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नोटबंदी के चलते किसको लाभ हुआ और किसको हानि, राजनीति और अर्थशास्त्र के विद्वान लोग इसका लम्बे अरसे तक अध्ययन करते रहेंगे और अपने अलग-अलग निष्कर्ष भी निकालते रहेंगे। लेकिन नोटबंदी ने जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद की कमर तोड़ दी है, इसको लेकर सभी सहमत हैं। इस मुद्दे पर मतभिन्नता नहीं है। यह बात अलग है कि कश्मीर घाटी में नोटबंदी के इस प्रभाव को सार्वजनिक रूप से स्वीकारने में कुछ लोगों को हिचक नहीं है और दूसरे, अनेक कारणों से इसे स्वीकार करने से अभी भी डरते हैं। सभी जानते हैं कि कश्मीर घाटी में आतंक का एक वैचारिक पक्ष है और दूसरा कारोबारी पक्ष। वैचारिक पक्ष कश्मीर घाटी में ज़्यादा मज़बूत नहीं है।
कश्मीर घाटी को पाकिस्तान में शामिल करवाना है, क्योंकि घाटी में मुसलमान बहुसंख्यक हैं, इस तर्क का सहारा लेकर अपना कैलेंडर जारी करने वाले हुर्रियत कान्फ्रेंस के कुछ बूढ़े नेता ही बचे हुए हैं। उनके इस पाकिस्तान प्रेम के पीछे भी बहुत कुछ कारोबारी मामला ही है। पाकिस्तान शुरू से ही अपने समर्थकों को धन मुहैया करवाता रहा है। हुर्रियत के कैलेंडर को असली जामा पहनाने का काम पाकिस्तान द्वारा सम्पोषित अनेक आतंकवादी संगठन करवाते हैं। इन संगठनों का नेतृत्व विदेशी आतंकियों के हाथ में ही रहता है लेकिन अब कुछ संख्या में उनके साथ स्थानीय कश्मीरी युवक भी जुड़ने लगे हैं। उनमें से कुछ को योजना के तहत प्रचारित प्रसारित भी किया जाता है। उनमें नायकत्व भी बताया जाता है। लेकिन वह केवल प्रचार और स्थानीय युवकों को आकर्षित करने के लिए ढाल का काम करता है।
सतही और भूमिगत कार्य कर रहे आतंकी संगठनों की कमान पाकिस्तानी आकाओं के पास ही रहती है। यह ठीक है कि पैसा सऊदी अरब तक से भी आता है, क्योंकि कश्मीर घाटी में पूरा आतंकी संगठन मज़हबी धरातल पर काम करता है। आतंकी संगठनों की लम्बी योजना में कश्मीर घाटी की संस्कृति का अरबीकरण करना भी है। ये छद्म योजनाएं लम्बी दूरी की होती हैं, इसलिए इनमें पैसा भी बहुत ज़्यादा दरकार होता है। कुल मिला कर आतंकी संगठनों को स्थापित करना, उन्हें सक्रिय रखना, हथियारों का सतत प्रवाह जारी रखना, हुर्रियत कान्फ्रेंस जैसे छद्म संगठनों का पालन पोषण करना, सांस्कृतिक अरबीकरण को क्रियान्वित करना, स्लीपर सेलों को तैयार करना और पालना, आतंकियों की मौत के बाद उनके परिवारों को आर्थिक सहायता देते रहना, सरकार पर दबाव डालने के लिए सच्चे झूठे समर्थकों को सड़कों पर उतारना, सुरक्षा बलों पर पत्थर इत्यादि फिकवाना, इन सभी कामों के लिए बहुत धन चाहिए। अमेरिका तक में ग़ुलाम नबी फ़ाई जैसे कितने छद्म विद्वानों को धन देना पड़ता है ताकि सेमिनारों के बहाने भारत विरोधी अभियान को जारी रखा जा सके। उन सेमिनारों में भारत से जाकर कश्मीर सम्बंधी मामलों में अपनी बहुमूल्य राय ज़ाहिर करने वाले विद्वान को हवाई टिकटों के साथ साथ वहॉं होटलों में अतिथ्य के लिए भी धन चाहिए।
कश्मीर घाटी में आतंक को चलाए रखने के लिए धन का यह गोरखधंधा भी उतना ही महत्वपूर्ण है। ज़ाहिर है इस गोरखधंधे का धन सफ़ेद धन तो हो नहीं सकता। इसलिए आतंक का यह सारा धंधा काले धन के सहारे ही ज़िन्दा रहता है। इस काले धन को समृद्ध करने के लिए पाकिस्तान की सरकार भारत की जाली करंसी छापती रहती है। पंचतंत्र के चूहे जैसी स्थिति है। बिल के नीचे दबे सोने के कलश की ऊर्जा से लबरेज़ चूहा दीवार पर खूंटी पर लटकी सत्तू की पोटली तक पहुंच जाता था। जब वह कलश निकाल लिया गया तो चूहे की कूदने की क्षमता दयनीय स्तर तक पहुंच गई। कश्मीर घाटी में आतंकियों की कूदने की क्षमता को काले धन का यह अकूत भंडार कई गुना बढ़ा देता है।
