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    विपक्षी दल जानते हैं कि एक बार मोदी दिल्ली में जम गए, उसके बाद उन्हें उखाड़ना मुश्किल होता जाएगा। इसलिए वे उन्हें उखाड़ने के लिए हर तरीका इस्तेमाल कर रहे हैं। लेकिन मोदी की असली ताकत उनका जनता से सीधा सम्पर्क और जनता का उन पर विश्वास है। ऐसे में उन्हें कौन डिगाएगा?

चार साल पहले 26 मई 2014 को नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने केन्द्र में अपनी सरकार स्थापित की थी। यह साधारण विजय नहीं थी। भारतीय इतिहास में एक नए अध्याय की शुरुआत थी। 1984 के बाद पहली बार किसी पार्टी ने लोकसभा में बहुमत प्राप्त किया था। इससे पहले नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री के पद पर थे। 7 अक्टूबर 2001 से लेकर 22 मई 2014 तक लगभग 13 साल वे गुजरात के मुख्यमंत्री रहे। गुजरात के मुख्यमंत्री बनने से पहले वे कभी विधायक तक भी नहीं रहे थे। उनके पास भारतीय जनता पार्टी के महामंत्री पद का दायित्व था।

2001 में हुए उपचुनावों में भाजपा चुनाव हार गई। हार का कारण मोटे तौर पर यह माना गया कि मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल की लोकप्रियता कम हो रही है और अब उनका स्वास्थ्य भी ठीक नहीं रहता था। उधर भुज में ऐसा भूकम्प आया जिसने वहां विनाश लीला का हृदय विदारक दृश्य उपस्थित कर दिया। इस विनाश लीला से लोहा लेकर वहां पुनः जीवन लीला शुरू करने का भारी भरकम कार्य था।

लेकिन विधि का विधान कुछ और ही था। मानो सिर मुंड़ाते ही ओले पड़े। नरेन्द्र मोदी को मुख्यमंत्री बने अभी कुल मिलाकर पांच महीने ही हुए थे कि 27 फरवरी 2002 को गोधरा में कट्टरपंथियों ने साबरमती एक्सप्रेस के डिब्बों में आग लगा दी। जिस डिब्बे में आग लगाई गई थी, उसमें कारसेवा कर अयोध्या से लौट कर वापस घर आ रहे कारसेवक थे। कट्टरपंथियों की इस करतूत से गुजरात ग़ुस्से की आग में जलने लगा। वहां साम्प्रदायिक दंगे शुरू हो गए।

गुजरात में साम्प्रदायिक दंगों का बहुत पुराना इतिहास है। 1969 में जब हितेन्द्र देसाई मुख्यमंत्री थे तो अहमदाबाद से शुरू हुए साम्प्रदायिक दंगे आधे गुजरात में फैल गए थे। दो महीने तक गुजरात दंगाग्रस्त रहा लेकिन सरकार नियंत्रण नहीं कर पा रही थी। इसके बाद 1985 के भयानक दंगे हुए। कहा जाता है इन दंगों में तो पुलिस भी शामिल हो गई थी। इन दंगों ने भी लगभग पूरे गुजरात को अपनी चपेट में ले लिया था। इसके बाद भी 1987 से 1991 के बीच छोटे मोटे साम्प्रदायिक दंगों की सौ से ऊपर घटनाएं हुईं। 1992 में अहमदाबाद एक बार फिर साम्प्रदायिक दंगों की चपेट में आ गया। कई दिनों तक शहर जलता रहा। सरकार नियंत्रण कर पाने में विफल रही।

नरेन्द्र मोदी को साम्प्रदायिक दंगों की विरासत गुजरात में मिली थी और इसे दुर्योग ही कहा जाएगा कि सत्ता संभालते ही गोधरा कांड हो गया। नरेन्द्र मोदी को किसी भी हालत में इन विपदाओं पर नियंत्रण करना ही था। गुजरात को विकास के रास्ते पर आगे ले जाना है तो उसे इस साम्प्रदायिकता कि भट्टी से किसी भी तरह निकालना ही होगा। उधर बहुत से राजनैतिक पंडित उनके प्रशासकीय व वैधानिक अनुभव के न होने को लेकर चिंतित थे। लेकिन जल्दी ही उनकी चिंता और आशंका दूर हो गई। मोदी की सरकार ने जिस कुशलता से दंगों पर नियंत्रण किया और बदले की आग में झुलसते गुजरात को शांत किया, उसने उनके विरोधियों को भी आश्चर्यचकित कर दिया। यह ठीक है कि इन दंगों में जान माल की बहुत हानि हुई लेकिन सरकार की सख़्ती के कारण समाज विरोधी तत्वों पर अंकुश लगा दिया गया।

