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पति के रोज -रोज के तानों से शाश्वती तंग आ चुकी है। वाकई वैवाहिक जीवन दोधारी तलवार की तरह है। कहां पिता के राज में अमन- चैन भरी जिंदगी और कहां यहा बात-बात पर ताने-उलाहनें, अपमान, तिरस्कार। क्या हर ‘हाऊस वाईफ’ के जीवन में ‘अर्थ’ को ही प्रधानता दी जाती है न कि उसके आचार -विचार को? पूछते तो ऐसे हैं जैसे मेरे खुदा हों? अभी तो इतने पैसे दिए थे कहां खर्च करके आई हो? कुछ तो हिसाब -किताब सही रखा करो। पैसा-पैसा-पैसा जब पापा से मेरा रिश्ता मांगने तुम्हारे घर आए थे तब तो नवाब वाजिद अलीशाह के रिश्तेदार लग रहे थे। अब क्या फटेहालचंद के रिश्तेदार हो?
क्या रिश्तें बिल्कुल अर्थहिन और आर्थिक संदर्भों के नाम होकर रह गए हैं? मैं इन लोगों के लिए सुबह से घर के कामों में लगी रहती हूं उसका कोई अर्थ नहीं है? क्या मैं भी इन्हें गिना – गिना कर हर वक्त एहसास जताती फिरूं? उफ! यह गृहस्थी।
शाश्वती ने मन के घोड़े दौड़ना बंद किया और फटाफट स्कूल जाने की तैयारी में जुट गई। आज यथार्थ का परीक्षा फल आने वाला है। बेटा तो सुबह से ही उत्साहित दिख रहा है। सारा क्लेश उसी की नई कापी-किताबों व फीस के रुपयों के चक्कर में सुबह से हो रहा है। खैर नितिन का टिफिन पैक कर उन्हें ऑफिस भेजा और मैं यथार्थ को लेकर स्कूल पहुंची। सुबह के दस बज रहे थे लेकिन स्कूल में बुक स्टाल पर सैकड़ों की संख्या में अभिभावक उसे घेरे हुए खड़े थे। खैर जाकर कापी-किताबों का मूल्य पूछा तो २५००/- की तो केवल वहीं थीं और फीस के ३०००/- अलग से। मेरा तो सिर ही भन्ना गया। स्टाल से खुद को अलग निकाल कर मैंने पहले हिसाब-किताब लगाया। तीन हजार और ढाई हजार कुल हुए साढ़े पांच हचार। पर्स टटोला तो नितिन से लिए चार हजार बमुश्किल व मेरी बचत के दो हजार और पर्स में पड़े थे। मन ही मन भगवान को कोटि-कोटि धन्यवाद दिया और किताबें लेकर फीस जमा करने चल दी। सुबह नितिन से पांच हजार रुपये जब शाश्वती ने मांगे थे तो उसने पैसे को लेकर इतनी हायतौबा मचाई थी कि बस पूछो मत। अब जनाब से पूछो इतनी महंगाई में इन रुपयों में से कुछ भी नहीं बचा है। नितिन ने तो बड़ी मशक्कत व तू-तू-मैं-मैं के बाद चार हजार दिए थे।
घुनघुनाती शाश्वती किताबें, ड्रेस, रिजल्ट, फीस रसीद आदि थैले में रख कर घर की ओर चल दी। रास्ते में मौसम्बी का जूस पीने को मन हुआ। पर सोचा, फालतू में १५ रुपये खर्च हो जाएंगे।
यथार्थ का रिजल्ट बहुत ही अच्छा था। सभी घर में बड़े खुश हुए। दबे मुंह से उसने नितिन से कहा- इस बार यथार्थ आठवीं में आ जाएगा। गणित का ट्यूशन लगा दो। बाकी तो मैं ही पढाऊंगी, पर मैथ्स अब मेरे बस की बात नहीं रही। खामख्वाह! बच्चे के नम्बर खराब हो जाएंगे। ट्यूटर से उसको मैथ्स का बेसिक समझ में आ जाएगा।
नितिन ने छूटते ही कहा-‘‘इतने रुपए कहां से आएंगे? महंगाई देखो कितनी बढ़ रही है। इस बार तुम्हीं तो कह रही थी कि स्कूल वालों ने फीस भी बढ़ा दी है। मैं ही समय निकाल कर पढाने की कोशिश करूंगा। ’’
शाश्वती यह सत्य तो आवश्य जानती थी कि नितिन के पास से यह ‘अमूल्य समय’ तो कभी भी नहीं निकलेगा।
इसी सोच-विचार में पड़ोस की लता दीदी शाश्वती से अपने स्कूल के बच्चों की ड्रेसें सिलवाने के सबंध में पूछने आईं। शाश्वती शुरू से ही सिलाई-कढ़ाई में बहुत होशियार थी। उसने नाप-तौल कर कपड़े की लम्बाई -चौड़ाई इत्यादी के बारे में लता दीदी को विस्तार से बताया। तभी उसने दबी जुबान से कहा, ‘‘लता दीदी, आप बाहर के टेलरों से सिलवाने के बजाय मुझ से ही अपने स्कूल की ड्रेसें सिलवा लें। आपके स्कूल में तकरीबन ६००-७०० बच्चे पढ़ते हैं। अगर मैं अपने घर पर ३-४ टेलरों को बिठा कर यह काम करवा दूं तो मेरी आर्थिक मदद हो जाएगी। आपका काम भी बेह्रतरीन होगा। कोई भी शिकायत का मौका आपको न दूंगी। ’’
लता दीदी को और क्या चाहिए था। शाश्वती तो उन्हें शुरू से ही अपनी छोटी बहन लगती थी। उन्होंने उसे बांहों में सानन्द भींचते हुए कहा-‘‘शाश्वती मैं जानती हूं कि इस समय तुम्हें अपने पैरों पर खड़े होने की जरूरत है। मैं आए दिन तुम्हारे व नितिन के झगड़े, जो पैसों को लेकर होते रहते हैं, सुनती हूं। इसलिए मैं यह प्रपोजल लेकर आइॅ थी, अगर तुम स्वयं अपने मुख से न बोलती तो मैं जबरन तुम्हें यह कार्य सौंपती। इतना तो बड़ी बहन होने के कारण मेरा हक बनता ही है, क्यों? जितना कमीशन पहले हम बाहर के टेलरों को देते थे, उतना अब तुम्हें मिला करेगा। ’’
शाश्वती के लिए तो पूरा आसमान मुट्ठी में आ गया था। उसके लिए सभी राहें खुल गई थीं। आज चार वर्षों में शहर के जाने-माने अधिकांश स्कूलों के यूनिफॉर्म संबधित ऑर्डर उसके ही ‘शाश्वती यूनिफॉर्म सेंटर ’ को मिलने लगे हैं। उसने एक-दो शिफ्टों के बजाय चार शिफ्टों में टेलरों को नियुक्त कर दिया है। व्यवसाय ‘दिन दूनी रात चौगुनी’ रफ्तार से बढ़ रहा है और शाश्वती का घर में उसी रफ्तार से प्रतिष्ठा मान -सम्मान भी।

 

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