखा जैसे किसी बड़े अज्ञानी को देख रहा हो। साधु सुमेर के मन की बात समझ गया, बोला- ‘एक बार आजमाकर तो देखो।’

सुमेर ने बेमन से सेल्फी लेने का उपक्रम किया। बाबा ने हिदायत दी- ‘मन में यही भावना रखो कि तुम ईश्वर के साथ सेल्फी ले रहे हो।’ सुमेर ने मन ही मन खीझते हुए सेल्फी ली और साधु को दिखाई। फोटो में केवल सुमेर दिखाई दे रहा था और कोई नहीं। ‘वाह !’ बाबा के मुंह से निकला- ‘कितना सुंदर स्वरूप है मेरे प्रभु का !’

सुमेर थोड़ा चकराया। उसने फिर से एक सेल्फी ली। इस बार भी सुमेर के अलावा फोटो में कोई नहीं था। साधु हर फोटो पर वाह-वाह कर रहा था। सुमेर के सब्र का बांध टूट गया- ‘या तो आप पागल है या मैं !’ ‘न तुम पागल हो न मैं।’ बाबा बोला- ‘भगवान सर्वत्र हैं। पूरी सृष्टि उनमें समाई है और वे सबमें मौजूद हैं। समस्त संसार में वही हैं। सेल्फी में जो भी दिखाई पड़ रहा है वह ईश्वर ही है।’

‘मुझे तो मंदिर में विराजमान मूर्ति के साथ सेल्फी लेनी है।’ सुमेर बोला- ‘मेरे लिए वही भगवान हैं।’

‘भगवान के जितने मंदिर हैं क्या उनमें सभी मूर्तियां एक ही रंग-रूप की हैं?’ साधु गंभीर हो गया- ‘जैसे मूर्तियों या चित्रों में थोड़ा बहुत अंतर होने पर भी भगवान एक हैं, उसी प्रकार निर्गुण और सगुण में भेद होने के बावजूद ईश्वर एक है। जैसे तुम्हारा आग्रह मंदिर में विराजमान विग्रह के साथ फोटो खिंचाने के लिए है, उसी तरह भक्त अपनी भावना और प्रेम के वशीभूत होकर ईश्वर के सगुण-निर्गुण और विभिन्न स्वरूपों की आराधना करते हुए परमानंद को प्राप्त करते हैं।’

सुमेर निशब्द होकर सुन रहा था। उसने बाबा के साथ सेल्फी लेने के लिए मोबाइल फोन सेट किया तो विस्मित रह गया, साधु न जाने कहां चला गया था। बहुत देर तक सुमेर बाबा को ढूंढता रहा फिर पहले की तरह अकेले ही सेल्फी लेकर वैसा ही खुश हो गया जैसा साधु हो रहा था।

–  रमेश रंजन त्रिपाठी

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