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विपक्ष का आरोप है कि मोदी ने चार साल में कुछ नहीं किया, और केवल सपने दिखाए। मोदी के कामों की फेहरिश्त ही इन बेबुनियाद आरोपों की अपने-आप कलई खोल देती है। हां, मोदी का सपना अवश्य है समर्थ भारत का। स्वाभिमानी भारत का। सबके विकास का, सबको साथ ले चलने का। यही उन्हें 2019 में अवश्य विजय दिलाएगा।

३८ साल पहले मुंबई में अटल बिहारी वाजपेयी ने भारतीय जनता पार्टी की स्थापना की थी और अपने उद्बोधन में कहा था, “अंधेरा छंटेगा, सूरज निकलेगा, कमल खिलेगा।’ वही कमल आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश के हर कोने में खिल रहा है। कभी व्यंग्य में कहा जाता था, “भाजपा के तीन ही काम- भोजन, बैठक और विश्राम।’ भाजपा के कार्यकर्ता इस व्यंग्य के आदी थे। लेकिन, मोदीजी के नेतृत्व ने इस मिथक को तोड़ दिया। उन्होंने पार्टी के हर स्तर पर नवसंजीवनी फूंक दी। पार्टी के रूप में केवल संगठन का ही महत्व नहीं बढ़ा, संगठन और सरकार के बीच भी अभूतपूर्व समन्वय स्थापित हुआ।

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 2014 के बाद से देश में हुए लगभग हर चुनाव में भाजपा की जीत हुई है। कांग्रेस हारती रही है। वर्तमान में देश के 21 राज्यों में भाजपा और सहयोगी दलों की सरकारें हैं। देश के 68% भूभाग और 70% आबादी पर भाजपा का प्रभाव है। फिर भी मोदीजी इसे भाजपा का स्वर्णकाल नहीं मानते। वे कहते हैं कि भाजपा का स्वर्णकाल तभी आएगा जब ओडिशा और प.बंगाल में भी सत्ता परिवर्तन होकर भाजपा की सरकारें स्थापित हो और 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा पूर्ण बहुमत के साथ विजय प्राप्त कर एनडीए की सरकार बने।

जनसंघ से भाजपा तक का सफर काफी संघर्षपूर्ण, कठिन और परिश्रमभरा रहा है। असंख्य कार्यकर्ता जी-जान से जुटे रहे। कई कार्यकर्ताओं ने अपनी जान तक न्योछावर कर दी। इसी का परिणाम पार्टी का आज का स्वरूप है। भाजपा दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बन गई है।

भाजपा के नेतृत्व में केंद्र में 30 वर्ष बाद पहली बार पूर्ण बहुमतवाली सरकार बनना इसी का नतीजा है। मोदीजी के नेतृत्व में सरकार बनते ही भारतीय राजनीति में एक अभूतपूर्व परिवर्तन होने लगा। यह एक ऐतिहासिक घटना है। अटलजी का यह सपना था। भाजपा के लिए यह एक नए युग का सूत्रपात बना। नरेंद्र मोदी समाज के वंचित, दुर्बल, पीड़ित, उपेक्षित घटकों की अस्मिता की हुंकार के प्रतीक बन गए। नरेंद्र मोदी प्रस्थापितों से अलग और पृथक राह पर चलने का प्रयास करते हैं। इसलिए उनके चारों ओर नई निष्ठाओं का संजाल बन गया है। मोदी का राष्ट्रीय मंच पर नेता के रूप में उदय देश में महज सत्ता परिवर्तन नहीं था, बल्कि प्रस्थापित व्यवस्था पर एक चोट थी। 2014 की विजय में देश का चेहरा बदल देने की संभावना थी। यह महज कांग्रेस पार्टी का ही विरोध नहीं था, वह तो दिल्ली से देश पर हुकूमत चलानेवाले एक परिवार का विरोध करने की चुनौती थी। सत्ता में पहुंचे किसी ने भी अब तक सत्तारूढ़ पार्टी के वर्चस्व को इस तरह चोट नहीं पहुंचाई थी। मोदी के आने से यह आघात संभव हो सका।

 

