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   वर्तमान केंद्र सरकार के कार्यकाल में खास तौर से विज्ञान और तकनीक के मामले में देश ने जो कुछ हासिल किया है, वह उल्लेखनीय है। अंतरिक्ष बाजार में देश ने अपनी ताकत दिखा दी है। कैशलेस लेनदेन में भारी इजाफा हुआ है। अब देश आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस की मदद से हथियारों के विकास में भी कदम रख रहा है।

भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश के नजरिये से देखें तो चार साल का अरसा उसके विकास को आंकने के लिहाज से काफी कम है, पर मई 2014 में नई बनी केंद्र सरकार के कार्यकाल में खास तौर से विज्ञान और तकनीक के मामले में देश ने जो कुछ हासिल किया है, वह उल्लेखनीय है। कुछ मामलों में इन बीते 4 वर्षों में उसी विकास को तेज रफ्तार दी गई है, जिसका आरंभ पिछली सरकारों में हुआ था तो कई क्षेत्र ऐसे हैं, जिनमें हुई तब्दीलियों को देखने से लगता है मानो रुकी हुई गाड़ी एक झटके से चल पड़ी हो। देश में कैशलेस लेनदेन यानी ऑनलाइन ट्रांजेक्शन में जितना इजाफा इन 4 वर्षों में हुआ है, वह अकल्पनीय ही है। अब देश आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस की मदद से हथियारों के विकास में भी कदम रख रहा है, जिसका असर अगले कुछ वर्षों में नजर आएगा। लेकिन सबसे पहली चर्चा कैशलेस होते देश की होनी चाहिए।

पैसा है पर ऐसा है

वैसे तो देश में अभी भी बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है, जिनके लिए रुपये-पैसे का मतलब कागज के नोट और सिक्के ही हैं। लेकिन शहरों में कभी रुपये-पैसे की जगह जिस तरह क्रेडिट और डेबिट कार्ड का प्रचलन बढ़ा था, बीते दो-ढाई वर्षों में कुछ वैसी ही रफ्तार ऑनलाइन पेमेंट की व्यवस्था ने पकड़ी है। इसकी असली शुरुआत असल में 8 नवम्बर, 2016 से माननी चाहिए, जिस दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की अर्थव्यवस्था में मौजूद ब्लैक मनी और जाली करेंसी के खात्मे के उद्देश्य से 500 और 1000 के नोटों को तत्काल प्रभाव से बंद करने की घोषणा की थी। हालांकि उस वक्त शुरुआत में इनकी जगह 500 के और 2000 के नए नोट बैंकों व उनके एटीएम तक में पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं होने से पूरे देश में अव्यवस्था का नजारा बन गया था और देश के करीब सवा दो लाख एटीएम के बाहर कई-कई दिनों तक लंबी-लंबी कतारें लगी रहीं। लेकिन इस मुश्किल से निजात पाने के लिए जब सरकार और कई अर्थशास्त्रियों ने आम लोगों से कैशलेस हो जाने का सुझाव दिया, तो यह कोशिश रंग लाने लगी।

       कैशलेस हो जाने का मतलब यह है कि लोग रुपये-पैसे का लेनदेन कागजी करेंसी और सिक्कों की बजाय क्रेडिट-डेबिट कार्ड रूपी प्लास्टिक मनी और कंप्यूटर, मोबाइल, स्वाइप मशीनों आदि से संचालित होने वाली डिजिटल करेंसी के रूप में करें। शुरुआत में डिजिटल लेनदेन को बढ़ावा देने के लिए सरकार की ओर से उपभोक्ताओं और दुकानदारों को क्रमश: एक करोड़ और 50 लाख रुपये के पुरस्कार तक देने का ऐलान किया गया।

इसके अलावा केंद्रीय मंत्रिमंडल ने सभी उपक्रमों, संस्थानों, कंपनियों में कर्मचारियों के वेतन का भुगतान चेक अथवा डिजिटल प्रणाली से करने का अनिवार्य नियम बना दिया। दावा किया गया कि अगर जनता रुपये-पैसे के डिजिटल लेनदेन की व्यवस्था अपना लेती है, तो वर्ष 2019 तक देश में डिजिटल करेंसी का इस्तेमाल 3500 अरब तक पहुंच सकता है। इसी दौरान पेटीएम, ग्रॉफर, बिग बास्केट जैसी ऑनलाइन पेमेंट कराने वाली और सामान बेचने वाली कंपनियों के कारोबार में कई सौ गुना इजाफा भी हुआ, जिससे पता चलता है कि जनता में धीरे-धीरे इसे लेकर जागरूकता आ रही है और लोग ऑनलाइन लेनदेन का महत्व समझ रहे हैं। यूं अभी इस मामले में ऑनलाइन सिक्योरिटी का एक मसला जरूर है। असल में कैशलेस इकॉनमी में कार्ड का क्लोन बना लेना, एटीएम पिन चुराकर पैसे निकाल लेना या क्रेडिट कार्ड से आपकी जानकारी के बगैर ट्रांजैक्शन करना, हैकिंग करना आदि समस्याएं अभी हैं, लेकिन जैसे-जैसे भारत को कैशलेस इकॉनमी बनाने के संबंध में इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित होगा, ये समस्याएं कम होती जाएंगी।

