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आज नवभारत टाईम्स दैनिक अखबार ने व्यक्ती इस नाते हमारे रिश्तों में जो परिवर्तन हो रहा है उसे स्पष्ट करनेवाला न्यूज प्रकाशित किया है। पालघर जिले के मनोर में पटेल परिवार ने 65 साल की महिला का निधन हो गया। उनके पति किसी काम के वजह से अन्य  कहीं गये थे। ऐसी स्थिती में पडोसियों ने अहमदाबाद में रहनेवाली उनकी बेटी को उस महिला के निधन के संदर्भ में खबर दे दी और अंतिम विधी को जल्द ही रवाना होने की सुचना दी। पर उस महिला की बेटी ने पड़ोसियों को जवाब दिया की आप मेरी माता का अंतिम संस्कार कर लिजीए वह अंतिम संस्कार की विधी मुझे ऑनलाइन दिखाईए और अंतिम संस्कार के बाद उनकी अस्थियां मुझे कुरियर से रवाना किजिए। उस खबर को पढ़कर मानवीय सबंध और आधुनिकता  एक विचारों की शृखंला मन में निर्माण हुई है उसे व्यक्त करने का प्रयास कर रहा है।

वर्तमान में भारतीय समाज के रूप में हमने तेजी से आधुनिकता की ओर बढ़ना शुरू किया। लेकिन क्या इस भौतिक प्रगति को ही हम आधुनिकता मानें? हमारे व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में, हमारी अनुभूतियों में विवेकी परिवर्तन होना चाहिए? आधुनिकता का अर्थ यही है। आधुनिकता शब्द में अनेक मूल्यों का समावेश होता है। इन मूल्यों के लक्षण भी होते हैं। भारतीय समाज बाहरी रूप से तो आधुनिक दिखाई देता है, किंतु क्या वह अंतर्मन से भी वाकई आधुनिक बन गया है? पिछले कुछ दशकों में तंत्रज्ञान में हुई चमत्कारिक प्रगति क्या आधुनिकता की दिशा में चल रहा परिपूर्ण सफर है? मतलब, क्या हम आधुनिक हैं? इस प्रश्न का अब तक का उत्तर है नही उपर दर्शाई गयी घटना और विभिन्न स्थानों पर अथवा हमारे अगल बगल  मे घटने वाली घटनाएं हमें यही बता रही है कि हम व्यक्ती का रुप अब तक सही मायने में विवेक पूर्ण आधुनिक नही हुये है।

व्यक्ति विचार कर सकता है। विचार किसका करें? विचार इस बात का करें कि अच्छा क्या है, बुरा क्या है; उचित क्या है, अनुचित क्या है?बहुत सरसरी तौर पर कहना हो तो आदर्श समाज व्यवस्था, परिवार व्यवस्था की दिशा में मार्गक्रमण करना ही आधुनिकता है। समाज की आधुनिकता का रिश्ता समाज की समकालीन धारणाओं से जुड़ा होता है। भारतीय के रूप में हमारे समाज का वैचारिक स्तर क्या सुधर रहा है?  एक बेटी ने अपनी ही मां के अंतिम
क्षणों मे जो अमानविय वर्तन अथवा अति अधुनिकता का दर्शन दिया है, इसे देखते हुए यांत्रिकीकरण के बाद वैश्विक स्तर पर हुए बाह्य परिणामों कों अपनाते हुए आधुनिकता की दिशा में जानेवाले भारतीय समाज का इस दिशा में सोचना अनिवार्य है।

आधुनिकता की इस दौड़ में कल शायद व्यक्ति को दीर्घ आयु प्राप्त हो, उसका यौवन लम्बे समय तक बना रहे। कल कार भी आसमान में उड़ने लगे। हवाई जहाजों, ट्रेनों, वाहनों की गति और बढ़े। 300-400 मंजिलों की महाकाय इमारतों में स्कूल, कॉलेज, मैदान, सभागृह, थिएटर, अस्पताल जैसी किसी शहर में उपलब्ध सभी सुविधाएं हो; यहां तक कि स्मशान भूमि भी हो। मनुष्य की आवश्यकता, व्यावहारिक क्षमता और तकनीकी का समन्वय हो जाए तो कोई बात असंभव नहीं लगेगी। इन सभी बातों की ओर देखने पर एक प्रश्न अवश्य उपस्थित होता है कि केवल तकनीकी प्रगति से उत्पन्न यह महाकाय और प्रचंड आधुनिकता क्या भारतीय मन को सुख प्रदान करेगी? इस प्रश्न का उत्तर फिलहाल तो नहीं ही देना होगा।

समाज परिवार एवं व्यक्ति के रूप में वैचारिक विशालता के बारे में हम विकास नहीं कर पाए। लगता है, इस बारे में हम पिछड़ गए हैं। केवल बाहरी आधुनिकता की ओर न देखते हुए हमारे समाज में और उसके अंतर्मन में ‘सामाजिक अत्याधुनिकता’ पूरी तरह रिसेगी तभी सच्चे अर्थ में हमारे विकास का चक्र पूरा होगा।

यदि हम भारत को एक शरीर मान लें तो वर्तमान में दिखाई दे रहा खोखला विकास शरीर का बाहरी हिस्सा हुआ।

विकास के बड़े-बड़े मानक हमने पार किए। दुनिया बदल रही है और उसके प्रभाव भी दिखाई दे रहे हैं। पिछले दस वर्षों में सुनामी की तरह अचानक आई और सर्वत्र उफन उठी अत्याधुनिकता का क्या करें?इंटरनेट कनक्टीविटी दिखाई दे रही है पर व्यक्ति का व्यक्ति के मन में कनेक्टीविटी किस प्रकार निर्माण हो  उस कनेक्टिविटी को कैसे सम्हालें? यही लोगों को ठीक से पता नहीं होता। मनोर में घटी मानवीय रिश्तों को शर्मसार करनेवाली घटना इस बात का जिवंत उदाहरण है।

इंटरनेट, डिजिटल से नए भारत की रचना की रूपरेखा बन रही है।  अत्याधुनिक विकास हम करेंगे ही; अब तक के सफर में उसे हमने साबित किया भी है। लेकिन भारतीय मन विकसित होकर एक दूसरे के मन की कनेक्टिविटी करना यह मानविय रूपरेखा में होना आवश्यक है।  व्यक्ति, समाज, समुदाय परस्पर रिश्तों को संभालने में इतना सड़ता जा रहा हो तो इस प्रकार का अत्याधुनिक विकास महत्वपूर्ण नहीं होता।

 

                                        मो .  9869206106

 

 

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