सनद रहे कि, मोदी सरकार के चार वर्ष के कार्यकाल में एक भी घोटाला या भ्रष्टाचार नहीं हुआ है और तुलनात्मक दृष्टि से पूर्ववर्ती सरकारों की अपेक्षा बेहतर कामकाज चल रहा है। इसके बावजूद विपक्षी दलों का यह सवाल बदस्तूर है कि, मोदी सरकार ने क्या किया है? वैसे पहले दिन से ही विपक्षी मोदी पर टूट पड़े हैं। आखिर उन्हें शिकायत क्या है? शिकायत यह है कि मोदी सपने दिखाते हैं। मोदी और विपक्षी नेताओं में यही अंतर है। मोदी भारत को स्वर्णयुग में ले जाने की आकांक्षा रखते हैं, जबकि विपक्ष के नेताओं के पास कोई सपना तक नहीं है। इस फर्क को मतदाता अच्छी तरह जानता है।

2014 के लोकसभा चुनावों की बात लें। मोदी इस दौरान मतदाताओं से विकास के सपने की बात रहे थे, तब मायावती दलितों और मुस्लिमों के वोट पाने की उठापटक कर रही थीं। मायावती का मुस्लिमों से आग्रह था कि वे दलितों के साथ हो जाए और उन्हें वोट दें। उत्तर प्रदेश में दलित 23% हैं, जबकि मुस्लिम 19%। दोनों का कुल योग 42% बनता है। मायावती सोचती थी कि इस समीकरण से भाजपा को निश्चित तौर पर रोका जा सकेगा। मायावती के पास इस समीकरण के सिवा और कोई एजेंडा तो था नहीं। अतः मायावती अपने पक्ष में कोई वोट बैंक बना नहीं पाई। उनकी मुस्लिमों से गुहार के कारण उनका पारम्पारिक वोटर भी उनसे छितर गया। अखिलेश यादव भी इसी तरह बहते चले गए। अखिलेश अपने राजनीतिक सफर में विकास को तवज्जो देना चाहते थे, किंतु मोदी की खिल्ली उड़ाने के चक्कर में विकास का मुद्दा उसकी हाथ से पूरी तरह छिटक गया। मोदी भारत के विकास के सपने दिखाकर मतदाताओं को अपना बनाते रहे, और अखिलेश-राहुल के युगल ने अपना सारा समय मोदी के नाम की रट लगाने में ही गंवा दिया। यह केवल उत्तर प्रदेश की बात नहीं है, लगभग हर राज्य में इसी की पुनरावृत्ति होती रही।

नरेंद्र मोदी का राष्ट्रीय राजनीति में प्रवेश तब हुआ जब देश में नेतृत्व की दृष्टि से एक रिक्तता पैदा हो गई थी। इस रिक्तता को भरने की पूरे देश को चाह थी। ऐसे समय में मोदी ने स्वयं को एक ऐसे समर्थ नेता के रूप में प्रस्तुत किया जो महत्वपूर्ण निर्णय लेने में नहीं डगमगाता। उनकी यह छवि बहुत फलदायी साबित हुई। चाहे सर्जिकल स्ट्राइक हो या नोटबंदी- उनके निर्णयों से उनकी छवि और प्रभावी होती चली गई। इसी कारण चार वर्ष की अवधि पूरी होने पर भी मोदी की लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई है।

अगले वर्ष याने 2019 में आनेवाले लोकसभा चुनावों पर सबकी नजरें हैं। अतः मोदी सरकार की पिछले चार वर्षों की निश्चित उपलब्धि क्या है अथवा मोदी सरकार की राजनीतिक विफलताएं क्या हैं, इसका लेखाजोखा पेश किया जा रहा है। विपक्ष का तो आरोप है कि मोदी सरकार ने पिछले चार वर्षों में बेरोजगारी, खेती की समस्याएं अथवा आर्थिक दिवालियापन के अलावा कुछ भी नहीं हासिल किया है। विपक्ष के ये आरोप ऐसे हैं मानो चार साल पहले देश में रामराज्य था और मोदी ने इस रामराज्य को रावणराज्य में तब्दील कर दिया। इन आरोपों का जवाब देना हो तो मोदी सरकार के कामों की एक लम्बी-चौड़ी फेहरिश्त ही गिनानी होगी।

जनधन, जनसुरक्षा, फसल बीमा, मुद्रा योजना, स्वास्थ्य बीमा, प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना, स्वच्छ भारत अभियान, पंडित दीनदयाल ग्रामीण बिजलीकरण योजना के साथ ही बेटी बचाओ- बेटी पढ़ाओ अभियान जैसी सारी योजनाएं जनसाधारण और किसानों के हितों का सवंर्धन करनेवाली ही हैं। दूसरी बात सरकार की दृढ़ता और साहस की है। मिसाल के तौर पर पाकिस्तानी शह से चलनेवाले आतंकवादी हमलों के जवाब को लें। पहले कभी भी इतनी दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिचय नहीं मिला। उरी में हुए आतंकवादी हमले के बाद दस दिन में ही सर्जिकल स्ट्राइक का निर्णय किया गया। सेना के जवानों ने अत्यंत वीरता और साहस के साथ पाकिस्तानी सीमा में घुसकर आतंकवादियों का खात्मा कर अपने शहीदों की मौत का बदला लिया।

