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 संंदर्भ : अमृतसर में रावण दहन के अवसर पर रेल ने लिए 60 लोगों के प्राण

अमृतसर में रावण दहन के अवसर पर हुआ रेल हादसा सीधे-सीधे प्रशासनिक लापरवाही का सबब है। इस लापरवाही के चलते उत्सव में शामिल 61 लोग असमय काल के गाल में समा गए और दर्जनों स्थार्इ विकलांगता के शिकार हो गए। दशहरे जैसे पावन और प्रचलित पर्व पर घटा यह भयंकर हादसा शोक के साथ मन को बेचैन करने वाला है। क्योंकि प्रशासन को पता था कि जिस स्थल पर घटना घटी है, वहां प्रत्येक वर्ष रावण, कुंभकर्ण और मेघनाथ के पुतले जलाए जाते हैं और बड़ी मात्रा में आतिशबाजी छोड़ी जाती है। इस सांस्कृतिक उत्सव को देखने हजारों लोग उल्लास के साथ आते हैं। बावजूद यह समझ से परे है कि रेल पटरियों के एकदम निकट रावण दहन क्यों करने दिया ? परंपरा के अनुसार यह जरूरी भी था तो रेल विभाग को दहन के समय रेलें आउटर पर ही रोकने की हिदायत क्यों नहीं दी गर्इ। रेल महकमे को भी इस दिन सावधानी बरतने की इसलिए जरूरत थी, क्योंकि उसे पता था कि पटरियों के निकट रावण दहन होता है। इसलिए एक तो रेलों को आउटर पर ही रोके रखने की जरूरत थी, दूसरे यदि रेल निकालना जरूरी था तो उसकी गति धीमी रखने की जरूरत थी। जब रावण जला और आतिशबाजी के भीषण विस्फोट होने लगे तो श्रद्धालु दर्शक पटरियों पर खड़े हो गए। इस शोर के चलते उन्हें रेल के इंजन और होर्न की अवाज भी सुनार्इ नहीं दी। संयोग से इसी समय दोनों दिशाओं से 100 की गति से रेलें आर्इं और दर्शकों को रौंदती निकल गर्इ। जलांधर एक्सप्रेस की चपेट में सबसे ज्यादा लोग आए। देश में धार्मिक मेलों और सांस्कृतिक आयोजनों के दौरान भीड़ में भगदड़ मचने से होने वाले हादसों का सिलसिला लगातार बढ़ रहा है। बावजूद देखने में नहीं आया कि किसी अधिकारी की जबावदेही सुनिश्चित की गर्इ हों और उसे दंडित किया जाकर नौकरी से हाथ धोने पड़े हों ? यही कारण है कि मेले-ठेलों में हादसों का सिलसिला लगातार बना हुआ है।
ठीक इसी किस्म की लापरवाही केरल में कोल्लम के पास पुत्तिगंल देवी मंदिर परिसर में हुर्इ त्रासदी के समय देखने में आर्इ थी। इस घटना में 110 लोग मारे गए थे और 383 लोग घायल हुए थे। यह ऐसी घटना थी, जिसे मंदिर प्रबंधन और जिला प्रशासन सचेत रहते तो टाला जा सकता था। क्योंकि मलयालम नववर्ष के उपलक्ष में हर वर्ष जो उत्सव होता है, उसमें बड़ी मात्रा में आतिशबाजी की जाती है और इसका भंडारण मंदिर परिसर में ही किया जाता है। आतिशबाजी चलाने के दौरान एक चिंगारी भंडार में रखी आतिशबाजी तक पहुंच गर्इ और भीषण त्रासदी में लोगों की दर्दनाक मौतें हो गर्इं। यह हादसा इतना बड़ा और हृदयविदारक था कि खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिकित्सकों का दल लेकर कोल्लम पहुंचना पड़ा था। लेकिन इस तरह से संवेदना जताकर और मुआवजा देने की खानापूर्ति कर देने भर से मंदिर हादसों का क्रम टूटने वाला नहीं हैं। जरूरत तो शीर्ष न्यायालय के उस निर्देश का पालन करने की है, जिसमें मंदिरों में होने वाली दुर्घटनाओं को रोकने के लिए राष्ट्रव्यापी समान नीति बनाने का उल्लेख है। यदि प्रधानमंत्री इस हादसे से सबक लेकर इस नीति को बनाने का काम करते हैं तो शायद अमृतसर रेल हादसा नहीं हुआ होता ?

