राज ठाकरे के वर्तमान तेवर के मायने

राज ठाकरे अचानक इस ढंग से पूरे देश में कई दिनों तक चर्चा के विषय रहेंगे और उनके साथ भारी संख्या में जनशक्ति दिखाई देगी इसकी कल्पना शायद ही किसी ने की होगी। लंबे समय से ऐसा लग रहा था जैसे राज ठाकरे राजनीति में सक्रिय है ही नहीं। पिछले 3 सालों में गाहे-बगाहे उनके कुछ बयान जाते थे। अचानक वे सामने आए । उन्होंने मस्जिदों में लाउडस्पीकर से अजान रोकने की आवाज उठाई, अवैध लाउडस्पीकर हटाने की मांग की और फिर मीडिया की सुर्खियां बनते चले गए।

उन्होंने घोषणा कर दी कि अगर 3 मई तक लाउडस्पीकर नहीं हटाए गए या मस्जिदों से लाउडस्पीकर से आजान बंद नहीं हुए तो वे दोगुनी आवाज में जगह-जगह हनुमान चालीसा का पाठ करेंगे। यह ऐसी चेतावनी थी जिससे पूरे महाराष्ट्र में सनसनी पैदा हो गई और लगा जैसे कोई बड़ा तनाव पैदा होने वाला है। मस्जिदों पर अवैध लाउडस्पीकर या अजान का विरोध करने वाले हिंदुत्व के अनेक चेहरे भारत में हैं, लेकिन किसी के अल्टीमेटम में वैसा दम मीडिया को नहीं दिखा जैसा राज ठाकरे में दिखा। हालांकि महाराष्ट्र में अब अवैध लाउडस्पीकर हट रहे हैं या जो हैं उनकी आवाज कम की जा रहीं हैं।

अनेक मस्जिदों में अजान लाउडस्पीकर से बंद हुए और नमाज के लिए मोबाइल से या निजी तौर पर लोगों को इकट्ठे होने की सूचना देने की खबरें हैं। तो यह मानना पड़ेगा कि अगर राज ठाकरे ने आवाज नहीं उठाई होती, औरंगाबाद में उनकी भारी भीड़ वाली सभा नहीं होती तथा मनसे के कार्यकर्ता जगह-जगह सड़कों पर नहीं उतरते तो ऐसा नहीं हो पाता। हालांकि अपनी पत्रकार वार्ता में उन्होंने अपने तेवर को थोड़ा मध्दिम किया एवं कहा कि यह सतत् चलने वाला आंदोलन है। इसे उन्होंने धार्मिक की बजाय सामाजिक विषय भी बताया।

निश्चय ही इससे महाराष्ट्र में भविष्य के तनाव की आशंकाएं थोड़ी कम हुई है। लेकिन यह नहीं मानना चाहिए कि मुद्दा खत्म हो गया या राज ठाकरे फिर लंबे समय के लिए घर में बंद हो जाएंगे। इस बार वे बाहर निकले हैं तो टिकेंगे और महाराष्ट्र की राजनीतिक परिस्थितियों पर नजर रखने वाले बता सकते हैं कि वे लंबे समय तक सक्रिय होने की योजना से बाहर निकले हैं। ऐसा तो नहीं कहा जा सकता कि शरद पवार की अगुवाई में महाविकास अघाडी की मुंबई में आयोजित बैठक से निकली आवाज में राज ठाकरे को अपनी आक्रामकता कम करने के लिए बाध्य किया होगा। उप मुख्यमंत्री अजीत पवार ने उस बैठक की जानकारी देते हुए कहा कि किसी को कानून हाथ में लेने की छूट नहीं दी जा सकती है। जो कोई भी कानून हाथ में लेगा उसके खिलाफ कार्रवाई होगी।

प्रश्न तो यही है कि आखिर कार्रवाई पहले क्यों नहीं हुई? सांसद नवनीत राणा और उनके पति रवि राणा को केवल मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के घर के सामने हनुमान चालीसा पढ़ने की चुनौती पर राजद्रोह लगाकर गिरफ्तार करने वाला महाराष्ट्र प्रशासन राज ठाकरे के संदर्भ में कुछ न कर सका तो आगे वे कोई कठोर कदम उठा पाते इसकी संभावना न के बराबर थी। वास्तव में शिवसेना राज ठाकरे के विरुद्ध कार्रवाई करके उनको नए सिरे से हिंदुत्व का हीरो बनने नहीं देना चाहती थी। साफ था कि ऐसा होने से शिवसेना के वोट बैंक का एक बड़ा पक्ष राज के साथ खिसक सकता है। राज ठाकरे बनाम शिवसेना की यह लड़ाई 2006 से ही आरंभ हुई।