इस महज एक कार्रवाई से भारत की ओर देखने का दुनिया का नजरिया पूरी तरह बदल गया। पूरी दुनिया को इससे अंदाजा हो गया कि भारत किसी भी मार्ग से अपनी सीमाओं की रक्षा करने में सक्षम है। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व के करिश्मे के कारण वैश्विक स्तर पर भारत की प्रतिष्ठा बढ़ी है। अंतरराष्ट्रीय रिश्तों और कूटनीति में मोदी की बराबरी कोई नहीं कर सकता।

‘न्यू इंडिया’ की ओर मार्गक्रमण करते समय आनेवाले कल के समर्थ भारत के पन्ने मोदी की ओर से लिखे जा रहे हैं। यहां मोदी के कामों की गिनती करने का इरादा नहीं है, बल्कि मोदी पर किए जा रहे बेबुनियाद आरोपों को उजागर करने का है। जो कोई पूर्ववर्ती सत्ताधारी इस तरह के उलजलूल आरोप मोदी पर करते हैं वे अपने 60 साल के कार्यकाल में इससे अधिक बेहतर ढंग से कामकाज चलाने का एकाध उदाहरण तो दें? वैसा उनके पास कुछ नहीं है। यह मोदी विरोधियों की शोकांतिका है और यही मोदी की शक्ति बनी है। राहुल गांधी पूछते हैं कि मोदी सरकार ने चार साल में क्या किया? तब भारतीय जनता के मन में सहज आनेवाला पहला प्रश्न यह है कि राहुलजी आप यह कैसा प्रश्न मोदीजी से पूछ रहे हैं? पहले आपकी चार पीढ़ियों के काम का हिसाब तो देश की जनता को दें। देश में चार पीढ़ियों तक कांग्रेस की सरकार थी। यह भी तो बताए कि कांग्रेस गांवों, गरीबों, किसानों, दलितों, आदिवासियों, युवाओं, महिलाओं का विकास क्यों नहीं कर पाई?

नरेंद्र मोदी ने उज्ज्वला योजना के तहत गरीबों के घरों में गैस पहुंचाने का काम किया है। स्वच्छ भारत अभियान के माध्यम से हर घर में शौचालय खड़ा करवाया है। सौभाग्य योजना के अंतर्गत हर घर में बिजली, मुद्रा बैंक योजना के तहत स्वयंरोजगार, और अब देश की लगभग 50 करोड़ गरीब जनता को 5 करोड़ रु. का स्वास्थ्य बीमा उपलब्ध कराकर बड़ी राहत पहुंचाई है। कांग्रेस ने पिछले 70 वर्षों में ‘गरीबी हटाओ’ के नारे के जरिए गरीबों को ही हटाने का काम किया है। मोदी ने गरीब जनता के कल्याण का काम केवल चार वर्षों में कर दिखाया हैं। मोदी के विरोधी दल अपनी पराजय के निश्चित कारण ढूंढ़ नहीं रहे हैं या वे उसे ढूंढ़ने की मंशा भी नहीं रखते हैं। कुछेक ने अपनी पराजय का कारण ईवीएम मशीन बताया है। कुछेक कहते हैं कि मोदी के बहकावे में आकर जनता ने विपक्ष को वोट नहीं दिया है। ये दोनों तर्क झूठे हैं।

इसलिए कि, 2014 के बाद जहां-जहां चुनाव हुए, वहां-वहां विपक्ष और भाजपा के वोटों का अंतर लगातार बढ़ रहा है, इस सत्य को अनदेखा नहीं किया जा सकता। पश्चिम से पूर्व तक और उत्तर से दक्षिण तक भाजपा का कमल धीरे-धीरे खिल रहा है। भाजपा के मतदाता बढ़ रहे हैं। मोदी की सफलता का रहस्य यह है कि उन्होंने भाजपा के परम्परागत मतदाताओं को कायम रखते हुए नया वोट-बैंक भी तैयार किया है।