स्पेस के बाजार में धमक

वैसे तो भारत समेत दुनिया के कई मुल्कों के लिए लंबी दूरी की बैलस्टिक मिसाइलों के निर्माण से लेकर चंद्रमा व मंगल मिशनों का एक सरल मतलब यह है कि उन्हें दुश्मन देशों से अपनी सुरक्षा करनी है या स्पेस अभियानों के जरिये सभ्यता में अपना कोई नाम कमाना है। लेकिन नए बनते भारत के लिए यह विशुद्ध रूप से बाजार और कमाई का मामला है जिसमें हमारे देश की बढ़ती धमक ने पड़ोसी चीन ही नहीं, ब्रिटेन जैसे यूरोपीय मुल्क और अमेरिका तक के पेट में मरोड़ पैदा कर दी है।

अग्नि-पृथ्वी मिसाइलों के सफल परीक्षण और इसरो द्वारा एक साथ सौ से ज्यादा सैटेलाइटों के प्रक्षेपण जैसी कामयाबियों ने साबित किया है कि गूढ़ साइंस और तकनीक के फॉर्मूलों पर चलने वाली साइंस में भारत जैसे पूरब के देश ने तरक्की की है। ज्यादा अहम बात यह है कि अब भारत स्पेस मार्केट में अमेरिका-यूरोप समेत पड़ोसी चीन को भी तगड़ी चुनौती देने की स्थिति में है।

इसरो के लिए यह एक बड़ी कामयाबी है कि अंतरिक्ष में उसके प्रक्षेपण यानों की धाक जम गई है। इसके महत्व को समझते हुए कुछ वर्ष पूर्व अमेरिका के निजी अंतरिक्ष उद्योग के कारोबारियों और अधिकारियों ने इसरो के कम लागत वाले प्रक्षेपण यानों से कड़ी प्रतिस्पर्धा मिलने की बात एक सार्वजनिक चिंता के रूप में सामने रखी थी। इस चिंता को प्रकट करने वालों के अगुवा ’स्पेस फाउंडेशन’ के सीईओ इलियट होलोकाउई पुलहम ने खुद कहा था कि उनकी चिंता यह नहीं है कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश को संवेदनशील तकनीक का हस्तांतरण किया जा रहा है, बल्कि मुद्दा बाजार का है। उनका कहना था कि जिस तरह भारत सरकार इसरो के प्रक्षेपण यानों के लिए सब्सिडी देती है, वह इतनी नहीं होनी चाहिए कि उससे इस बाजार में मौजूद अन्य कंपनियों के वजूद पर ही खतरा मंडराने लगे।

कैसा अजीब विरोधाभास है कि इसरो के दबदबे से आशंकित होने वाली यह आवाज वहां से उठी है जिस पश्चिमी जगत ने एक दौर में स्पेस की तकनीक तो क्या, सुपर कंप्यूटर तक देने से इनकार कर दिया था, क्योंकि इससे उसे भय था कि कहीं एक पिछड़ा एशियाई मुल्क उसे टक्कर देने की हैसियत में न आ जाए। इसके लिए भारत पर तमाम प्रतिबंध (खास तौर से पोखरण विस्फोट के बाद) लगाए गए और यानों को प्रक्षेपित करने वाले उसके रॉकेटों पर यह कहते हुए संदेह किया कि भारत इसकी आड़ में लंबी दूरी की बैलस्टिक मिसाइलों का कार्यक्रम चला रहा है।

ध्यान रहे कि, आईटी और बीपीओ इंडस्ट्री के बाद अंतरिक्ष परिवहन ऐसे तीसरे क्षेत्र के रूप में उभरा है, जिसमें भारत को पश्चिमी देशों की आउटसोर्सिंग से अच्छी-खासी कमाई हो रही है। भारत अपने रॉकेटों के बल पर साबित कर चुका है कि वह दुनिया का लॉन्च सर्विस प्रोवाइडर बनने की संभावना रखता है। पहले से ही भारी किफायत में चल रहे भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए विदेशी सैटेलाइटों को अपने रॉकेटों से अंतरिक्ष में भेजने का उपक्रम असल में पैसा जुटने का एक जरिया है। आज स्थिति यह है कि कई यूरोपीय देश भारतीय रॉकेट से अपने उपग्रह स्पेस में भेजना पसंद करते हैं। इसकी वजह शुद्ध रूप से आर्थिक है। भारतीय रॉकेटों के जरिये उपग्रह भेजना सस्ता पड़ता है।

