अटल जी की खींची लकीर लंबी है…

अटल जी का करिश्माई व्यक्तित्व सदा याद किया जाएगा। उन्होंने ऐसी लम्बी लकीर खींची है, जिस पर चलना अब हमारा कर्तव्य है। उनसे प्रेरणा लेकर काम करें तो भारत को परमवैभव तक पहुंचने से कोई रोक नहीं सकता। भारत वाकई महान है, जिसने विश्व को ऐसी महान विभूति दी।

अटली बिहारी वाजपेयी जी कीमृत्यु के पश्चात संपूर्ण देश ने जिस भाव-विह्वलता से उन्हें श्रध्दांजलि अर्पित की, उस पूरे माहौल को देखते हुए वाजपेयी जी की राजनीति के प्रारंभिक दिनों का एक किस्सा याद आ रहा था। सत्तर के दशक में यह बात कोई मान भी नहीं सकता था कि अटल बिहारी वाजपेयी और उनकी पार्टी केंद्र की सत्ता में होंगे। उस दौर में एक पत्रकार ने वाजपेयी जी से पूछा था कि, आप इतने प्रभावी राजनेता होकर भी ऐसी पार्टी में क्यों हैं, जिस पार्टी का सत्ता तक पहुंचना दूर-दूर तक संभव नहीं दिखता? पत्रकार परोक्ष रूप से कहना चाहता था कि आप अगर कांग्रेस में चले जाएं तो आपको देश का बड़े से बड़ा पद प्राप्त करना संभव हो सकता है। वाजपेयी जी ने इसके जवाब में कहा, “तेरा वैभव अमर रहे मां, हम दिन चार रहें न रहें।” उस पत्रकार को यह कहां पता था कि वाजपेयी जी के लिए राजनीति केवल सत्ता प्राप्ति का साधन नहीं थी। उनके लिए तो राजनीति राष्ट्र को परमवैभव तक ले जाने का साधन थी। राजनीति के प्रति यह अनोखी सोच हीकारण है कि जब अटल जी की मृत्यु हुई तब केंद्र में भाजपा की सत्ता है, 22 राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं, यहां तक कि राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति तथा प्रधानमंत्री भी उसी विचारधारा से जुड़े हुए हैं।

किसी परिवार के उत्तराधिकारी के रूप में कुर्सियां हासिल करना भारत की राजनीति की परंपरा रही है। किंतु वाजपेयी जी इस लीक से हटकर निकले। वाजपेयी जी की सामान्य पारिवारिक पृष्ठभूमि और उन्होंने पार्टी की निरंतर वृद्धि के लिए जो संघर्ष किया उसे देखकर लगता है कि संकल्प और विचारधारा किस तरह एक सामान्य परिवार से आए व्यक्ति में राष्ट्र परिवर्तन का बीजारोपण करती है। शायद इसी कारण राजनैतिक विरासत न होने के बावजूद भी उनके साथ ‘संघ परिवार’ नामक एक ऊर्जावान परिवार था। अटल जी राष्ट्रवाद की ऊर्जा से भरे एक ऐसे महापरिवार के नायक बने।  अटल जी की उन क्षमताओं को पूरे देश ने महसूस किया जिसने भारत मां के वैभव को अमरत्व देने की कोशिश करते हुए देश का नेतृत्व सफलता से निभाया।

अटल जी अत्यंत संवेदनशील व्यक्ति और उच्च दर्जे के कवि भी थे। अन्य कवियों की तरह अटल जी भी सपने देखते थे, पर कैसे सपनें? जरा अटल जी में बसे कवि के सपनें तो देखिए-

आदमी को चाहिए,

वह जूझे, परिस्थितियों से लड़े,

एक स्वप्न टूटे तो दूसरा गढ़े।

और वे कहते थे,

मै तो समष्टि के लिए व्यष्टि का कर सकता बलिदान अभय

हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन, रग रग हिन्दु मेरा परिचय।