नरेन्द्र मोदी के नोटबंदी के निर्णय ने आतंकी संगठनों के इस काले धन के भंडारों को एक ही झटके में काग़ज़ में बदल कर रख दिया है। पांच सौ और एक हज़ार के नोट की मान्यता रद्द कर दी गई है। अचानक पाकिस्तान से आए सभी नक़ली नोट बेकार हो गए। जब असली मिट्टी हो गए तो नक़ली की क्या बिसात? पत्थरबाज़ी तो ख़ैर रुकनी ही थी। आतंकियों की सभी परोक्ष अपरोक्ष गतिविधियां, जो दौड़ रहीं थीं, वे रेंगने की स्थिति में आ गईं।
आतंकियों ने पिछले दिनों नई करंसी प्राप्त करने के लिए कश्मीर घाटी में कुछ बैंकों में लूटपाट की वारदातें भी की हैं। इसी से सिद्ध होता है आतंकियों की ऐशगाहों में धन का संकट खड़ा हो गया है। हो सकता है इस लूट को सफल बनाने में कुछ बैंकों के लोग भी शामिल हों, लेकिन इतना तो साफ़ है कि संकट काल में बचने के लिए चूहे बिलों से बाहर आने शुरू हो गए हैं। नोटबंदी ने कश्मीर घाटी में आतंकियों को गहरी चोट पहुंचाई है, यह तो सारी कहानी का एक पक्ष है। दूसरा पक्ष है इस नोटबंदी ने तथाकथित मुख्य धारा के राजनैतिक दलों के चेहरे से भी नक़ाब उतार दी है और उन्हें कश्मीरी जनता के सामने ही नहीं बल्कि देश के आगे भी नंगा कर दिया है।
कश्मीर घाटी के क्षेत्रीय राजनैतिक दलों के पास भी अपने काले सफ़ेद धन के भार रहते हैं। घाटी की संवेदनशील स्थिति को देखते हुए सरकार इनको क़ानून का रास्ता दिखाने से डरती रहती है। सरकार की इस मानसिकता को ये दल भी समझते हैं और मुंहमांगी क़ीमत मांगते रहते हैं। लेकिन नोटबंदी ने उनके छिपे धनागारों को तबाह कर दिया। नेशनल कान्फ्रेंस के नाम पर अपनी राजनीति की दुकान चलाने वाले अब्दुल्ला परिवार की यही स्थिति कही जा सकती है। भ्रष्टाचार में संलिप्तता की अनेकों कहानियां जगजाहिर हो जाने के कारण फारुक और उनके पुत्र को कश्मीर घाटी के लोगों ने सत्ताच्युत कर दिया तो उस खेमे में चिंता स्वाभाविक थी। धनबाद से आगे फिर सत्ता में आ सकते हैं, इसकी संभावना को नोटबंदी ने समाप्त कर दिया। पंजाबी में कहावत है, नंगा पुत्त चोरों से खेले। फारुक अब्दुल्ला नोटबंदी के बाद हुर्रियत कान्फ्रेंस की गोद में जा बैठे।
जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री रहे डॉ. फ़ारूक़ अब्दुल्ला पिछले दिनों जम्मू- कश्मीर की वर्तमान हालत को देख कर जरूरत से ज़्यादा चिंतित हो गए हैं। अब्दुल्ला परिवार की पुरानी ख़ूबी है कि जब वह सत्ता से बाहर होता है या सत्ता से बाहर होने का ख़तरा बढ़ जाता है तो वह कश्मीर और कश्मीरियों को लेकर चिंतित होने लगता है। शेख़ अब्दुल्ला के वक्त, वे चिंतित होकर अमेरिका या पाकिस्तान की ओर भागते थे। अपने देशीयों हितों के मामलों में इन देशों को वे मूल्यवान दिखाई देते थे, अतः उनकी क़ीमत थी। लेकिन अब मामला इक्कीसवीं शताब्दी तक पहुंच गया है और नए हालात में अब्दुल्ला परिवार का अवमूल्यन हो गया है। कम कीमत के माल को कोई बड़ा दुकानदार तो अपने शोरूम में सजाएगा नहीं। उसकी ज़रूरत तो किसी छोटे-मोटे किरानी को ही हो सकती है। यह कारण है कि चिंतित फारुक अब्दुल्ला अब हुर्रियत कान्फ्रेंस की किराना दुकान में सजने के लिए तैयार हो गए हैं। शेख़ अब्दुल्ला की राजनैतिक यात्रा मुस्लिम कान्फ्रेंस से शुरू होकर नेशनल कान्फ्रेंस तक पहुंची थी, उनके बेटे और पौत्र उस यात्रा को अंततः हुर्रियत कान्फ्रेंस तक ले गए हैं। हुर्रियत कान्फ्रेंस, पुरानी मुस्लिम कान्फ्रेंस का ही रैडीकल संस्करण कहा जा सकता है। फारुक अब्दुल्ला