मोदी की सबसे बड़ी ताकत युवा मतदाता हैं। केंद्रीय राजनीति में प्रवेश करते समय मोदी ने युवाओं का महत्व समझा और युवाओं से सीधा संवाद स्थापित करते हुए उनसे गहरा रिश्ता बनाया। इसलिए युवाओं में मोदी जैसी लोकप्रियता पाने में अन्य कोई नेता सफल नहीं हो सका। महिलाओं की सक्षमता को मोदी ने पहचाना और वोट-बैंक के रूप में महिलाओं को अपनी ओर मोड़ने में वे सफल रहे। निःशुल्क एलपीजी कनेक्शन के लिए उज्ज्वला योजना लागू की, तीन तलाक के बारे में दृढ़ भूमिका के कारण हिंदू महिलाओं के साथ मुस्लिम महिलाओं को भी उन्होंने अपनी ओर किया। अब तक आर्थिक संकट से जूझनेवाला मध्यम वर्गीय समाज मोदी की विकास नीति के कारण स्वयं को सुरक्षित महसूस करने लगा। देश का यह मध्यम वर्गीय समाज बड़े पैमाने पर मोदी की ओर झुका। विभिन्न जातियों और छोटे-छोटे व्यवसायों से जुड़े मध्यम वर्ग की ओर अब तक किसी का ध्यान नहीं गया था। आर्थिक विकास के कारण यह वर्ग बड़े पैमाने पर मोदी की ओर आया। मोदी की अब तक की सफलता का प्रमुख कारण यह भी है ही। भाजपा के विरोधी दल इस सत्य को समझकर अपनी रणनीति बनाने में अब तक तो सफल नहीं हुए हैं। केवल मोदी की विभिन्न योजनाओं की और मोदी की खिल्ली उड़ाना, मोदी ने चार वर्ष में क्या किया है यह बचकाना सवाल उछालते रहना अब मतदाताओं को भरमा नहीं पाएगा।

इसी कारण 2019 के चुनाव का मोदी को भय नहीं है। पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकारों की अपेक्षा बेहतर कामकाज मोदी ने किया हो तो उससे अधिक बेहतर करने की आश्वस्ति मोदी के लिए चुनौती बनी रहेगी। यह चमत्कार राहुल गांधी और अन्य विरोधियों में से कोई नहीं कर पाएगा। इस स्थिति में 2019 में मोदी के लिए चुनौती बचती ही कहां है? आज दुनिया में मोदी को वैश्विक नेता के रूप में मान्यता मिल चुकी है। अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संगठन और विशेषज्ञ भी मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों की सराहना करते हैं। नोटबंदी या जीएसटी जैसे निर्णयों के दूरगामी परिणाम धीरे-धीरे भारतीय जनता के समक्ष आ रहे हैं।

‘अबकी बार, मोदी सरकार’ का नारा बुलंद कर 2014 में सत्तारूढ़ हुई मोदी सरकार को चार वर्ष पूरे हो चुके हैं और उन्हें अब 2019 के चुनावों का सामना करना है। जैसे-जैसे 2019 निकट आ रहा है वैसे-वैसे राजनीतिक और सामाजिक चित्र बदल रहा है। नोटबंदी के कारण ग्रामीण इलाकों में अर्थव्यवस्था बिगड़ गई थी। उसमें भी पुराने नोटों को लेने की व्यवस्था चाकचौबंद न होने से अनेकों को कष्ट झेलने पड़े। निरंतर बदलते निर्णयों के कारण संभ्रम का माहौल बन गया था। यह सब होने पर भी पुराने नोटों के रूप में कितना धन रिजर्व बैंक के पास आया, इसके ठीक-ठीक आंकड़ें अब तक उपलब्ध नहीं हो पाए हैं। नोटबंदी की तरह ही जीएसटी निर्णय भी महत्वपूर्ण है। उसके अमल में, जीएसटी की दरों में लगातार बदलाव किए जाते रहे। यह निर्णय कुछ देरी से और पूर्व तैयारी के साथ किया जाना चाहिए था। फलस्वरूप, नोटबंदी और जीएसटी जैसे अच्छे निर्णय भी पूर्व-तैयारी के अभाव में आलोचना का शिकार बने और विरोधियों के हाथ में पलीता लग गया। सच है कि नोटबंदी और जीएसटी देश की अर्थव्यवस्था के दीर्घकालीन हित में होने के बावजूद उसका तात्कालिक परिणाम जनसाधारण को नाराज करनेवाला साबित हुआ।