इसे नरेन्द्र मोदी का आत्मविश्वास ही कहना होगा कि इतनी विपरीत परिस्थितियों में भी वह डगमगाए नहीं। यह आत्मविश्वास ही मोदी का सबसे बड़ा गुण है। देश के भविष्य को लेकर, दो जून रोटी के लिए जीवन संघर्षों से जूझ रहे आम आदमी के जीवन को बेहतर बनाने का एक सपना, सपना ही नहीं बल्कि उसे ज़मीन पर उतारने का भागीरथ प्रयास। मोदी अपने इस सपने को साकार करने के प्रयासों में लगे रहे और उधर गुजरात में पूरी तरह संगठित एक समूह किसी भी तरह मोदी को घेरने के प्रयासों में लगा रहा। यह समूह इतनी दूर तक गया कि जब गुजरात पुलिस ने आतंकवादियों को मार गिराया तो इसने उसके साहस की प्रशंसा करने के स्थान पर उन्हें ही कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की। यह भी भारत के इतिहास में पहली बार हुआ कि किसी दंगे के लिए मुख्यमंत्री को व्यक्तिगत तौर पर ज़िम्मेदार ठहराकर बाकायदा उन पर मुक़दमे दर्ज किए गए हैं।

गुजरात में मोदी ने राजनीति में व्याप्त जाति, सम्प्रदाय और अपराध के भीतरी कनेक्शनों को तोड़ा और नौकरशाही में आई जड़ता से लोहा लिया। यही कारण था कि वे गुजरात को विकास का एक ऐसा मॉडल दे सके, जिसने सारे देश को अपनी ओर आकर्षित किया। गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए भी मोदी का आचरण क्षेत्रीयता के दायरे में सीमित नहीं हो पाया। गुजरात में उनकी इसी विकास यात्रा और राष्ट्रीय दृष्टिकोण ने सारे भारत का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। यह मोदी का आत्मविश्वास और निश्चयभाव से जनसंवाद का जुनून ही था जिसके कारण सारे देश का ध्यान उनकी ओर आकर्षित हुआ।

राष्ट्रीय राजनीति में उन्होंने पदार्पण किया तब देश की जनता दिल्ली की पिछले सात दशकों की भ्रष्ट राजनीति से ऊब चुकी थी। अधिकांश कालखंड तक कांग्रेस का शासन ही रहा, लेकिन वह भी कांग्रेस का न रह कर एक परिवार या वंश का शासन बन गया था। दरबारियों की बन आई थी। इसी वातावरण में भ्रष्टाचार को खाद पानी मिलता है। कांग्रेस का शासन हटता था तो जातीय आधार पर बनी उन छोटी छोटी पार्टियों के हाथ में नीति निर्धारण का काम आ जाता था जो अपनी नाक के आगे देख नहीं पाते थे। ऐसा शासन नौकरशाही, अपराधियों, विदेशों और दलालों को सर्वाधिक अनुकूल पड़ता था। ऐसी परिस्थितियों में नरेन्द्र मोदी भारतीय राजनीति में स्वच्छ व ताजा हवा के एक झोंके के समान आए। जनता ने उनमें विश्वास जताया।

पिछले चार साल में मोदी जनता के विश्वास पर खरे उतरे। उसका सबसे बड़ा कारण यह है कि उन्होंने अपनी तमाम जनकल्याणकारी योजनाओं के लिए महात्मा गांधी और दीनदयाल उपाध्याय के दिए गए उस तावीज़ को याद रखा कि जब भी कोई काम करो तो पहले इस पर विचार कर लो कि इससे सीढ़ी के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को कितना लाभ होगा। राज्य का एक ही उद्देश्य है- अंत्योदय। यानि सबसे नीचे बैठे व्यक्ति का उदय। यह तभी सम्भव था यदि भ्रष्टाचार को समाप्त किया जाता ताकि जनकल्याणकारी योजनाओं का पैसा इस अंतिम व्यक्ति तक पहुंच पाता। नोटबंदी को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए और देश की जनता ने देखा भी। यही कारण था कि नोटबंदी के बाद हुए चुनावों में भारतीय जनता पार्टी जीती।

