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सन 2019 का चुनाव इस अर्थ में महत्वपूर्ण होने जा रहा है कि इसमें 21वीं सदी में पैदा होने वाला मतदाता भी हिस्सा लेगा।  जाहिर है कि नया मतदाता पुराने भ्रमजालों से बचते हुए अपनी शर्तों पर मतदान करेगा। चूंकि उसकी प्राथमिकताएं और अपेक्षाएं अलग होंगी अतः उसका मत भी अपेक्षाकृत राष्ट्रविकास पर अधिक केन्द्रित होगा। कुछ ऐसा ही महत्व महाराष्ट्र में हिंदी भाषी मतदाताओं का भी है। हिंदी भाषी व्यापक क्षेत्र से सम्बद्ध होने के कारण काफी उदार हैं। उनमें भाषिक आग्रह के बजाय राष्ट्रीय मुद्दे अधिक प्रभावी होते हैं। हिंदी भाषी मतदाता अपनी राजनीतिक सजगता के कारण अधिकतर उसी राजनीतिक दल अथवा प्रत्याशी को मत देते हैं, जो यथार्थ में मतदाताओं के हितों को ध्यान में रखकर नीति-निर्माण करते हैं तथा मतदाताओं से किए गए वादों को पूरा करते हैं।

आगामी चुनाव में जो मुद्दे महाराष्ट्र में असरदार रहेंगे उनमें एक मुद्दा मुंबई के डॉ.राम मनोहर त्रिपाठी हिंदी भाषा भवन का है। गौरतलब है कि पिछली सरकार ने मुंबई विश्व विद्यालय के कालीना परिसर में हिंदी भाषा भवन के निर्माण के लिए पांच करोड़ की राशि स्वीकृत की थी जिसमें से दो करोड़ की पहली किश्त विश्वविद्यालय के खाते में जमा हो गई थी। बाकी राशि खर्च होने के बाद उपनगरीय जिला विकास व नियोजन अधिकारी के पास से जारी होनी है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि 10 सितंबर 2014 को तत्कालीन उद्योग मंत्री नारायण राणे और सांस्कृतिक मंत्री नसीम खान के हाथों उक्त हिंदी भवन का भूमिपूजन भी हो गया था। लेकिन सरकार बदलने के बाद वर्तमान शिक्षा मंत्री ने कुछ नहीं किया। उन्होंने कई बार मीडिया के सामने यह आश्वासन दिया लेकिन ठोस रूप में कुछ नहीं हुआ।

इसी तरह महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी के कामकाज को लेकर भी हिंदी भाषियों में आक्रोश है। यह अब तक के इतिहास की सबसे कमजोर समिति मानी जा रही है। यहां योग्यता को प्राथमिकता देने के बजाय एक-दो लोगों की आपसी गुटबाजी ज्यादा प्रभावी है। पुरस्कारों के वितरण में पारदर्शिता का अभाव है। हिंदी भाषियों की अपेक्षा है कि अकादमी को यथोचित बजट मिले और उसका समुचित वितरण हो। हर क्षेत्र से आया हुआ हिंदी भाषी स्वयं को महाराष्ट्र की धरती से रागात्मक धरातल पर जोड़ता है। चूंकि हिंदी भाषी यहां एक बहुस्तरीय समाज की रचना करते हैं अतः उनकी समस्याएं और चुनौतियां भी बहुआयामी हैं। मुंबई और ठाणे जिले में बहुत बड़े पैमाने पर हिंदी भाषी झोपड़ों में रहते हैं। उनकी यही मांग है कि उन्हें हिंदी भाषी होने के कारण किसी तरह के भेदभाव का सामना न करना पड़े। विशेष रूप से झोपड़पट्टी पुनर्वास योजना में उनके साथ भेदभाव न हो। उनका वैध अधिकार उन्हें प्राप्त हो।

इसी तरह हिंदी भाषियों के जो शैक्षणिक संस्थान भाषायी अल्पसंख्यक के अंतर्गत संवैधानिक सुविधाओं का लाभ ले रहे हैं उनके अधिकारों की भी सुरक्षा सुनिश्चित रहे। बड़े उद्योगपतियों और व्यापारियों के हित तो सुरक्षित रहते हैं लेकिन फेरी वाले, छोटे दुकानदार, रिक्शा- टैक्सी वाले भी भाषायी आधार पर भेदभाव के शिकार न बनने पाएं , यही अपेक्षा है। चूंकि महाराष्ट्र एक उन्नत राज्य है और इसके विकास में हिंदी भाषियों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है अतः उन्हें अपनी ऊर्जा और उद्यम के बल पर अपना अवदान देने का सुअवसर मिलता रहे यही अपेक्षा है। वे महाराष्ट्र के सर्वोन्मुखी विकास में ऐतिहासिक भूमिका अदा करने के लिए संकल्पित हैं। अब ऐसा समय आ रहा है जब आपसी सहयोग और सौमनस्य के बल पर सबका समुचित विकास संभव होगा।

अगले चुनाव में भी तमाम राजनीतिक दल सत्ता प्राप्ति की प्रतिस्पर्धा में हिंदी भाषियों को लुभाने के लिए भी अपने घोषणापत्र में अनेक प्रकार के लुभावने वादे करेंगे। उस समय उनका ध्यान इस बात पर होगा कि मतदाता को प्रभावित करने वाला कोई आकर्षक मुद्दा छूट न जाए। इसके लिए जाति, धर्म, वर्ग, भाषा, क्षेत्र, शिक्षा, रोजगार, मूलभूत सुविधाएं, उद्योग-व्यापार जैसे कारकों के आधार पर मतदाताओं से वादे किए जाते हैं। हिंदी भाषी मतदाता इस अर्थ में अत्यधिक सजग है। उसे चुनावी घोषणापत्र द्वारा भ्रमित कर पाना  असंभव है। उनमें यथार्थ की सही समझ है। वे परिपक्व होकर देशहित और विकास के पक्ष में मतदान करेंगे। वे ’विकास की राजनीति’ अथवा ’देशहित की राजनीति’ करने वाले को विशेष महत्व देंगे। वे विकास के नारे को चरितार्थ करने में विश्वास करते हैं।

सरकार को अभी से ही ध्यान रखना होगा कि ग्रामीण क्षेत्र के बैंकों में पर्याप्त नकदी रहे और वहां के ए.टी.एम. सूखने न पाएं। हिंदी भाषी मतदाता इन्हीं अपेक्षाओं के साथ चुनाव को देख रहा है। हमारी वर्तमान सरकार अभी भी सतर्क होकर उनका विश्वास जीत सकती है। हमारा नया मतदाता विकास, देशहित, सुरक्षा और रोजगार जैसे मुद्दे से ही जोड़ता है। वह भेद अथवा वैमनस्य पैदा करने वाली शक्तियों से एक निश्चित दूरी बनाकर रखता है। चूंकि नया मतदाता अपेक्षाकृत ज्यादा सुशिक्षित है अतः उसे गैरजरूरी मुद्दे पसंद भी नहीं हैं। उसे रोजगार, उद्योग, विकास, व्यापार, जी.डी.पी . तथा महंगाई जैसे मुद्दे ज्यादा उद्वेलित करते हैं। अगले चुनाव में राजनीतिक दलों को अपने आपको ब्रांड की तरह पेश करना होगा। हमारा युवा मतदाता ब्रांड चाहता है कांड नहीं।

 

 

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