विस्थापित

  शासन जब विकास की योजनायें हाथ में लेता है तब अनेक लोगों को विस्थापित होना पडता है। बडे बडे बांध बनाते समय गांव के गांव विस्थापित होते हैं। विस्थापित के पुर्नवास का प्रश्न अत्यंत जटिल होता है। शासन द्वारा समझदारी से यह प्रश्न सुलझाना होता है। काश्मीर के राजा चंद्रापीड़ द्वारा यह प्रश्न कैसे सुलझाया गया उसकी यह कथा –

काश्मीर के राजा चंद्रापीड़ को एक भव्य मंदिर का निर्माण करना था। मंदिर के लिये बहुत बडी जगह की आवश्यकता थी। उस जमीन के अधिग्रहण हेतु राजाज्ञा जारी की। जमीन अधिग्रहण का काम प्रारंभ हुआ।

उस जमीन पर एक चर्मकार का घर था। उसके सभी पुरखे उसी घर में रहे थे। मंदिर के नक्शे में उसका मकान बिलकुल मध्यवर्ती स्थान पर था।

राजा अधिकारी उसके घर आते हैं और उसे राजाज्ञा पढकर सुनाते हैं। चर्मकार कहता है, “यह मेरे पुरखों का घर है। इस घर में मेरी अनेक पीढ़ीयां हुई है। मेरा जन्म भी इसी घर में हुआ है। मै यह घर नही दूंगा।

चर्मकार को समझाने का बहुत प्रयत्न किया जाता है परंतु सब निेफल होता है। घर के बदले धन देने की बात की जाती है परंतु चर्मकार उसे अस्वीकार कर देता है। मंदिर का काम रूक जाता है।

राजमंत्री अपने अधिकारियों से कहता है कि यदि चर्मकार किसी भी प्रकार से घर देने राजी नही है तो जबरदस्ती घर पर कब्जा कर घर गिरा दें। हम काम नही रोक सकते हैं।

बात राजा तक पहुंचती है। राजा कहता है, “जबरदस्ती मकान पर कब्जा न किया जाये। पुन: चर्मकार को समझाया जाये एवं मंदिर निर्माण में उसका सहयोग लिया जाये।”

राजा के सेवक पुन: चर्मकार को समझाते हैं। धीरे-धीरे चर्मकार के मन में भी विचार आता है, “काम तो मंदिर बांधने का चल रहा है। मंदिर पूरे समाज के लिये होता है। वह तो दीर्घकाल तक रहेगा। मंदिर बनने के बाद हजारों लोग भगवान के दर्शन को आयेंगे। ऐसे पवित्र काम में मेरे द्वारा अडचन हो, यह अच्छी बात नही है। मुझे घर खाली कर देना चाहिये।”

    एक दिन वह राजा के पास जाता है एवं राजा से कहता है, “महाराज मै अपना मकान मंदिर निर्माण हेतु खाली करने तैयार हूं, पर मेरी एक शर्त है।” राजा पूछता है, “क्या है तुम्हारी शर्त?” चर्मकार कहता है, “मेरी शर्त ये है कि आप स्वत: मेरे घर आकर मुझसे मेरा घर एवं जमीन दान में मांगे, मुझे उसके बदले कुछ नही चाहिये।”

उसकी यह विचित्र शर्त सुनकर दरबार में बैठे मंत्रियों को गुस्सा आता है। वे राजा को सलाह देते हैं कि एक क्षुद्र मनुष्य के यहां जाकर राजा दान न मांगे, वरन, राजशक्ति का प्रयोग कर उसकी जमीन का अधिग्रहण कर लें।

  राजा मंत्रियों की बात नही मानता। राजा सद्विचारी था। एक दिन वह रथ पर बैठकर चर्मकार के घर जाता है और कहता है, “महोदय मै इस स्थान पर एक मंदिर का निर्माण करने की इच्छा रखता हूं। इस काम के लिये मैं आपका घर एवं जमीन दान में मांगने आया हूं।”

राजा स्वयं दान मांगने के लिये आया देखकर वह चर्मकार राजा के घर एवं जमीन दान में दे देता है। वह बेघर हो जाता है। मंदिर निर्माण का काम पुन: प्रारंभ हो जाता है।

परंतु राजा उस चर्मकार को नही भूलता। चर्मकार ने तो दान दे दिया पर मै उसके लिये क्या कर सकता हूं, यह विचार सतत राजा के मन में आता रहता है। वह उस चर्मकार के लिये एक नई जगह पर नया घर बनाता है। राजा चर्मकार को बुलाकर कहता है, “हे भलेमानुस, तुने सर्वस्व दान देकर बहुत बडा त्याग किया है। तुने अपना कर्तव्य कर दिया, अब मुझे मेरा कर्तव्य करने दो। राजा के रूप में मेरा कर्तव्य है कि तुम्हारे सर पर छत होना चाहिये। मै तुम्हे घर दे रहा हूं। पर यह तुम्हारे दान का बदला नही है। तुम्हारे दान की तो कोई किमत ही नही है परंतु एक नागरिक के रूप में तुम्हारा अधिकार तुम्हे दे रहा हूं। कृपया इसे स्वीकार करो।”

    सार्वजनिक कार्य के लिये दान देनेवाला चर्मकार बड़ा? या नागरिकों के अधिकार का सम्मान करने वाला राजा बड़ा? अब यह निर्णय आपको ही करना है।

 

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