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वैश्वीकरण का साम्राज्यवादी चेहरा श्री अटल जी को मान्य नहीं था परंतु वैश्वीकरण के मानवीय रूप को वे स्वीकार करने के पक्षधर थे। इसी कारण वे न्यायोवित्त बहुपक्षीय आर्थिक समझौते के पक्ष में थे। साम्राज्यवादी ताकतों के खिलाफ दक्षिण-दक्षिण सहयोग संगठन को मजबूती प्रदान करने में उनकी अहम भूमिका थी।

यूरोपियन- अमेरिकन राजनीतिकारों ने वैश्वीकरण की घोषणा की। दूसरे महायुध्द के बाद उन्हें तीसरे जगत के बाजार से हटना पड़ा था। वहां किस तरह से अपने पैर पसारे जाए इस हेतु से यह राजनीति बनाई गई थी। उपनिवेशवाद एशिया, अफ्रीका तथा लेटिन अमेरिका से समाप्त हो गया था। नई वैश्विक परिस्थिति में दूसरे महायुध्द के पूर्व का उपनिवेशवाद नहीं लाया जा सकता था। इसके लिए नए प्रकार के उपनिवेशवाद की राजनीति बनाना आवश्यक था। इसी राजनीति का उद्घोष वैश्वीकरण के रूप में हुआ।

अटल जी समय को पहचानने वाले राजनीतिक नेता थे। राजनीति एवं वित्त नीति की जो वैश्विक व्यापकता है, उसे झुठलाया नहीं जा सकता था। आदानप्रदान की राजनीति एवं अर्थव्यवस्था के समर्थक थे इसलिए वैश्वीकरण पर अर्थपूर्ण बहस हो इसके पक्षधर थे। वे वैश्वीकरण के अंधे विरोधक नहीं थे। उनकी यह भूमिका विरोधी दल के नेता के नाते जैसी प्रकट हुई उससे अधिक प्रधानमंत्री बनने के बाद प्रगट हुई। उन्होंने पाश्चिमात्य प्रभावित वैश्वीकरण को दक्षिण-दक्षिण के सहयोग से थामने में यश पाया।

प्रधानमंत्री बनने के बाद 1997-98 में जमैका में जी-15 परिषद में उन्होंने आवाहन किया कि विश्व व्यापार संगठन के अंतर्गत दक्षिण-दक्षिण सहयोग को मजबूती प्रदान की जाए। श्री वाजपेयी के प्रधानमंत्री होने के पूर्व तीन महत्वपूर्ण मंत्रीस्तरीय बैठकें हुई थीं। 1994 में मराकेश में पहली परिषद हुई। उस समय श्री नरसिंह राव प्रधानमंत्री एवं श्री प्रणव मुखर्जी व्यापार मंत्री थे। उस समय भारत ने संसद को विश्वास में लिए बिना वैश्विक व्यापार संधि पर हस्ताक्षर कर दिए थे। पश्चिमी देशों ने ऐसा हौवा निर्माण किया था कि जो इस संधि पर हस्ताक्षर नहीं करेगा वह विश्व में अकेला पड़ जाएगा। इस कारण, भारत अपनी भूमिका आग्रह के साथ नहीं रख पाया। परिणाम स्वरूप तृतीय विश्व व्यापार संगठन नेतृत्वविहीन हो गया। उसके बाद विश्व व्यापार संगठन की मंत्रीस्तरीय दो बैठकें क्रमश: सिंगापुर एवं जिनेवा में हुई थीं और भारत में उस समय क्रमश: श्री देवगौड़ा एवं गुजराल प्रधानमंत्री थे एवं पी.चिदम्बरम वित्त मंत्री थे। दोनों परिषदों में विश्व व्यापार संगठन का कामकाज बढ़ा। दक्षिण गोलार्ध के देश हाथ मलते रह गए।

जमैका में अटल जी ने दक्षिण-दक्षिण सहयोग का आवाहन किया। उनके प्रधानमंत्री पद की कालावधि में विश्व व्यापार संगठन की तीसरी मंत्रीस्तरीय बैठक सिऍटल में हुई। यूरो-अमेरिकन देशों ने पहली बार दक्षिण-दक्षिण सहयोग का संगठित होकर मुकाबला किया। उनके साम्राज्यवादी घमंड पर प्रहार करते हुए भारत ने अपना पक्ष रखा। तृतीय विश्व के देशों के आपसी सहयोग के कारण सिएटल परिषद असफल सिध्द हुई। नवउपनिवेशवाद पर यह कठोर आघात था। अटल जी ने इसके पूर्व ही भारत को अणुशक्ति संपन्न बनाकर साम्राज्यवादी मंसूबों को शह दे दी थी। पश्चिमी जगत चकित होकर विस्मयसे देखता रहा। भारत उनका सीधा-सीधा मुकालबा करेगा, ऐसी कल्पना भी उन्होंने कभी नहीं की थी।