इसी कारण अपना कोई घरबार न बसाकर, एकाकी जीवन जीकर, अपने-आप को समाज और देश के लिए उन्होंने पूरी तरह समर्पित कर दिया। हमारी भारतीय संस्कृति समष्टि पर, सामूहिकता पर बहुत गर्व करती है। इसी कारण सामान्य परिवार में जन्मे अटल जी कीमृत्यु के बाद उनकी अंतिम यात्रा में देश के प्रधानमंत्री से लेकर सैकड़ों मान्यवर अंतिम विदाई देने के लिए साथ-साथ चल रहे थे। साथ ही सवा सौ करोड़ भारतीय जनता उन्हें भावपूर्ण आदरांजलि अर्पण कर रही थी।

अटल जी कवि थे, एक संवेदनशील व्यक्ति थे। सच्चाई तो यह है कि कविता और राजनीति साथ-साथ नहीं चल सकती। पर अटल जी का कहना था कि, जब कोई साहित्यकार राजनीति करेगा तो वह अधिक परिपक्व रूप में करेगा, वह मानवीय संवेदनाओं को नकार नहीं सकता। अटल जी की यह बात शतप्रतिशत सही साबित हुर्ई। अटल जी संवेदनशील होने के साथ ही प्रखर वक्ता भी थे। अन्य राजनैतिक व्यक्तियों से उनकी तुलना करना गलत होगा। उनके अंदर का वक्ता बड़ी-बड़ी प्रस्तावना न देकर सीधे मुख्य विषयों पर संवाद प्रस्थापित करता था। अपने सामने उपस्थित जन समुदाय की नब्ज पहचान कर अटल जी अपनी प्रस्तुति देते थे। उनके वक्तव्य हमेशा राजनैतिक विषयों पर ही नहीं वरन राजनीति से अलग विषयों पर भी होते थे। लेकिन गैरराजनैतिक भाषण होते हुए भी वे उनके सम्मुख उपस्थित लाखों श्रोतांओं को कभी यह भूलने नहीं देते थे कि यह भाषण राजनीति में सक्रिय व्यक्ति  का है। सटीकमुद्दों के साथ वे विरोधकों पर सीधा प्रहार करते थे। वे संस्कार भी करते थे और अपनी भाषण कला से लाखों श्रोताओं को वश में भी कर लेते थे।

अटल जी को कविता विरासत में मिली थी। उनके पिता पं. कृष्ण बिहारी वाजपेयी ग्वालियर रियासत के जाने-माने कवि थे। परिवार के साहित्यिक वातावरण का प्रभाव अटल जी केभाइयों पर भी था। ऐसे वाजपेयी परिवार ने देश को एक ऐसा नायक दिया जो वास्तव में भारतीय संस्कृति का विस्तारक बना। याद कीजिए अटल जी की कविता

‘जग को अमृत का घट देकर हमने विष का पान किया था,

मानवता के लिए हर्ष से अस्थिवज्र का दान किया था।’

अटल जी अपनी कविताओं में, भाषणों में और जीवन में जो कुछ प्रकट करते थे, उसमें मातृभूमि की अर्चना के सिवा और क्या था? अटल जी सही मायने में भारतीय राजनीति में सुशासन के प्रचार के अग्रदूत थे।

उन्होंने भारतीय राजनीति में राष्ट्रीयता की विचारधारा को प्रस्थापित किया और उसी विचारधारा को सामान्य जन के बीच स्थापित करने का प्रयास भी किया है। वर्ष 1989 में लोकसभा चुनावों के पश्चात वाजपेयी लोकसभा के सदस्य थे। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं संसदीय दल के नेता दोनों ही पदों पर लालकृष्ण आडवाणी ही थे। फिर भी वाजपेयी जी में कोई असंतोष या विषाद देखने को नहीं मिला। दूसरे किसी दल में कोई लोकप्रिय राजनैतिक नेता ऐसी स्थिति कतई सहन नहीं करता था। भारतीय राजनीति में इसके सैकड़ों उदाहरण देखने को मिल जाते हैं, जब व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के चलते पार्टी दो गुटों में विभाजित होकर रह गई थी। पर वाजपेयी जी वे राजनेता थे जिनकी राजनीति व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए न होकर राष्ट्र निर्माण के लिए थी। अटल जी सहज भाव से अपना काम करते रहे-

