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सन 1492 में भारत की खोज में कोलंबस निकला और पश्चिमी द्वीप समूह में पहुंचा। स्पैनिश यात्रियों को सोने की खोज में भारत ((India) पहुंचने का भ्रम हुआ इसलिए उस नई दुनिया को उसने खपवळर नाम दे दिया तथा उनके निवासियोंको इण्डियन कहना प्रारंभ किया।

किन्तु जब पूर्व दिशा से वास्कोडिगामा के नेतृत्व India की खोज में निकला दल वास्तविक India  के कालीकट बंदरगाह पर 1498 में उतरा तब वहा के लोगों को Indians कहा जाने लगा।

कोलंबस द्वारा खोजे क्षेत्र के लोगों का रंग लाल था इसलिए उन्हें रेड इण्डियन कहा गया। स्पैनिश लोगों ने चार बार यात्रा की। इटली के निवासी अमेरिगो वेपुस्सी ने दो बार अभियान चलाया। अमेरिगो ने पत्र लिखा। new world – more densely peopled & full of animals than our Europe or Asia or Africa अमेरिगो के इस पत्र के आधार पर जर्मन मानचित्र बनाने वाले ने इस क्षेत्र के अपने मानचित्र में Land of Amerigo  नामकरण किया। जो धीरे धीरे बदलकर अमेरिका कहा जाने लगा। सन 1507 में यह क्षेत्र अमेरिका कहा जाने लगा।

प्रथम बार 90 स्पैनिशों के साथ स्पेन से सात पाल नौकाओं से चला क्रिस्टोफर कोलंबस जब 12 अक्टूबर 1492 को वर्तमान सन साल्वाडोर के सागर तट पर उतरा तब वहाँ के स्थानीय ‘अरावाक’ जनजाति के लोगों ने अतिथि के रूप में उनका खुले ह्रदय से एवं मैत्री भाव से स्वागत किया। उन आदिवासियों ने उस यात्री दल के सभी सदस्यों को अपने ढंग का उपहार देकर अतिथि के रूप में  उनका सम्मान किया। कोलंबस ने स्पेन के राजा को लिखा है कि  वे लोग कितने शांतिपूर्ण और सद्भावी है, जिसके आधार पर मैं निश्चयपूर्वक कहता हूँ कि सारे विश्व में उनसे उत्तम अन्य कोई राष्ट्र नहीं हैं। वे  अपने पड़ोसियों से आत्मीयतापूर्ण व्यवहार करते हैं। उनकी वाणी अत्यंत मधुर एवं सौम्य मुस्कराहट के साथ होती है। यद्यपि वे नग्न रहते है तथापि उनका व्यवहार अत्यंत शालीन तथा प्रशंसा योग्य है। ऐसे उदगार व्यक्त करने के बाद भी उन स्पैनिशों ने उनपर भीषण अत्याचार, शोषण व जनसंहार का जघन्य व घृणित व्यवहार किया। इन स्पैनिशों ने 50। 60 वर्षो में ज़ोर, जुल्म, अत्याचार व अग्नेयास्त्रों तथा छल।छद्म से वहाँ अपना विशाल साम्राज्य खड़ा कर दिया। सन 1493 में कोलंबस को दूसरी बार 17 बड़े जहाजों में 1500 सैनिको के साथ फिर भेजा गया। उस बार कोलंबस ने पोर्टेरीको सहित अन्य कई द्वीपों पर अपना अधिपत्य जमा लिया। उसने उनसे वहाँ के मूलनिवासी।जनजातियों को गुलाम बनाकर जमीन खरीदकर सोना निकालने का काम क्रूरतापूर्वक करवाया। वापसी में कई आदिवासियों को बंदी बनाकर साथ भी ले गया।

1506 में कोलंबस के निधन के पश्चात स्पैनिश खोजी हर्नान्ड़ो कोर्टीस 500 सैनिकों के साथ 1519 में क्यूबा से पश्चिम चलकर प्रथम बार मैक्सिको पहुंचा। वहां ‘एजटेक’ जनजातीय लोगों ने उनका स्वागत किया तथा उन्हें उपहार स्वरुप स्वर्ण भेट किया। एजटेक जनजाति के लोग अपने स्वजातीय प्रधान कठोर शासन से असंतुष्ट थे जिसके कारण स्पैनिशों के साथ राजधानी पर हमला करने पर एजटेकों ने कोर्टीस का साथ दिया। उन लोगों ने उसे पर्याप्त सोना उपहार में देकर वापस लौट जाने को कहा। किन्तु कोर्टीस ने उनका सोना भी ले लिया तथा पूरे मैक्सोको देश पर स्पैनिशों का साम्राज्य भी स्थापित कर दिया।

