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पर्यटन में साधनों के विकास के साथ तेजी से इजाफा हो रहा है। आज देश के जीडीपी में पर्यटन उद्योग की भागीदारी लगभग साढ़े नौ प्रतिशत है। इससे नए-नए रोजगार उपलब्ध हो रहे हैं। ‘उड़ान’ जैसी नई योजना के अंतर्गत देश के छोटे हवाई अड्डों का विकास किया जा रहा है, जिससे देश में आंतरिक हवाई सफर आम नागरिकों की पहुंच में आ गया है।

वर्ल्ड ट्रैवल एण्ड टूरिज्म काउंसिल के सर्वेक्षण के अनुसार गत वर्ष याने सन 2017 में भारत का सकल राष्ट्रीय उत्पाद (जीडीपी) में पर्यटन का हिस्सा 9.4 प्रतिशत था। इसका मतलब है, विदेशों से भारत भ्रमण पर आनेवाले पर्यटकों एंव देश के अंदर ही पर्यटन स्थलों की सैर करनेवाले पर्यटकों ने कुल मिलाकर 15.24 लाख करोड़ रुपयों का योगदान दिया है। इन आंकड़ों से पर्यटन उद्योग का महत्व और देश की प्रगति में उसके योगदान का महत्व परिलक्षित होता है। भारत की हजारों वर्षा पुरानी परंपरा, रोमांचक इतिहास, वैविध्यपूर्ण भूगोल एंव अनोखे प्राकृतिक सौंदर्य के कारण देश की प्रगति में पर्यटन उद्योग की हिस्सेदारी नि:संदेह उल्लेखनीय होगी। भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूती देनेवाले इस उद्योग का विकास किस तरह होता गया, यह देखने योग्य है।

लगभग 50 वर्ष पूर्व भारत में पर्यटन तीर्थयात्रा तक सीमित था। भारतीय परंपरा के अनुसार प्रत्येक परिवार की एक कुलदेवता होती है। और कहीं जाए या न जाए, परंतु इस कुलदेवता के दर्शन के लिए लोग अवश्य जाया करते थे। इसके अलावा बारह ज्योतिर्लिंगों (जो उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक फैले हैं) की यात्रा, चार धाम यात्रा (गंगोत्री- यमुनोत्री-केदारनाथ-बद्रीनाथ) एंवं काशी यात्रा का भी अत्यधिक महत्व था। भारत में आंतरिक पर्यटन का दायरा यहीं तक सीमित था। विदेशी पर्यटक मुख्यत: ताजमहल, राजस्थान के किलों-रजवाड़ोंका सौंदर्य देखने आते थे।

उस समय पर्यटन के अनुकूल सुविधाओं का भी अभाव था। धीरे-धीरे यह स्थिति बदलने लगी। तीर्थयात्रा के साथ स्थल दर्शन भी भारतीय पर्यटकों को रास आने लगा। सत्तर से अस्सी के दशक में भी देशांतर्गत पर्यटन बहुत ज्यादा नहीं था। हवाई सेवाएं सीमित थीं एवं भारत जैसे विशाल क्षेत्र में रेल से सफर करना दुष्कर कार्य था। इस काल में परंपरा से चले आ रहे पर्यटन स्थल याने उत्तर में शिमला-मनाली, दक्षिण में कोडाई कनाल-उटी जैसे ठंडी हवा के क्षेत्र, राजस्थान में जयपुर-उदयपुर या दिल्ली-आगरा-मथुरा जैसे ऐतिहासिक स्थलों तक ही देशांर्तगत पर्यटन सीमित था।  धीरे-धीरे नागारिकों की मानसिकता बदलती गई और साल में कम से कम एक बार सपरिवार पर्यटन की इच्छा को साकार रूप दिया जाने लगा। देव दर्शन से स्थल दर्शन का प्रवास भारतीय समाज में शुरू हुआ। नब्बे के  दशक में इसमें तेजी से प्रगति हुई। उस समय तक कम्प्यूटर का उपयोग शासकीय एंव निजी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर प्रारंभ हो गया था। इससे रेल्वे आरक्षण जैसा कठिन एंव तकलीफदेह काम आसानी से होने लगा। बैंकों में भी इसके उपयोग के कारण एक स्थान से दूसरे स्थान में पैसे भेजना आसान हो गया।

इन सबके साथ ही वैश्वीकरण की दौड़ में भारत भी शामिल हुआ। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए भारतीय बाजार संभावनाओं से भरा था। उन्होंने इस ओर अधिक गंभीरता से ध्यान देना प्रारंभ किया। इसका भारत के मध्यम वर्ग की आर्थिक स्थिति पर अनुकूल प्रभाव पड़ा एवं उनका आर्थिक स्तर बढ़ता गया। डिजिटलाइजेशन के कारण विश्व के देश एक दूसरे के अधिक करीब आते गए। विदेशी कंपनियों ने भारत के उच्च शिक्षित एवं टेक्नोसेवी युवाओं को अपने यहां भर्ती करना शुरू किया। भारतीय युवाओं ने उनकी कार्यशैली के साथ उनकी जीवनशैली को भी स्वीकार करना आरंभ किया। इससे पर्यटन उद्योग को बड़े पैमाने पर प्रोत्साहन मिला एवं भारतीय पर्यटन क्षेत्र का स्वरूप ही बदल गया।

