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सभी को आश्चर्य चकित करते हुए डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के नए राष्ट्रपति चुने गए। उनके कार्यकाल में अब अमेरिका कैसा होगा इसके अनुमान लगाए जा रहे हैं। अमेरिका में बेरोजगारी बढ़ी है, ओबामा की अमेरिकी चिकित्सा बीमा योजना के प्रति बहुत ज्यादा असंतोष है, अर्थव्यवस्था गतिहीन हो गई है, जिहादी इस्लामी आंदोलन का डर कम नहीं हुआ है। इस पृष्ठभूमि में राजनीतिक अनुभवविहीन ट्रंप सत्ता पर आए हैं। चुनाव के समय उन्होंने अमेरिकी जनता को अनेक आश्वासन दिए हैं- जैसे उद्योगों का स्वदेशीकरण, रोजगार के लिए बाहर से आने वालों पर प्रतिबंध, अवैध आप्रवासियों को देश से बाहर निकालना, चिकित्सा बीमा का निजीकरण, जिहाद के विरोध में संघर्ष को प्राथमिकता देते हुए अमेरिका में आनेवाले मुसलमानों की जांच करना, अमेरिका की अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी कम करना, जिन्हें अमेरिका का संरक्षण चाहिए उन्हें वैसा सशुल्क देना आदि। अब उनकी पूर्ति करना ट्रंप की जिम्मेदारी है।

प्रचार माध्यमों के विरोध के परे

    
ट्रंप ने जब राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ने की घोषणा की थी तब से अमेरिकी प्रचार माध्यम उनका मज़ाक उड़ा रहे थे। अत्यंत अगंभीर, राजनीतिक रूप से नासमझ, एक मनमौजी अमीर व्यक्ति के रूप में ट्रंप की छवि खड़ी की गई। उन्हें रिपब्लिकन पार्टी का उम्मीदवार बनना था। इस उम्मीदवारी के लिए जो प्राथमिक चुनाव हुए उनमें भी उन्हें किसी ने गंभीरता से नहीं लिया। परंतु वे चुनाव उन्होंने जीत लिए। रिपब्लिकन पार्टी से उनकी उम्मीदवारी घोषित होते ही मीडिया में यह प्रचार शुरू हो गया कि ट्रंप के रूप में अमेरिका पर महाभयंकर संकट मंडरा रहा है। अपने बेखौफ एवं बेबाक भाषणों से भी ट्रंप ने प्रचार माध्यमों को दुष्प्रचार का मसाला दिया। महिलाओं से संबंधित उनके वक्तव्य, किस्से, उनके द्वारा न चुकाए गए कर आदि का बड़ा प्रचार किया गया। यह प्रचार इस तरह था कि मानो हिलेरी क्लिटंन जीतने ही वाली हैं और चुनाव महज औपचारिकता रह गई है। परंतु अमेरिकी जनमानस में कितना असंतोष पनप रहा है इसका अंदाजा प्रसार माध्यम नहीं लगा सके। ट्रंप ने इस असंतोष की भावना को ही हवा दी। प्रचार माध्यम एवं सोशल मीडिया के वर्तमान विश्व में भी हृदय का संवाद कितना प्रभावी है इसका अहसास इस चुनाव ने करा दिया।

सभी क्षेत्रों में कड़ी चुनौती

      कृषि, उद्योग, सेवा व असंगठित क्षेत्र जैसे चार-पायों पर वर्तमान अर्थव्यवस्था खड़ी है। इनमें से कृषि को छोड़ कर शेष तीन पर मूल अमेरिकियों का प्रभाव कम होता जा रहा है। उद्योग क्षेत्र में प्रमुखता से चीन तथा सेवा क्षेत्र में भारत तथा चीन के साथ ही अनेक अन्य देशों का प्रभाव है। असंगठित क्षेत्र पर मेक्सिकन व लैटिन अमेरिका के अन्य देशों का प्रभाव बढ़ रहा है। इसके कारण अर्थव्यवस्था में मंदी, कम होते रोजगार, अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी के कारण बढ़ता खर्च इन सब से अमेरिका को बाहर निकाल कर उसका पुनर्वैभव लौटाने का आश्वासन ट्रंप ने चुनाव के दौरान दिया था। अमेरिकी मतदाताओं ने उन पर भरोसा जताया है। उपरोक्त चक्रव्यहू से ट्रंप अमेरिका को कैसे बाहर निकालते हैं यह देखने वाली बात होगी। ट्रंप राजनीति में नए हैं। इस चुनाव में जिस रिपब्लिकन पार्टी के वे उम्मीदवार थे वह पार्टी भी केवल नाम के लिए उनके साथ थी। प्रचार माध्यम उनके सख्त विरोध में थे। अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव के साथ कुछ सीनेटर्स के भी चुनाव होते हैं। साधारणत: पार्टी का राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार एवं सीनेटर पद का उम्मीदवार अपना चुनाव प्रचार साथ-साथ ही करते हैं। परतु ट्रंप के साथ यदि प्रचार किया तो हम चुनाव हार भी सकते हैं इस डर से अनेक रिपब्लिकन उम्मीदवारों ने अपना प्रचार अलग से चलाया। सारी व्यवस्था विरोध में होते हुए भी उन व्यवस्थाओं के विरोध में जाकर अमेरिकी जनता ने ट्रम्प को जिताया है। इसका अर्थ यह हुआ कि मतदाताओं को यह विश्वास हो गया था कि वर्तमान व्यवस्था उनके प्रश्नों का उत्तर ढूंढने में सक्षम नहीं है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि ट्रंप पुरानी व्यवस्था की चौखट से बाहर निकल कर प्रश्नोंका का उत्तर किस प्रकार से ढूंढते हैं।