अभी तक शिवसेना उसमें  जीत रही है। लेकिन महा विकास आघाडी में आने के बाद शिवसेना का चाल और चरित्र में जो अंतर आया है उसके बाद कई प्रकार की संभावनाएं खड़ी हुई है। हिंदुत्व पर भाजपा से ज्यादा आक्रामक और अनेक मायनों में मुस्लिम विरोधी पार्टी मानी जाने वाली शिवसेना के सरकार में आने के बाद अपने ज्यादातर मुद्दों पर पहले के विपरीत रवैया रहा है। वह हिंदुत्व आधारित अपने वोट बैंक को बनाए रखना चाहती है तो दूसरी ओर अपने दोनों साझेदारों कांग्रेस तथा राकांपा के साथ पैदा हुए नए समर्थकों को संदेश देना चाहती है कि सेकुलरिज्म के नाम पर उसकी निष्ठा अटूट है।

लंबे समय जो पार्टी हिंदुत्व का झंडाबरदार रही वह अचानक वर्तमान राजनीति में भाजपा विरोधी खेमे के अनुकूल सेक्यलर हो जाए यह संभव नहीं। किंतु उसे गठबंधन में वर्तमान एवं भविष्य की राजनीति करनी है तो सेक्यूलरवाद के प्रति आक्रामक निष्ठा प्रदर्शित करते रहनी होगी। इसमें खतरा यह है कि धीरे-धीरे हिंदुत्व विचारधारा के आधार पर खड़ा समर्थन कमजोर हो सकता है। हिंदुत्व विचारधारा के आधार पर शिवसेना से जुड़े लोगों के बड़े समूह में यह विचार प्रबल होने लगा है कि क्या यह वही पार्टी है? जब तक सत्ता है बहुत सारे लोग समर्थन करेंगे लेकिन सत्ता जाने के बाद विचारधारा वाले समर्थक साथ छोड़ सकते हैं। उनके लिए महाराष्ट्र में दो ही विकल्प होंगे भाजपा या राज ठाकरे की मन से।

इन दोनों पार्टियों को इसका अंदाजा है। इसलिए राज ठाकरे ने उपयुक्त समय जानकर चोट किया और संभव है भाजपा ने उन्हें इसके लिए प्रोत्साहित किया हो। तत्काल भले इसका असर न दिखाई दे किंतु राज ठाकरे ने लोगों के अंदर यह संदेश दे दिया है कि शिवसेना अब पहले वाली हिंदुत्व आधारित पार्टी नहीं रही क्योंकि 3 मई यानी रमजान पूरा होने तक उन्होंने मस्जिदों पर लगे लाउडस्पीकर को मुंबई उच्च न्यायालय एवं उच्चतम न्यायालय के आदेशों के अनुसार नियमित करने का साहस नहीं दिखाया।

राज ठाकरे यही साबित करना चाहते थे कि मुसलमानों के समक्ष शिवसेना भी उसी ढंग से नतमस्तक है जैसी बाकी तथाकथित सेकुलर पार्टियां। इसमें वे कुछ हद तक अवश्य सफल हुए हैं। 3 मई के बाद कुछ हो जाए वह मायने नहीं रखता।  प्रश्न यह है कि आगे क्या होगा? राज ठाकरे का राजनीतिक भविष्य क्या होगा? क्या शिवसेना कमजोर होगी और वह मजबूत? क्या भाजपा शिवसेना से अलग होने के बाद राज ठाकरे को इतना सशक्त करना चाहती है ताकि उनके साथ राजनीतिक साझेदारी होने का लाभ मिल सके और शिवसेना कमजोर हो जाए?