यहां उन योजनाओं की सूचियां गिनाने की जरुरत नहीं है जिनका सीधा लाभ आम जनता को हुआ है। यही स्थिति जीएसटी की है। नोटबंदी व जीएसटी से सबसे ज्यादा कष्ट उनको हुआ है जिन्होंने अपने हितों के लिए पूरे सिस्टम पर क़ब्ज़ा कर रखा था। वे लम्बे अरसे से इस सिस्टम को हाईजैक करके उसे अपने निजी हितों के लिए इस्तेमाल कर रहे थे। इसी से राजनीति में अपराधी जगत का बोलबाला हो रहा था। मोदी ने इसी गठबंधन को साहस से तोड़ने की दिशा में क़दम बढ़ाए। मोदी देश के भीतर गतिशीलता का प्रयास कर रहे हैं। विरासत से जुड़े रहकर स्वर्णिम भविष्य बनाने के लिए वर्तमान में कठिन संघर्ष, यही मोदी का मूलमंत्र है और यही देश के युवा का भीतरी संकल्प है। आजतक इस संकल्प को कोई आवाज़ देने वाला नहीं था। मोदी ने यही कर दिखाया है। पूर्वोत्तर राज्यों में संचार व आवागमन को विकसित करने के मोदी के प्रयास इसी दिशा में पहल है। उत्तर पूर्व के सभी राज्यों को रेलवे के नेटवर्क सेे जोड़ने का प्रयास देश की युवा पीढ़ी में एक नई चेतना जगाती है।

नरेन्द्र मोदी ने भारत के पड़ोसी देशों के साथ सांस्कृतिक आधार पर परम्परागत सम्बंधों को पुख़्ता करने की दिशा में ध्यान दिया। दक्षिण पूर्व एशिया और मध्य एशिया को अहमियत दी जा रही है। दरअसल युगों युगों से सांस्कृतिक दृष्टि से एक समान भौगोलिक क्षेत्र जम्बू द्वीप के पुराने सांस्कृतिक सम्बंधों को पुनः सींचने के प्रयास सही तरीके से मोदी के शासन काल में ही हुए। इसके अतिरिक्त पूरे विश्व की राजनीति में भारत की प्रतिष्ठा बढ़ी है। इसमें मोदी की नई पहल और भारत में विकसित हुए नए आत्मविश्वास की ही प्रमुख भूमिका है। पहली बार चीन के साथ बराबर के स्तर पर बातचीत हुई है।

लेकिन असली प्रश्न है- एक साल बाद 2019 में अगली लोकसभा के लिए चुनाव होने वाले हैं। ज़ाहिर है मोदी सरकार को आम जनता के पास अपना रिपोर्ट कार्ड प्रस्तुत करना होगा, उसी के आधार पर जनता अपना निर्णय देगी। लेकिन शायद विपक्ष को लगता है कि वे अपने बलबूते नरेन्द्र मोदी सरकार को अपदस्थ नहीं कर सकते। इसलिए वे आपस में बार-बार मिलने की कोशिश करते दिखाई दे रहे हैं।

धुर विरोधी राजनैतिक दल, जिनका आपस में कुछ भी साझा नहीं है, वे भी किसी तरह एक मंच पर एकत्रित होने की कोशिश कर रहे हैं। उदाहरण के लिए सारी दुनिया को क्रांति का पाठ पढ़ाने वाले सीपीएम के लोग किसी भी हालत में सोनिया कांग्रेस से समझौता करना चाहते हैं। उधर सोनिया कांग्रेस तो मुस्लिम लीग तक से समझौता करने को आतुर है। विपक्षी पार्टियों की हालत का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी तक हाथ मिला रहे हैं। ममता बैनर्जी का मामला जरा टेढ़ा है। वह सभी विपक्षी दलों से आग्रह कर रही हैं कि भाजपा को हराने के लिए आपस में मिल जाओ लेकिन साथ ही पश्चिम बंगाल में न आने की सख़्त ताकीद भी कर देती हैं।

विपक्षी दलों के पास नरेन्द्र मोदी पर हमला करने के अभी तक कुल मिला कर दो बिन्दु बनते बिगड़ते रहते हैं। पहला नोटबन्दी और दूसरा जीएसटी। उनका कहना है कि इन दो कामों से देश की अर्थव्यवस्था चौपट हो गई है। लेकिन नोटबंदी और जीएसटी के बाद देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में चुनाव हुए, उसमें जनता ने भाजपा को भारी बहुमत से जिताया और शेष सभी विपक्षी दलों को अपमानजनक शिकस्त दी। उसके बाद त्रिपुरा के चुनाव में एक बार फिर आम जनता ने भाजपा को भारी बहुमत से जिताकर इन दोनों मुद्दों पर अपना निर्णय दे दिया।

लेकिन विपक्ष की समस्या कुछ और गहरी है। उसके पास मोदी पर हमला करने के लिए आख़िर और कौन सा मुद्दा बचता है, जिसके चलते देश के लोग विपक्ष पर विश्वास कर लें? उनके पास मोदी के चार साल के शासन पर उंगलियां उठाने के लिए कोई मुद्दा ही नहीं है। इसलिए सोनिया कांग्रेस इसी मुद्दे पर अलग अलग लोगों को मैदान में उतारती रहती है। कर्नाटक में उसने मनमोहन सिंह को ही मैदान में उतार दिया। डॉ. सिंह ने भी कह दिया कि नोटबंदी और जीएसटी से देश की आर्थिक व्यवस्था चरमरा गई है।