‘क्या हार में क्या जीत में किंचित नहीं भयभीत मैं

संघर्ष पथ पर जो मिले यह भी सही वह भी सही।’

अटल जी के चेहरे के नटखट भावों, छोटे बच्चों जैसा निश्छल हास्य, गंभीर मुद्दों पर आवाज में आरोह-अवरोह और हावभावों से संपूर्ण सभा को सम्मोहित करने के उनके कौशल को जिन्होंने देखा है वे धन्य हैं। ‘वाजपेयी जी का भाषण है’ इस वाक्य को अत्यंत उत्साह से बताते हुए भाषण के दिन की राह देखी जाती थी। केवल यही नहीं, भाषण के बाद अटल जी ने क्या कहा इस पर कई दिनों तक चर्चा होती रहती थी। इसके पीछे कारण भी वैसा ही था। अटल जी का विषय प्रस्तुत करने का अलग अंदाज, मंत्रमुग्ध कर देने वाला वक्तव्य, उसमें उनके प्रदीर्घ अनुभव का प्रतिबिंब। वे अपनी सुसंस्कृत वाणी से श्रोताओं को तृप्त कर देते थे। वाजपेयी जी के राजनीतिक, सामाजिक और अन्य भाषण बहुत लोकप्रिय होते थे। अन्य नेताओं से अटल जी का भाषण निराला होता था। इसका कारण यह था कि अटल जी कवि, नेता, अच्छे पाठक, रसिक श्रोता और सामाजिक कार्यकर्ता भी थे।

वैसे तो अटल जी लिखने-पढ़ने की दुनिया में ही रहना चाहते थे। किन्तु कश्मीर की वेदी पर डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बलिदान ने अटल जी को झकझोर दिया। अटल जी को राष्ट्र निर्माण की दिशा में आगे आने के लिए व्याकुल कर दिया और वे राजनीति की रपटीली राह पर चल पड़े। उस समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की बात कहने वाला लोकसभा में कोई भी नहीं था। संघ के वरिष्ठ स्वयंसेवकों में इस विषय पर गहन विचार- विमर्श हुआ। निश्चय किया गया कि रा.स्व.संघ अपना राजनीतिक दल खड़ा करें, जो चुनाव में भी भाग लें।

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नेतृत्व में भारतीय जनसंघ की स्थापना हुई। एक पत्रकार के नाते डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के संपर्क में अटल जी आए। डॉ. मुखर्जी ने अटल जी में संभावनाओं को भांप लिया। उनके साथ अटल जी ने कई यात्राएं कीं। जब डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने बगैर परमिट कश्मीर में दाखिल होने की यात्रा प्रारंभ की तब अटल जी उनके साथ थे। जब डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी बगैर परमिट कश्मीर मे दाखिल हुए, तो उन्होंने अटल जी से कहा कि दिल्ली जाकर पूरे देश को बता दो कि मैं बगैर परमिट कश्मीर चला आया हूं। अटल जी दिल्ली लौट आए और बाईस दिन बाद हिरासत में डॉ. मुखर्जी का निधन हो गया। तब अटल जी ने तय किया कि उन्हें राष्ट्र के लिए कुछ जिम्मेदारियां निभानी हैं और वे राजनीति में आ गए।