मोदी के प्रभाव से 2014 और बाद में हुए राज्यों के चुनावों में जबरदस्त पराजय से टूट चुका विपक्ष अब अपनी ताकत बढ़ाने पर बल दे रहा है। विशेष रूप से, राहुल गांधी द्वारा गुजरात, कर्नाटक में किया गया जबरदस्त प्रचार और विपक्ष की एकजुट निश्चित ही कुछ संकेत दे रहे हैं। कांग्रेस नेता, विरोधी दल और उनके कार्यकर्ताओं का आत्मविश्वास बढ़ रहा है। इसके विपरीत भाजपा के कुछ सांसद खुलेआम पार्टी के विरोध में सुर आलाप रहे हैं। नाना पाटोले ने भाजपा से इस्तीफा देकर सीधे कांग्रेस का रास्ता नापा है। आयाराम-गयाराम का गणित न बिगड़े इस पर ध्यान देने की जरूरत है। शिवसेना, तेलुगू देशम जैसे भाजपा मोर्चे के घटक दलों ने खुलेआम नाराजी प्रकट करना आरंभ कर दिया है। राष्ट्रवादी कांग्रेस के अध्यक्ष शरद पवार भाजपा से टक्कर लेने के लिए विपक्ष की एकता पर बल दे रहे हैं। भाजपा के विरोध में विभिन्न दलों का मोर्चा बनाने के लिए शरद पवार का विशेष आग्रह दिखाई दे रहा है। उन्हें इसमें सफलता मिली तो चुनाव कांटे के होंगे।

कुल मिलाकर मोदी के कामों को देखते हुए समस्या इतनी गंभीर नहीं लगती। लेकिन, 2019 तक कुछ बातों की ओर ध्यान देना आवश्यक है। ऐसी स्थिति में घटक दलों को विश्वास में लेना और सरकार की लोकप्रियता में और इजाफा करना जरूरी है। विभिन्न योजनाओं की घोषणाएं होती हैं, परंतु अमल में गड़बड़ी हो जाती है। अतः नौकरशाही की ओर से उन योजनाओं पर प्रभावी ढंग से अमल होना भी जरूरी है। भ्रष्टाचार का एक भी मामला सामने न आना मोदी सरकार की उपलब्धि है। स्वच्छ और पारदर्शक कामकाज का आश्वासन मोदी सरकार पूर्ण कर रही है, यह चित्र अब तक तो दिख ही रहा है। 2019 तक इसमें खलल न पड़े, और जनता का विश्वास न टूटे- इस ओर मोदी सरकार को ध्यान देना होगा।

भारत के विकास का दायित्व वहन करते समय मोदी सरकार ने आर्थिक विकास की दिशा में भी दृढ़ कदम उठाए हैं। इसकी पृष्ठभूमि में पारदर्शी शासन और समाज के सभी वर्गों-घटकों का विकास महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। इसी तरह राजनीतिक जड़ता से बाहर आकर चुनावों में सफलता-विफलता की परवाह न करते हुए मोदी सरकार ने भारत के विकास की जो रूपरेखा तैयार की है, उससे मतदाता प्रभावित हैं। इससे सव्वा सौ करोड़ आबादीवाला भारत स्वाभिमान का अनुभव कर रहा है। मोदी ने भारतीय जनता में यह विश्वास जगाया है कि, हम समृद्ध तथा शक्तिशाली भारत के नागरिक हैं तथा दुनिया की कोई ताकत हमारी ओर तिरछी नजर से नहीं देख सकती।

नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता इसलिए बढ़ रही है कि, भारतीय जनता उनके व्यक्तित्व में मजबूत नेता और नेतृत्व का दर्शन कर रही है। इसलिए भारत की जनता 2019 के चुनाव विपक्षी दल और कांग्रेस को पुनर्स्थापित करने के लिए नहीं लड़ेगी, बल्कि भारत के विकास के लिए जूझनेवाले राष्ट्र को सर्वोपरि माननेवाले नेतृत्व के लिए लड़ेगी। विपक्ष नकारात्मक प्रचार कर माहौल बिगाड़ने का काम करेगा तो करने दें। इसके पूर्व भी ऐसी ही पद्धति का इस्तेमाल किया गया है। लेकिन याद रहे कि उनके इन प्रयासों को पूर्व में भारतीय जनता पूरी तरह नकार चुकी है। निश्चित मानिए कि, विकास का मुद्दा छोड़कर केवल मोदी विरोध का विपक्ष का प्रयास विफल होना ही है।

 

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