भारत में पिछले डेढ़ दशक के दौरान मंदिरों और अन्य धार्मिक आयोजनों में उम्मीद से कर्इ गुना ज्यादा भीड़ उमड़ रही ह्रै। जिसके चलते दर्शनलाभ की जल्दबाजी व कुप्रबंधन से उपजने वाली भगदड़ व आगजनी का सिलसिला जारी है। धर्म स्थल हमें इस बात के लिए प्रेरित करते हैं कि हम कम से कम शालीनता और आत्मानुशासन का परिचय दें। किंतु इस बात की परवाह आयोजकों और प्रशासनिक अधिकारियों को नहीं होती। इसलिए उनकी जो सजगता घटना के पूर्व सामने आनी चाहिए, वह अकसर देखने में नहीं आती। लिहाजा आजादी के बाद से ही राजनीतिक और प्रशासनिक तंत्र उस अनियंत्रित स्थिति को काबू करने की कोशिश में लगा रहता है, जिसे वह समय पर नियंत्रित करने की कोशिश करता तो हालात कमोबेश बेकाबू ही नहीं हुए होते ?
हमारे धार्मिक-आध्यात्मिक आयोजन विराट रुप लेते जा रहे हैं। कुंभ मेलों में तो विशेष पर्वों के अवसर पर एक साथ तीन-तीन करोड़ तक लोग एक निश्चित समय के बीच स्नान करते हैं। दरअसल भीड़ के अनुपात में यातायात और सुरक्षा के इंतजाम देखने में नहीं आते। जबकि शासन-प्रशासन के पास पिछले पर्वों के आंकड़े हाते है। बावजूद लपरवाही बरतना हैरान करने वाली बात है। दरअसल, कुंभ या अन्य मेलों में जितनी भीड़ पहुंचती है और उसके प्रबंधन के लिए जिस प्रबंध कौशल की जरुरत होती है, उसकी दूसरे देशों के लोग कल्पना भी नहीं कर सकते ? इसलिए हमारे यहां लगने वाले मेलों के प्रबंधन की सीख हम विदेशी साहित्य और प्रशिक्षण से नहीं ले सकते ? क्योंकि दुनिया किसी अन्य देश में किसी एक दिन और विषेश मुहूर्त के समय लाखों-करोडों़ की भीड़ जुटने की उम्मीद ही नहीं की जा सकती ? बावजूद हमारे नौकरशाह भीड़ प्रबंधन का प्रशिक्षण लेने खासतौर से योरुपीय देशों में जाते हैं। प्रबंधन के ऐसे प्रशिक्षण विदेशी सैर-सपाटे के बहाने हैं, इनका वास्तविकता से कोर्इ संबंध नहीं होता। ऐसे प्रबंधनों के पाठ हमें खुद अपने देशज ज्ञान और अनुभव से लिखने होंगे।
प्रशासन के साथ हमारे राजनेता, उद्योगपति, फिल्मी सितारे और आला अधिकारी भी धार्मिक लाभ लेने की होड़ में व्यवस्था को भंग करने का काम करते हैं। इनकी वीआर्इपी व्यवस्था और यज्ञ कुण्ड अथवा मंदिरों में मूर्तिस्थल तक ही हर हाल में पहुंचने की रुढ़ मनोदशा, मौजूदा प्रबंधन को लाचार बनाने का काम करती है। नतीजतन भीड़ ठसाठस के हालात में आ जाती है। ऐसे में कोर्इ महिला या बच्चा गिरकर अनजाने में भीड़ के पैरों तले रौंद दिया जाता है और भगदड़ मच जाती है। आंध्रप्रदेश में गोदावरी तट पर घटी घटना एक साथ दो मुख्यमंत्रियों के स्नान के लिए रोक दी गर्इ भीड़ का परिणाम थी।
धार्मिक स्थलों पर भीड़ बढ़ाने का काम मीडिया भी कर रहा है। इलेक्ट्रोनिक मीडिया टीआरपी के लालच में इसमें अहम् भ्ाूमिका निभाता है। वह हरेक छोटे बड़े मंदिर के दर्शन को चमात्कारिक लाभ से जोड़कर देश के भोले-भाले भक्तगणों से एक तरह का छल कर रहा है। इस मीडिया के अस्तित्व में आने के बाद धर्म के क्षेत्र में कर्मकाण्ड और पाखण्ड का आंडबर जितना बड़ा है, उतना पहले कभी देखने में नहीं आया। निर्मल बाबा, कृपालू महाराज और आशाराम बापू, रामपाल जैसे संतों का महिमामंडन इसी मीडिया ने किया था। हालांकि यही मीडिया पाखण्ड के सार्वजनिक खुलासे के बाद मूर्तिभंजक की भ्ाूमिका में भी खड़ा हो जाता है। निर्मल बाबा और आशाराम के साथ यही किया गया। मीडिया का यही नाट्य रुपांतरण अलौकिक कलावाद, धार्मिक आस्था के बहाने व्यक्ति को निष्क्रिय व अंधविश्वासी बनाता है। यही भावना मानवीय मसलों को यथास्थिति में बनाए रखने का काम करती है और हम र्इश्वरीय अथवा भाग्य आधारित अवधारणा को प्रतिफल व नियति का कारक मानने लग जाते हैं। दरअसल मीडिया, राजनेता और बुद्धिजीवियों का काम लोगों को जागरुक बनाने का है, लेकिन निजी लाभ का लालची मीडिया,धर्मभीरु राजनेता और धर्म की आंतरिक आध्यात्मिकता से अज्ञान बुद्धिजीवी भी धर्म के छद्म का शिकार होते दिखार्इ देते हैं। यही वजह है कि पिछले एक दशक के भीतर मंदिर हादसों में लगभग 3500 हजार से भी ज्यादा भक्त मारे जा चुके हैं। बावजूद श्रद्धालु हैं कि दर्शन, श्रद्धा, पूजा और भक्ति से यह अर्थ निकालने में लगे हैं कि इनको संपन्न करने से इस जन्म में किए पाप धुल जाएंगे, मोक्ष मिल जाएगा और परलोक भी सुधर जाएगा। गोया, पुनर्जन्म हुआ भी तो श्रेष्ठ वर्ण में होने के साथ समृद्ध व वैभवशाली भी होगा। जाहिर है,धार्मिक हादसों से छुटकारा पाने की कोर्इ उम्मीद निकट भविष्य में दिखार्इ नहीं दे रही है ?

 

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