इन सारे प्रश्नों का उत्तर अभी भविष्य के गर्भ में है। किंतु महाराष्ट्र की राजनीति में बदलाव होगा इससे इनकार नहीं किया जा सकता है। राज ठाकरे के साथ उमड़ा जनसमूह इस बात का प्रमाण है कि उनके लिए अभी संभावनाएं मौजूद है। हालांकि  बाला साहब ठाकरे के नेतृत्व में भी शिवसेना कभी ऐसी पार्टी नहीं बन सकी जो स्वयं बहुमत पा ले। उन्होंने स्वयं कभी चुनाव नहीं लड़ा और न8 कभी किसी सरकारी पद पर रहे। अन्य क्षेत्रीय नेताओं जैसे तमिलनाडु में एमजी रामचंद्रन करुणानिधि जय ललिता या फिर आंध्र प्रदेश में एनटी रामा राव आदि की तरावे सफल राजनेता नहीं बन सके। हालांकि उनका कद इतना बड़ा हो गया था कि मृत्यु के बाद तिरंगे में लपेटकर पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया और सभी पार्टियों के लोग उनकी अंत्येष्टि में शामिल हुए।

उनके जाने के पहले ही शिवसेना दो भागों में विभक्त हो चुकी थी। उद्धव ठाकरे को उत्तराधिकारी बनाने के कारण विभेद पैदा हुआ और 2006 में राज ठाकरे ने शिवसेना का त्याग कर दिया। उन्होंने मार्च 2006 में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना या मनसे का गठन किया। उनके हाव-भाव आवाज और तौर-तरीकों में लोग बाल ठाकरे की छवि देख रहे थे। लेकिन उन्होंने अपने झंडे में चार ऐसे रंग दिखाएं जिससे लगता था कि वह सेकुलर राजनीति करना चाहते हैं। बाला ठाकरे के आरंभिक कार्यकाल की तरह राज ठाकरे ने उत्तर भारतीयों के खिलाफ अभियान चलाया जो हिंसक हो गया ।

बाल ठाकरे की नकल में महाराष्ट्र के भूमि पुत्रों की लड़ाई का शायद आरंभ में थोड़ा असर हुआ और  2009 के विधानसभा चुनाव में मनसे के 13 विधायक जीतकर विधानसभा पहुंचे। इसके बाद नगर निगम के चुनाव में भी उनका प्रदर्शन अच्छा रहा। नासिक नगर निगम मनसे के कब्जे में आ गया। बीएमसी यानी बृहन्मुंबई नगर पालिका में उनके 27 कॉरपोरेटर निर्वाचित हुए। अच्छी सफलता थी । वे उसे बनाए नहीं रख सके और दोनों ही जगह धीरे-धीरे मनसे कमजोर होती गई। 2014 के लोकसभा चुनाव में राज ठाकरे की कोशिश थी कि शिवसेना की जगह उनका भाजपा से गठबंधन हो जाए।

ध्यान नहीं हुआ और मनसे एक भी सीट नहीं जीत सकी। उसी साल के विधानसभा चुनाव में से मन से केवल 1 सीट जीत पाई जिसके बारे में माना गया किया उम्मीदवार के कारण हुआ। 2019 लोकसभा चुनाव उन्होंने नहीं लड़ा। कार्य किया था कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश अच्छा कर रहा है इसलिए लोकसभा चुनाव मन से नहीं लड़ेगी। उसी वर्ष के विधानसभा चुनाव में मनसे ने 101 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए जिसमें से फिर केवल 1 सीट पर विजय मिली एवं 87 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गए। इसके बाद राजनीति में उनकी संभावनाएं लगभग खारिज कर दी गई।

सामान्य तौर पर यह हैरत में डालता है कि उनकी सभाओं में किसी राष्ट्रीय नेता की तरह भारी जनसमूह जुड़ता रहा लेकिन कभी वह वोटों में तब्दील नहीं हुआ। कारण यही माना गया कि उनके पास राजनीतिक और चुनाव प्रबंधन करने वाले लोगों की कमी है।   कार्यकर्ता राज ठाकरे की आक्रामकता से प्रभावित हो सड़कों पर उसने लड़ाई लड़ी लेकिन लोगों को पार्टी से जुड़े जनसमर्थन बढ़ाएं शिवसेना को कमजोर करें यह सब हुआ नहीं। दूसरे, मनसे ने वैचारिक आधार स्पष्ट नहीं किया । विचारधारा को लेकर वह अस्पष्ट रही ।उनका झंडा 4 रंगों का और इसके साथ घोषणा कि हमारी नीति धर्मनिरपेक्षता की है तो फिर लोग मनसे के साथ क्यों आएंगे? तीसरे, उत्तर भारतीयों का विरोध करके उन्होंने भूमि पुत्र सिद्धांत को आगे बढ़ाया जिससे भ्रम पैदा हो गई।