सिएटल में घायल हुआ वैश्वीकरण दोहा परिषद में पुन: सम्हला। यूरोपियन समुदाय एवं अमेरिका ने अपने मतभेद बाजू में करके दोहा में किसी भी प्रकार से सफल होने की नीति बनाई। इसके कारण दोहा इस विषय में भयानक संघर्ष का मैदान साबित हुआ। भारत के प्रतिनिधि श्री मुरासोली मारन ने, अटल जी द्वारा दक्षिण- दक्षिण सहयोग की जो नींव रखी थी, उसकी सफलतापूर्वक पैरवी की। परंतु पश्चिमी देशों ने उस नींव को उखाड़ने के लिए सभी दांवपेंच आजमाए थे। उनको कुछ सफलता भी मिली, इसके कारण श्री मारन ने आगामी परिषद की नई कार्यसूची पर चर्चा करने की सहमति दी परंतु पूर्वशर्त के रूप में उन्होंने ट्रिप्स पर चर्चा भी करा ली एवं अनिवार्य अनुमति पत्र हेतु स्पष्टीकरण भी सब को सुलभ कराया। मारन का यह जो योध्दा रूप था उसके पीछे शक्ति थी श्री अटल जी की।

अलग-अलग टुकडों में बिखरने वाले दक्षिण-दक्षिण सहयोग को पुन: साथ लाकर एकत्रित करने की आवश्यकता थी। भारत ने वह काम किया। सितंबर 2003 में मेक्सिको के कानकून में जो पांचवीं परिषद हुई उसमें भारतीय नेतृत्व कसौटी पर था। व्यापार मंत्री श्री अरूण जेटली ने बड़ी कुशलता से दक्षिण-दक्षिण सहयोग की आवश्यकता बताई। ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, मलेशिया तथा चीन ने संयुक्त होकर इस युध्द का सामना किया। कानकून बैठक का हाल भी सिएटल जैसा ही हुआ। सिंगापुर के मुद्दों को स्वीकार नहीं किया गया एवं कृषि समझौते पर हस्ताक्षर नहीं हुए। यूरो-अमेरिकन दांवपेंच किसी काम नहीं आए। साम्राज्यवादी आर्थिक आक्रमणों के विरोध में दक्षिण-दक्षिण सहयोग संगठन बनाने में श्री वाजपेयी सफल हुए एवं नवउपनिवेशवाद के रथ की गति को थामने में वे सफल हुए।

मराकेश, सिंगापुर एवं जिनेवा में उपनिवेशवाद का रथ तीसरे विश्व के सार्वभौमत्व को रौंदता हुआ आगे बढ़ रहा था। सिएटल, दोहा एवं कानकून में उसमें लगाम लगी और वह पकड़ में था एवं आगे नहीं बढ़ सकता था। श्री अटल बिहारी वाजपेयी का नेतृत्व इस संबंध में मील का पत्थर साबित हुआ।

वैश्वीकरण का साम्राज्यवादी चेहरा अटल जी को मान्य नहीं था परंतु वैश्वीकरण के मानवीय रूप को वे स्वीकार करने के पक्षधर थे। सिएटल दोहा एवं कानकून में उन्होंने अपना पक्ष दृढ़ता के साथ रखा परंतु अनेक पहलुओं वाली इस संरचना में किसी प्रकार का रोड़ा उन्हें मान्य नहीं था। साम्राज्यवादी वैश्वीकरण के स्थान पर मानवीय वैश्वीकरण के वे समर्थक थे। इसके कारण वे न्यायोवित्त बहुपक्षीय आर्थिक समझौते के पक्ष में थे। कानकून में भारत वैकल्पिक कार्यप्रणाली प्रस्तुत करने को तैयार था परंतु पश्चिमी देशों को वह पसंद नहीं था। सकारात्मक वैश्वीकरण हो ऐसी श्री वाजपेयी की इच्छा थी परंतु नकारात्मक वैश्वीकरण से लड़ने में ही उनका कार्यकाल समाप्त हो गया।

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