लेकिन फिर भी भारतीय पर्यटकों के लिए विदेश पर्यटन महंगा सौदा था। परंतु नब्बे के दशक में आर्थिक स्तर में सुधार के कारण विदेशी पर्यटन भारतीय पर्यटकों की क्षमता में आता गया। फलस्वरूप दक्षिण-पूर्व एशिया के थाईलैण्ड-मलेशिया-सिंगापुर से लेकर यूरोप के फ्रांस-इटली-जर्मनी-स्विट्जरलैण्ड-इंग्लैण्ड-नीदरलैण्ड तक भारतीय पर्यटकों ने प्रवास करना शुरू किया। देशांतर्गत पर्यटन में भी इसका प्रभाव देखने को मिला। स्थल दर्शन तक  सीमित पर्यटन के अनेक अलग-अलग प्रकार सामने आने लगे। इनमें साहसी पर्यटन, वन्य जीव पर्यटन, महोत्सव पर्यटन, व्यंजन पर्यटन, धरोहर पर्यटन जैसे अनेक प्रकार हैं।

हमारे देश की भौगोलिक-सांस्कृतिक-प्राकृतिक विविधताओं के कारण इन्हें हम अनुभव कर सकते हैं। उत्तर में कश्मीर से पूर्व में सिक्किम तक फैली हुई हिमालय की
पर्वतमाला में पर्वतारोहण, ट्रेकिंग, कैंपिंग, माउंटेन बाइकिंग सरीखे साहसिक पर्यटन को बढ़ावा मिला है। दार्जिलिंग या मनाली के माउंटेनियरिंग इंस्टिट्यूट में प्रशिक्षित पर्वतारोहियों से लेकर केवल आनंद के लिए पर्वतारोहण करनेवाले विविध स्तरों के पर्यटकों को ‘एडवेंचर टूरिज्म’ का लाभ मिलने लगा। गंगा नदी के उफनते प्रवाह में वॉटर राफ्टिंग तो प्रसिद्ध थी ही, परंतु मनाली के बियास, दार्जिलिंग के पास तीस्ता, लद्दाख में झंंस्कार एवं महाराष्ट्र में कुंडलिका नदी में भी इस साहसिक खेल की सुविधा प्राप्त हुई। महाराष्ट्र के ताड़ोबा से लेकर राजस्थान में रणथंबोर तक एवं कर्नाटक में काबिनी से लेकर उत्तरखंड में जिम कॉर्बेट नेशनल पार्कतक भारत के विभिन्न जंगलों में बाघों से लेकर हाथियों तक वन्य जीव पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र बने। पुरी की रथयात्रा, मथुरा की होली, मैसूर का दशहरा जैसे पारंपरिक उत्सव भारत में प्राचीन समय से मनाए जा रहे हैं। अब इनके साथ ही महोत्सव प्रेमियों के लिए खजुराहो महोत्सव, हॉर्नबिल महोत्सव, अलेप्पी बोट रेस जैसे महोत्सव मनााए जा रहे हैं। इस महोत्सव पर्यटन का आनंद उठाने के लिए देशी पर्यटकों के साथ विदेशी पर्यटकों की भीड़ बढ़ती जा रही है।

संक्षेप में कहें तो भारतीय पर्यटन का रंग-रूप ही बदल गया है। भारत की अर्थव्यवस्था को इससे बहुत आधार मिल रहा है। पर्यटन एक ऐसा  उद्योग है जिससे स्थानीय लोगों कों बड़े पैमाने पर रोजगार उपलब्ध होता है। जब एक पर्यटक किसी पर्यटन स्थल पर जाता है तो कम से कम नौ लोगों को रोजगार मिलता है। इसमें वाहन चलाने से लेकर गाइड तक के रोजगार शामिल हैं। जब किसी पर्यटन स्थल पर एक होटल खुलता है तब उसमें बावर्ची से लेकर सुरक्षा कर्मी तक विभिन्न स्तरों पर प्रशिक्षित, अर्ध प्रशिक्षित, अप्रशिक्षित लोगों को रोजगार मिलता है।

आवागमन की सुविधाओं में सुधार आने से पर्यटन को बढ़ावा मिलता है। भारत में हवाई सेवाओं का विकास होने से भारतीय पर्यटन को बढ़ावा मिल रहा है। नब्बे के दशक में सरकार ने हवाई सेवा के नियमोें में बदलाव किया एंवं निजी
विमान कंपनियों को भी हवाई सेवा उपलब्ध कराने की अनुमति दी। इससे लोगों को स्पर्धात्मक दरों पर विमान टिकटें उपलब्ध होने लगीं। आज भारतीय नागरी विमान सेवा विश्व की तीसरी बड़ी हवाई सेवा है और 2020 तक इसका क्रमांक दूसरा होगा।