राज ठाकरे मनसे के नेता हैं  तो लोग उनकी गतिविधियों के आधार पर अपना मन बनाएंगे।  बयान देने या फिर मंच पर भाषण देने के अलावा कभी भी सड़क पर उतर कर काम करना या लंबी यात्रा करना, जनता के बीच लंबे समय तक रहना आदि व्यवहार उन्होंने नहीं दिखाया। इसलिए महाराष्ट्र की मीडिया में उन्हें विंडो पॉलीटिशियन की भी संज्ञा दी गई। मीडिया के साथ उनका व्यवहार अत्यंत रूखा और सख्त रहा। इस तरह हुए महाराष्ट्र की राजनीति में अलग-थलग पड़ गए 15 इस समय की परिस्थितियां थोड़ी अलग है। 2019 का विधानसभा चुनाव भाजपा और शिवसेना ने एक साथ लड़ा। शिवसेना केवल 56 सीटें पाने के बावजूद मुख्यमंत्री पद की जिद पर अड़ गई और गठबंधन टूट गया।

शरद पवार ने इसका लाभ उठाया तथा उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री बनाकर उनके नेतृत्व में कांग्रेश राकपा एवं शिवसेना की सरकार चल रही है। 105 सीटें पाकर भाजपा विपक्ष में बैठी है। शिवसेना की धोखेबाजी को लेकर भाजपा के अंदर क्षोभ  स्वाभाविक है। इसलिए भाजपा अगर राज ठाकरे को समर्थन और सहयोग देकर आगे कर रही होगी तो यह स्वाभाविक नहीं प्ले स्टोर हालांकि भाजपा इतनी कमजोर पार्टी नहीं कि वह शिवसेना से लड़ना सके। लेकिन शिवसेना के वोट बैंक को कमजोर करने के लिए राज ठाकरे हैं इस समय एकमात्र चेहरा हो सकते हैं।

राज ठाकरे ने 2020 से अपने पार्टी में बदलाव किया है। उन्होंने 4 रंगों की जगह केसरिया रंग का झंडा अपना लिया है। साथ ही उसमें छत्रपति शिवाजी के राज प्रतीक को अंकित किया हैं। इस तरह हिंदुत्व और मराठा स्वाभिमान को अपने साथ जोड़ा है। वर्तमान समय पूरे देश में हिंदुओं के अंदर हिंदुत्व को लेकर आंदोलन का है। इसमें राज ठाकरे की आवाज को समर्थन मिलना स्वभाविक है। किंतु उत्तर भारतीयों के विरुद्ध उन्होंने जिस तरह का अभियान चलाया उसे लेकर संदेह कायम है। हालांकि इसे दूर करने के लिए उन्होंने अयोध्या आने की घोषणा की है। लव मस्जिदों पर लगे लाउडस्पीकर के संदर्भ में उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रशंसा कर शिवसेना को घेरने की कोशिश की।

इस तरह हुए उत्तर भारतीयों के विरोधी होने के दाग से मुक्ति की कोशिश कर रहे हैं। वे अयोध्या आए और यहां उनके भाजपा नेताओं से मुलाकात हुई या योगी आदित्यनाथ से मिले तो इसका संदेश जा सकता है। योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता इस समय चरम पर है और महाराष्ट्र के चुनाव में उत्तर भारतीयों और के वोटों के संदर्भ में उनकी भूमिका बढ़ने वाली है। तो कुल मिलाकर राज ठाकरे के लिए संभावनाएं हैं और उस दिशा में व कोशिश कर रहे हैं। शिवसेना के लिए उनका वह चिंता अवश्य है। भाजपा ने राज ठाकरे के साथ गठबंधन किया तो फिर उनका जनाधार मजबूत होगा और इसकी छपी शिवसेना की होगी। भाजपा यह कर सकती है लेकिन वह घोषणा करने के पहले थोड़ी प्रतीक्षा और करेगी।

 

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