ज्ञान और श्रम का संयोग आवश्यक

मनोबल का विकास ही  साहस, सूझबूझ, कुशलता, कलाकारिता, योग्यता का प्रतीक है, किंतु केवल बौद्धिक योग्यता ही मनुष्य को पूर्णतया संतुष्ट नहीं कर पाती । हृदय और उसके उद्गार ही ऐसे हैं, जिनकी आवश्यकता मनुष्य ही नहीं, साधारण जीवधारियों को भी होती है । प्रेम, स्नेह, वात्सल्य, श्रद्धा, निष्ठा, आस्था का स्थान मनुष्य जीवन में  मानसिक शक्तियों से भी अधिक है।

पढ़े-लिखे व्यक्ति यदि हृदय हीन हैं तो अपार सम्पत्ति और सफलता होने पर भी उनका व्यक्तिगत जीवन दुःखी रहता है, पर जिन लोगों के जीवन में  प्रेम, ममत्व, आत्मीयता, विश्वास की भावनाएँ होती हैं, वे अनपढ़ होने पर भी बड़े प्यारे लगते हैं । बहुत से अशिक्षित व्यक्तियों के कौटुम्बिक, दाम्पत्य और सामाजिक संबंध बड़े मधुर होते हैं । यह सब हृदय का ज्ञान कहलाता है उसकी आवश्यकता बौद्धिक ज्ञान से अधिक है ।  सांसारिक दृष्टि से दोनों ही आवश्यक हैं । जिसको उनका एक सम्मिलित रूप दिया गया है, शास्त्रकार उसे ‘विद्या’ कहते हैं ।

आधुनिक शिक्षा केवल शिक्षा है, विद्या नहीं, जबकि जीवन के अधिकतम विकास और संतुष्टि के लिए उभयनिष्ठ स्थिति आवश्यक है । हम जो ज्ञान प्राप्त करें, वह बुद्धि विकास के साथ-साथ आत्मविकास का भी माध्यम होना चाहिए ।

 – मानस संजीवनी ज्ञानपीठ, पटना

सनातन वैदिक शिक्षा एवं शोध संस्थान

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