राजनीति में अटल जी के द्वारा खींची गई लकीर इतनी लंबी है जिसे पार कर पाना संभव नहीं है। अटल जी सही मायने में एक ऐसी विरासत के उत्तराधिकारी हैं जिसने राष्ट्र को सर्वोपरि माना। राष्ट्र के बारे मे सोचा और अपना सर्वस्व राष्ट्र के लिए अर्पित किया। अटल जी की संपूर्ण राजनीति राष्ट्र के हितों के संकल्पों को समर्पित रही। उनके विदेश मंत्री रहते पड़ोसी देशों से रिश्तें सुधारने के प्रयत्न हुए। प्रधानमंत्री रहते भी उन्होंने इसके लिए दिल से प्रयास जारी रखे थे। भले ही करगिल में हम से धोखा किया गया, पर अटल जी का मन इन सब के बाद भी प्रांजलता से भरा रहा। बदले की भावना न उनके मन में थी न उनके राजनीति में। इसी कारण अटल जी अजातशत्रु कहे जाते थे।

1998 में जब अटल बिहारी वाजपेयी जी देश के प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने देश के राजनैतिक इतिहास में एक नया अध्याय लिखा था। उनके प्रेरक और प्रतिबद्ध नेतृत्व के चलते भारत एक मजबूत और स्वाभिमानी राष्ट्र के रूप में दुनिया के सामने खड़ा हो गया। वाजपेयी सरकार ने समाज के सब से दुर्बल और कमजोर तबके के उत्थान के लिए जो प्रतिबध्दता दिखाई वह वाकई काबिले-तारीफ थी। 1998 के पहले कांग्रेस राज में भारी कर्जे में डूबा भारत वाजपेयी जी की अगुवाई में न केवल पिछला कर्ज चुका सका; बल्कि छोटे-छोटे देशों समेत अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष तक को कर्ज देने की स्थिति में आ गया था। नदियों को जोड़ने की बात किसी ने सोची नहीं थी।

पोखरण में परमाणु बम विस्फोट कर अटल जी ने समूचे विश्व को चौंका दिया था। वह पोखरण का विस्फोट भारत की सामरिक शक्ति का परिचय मात्र था। पोखरण विस्फोट ने प्रत्येक भारतवासी को रोमांचित किया था। अटल जी ने अपने कार्यकाल में अपने बजट का रुख ग्रामीण विकास और किसानों की ओर कर दिया। भारत के बजट में ग्रामीण विकास को पहले कभी भी इतना महत्व नहीं मिला था। इसे आज भी लोग याद करते हैं।

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी वर्षों तक विपक्ष में रहे। उन्होंने विपक्ष को सदैव दायित्व के रूप में लिया। विपक्ष का दायित्व अटल जी ने एक प्रहरी के रूप में निभाया। सत्ता की प्राप्ति के लिए अटल जी ने कभी सिध्दांतों से समझौता नहीं किया। आज मृत्यु बाद भी अटल जी जीवंत इतिहास की तरह देश को प्रेरणा दे रहे हैं। ऊर्जा भर रहे हैं। उन्होंने स्वाभिमान की स्वच्छ राजनीति का पाठ पढ़ाया है। उसमें राजनीति कम और राष्ट्रीय चेतना ज्यादा थी। सारा जीवन एक तपस्वी की तरह जीते हुए अटल जी राजधर्म निभाते रहे। सत्ता के गलीयारों में रह कर भी अपनी नैतिक शुचिता कायम रखी। अटल जी अपने जीवन कार्य से एक लंबी लकीर खींच कर गए हैं। अटल जी के चाहने वालों को उस लकीर को अब बड़ा करना है। स्वतंत्र भारत के इस आखरी करिश्माई व्यक्तित्व को सदियों तक याद किया जाएगा। अटल जी की यादें, अटल जी की प्रेरणा लेकर काम करें तो भारत को परमवैभव तक पहुंचने से कोई रोक नहीं सकता। भारत वाकई महान है, जिसने विश्व को ऐसी महान विभूति दी।

आपकी प्रतिक्रिया...