कांग्रेस को शायद यह आशा थी कि मनमोहन सिंह जानेमाने अर्थशास्त्री हैं, इसलिए लोग कम से कम उनकी बात पर तो विश्वास करेंगे ही। यह ठीक है कि मनमोहन सिंह ख्यातिप्राप्त अर्थशास्त्री हैं लेकिन उनके अर्थशास्त्र ने तथाकथित विकास का जो रास्ता पकड़ा था वह विकास की ओर तो नहीं अलबत्ता भ्रष्टाचार के भयानक दलदल में परिवर्तित हो गया। शायद इसीलिए किसी ने कहा है कि किसी भी देश की आर्थिकी इतनी महत्वपूर्ण होती है कि उसे केवल अर्थशास्त्रियों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। ग़लती से देश के लोगों ने उसे अर्थशास्त्री के हवाले कर दिया था, और उसका परिणाम देश आज तक भुगत रहा है।

क्या कारण है कि मीडिया के साथ तालमेल बिठा कर विपक्षी दलों द्वारा नरेन्द्र मोदी पर किए जा रहे निरंतर हमलों के बाद भी उन पर देश की आम जनता का विश्वास बदस्तूर जमा हुआ है? इसका कारण बहुत ही स्पष्ट है। पिछले सत्तर साल में राजनीतिज्ञों ने अपनी चाल, चरित्र और चेहरे के बल पर आम जनता का विश्वास ही नहीं खोया बल्कि व्यवस्था के प्रति एक निराशा भी उत्पन्न की। सब राजनीतिज्ञ एक ही थैली के चट्टेबट्टे हैं, यह आम धारणा बन गई। नरेन्द्र मोदी ने अपने कार्यों, व्यक्तित्व और परिश्रम से इस धारणा को बदला है। मोदी आम राजनीतिज्ञ से हट कर हैं।

जिन पर आम आदमी भरोसा कर सकता है। देश को विश्वास है कि मोदी दिल से ही आम आदमी की भलाई के लिए काम करना चाहते हैं। जहां काम की गति धीमी है, वहां दोष मोदी का नहीं बल्कि उन सभी का है जो किसी भी तरह हर हालत में मोदी को अपदस्थ करना चाहते हैं। मोदी की नीतियों से आम आदमी को लाभ हुआ है। डिजिटलाइजेशन के कारण रिश्वत बहुत हद तक समाप्त हो गई है। जीएसटी के कारण करों की मात्रा कम हो गई है। लेकिन साथ ही बहुत देर तक समझौता भी तो नहीं किया जा सकता। जिनके दशकों से जमे आसन उखड़े हैं, वे तो चिल्लाएंगे ही और चिल्ला भी रहे हैं। उनका चिल्लाना ही बताता है कि चोट सही जगह लगी है।

जो चिल्ला रहे हैं, उन्हीं के साथ सोनिया कांग्रेस के पुराने रिश्ते हैं। इसलिए उन्हें उनकी पार्टी देश के लोगों के लिए नहीं बल्कि इन्हीं स्वार्थी लोगों के लिए हैं, जो डिजिटाइजेशन का नाम सुन कर कांपते हैं। यही पारदर्शिता कांग्रेस, सीपीएम जैसे लोगों के लिए बहुत परेशान करने वाली है। ये दल जानते हैं कि एक बार मोदी दिल्ली में जम गए, उसके बाद उन्हें उखाड़ना मुश्किल होता जाएगा। इसलिए वे उन्हें उखाड़ने के लिए हर तरीका इस्तेमाल कर  रहे हैं।

लेकिन मोदी की असली ताक़त उनका जनता से सीधा संवाद है। यह संवाद ग्रामीण क्षेत्रों में ज्यादा कारगार हो रहा है। उनकी नज़र में देश मोदी पर अभी भी विश्वास कर सकता है। मोदी की ताकत का स्रोत उनका जनता के साथ सीधा सम्पर्क और उनका विश्वास है। यही लोकतंत्र की असली ताकत है।

 

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  1. मोदी सरकार के लिए २०१९ का चुनाव चुनौतियों भरा होगा। २०१४ वाली मोदी लहर अब देश में कहीं नहीं है। मोदी सरकार की कोई खास उपलब्धि नहीं है जिसे जनता के बीच बताया जा सके। चार वर्षों में भाजपा का सिर्फ कांग्रेसी करन ही हुआ है। भाजपा के मूल कार्यकर्ता ही भाजपा के नेताओं से नाराज़ हैं। २०१९ में शायनिंग इंडिया वाली हाल होगी।

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