वर्ष 2015 में पीएसएलवी सी-23 के सफल प्रक्षेपण के साथ जब पांच विदेशी उपग्रहों को उनकी कक्षा में स्थापित किया गया था तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसकी कामयाब लॉन्चिंग पर भारतीय अंतरिक्ष संगठन- इसरो की तारीफ करते हुए कहा कि देश के स्पेस मिशन हॉलीवुड की फिल्मों के निर्माण से सस्ते हैं। उल्लेखनीय है कि प्रसिद्ध हॉलीवुड फिल्म- ग्रैविटी 100 करोड़ डॉलर में बनी थी, जबकि भारतीय मंगल मिशन की लागत 72 करोड़ डॉलर आई। यही बात पीएसएलवी से साबित हो रही है।

मसला सिर्फ लागत या कीमत का नहीं है। भारतीय रॉकेटों की सफलता दर भी काफी ऊंची है। यह साबित हुआ था फरवरी 2017 में, जब इसरो ने पीएसएलवी-सी 37 से एकल मिशन में रिकार्ड 104 उपग्रहों का प्रक्षेपण किया था। छोड़े गए सैटेलाइटों में 101 नैनो-सैटेलाइट शामिल थे जिनमें से एक-एक इस्राइल, कजाखस्तान, नीदरलैंड, स्विट्जरलैंड, यूएई से और 96 सैटेलाइट अमेरिका के थे। इसके अलावा, दो उपग्रह भारत के थे।

आईटी और फार्मा का चमकता सितारा

मई, 2018 में विश्व बैंक ने एक आंकड़ा जारी किया है, जिसके मुताबिक दुनिया में विदेश में काम कर रहे अपने नागरिकों से सबसे ज्यादा पूंजी हासिल करने वाले देशों में भारत अव्वल नंबर पर है। वर्ष 2017 में विदेशों में निवासित भारतीयों ने 69 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा भारत भेजी, जो एक रिकॉर्ड है। यह मुद्रा हमारी जीडीपी का 2.6 प्रतिशत है। यह आंकड़ा कई और बातों के साथ यह भी दर्शाता है कि दुनिया के कई देशों में भारतीय प्रतिभाएं अपना लोहा मनवा रही हैं। इनमें निश्चित तौर भारत के आईटी प्रोफेशनल्स का योगदान है।

असल में पिछले कुछ दशकों में आईटी-बीपीओ उद्योग में देश के लाखों युवाओं को न सिर्फ देश में रोजगार मिला, बल्कि विदेशों में भी उन्होंने अपनी मेहनत से मुकाम बनाया। जिस तरह आज हर भारतीय को गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई की सफलता पर गर्व है, उसी तरह एक सच यह भी आईटी के कारोबार के लिए मशहूर सिलिकॉन वैली में भारतीय मूल के उद्यमी फल-फूल रहे हैं। सिर्फ विदेश में ही नहीं, भारत की अर्थव्यवस्था में भी आईटी सेक्टर की हिस्सेदारी 7.5 फीसदी से ज्यादा है और इसमें 25-30 लाख लोगों को सीधे तौर पर रोजगार मिला हुआ है। हालांकि भारतीयों की इस कामयाबी के लिए इधर अमेरिका-ब्रिटेन जैसे देश अंकुश लगाने का प्रयास कर रहे हैं। वहां तमाम वीजा कटौतियां की जा रही हैं और भारत को अपना काम भेजने वाली कंपनियों की टैक्स छूटें खत्म की जा रही हैं, पर उम्मीद है कि केंद्र सरकार इन मामलों में कोई पहल करेगी और पैदा हो रही दिक्कतों का कोई समाधान खोज निकालेगी। उम्मीद है कि देश में चलाया जा रहा डिजिटल इंडिया अभियान इन चुनौतियों का हल सुझाएगा।