अप्रैल 2017 में हवाई सेवा को अधिकाधिक लोगों तक पहुंचाने के उद्देश्य से सरकार ने ‘उड़ान’ अर्थात ‘उड़े देश का आम नागरिक’ योजना का शुभारंभ किया। इस योजना के अंतर्गत भारत के विभिन्न प्रांतों में कम उपयोग में आनेवाले 70 हवाई अड्डों पर हवाई सेवा की व्याप्ति बढ़ाने का निर्णय किया गया है और ऐसे छोटे हवाई अड्डों की संख्या 150 तक करने का विचार है। इस योजना का अपेक्षित परिणाम हो रहा है। सन 2016 की तुलना में 2017 में हवाई यात्रियों की संख्या में 18.5% की बढ़ोत्तरी हुई है।

भारतीय पर्यटन उद्योग के विकास में विदेशी पर्यटकों की संख्या निश्चित ही उल्लेखनीय है। गत कुछ वर्षों के आकड़ें यदि हम देखें तो पता चलता है कि विदेशी पर्यटकों की संख्या निरंतर बढ़ रही है। सन 2008 में यदि यह सहभाग 5.28% था तो 2012 में वह 6.58% हो गया। 2015 में यह प्रतिशत 8.02 हो गया। विदेशी पर्यटकों के कारण हमें विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है, जिसका उपयोग अर्थव्यवस्था की मजबूती में होता है। सन 2005 में इन विदेशी पर्यटकों के कारण हमारे देश को 7493 मिलियन अमेरिकी डॉलर की विदेशी मुद्रा प्राप्त हुई तो 2016 में यह आकड़ा बढ़कर 22923 मिलियन तक पहुंच गया।  विदेशी पर्यटक भारत में अधिक आसानी से आ सके इसलिए भारत की सरकार ने 40 देशों के नागरिकों के लिए ई-वीजा योजना प्रारंभ की है। इस योजना के अंतर्गत नवम्बर 2014 से इन 40 देशों के नागरिकों को भारत में पहुंचने पर 16 अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों पर वीजा प्रदान करने की सुविधा मुहैया कराई गई है। इस योजना का फायदा लेने हेतु उन्हें भारत आने के पूर्व उनके देश में स्थित भारतीय दूतावास जाने की आवश्यकता नहीं होती। उन्हें इसके लिए ऑनलाइन इलेक्ट्रॉनिक ट्रेवल आथराइजेशन लेना पड़ता है। इस योजना का सकारात्मक परिणाम तुरंत दिखाई पड़ा। यह योजना लागू होने के पूर्व अक्टूबर 2014 में 2705 विदेशी पर्यटक आए थे, जबकि अक्टूबर 2015 में इनकी संख्या बढ़कर 56477 हो गई। विदेश पर्यटकों के लिए अब ’मेडिकल टूरिज्म” भी उपलब्ध है; ताकि वे देश की चिकित्सा सुविधाओं का लाभ उठा सके। सन 2015-2016 में भारती अस्पतालों में चिकित्सा कराने 4,60,000 विदेशी पर्यटक आए। इससे मेडिकल टूरिज्म की व्याप्ति पता लगती है। एक सर्वेक्षण के अनुसार 2017 में मेडिकल टूरिज्म से तीन अरब डॉलर प्राप्त हुए और आनेवाले कुछ वर्षों में यह आय दुगुनी होने का अनुमान है।

भारत के कुल रोजगार में 8.78% रोजगार की निर्मिति पर्यटन उद्योग के माध्यम से होती है। आनेवाले वर्षों में यह प्रतिशत निःसंदेह और बढ़ेगा। एक समय विदेशी पर्यटकों को भारत कहने पर केवल ताजमहल और खजुराहो ही ज्ञात थे परंतु आज केरल की पंचकर्म चिकित्सा से लेकर स्पीति घाटी के बौद्ध मठ तक भारत के अनेक रूपों का उन्हें दर्शन होता है। देशांतर्गत पर्यटन में भी अंडमान, असम, मेघालय, अरूणाचल प्रदेश जैसे उपेक्षित राज्य अब आगे आ रहे हैं।

पर्यटन के लाभ हैं तो नुकसान भी हैं। विशेषतः पर्यावरण पर पड़नेवाला हानिकारक प्रभाव। पर्यावरण पर होनेवाला प्रतिकूल परिणाम और स्थानीय लोगों के शोषण को रोका जाना चाहिए। नैनीताल, अंडमान, मेघालय जैसे पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील स्थानों पर लागू प्लास्टिक बंदी, स्थानीय कला – कलाकारों को बढ़ावा देने के लिए आरंभ शासकीय दुकानों से प्राप्त फायदों को उस राज्य तक पहुंचाने की आवश्यकता की ओर ध्यान दिया जाना आवश्यक है। पर्यटन बढ़ेगा तो देश भी संपन्न और सुदृढ़ होगा इसमें कोई संदेह नहीं है।

 

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