प्रतिक्रिया स्वरुप एजटेकों ने विद्रोह कर कोर्टीस सहित पूरी स्पैनिश सेना को भाग जाने को विवश कर दिया। किन्तु सोने के आकर्षणवश हर्नान्ड़ो कोर्टीस ने आग्नेयास्त्रों से सम्पन्न भारी सेना लेकर पुनः अगले वर्ष 1520 में उस नगर पर आक्रमण करके उसे पूरी तरह से तहस नहस कर दिया तथा ‘न्यू स्पेन’ नाम से उस देश की नई राजधानी ‘मैक्सिको सिटी’ बसाई।

इस साम्राज्य विस्तार के समय हर जगह बड़ी संख्या में वहाँ के मूल निवाईसियों पर स्पैनिशों ने निर्मम अत्याचार, कोड़ो की मार व दासो जैसा व्यवहार तथा स्त्रियों का शोषण किया। कितने ही बार जनसंहार भी किया गया। यह नंगा नाच दो सौ वर्ष तक चलता रहा।

ऐतिहासिक दस्तावेजो के अनुसार सन 1517 में स्पैनिशों ने प्रथम बार 5 हजार अश्वेत अफ्रिकियों को कई जहाजों में भरकर करीबियां देशों (वर्तमान वेस्टइंडीज) में स्थानांतरित कर के गुलामों के रूप में उनसे श्रमिकों का काम लिया। उनकी औरतों तक को केवल प्रतडित ही नहीं किया गया बल्कि उनका दैहिक योन शोषण भी किया। यहाँ से अमेरिका में अफ्रीकनों के दास प्रथा का प्रारंभ तथा उनकी करुण कथा का विश्व में नया एवं काला इतिहास प्रारंभ हुआ। आगे तो अफ़्रीकी दासों के क्रय विक्रय ने स्पैनिशों के व्यापार का नया स्वरुप ही धारण कर लिया।

ब्रिटिश अभियान। सन 1607 में ‘वर्जिनियाँ कम्पनी ऑफ़ लन्दन’ का गठन कर के प्रथम बार एक सौ अंग्रेज व्यापारियों को उस नए क्षेत्र में भेजा गया। वहाँ के स्थानीय आदिवासी ‘पौहटन’ ने अपने स्वजातीय स्वाभाव से उनका भी स्वागत किया। किन्तु अंग्रजों ने कूटनीति अपनाते हुए स्थानीय जनजाति प्रमुख ‘वहुनसोनाकुक’ को सोने का मुकुट पहना कर उस जनजाति का राजा घोषित कर दिया। उससे प्रभावित होकर राजा ने लोगों को अंग्रजों की सेवा करने व उनके कृषि कार्य में श्रमिक के रूप में कार्य करने को बाध्य कर दिया। वाहुनसोनाकुक ने 5 अप्रैल 1614 को अपनी बेटी ‘पोकाहोंटज’ का विवाह जॉन रौल्फ़ नाम के प्रमुख अंग्रेज से कराया। और स्वयं को इण्डियन के बजाय अंग्रेज समझने लगा।

अंग्रेज लोग बड़ी मात्रा में वहाँ के लोगों कीजमीन पर तम्बाकू की खेती करने लगे। जिस कारण उन लोगों का अंग्रेजों से विवाद होने लगा सन 1622 में संघर्ष शुरू हो गया, जो बीच बीच में शांत होता और उभरता रहा। सन 1644 में जो संघर्ष हुआ जिसमें यद्यपि इंडियन्स ने सैकड़ो अंग्रजों को मौत के घाट उतारा किन्तु दोनों ही बार इंडियन्स को ही पराजित होना पड़ा। अंग्रजों ने जेम्सटाउन नाम से प्रथम बस्ती बनाई। 1675 में नथैनिअल बेकन ने वर्जिनिया के अन्तःवर्ती क्षेत्रों के मूल निवासियों पर एक हजार अंग्रजों ने पुनः आक्रमण किया। स्थानीय लोगों के तीर कमान अंग्रजो के बन्दूक की गोलियों, आग्नेयास्त्रो के सामने टीक नहीं पाए। परिणामस्वरूप अपार जनहानि हुई। अंग्रजों की बर्बरता का इतिहास गवाह है कि थोड़े ही समय में उस क्षेत्र के 8 हजार आदिवासियों की संख्या घटकर एक हजार से भी कम रह गई।  सन 1670 में अंग्रजों की संख्या 40 हजार जा पहुंची।