सीधे-सीधे ही पाकिस्तान के पक्ष में नारेबाज़ी कर सकते थे लेकिन लगता है अब इस्लामाबाद में भी उन्हें कोई घास डालने वाला नहीं है, इसलिए वाया हुर्रियत कान्फ्रेंस आंखमट्टका करने का प्रयास भी कंगाली के दिनों में, परिवार का पुराना इतिहास देखते हुए बुरा नहीं कहा जा सकता। जिन दिनों दिल्ली में नेहरू परिवार का छत्र झूलता था, उन दिनों कश्मीर घाटी के लोगों से संवाद भी दलालों के माध्यम से होता था। तब अब्दुल्लाओं, बख्शियों, सादिकों और मीर कासिमों पर ‘प्राईस टैग’ कश्मीरी जनता में नहीं बल्कि दिल्ली दरबार में लगता था। यही कारण था कि घाटी का ज़ीरो भी दिल्ली से हीरो होकर लौटता था और कश्मीरियों को डराता था। लेकिन अब दिल्ली में सब कुछ बदल गया है। कभी हुर्रियत कान्फ्रेंस के साथ हमबिस्तर होने के प्रकरण को समझा जा सकता है। क्योंकि हुर्रियत कान्फ्रेंस को भी कभी कश्मीरी जनता के दरबार में जाना नहीं होता, उसे पाकिस्तानी हथियारों को हाथ में थामे आतंकवादियों का भय दिखा कर कश्मीरी जनता को डराना होता है। कश्मीरी जनता से डरे हुए फारुक अब्दुल्ला अंततः हुर्रियत कान्फ्रेंस के खेमे में चले गए, यह इस परिवार की राजनीति की स्वाभाविक परिणीति है।
फारुक अब्दुल्ला ने नेशनल कान्फ्रेंस के सभी कार्यकर्ताओं का आह्वान किया है कि वे हुर्रियत कान्फ्रेंस के समर्थन में जुट जाएं। फारुक अब्दुल्ला को अब कश्मीरियों का भविष्य घाटी की आज़ादी में ही दिखाई देता है। वे स्वयं भी अच्छी तरह जानते हैं कि यह कश्मीरियों का भविष्य नहीं है बल्कि यह उनका अपना भविष्य हो सकता है। अब्दुल्ला परिवार शेख़ अब्दुल्ला के समय से ही अपने भविष्य को कश्मीरियों का भविष्य मानने की ग़लती करते आ रहे हैं। कश्मीर घाटी की बहुत सी समस्याओं के मूल में अब्दुल्ला परिवार की यही राजनीति कही जा सकती है। यह कश्मीर घाटी की राजनीति का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि कश्मीरी जनता से परित्यक्त लोग, आतंकियों के हमसफ़र हो जाते हैं, और उन्हें ढाल बना कर कश्मीरियों को डरा कर पुनः सत्ता में आने का प्रयास करते हैं। यही कारण है कि फारुक अब्दुल्ला अनेक बार भारतीय संविधान की क़समें खाने के बाद आज बुढ़ापे में फिर कह रहे हैं कि जम्मू-कश्मीर के विलय का प्रश्न अभी भी खुला है। इतना ही नहीं फारुक अब्दुल्ला कह रहे हैं कि रियासत के जिस हिस्से पर पाकिस्तान ने क़ब्ज़ा कर रखा है वह पाकिस्तान का ही हिस्सा है। अब्दुल्ला का कहना है कि इस हिस्से को हिन्दुस्तान कभी वापस नहीं ले सकता। उनका कहने का तरीक़ा और लहजा कुछ इस प्रकार का था मानो इस कल्पना से उन्हें बहुत आनंद आ रहा हो। भाषा व्यंग्य की थी कि आप अपने-आप को जितना चाहो ताक़तवर समझते रहो आप उनसे जम्मू-कश्मीर का अनधिकृत हिस्सा छुड़ा नहीं सकते। लेकिन मुख्य प्रश्न केवल इतना ही है कि क्या फारुक अब्दुल्ला जब बोल रहे थे तो क्या वे सचमुच कश्मीर घाटी के लोगों के मन की बात कर रहे थे ? यदि अब्दुल्ला सचमुच कश्मीरियों के मन का प्रतिनिधित्व कर रहे होते तो शायद उन्हें हुर्रियत के मानस का प्रतिनिधित्व करने की जरूरत ही नहीं पडती। यह कश्मीर का दुर्भाग्य है कि जब कोई नेता कश्मीरी समाज से कट जाता है और वहां अप्रासांगिक हो जाता है तो चोर दरबाजे से सत्ता पाने के लिए या तो वह दिल्ली दरबार की ओर भागता है या फिर हुर्रियत कान्फ्रेंस की गोद में जा बैठता है। फारुक अब्दुल्ला का वर्तमान व्यवहार इसी का प्रतीक है। नोटबंदी ने एक साथ गिलान के गिलानी को और सौरा के अब्दुल्ला को धर दबोचा है। आमीन ।

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