      अमेरिका में उच्च शिक्षा महंगी है। अमेरिका की परिवार व्यवस्था के अनुसार लड़का अठारहवें साल में स्वतंत्र हो जाता है। वहां के पालक मानते हैं कि इस उम्र के बाद उसकी शिक्षा की जबाबदारी उसके पालकों की नहीं है। इस कारण तुरंत उच्च शिक्षा ग्रहण करने की अपेक्षा उसे रोजगार ढूंढना आवश्यक होता है। इसके विरुद्ध एशियाई देशों में परिवार व्यवस्था कायम रहने से अपने पुत्र-पुत्री की शिक्षा पूर्ण करना अभिभावक अपनी जिम्मेदारी मानते हैं। अत: अमेरिका की उच्च शिक्षा में बाहर से आए हुए एशियाई विद्यार्थियों- विशेषकर भारतीयों- की संख्या अत्यधिक है। इसके कारण अमेरिकी शिक्षा संस्थाओं की अर्थव्यवस्था भी इन्हीं विद्यार्थीयों के आसपास घूमती है। स्वाभाविकता उच्च शिक्षा की आवश्यकता वाले उद्योगों में मूल अमेरिकी निवासियों को पीछे छोड़ कर अन्य देशों के व्यक्तियों का प्रभाव बढ़ रहा है। इस पर यदि ट्रंप ने तुरंत कोई प्रतिबंधक उपाय लागू किए तो उन्हें वहां के शिक्षा क्षेत्र व उद्योगों का विरोध सहना पड़ेगा। यही स्थिति संगठित व असंगठित क्षेत्र के रोजगार के विषय में है। चीनी या मेक्सिकन लोग कम पारिश्रमिक पर काम करने तैयार होते हैं। इतने कम पारिश्रमिक पर अमेरिकी लोग काम करने को क्या तैयार होंगे? यदि ऐसा नहीं होगा तो ज्यादा पारिश्रमिक के कारण बढ़े हुए दामों पर वस्तुएं खरीदने को क्या अमेरिकी जनता तैयार होगी? चिकित्सा बीमा का प्रश्न भी आसान नहीं है। केवल निजीकरण ही उसका उत्तर नहीं है।

      अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पुतिन का साथ लेना अनेक यूरोपीय देशों को पसंद नहीं आएगा। अपनी सुरक्षा हेतु जापान सरीखे कई देश अमेरिका पर निर्भर हैं। चीन की आक्रामकता बढ़ती जा रही है, ऐसे में उन्हें अकेला छोड़ना अमेरिका के लिए आसान नहीं है। जिहादी मुस्लिम आतंकवाद पर, यूरोप के अनेक देश ट्रंप के साथ खड़े हो सकते हैं। परंतु उसके कारण अमेरिका के अपने आंतरिक प्रश्न एवं विदेश नीति के प्रश्नों के चक्रव्यूह से बाहर निकलना आसान नहीं है। परंतु इसके साथ ही यह भी याद रखना होगा कि दूसरे महायुद्ध में यदि अमेरिका मित्र राष्ट्रों के साथ न होता तो उन्हें युध्द जीतना संभव नहीं था। कई कारणों से मूल अमेरिकी कर्तृत्वशक्ति पर कुछ कालिमा आ गई है। राष्ट्रवाद के भावनात्मक आवाहन से ट्रंप अमेरिका की कर्तृत्वशक्ति को कितना जागृत कर पाते हैं यह देखना होगा।

भारत के लिए अवसर?

      अमेरिका-भारत संबंध भारतीयों की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। भारतीय समुदाय का वहां प्रभाव बढ़ रहा है। इस प्रभाव को ट्रंप ने अपने भाषणों में यह कह कर रेखांकित किया है कि हिंदुओं एवं मोदी के वे भक्त हैं। ‘अगली बार मोदी सरकार’ की तर्ज पर ‘अगली बार ट्रंप सरकार’ का नारा भी उन्होंने दिया। आज तक भारत अमेरिका का अनुसरण करता था। शायद पहली बार अमेरिका जैसी महाशक्ति ने भारतीय प्रचार की नकल की। इससे मोदीजी का प्रभाव व उनकी लोकप्रियता भी दिखाई देती है। चुनाव प्रचार में कही गई बातें प्रत्यक्ष व्यवहार में कितनी आती हैं यह बात अलग है, फिर भी मोदीजी ने अनेक राष्ट्राध्यक्ष्यों से जिस प्रकार अच्छे व्यक्तिगत संबंध प्रस्थापित किए हैं वैसे वे ट्रंप के साथ भी प्रस्थापित कर सके तो राजनीति का विशेष अनुभव न रखने वाले ट्रंप को वे अच्छी सलाह भी दे सकते हैं, इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

      इस चुनाव में अमेरिकी प्रचार माध्यम मुंह के बल गिरे। जिस समाज में उनका दखल था उस समाज मन का अंदाजा उन्हें नहीं लगा। इस संदर्भ में उन्होंने भारतीय प्रसार माध्यमों की ही नकल की ऐसा कहना अनुचित न होगा। अब आगे वे ट्रंप के बारे में क्या भूमिका लेते हैं यह देखना होगा।

 मो.: ९५९४९६९६३१

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