सन 1662 में ‘वैम्पानोआग’ जनजाति के प्रमुख ‘मैसासोइट’ का देहान्त होने के बाद उसके पुत्र ‘मेटाकाम’ को किंग फिलिप नाम से राजा घोषित कर उसे अपनी और मिलाने की धूर्ततापूर्ण चेष्टा की। लेकिन मेटाकाम सजग था उसने इस षड़यंत्र को पहचाना और उसने अन्य जनजाति के लोगों के साथ भी अछे सम्बन्ध प्रस्थापित कर जनजाति संघ निर्माण किया। किंग फिलिप ने 1675 में अंग्रेजों के 52 उपनिवेशों पर एक साथ आक्रमण करके 12 बस्तियों को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। किन्तु अंग्रेजों के आग्नेयास्त्रो के सामने आदिवासी भला कैसे टिक पाते। अतः उन उपनिवेशवादियों ने पोकानोकेट एवं नैरंगासेट जनजातियों को उस क्षेत्र से समूल नष्ट कर दिया। इतना ही नहीं तो फिलिप की हत्या कर सार्वजनिक प्रदर्शन तथा अपना आतंक ज़माने हेतु सड़क पर 20 वर्षों तक उसके नरमुण्ड को लटका कर रखा। किंग फिलिप की पत्नी, बेटे सहित सैकड़ो जनजातीय स्त्रियों और बच्चों को पकड़कर वेस्ट इंडीज में दासों की भान्ति बेचकर अपनी निकृष्टता का परिचय दिया। धीरे धीरे कुछ ही वर्षों में अंग्रजों ने पूर्वी तटीय क्षेत्रों में अपने अपने समुदाय पर आधारित 13 ब्रिटिश उपनिवेश स्थापित कर दिए, जिसने आगे चलकर 50 स्वतंत्र राज्यों के सम्मिलित स्वरुप ‘संयुक्त राज्य अमेरिका’ नाम के श्वेतों के एक विशाल सशक्त राष्ट्र के नवनिर्माण की प्रमुख भूमिका अदा की।

डचों का आगमन

नीदरलैंड (हालैण्ड) के शासन ने हडसन नाम के एक ब्रिटिश नागरिक को समर्थन देकर 1610 में अमेरिका के अभियान पर भेजा। वह नौकायन करते करते नुअर्क की खाड़ी में पहुँच गया तथा निकटवर्ती भू प्रदेश को नीदरलैंड की सम्पति घोषित किया। सन 1634 में 300 डच एक स्थान पर बस गए तथा वहाँ के इंडियन्स के साथ फर व चमड़े का व्यापार करके लाभ कमाने लगे।  कुछ दिन बाद व्यापारियों का एक और दल हडसन नदी के उत्तरी तट के एक द्वीप पर आया। उन्होंने वहाँ रहनेवाले ‘मैहिकन’ जनजाति के लोगों को 50 मुद्रा तथा शीशे के चमकदार मोतियों का लालच देकर पूरा द्वीप खरीद लिया। उस द्वीप का नाम ‘मनहट्टन’ था। डच ओपनिवेशकों ने हालैण्ड की राजधानी ऐमस्टर्डम के नाम पर उसका नाम न्यू ऐमस्टर्डम रखा। आज वही मनहट्टन विश्व के आर्थिक गतिविधियों का केंद्र बन गया। अंग्रेजो ने यह नाम बदलकर इंग्लैंड के ड्रयूक ऑफ़ यॉर्क के नाम पर न्यूयॉर्क रखा।

1641 में क्रिफ्ट ने निकटवर्ती स्टेटन द्वीप के रैरिटन नाम के निरपराध आदिवासियों का दमन करने के लिए उनकी गिरफ़्तारी प्रारंभ की। उसके प्रतिरोध करने के कारण 4 रैरिटनों की डच सैनिकों ने हत्या कर दी। उन जनजातियों ने बदले में 4 डचों को मारा। उसके कारण क्रिफ्ट ने क्रोध में आकर दो गांवों के निवासियों का रात्रि में सोते समय ही संहार करने का आदेश दिया। और रातो रात नरसंहार कर दिया गया।

डचों ने उस न्यू ऐमस्टर्डम द्वीप में बाह्य आक्रमणों से अपनी सुरक्षा के लिए एक पक्की दीवाल खड़ी कर दी थी, जो आज Wall Street के नाम से प्रसिद्ध है।

इसी प्रकार यूरोपीय देशो ने अमरीकी भूभाग पर आक्रमण कर, वहा के मूल निवासियों के ऊपर अत्याचार, अनाचार एवं जनसंहार कर अपना अधिपत्य जमाया। वहाँ के मूलनिवासियों को शरणार्थी, गुलाम, आश्रित एवं दोयम दर्जे का नागरिक बनाया और आक्रान्ता मालिक बन गए। यही इतिहास आफ्रिका एवं ऑस्ट्रेलिया का भी है। आज वह मूलनिवासी अपनी पहचान खोज रहा है, अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहा है।

दुनियां  में भारत ही ऐसा एकमात्र देश है की संयुक्त राष्ट्र  संघ के मूल निवासी संरक्षण कानून के 57 वर्ष पूर्व याने 1950 में भारत अपने जनजाति समाज को वो सभी संवैधानिक अधिकार दे चुका है जिसका उल्लेख संयुक्त राष्ट्र संघ ने किया है।

This Post Has 2 Comments

  1. मैं बिहार का रहने वाला हुँँ.मुझे यह पत्रिका कैसे उपलब्ध हो सकती है. कृप्या मार्गदर्शन करें

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