आईटी की तरह फार्मा यानी चिकित्सा के क्षेत्र में भी भारत की उपलब्धियां चौंकाने वाली रही हैं। भारत में बनी दवाओं की मांग पूरी दुनिया में बढ़ी है और भारतीय अस्पताल और दवा कंपनियां पूरी दुनिया के लिए एक भरोसेमंद विकल्प बन चुके हैं। इसकी एक अहम वजह यह है कि भारत में अभी भी इलाज कराना अन्य देशों के मुकाबले सस्ता है। पिछले कुछ वर्षों में रुपये की कीमत में हुई गिरावट (अवमूल्यन) के बाद तो यहां इलाज कराना मिडल ईस्ट देशों के लोगों के लिए भी काफी सस्ता (करीब 30 प्रतिशत सस्ता) होता है। जिस इलाज पर ईरान-इराक आदि मुल्कों में 10 हजार डॉलर खर्च होते हैं, वही इलाज भारत के पांच सितारा अस्पतालों में आने-जाने के सारे खर्च मिलाकर 7 हजार डॉलर तक में हो जाता है। यही वजह है कि अब विदेशों के लोग भारत में इलाज को पहले की तुलना में ज्यादा प्राथमिकता देते हैं।

औद्योगिक संगठन एसोचैम की एक रिपोर्ट के मुताबिक, मेडिकल ट्रीटमेंट (चिकित्सा) के लिए सबसे ज्यादा लोग सऊदी अरब, कुवैत, कतर, टर्की और ईरान से आते हैं। खास बात है कि बांग्लादेश और पाकिस्तान के लोग भी अब डॉलर के मुकाबले रुपये में गिरावट का लाभ उठाने के लिए भारत में इलाज के लिए आते हैं। एसोचैम के मुताबिक, भारत में आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, महाराष्ट्र और दिल्ली में कॉर्डियोलजी, ऑर्थोपैडिक सर्जरी, ट्रांसप्लांट्स जैसी चिकित्सा सुविधाएं काफी बेहतर हैं।

सिर्फ इलाज ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया को दवाओं को कम कीमत पर उपलब्ध कराने की कोशिश भी हमारी दवा कंपनियों ने की हैं। दवाओं के भारतीय जेनरिक संस्करण हमारे देश के फार्मा उद्योग को ही नहीं, खुद अमेरिका के गंभीर मरीजों को भी फायदा पहुंचा रहे हैं क्योंकि उन दवाओं की काफी कम कीमत देनी पड़ती है।

       

   एआई में जगती नई उम्मीदः

एआई यानी आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस एक नया उभरता क्षेत्र है जिसमें कई कामकाज आसान होने और कई चीजों के आधुनिक होने के साथ-साथ रोजगार बढ़ने का विकल्प भी खुला है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को दुनिया में चौथी क्रांति के रूप में देखा जा रहा है। दावा है कि जल्द ही ऐसी अक्लमंद मशीनें हमारे इर्दगिर्द होंगी जो इंसानों की जगह ले लेंगी और हर वह काम करेंगी, जो इंसान करते हैं। वैसे तो हमारे एक इशारे पर काम करने वाली वॉशिंग मशीनें, माइक्रोवेव ओवन, टीवी और कारें अभी भी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे कई काम कर रही हैं। पर असल में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एक कदम आगे की चीज है। आधुनिक कंप्यूटरीकृत मशीनें किसी लिखे हुए पाठ को मानव की तरह से ही शब्दों की पहचान कर सकती हैं और पढ़ सकती हैं, लेकिन एआई उन मशीनों में स्वत: ही किसी स्थिति के मुताबिक काम करने की क्षमता विकसित कर देती है।

बैंकों में, ऑनलाइन शॉपिंग में और स्वचालित हो सकने वाले हर काम में एआई का दखल बढ़ रहा है। देश में एआई से कितनी तरह के काम हो सकते हैं, सरकार ने इसके लिए वर्ष 2017 में ही एक टास्क फोर्स गठित कर दिया है। बल्कि युद्ध और हथियारों के मामले में भी एआई मददगार हो सकता है- अब इसे लेकर भी प्रयास शुरू हो गए हैं।

मई 2018 में केंद्र सरकार ने एक महत्वाकांक्षी रक्षा परियोजना के तहत सुरक्षा बलों के लिए आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (एआई) के इस्तेमाल पर काम करना शुरू किया है। इस परियोजना का मकसद सुरक्षा बलों को मानव रहित टैंक, पोत, हवाई जहाजों और रोबोटिक हथियारों से लैस करते हुए उनकी अभियान संबंधी तैयारी को महत्वपूर्ण तरीके से बढ़ाना है। परियोजना अपनी सेना के लिए आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के व्यापक इस्तेमाल की खातिर चीन के बढ़ते निवेश के बीच देश की थल सेना, वायु सेना और नौसेना को भविष्य के युद्धों के लिहाज से तैयार करने की एक व्यापक नीतिगत पहल का हिस्सा है। असल में यह अगली पीढ़ी के युद्ध के लिए भारत की तैयारी  है जो ज्यादा से ज्यादा तकनीक  आधारित, स्वचालित और रोबोटिक प्रणाली पर आधारित होगा।

 

 

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