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पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर के प्रश्न को राष्ट्रीय से अधिक सभ्यता से जुड़ा प्रश्न मानता रहा है। इसी मान्यता के आधार पर वह इस्लामी दुनिया को यह समझाने में एक हद तक सफल भी रहा है कि गजवा-ए-हिंद अथवा खिलाफत के इस्लामी स्वप्न का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पड़ाव जम्मू-कश्मीर है। पाक के अनुसार जम्मू-कश्मीर में इस्लामी हुकूमत स्थापित किया जाना इसलिए अनिवार्य है क्योंकि यहीं से आगे के भी रास्ते खुलेंगे। इसी रणनीति के आधार पर वह मुस्लिम दुनिया से सहयोग और समर्थन हासिल करता रहा है और इसी कारण खिलाफत और उम्मा के सम्मोहन से संचालित लोग जम्मू-कश्मीर को लड़ाई का अहम मैदान मानते हैं।
पाकिस्तान इस्लामी दुनिया में अपनी जम्मू-कश्मीर संबंधी रणनीति को खिलाफत अथवा गजवा-ए-हिंद के संदर्भ में रख सकता है लेकिन पश्चिमी दुनिया में ऐसा संभव नहीं है। वहां पर उम्मा और खिलाफत के खिलाफ एक जबरदस्त भावना है और यह सदियों से चली आ रही है। इन संदर्भों मे ईसाइयत प्रभावित देशों में बात रखने का उल्टा असर पड़ सकता है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए पाकिस्तान वहां पर जम्मू-कश्मीर के प्रश्न को मानवाधिकार के संदर्भों में रखने की कोशिश करता है और इसी आधार पर इस प्रश्न को वैश्विक साबित करने की कोशिश करता है। पाकिस्तान अच्छी तरह जानता है कि पश्चिम में मानवाधिकार महत्वपूर्ण मुद्दा है, वहां की जनता भी इससे जुड़ी शब्दावली से परिचित है और इससे गहरा जुड़ाव भी महसूस करती है, इसलिए मानवाधिकार के प्रश्न को उठा कर पश्चिमी दुनिया का समर्थन हासिल किया जा सकता है।
जम्मू-कश्मीर के प्रश्न को इस्लामी दुनिया में सभ्यता से जुड़े संघर्ष के रूप में प्रस्तुत करने अथवा पश्चिमी दुनिया में मानवाधिकार की समस्या के रूप में प्रस्तुत करने के लिए पाक का मीडिया पर काफी फोकस रहा है। ९/११ की घटना के बाद उसकी मीडिया पर निर्भरता और भी अधिक बढ़ गई है। विश्व की अधिकांश आतंकी घटनाओं के तार पाकिस्तान के साथ जुड़ने के सबूत आने के बाद उसकी छवि एक आतंक-निर्यातक देश के रूप में बन गई है। इसके कारण विश्व-बिरादरी में उसके अलग-थलग पड़ने की संभावनाएं भी बढ़ती जा रही हैं। ऐसे में आतंकवाद का उपकरण के रूप में उपयोग करने की आत्मघाती नीति की सीमाएं पाक को भी दिखने लगी हैं। नई परिस्थितियों के उभार ने पाक को जम्मू-कश्मीर संबंधी रणनीति की प्राथमिकताओं में बदलाव करने के लिए विवश कर दिया है। अब मीडिया-मानवाधिकार का गठजोड़ उसकी रणनीति में काफी ऊपर आ चुका है और केंद्रीय स्थान ग्रहण करते जा रहा है।
मीडिया और मानवाधिकार का पाकिस्तान किस तरह रणनीतिक उपयोग कर रहा है, इसे गुलाम नबी फई प्रकरण से आसानी से समझा जा सकता है। अमेरिका में आईएसआई के एजेंट गुलाम अहमद फई को वहां की खुफिया एजेंसियों द्वारा हिरासत में लिए जाने के बाद पाक की पूरी प्रचारबाजी और साजिश की कलई खुल गई। अमेरिकी खुफिया एजेंसी एफबीआई ने फई को १९ जुलाई २०११ को गिरफ्तार कर लिया था। उसकी हिरासत से कई नामचीन मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और मीडियाकर्मियों के भी वास्तविक चेहरे सामने आ गए। कश्मीर में पैदा हुआ फई वाशिंगटन मे कश्मीर-अमेरिकन काउंसिल (घअउ) का कर्ताधर्ता था। अमेरिका खुफिया एजेंसियों के अनुसार वह २५ वर्षों से आईएसआई के लिए काम कर रहा था। आईएसआई गुप्त रूप से इस संगठन को वित्तीय मदद उपलब्ध कराती थी और इसका एजेंडा भी तय करती थी। इसके अतिरिक्त कश्मीर के मुद्दे को लेकर भारत पर दबाव बनाने के लिए अमेरिकी नीति-नियंताओं में लॉबिंग का काम भी करता था।
फई ने वाशिंगटन में कई कश्मीर पीस कॉन्फ्रेंस आयोजित कीं। इसमें अमेरिकी और पाकिस्तानी विद्वानों तथा नीति-नियंताओं के अतिरिक्त कई जानेमाने भारतीय पत्रकारों, विद्वानों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने शिरकत की। भारत में हलचल तब मची जब यह बात सामने आई कि इसमें कुलदीप नैयर, न्यायाधीश राजिंदर सच्चर और मानवाधिकार कार्यकर्ता रीता मानचंदा और गौतम नवलखा जैसे लोगों ने शिरकत की। कुछ लोगों के अनुसार इन महानुभावों के लेखन और चिंतन की धारा और केएसी के उद्देश्यों में अद्भुत साम्यता देखने को मिल जाती है।
पाकिस्तान की जम्मू-कश्मीर रणनीति में मीडिया-मानवाधिकार का गठजोड़ कितनी अहम भूमिका हासिल कर चुका है, इसका अंदाजा एफबीआई के इस अनुमान से लगाया जा सकता है कि आईएसआई ने फई के संगठन पर लगभग २० करोड़ रुपए खर्च किए। फई को हर साल २५ से ३५ लाख रुपए हवाला चैनल से प्राप्त होते थे। एफबीआई ने फई और उसके संगठन के खिलाफ वर्जीनिया जिला कोर्ट में सबूत पेश करते हुए दो अन्य संगठनों के नामों का उल्लेख इसी तरह की भूमिका में संलिप्त रहने के लिए किया। एफबीआई के अनुसार लंदन में स्थित और नजीर अहमद शॉल द्वारा संचालित जस्टिस फाउंडेशन कश्मीर सेंटर तथा ब्रसेल्स में स्थित और मजीद त्रांबू द्वारा संचालित कश्मीर सेंटर यूरोपियन यूनियन भी केएसी के तर्ज पर कार्य करते हैं। एफबीआई द्वारा प्रस्तुत तथ्य से स्पष्ट होता है कि जम्मू-कश्मीर संबंधी सूचना प्रवाह को अपने पक्ष में करने के लिए पाक केवल अमेरिका में ही सक्रिय नहीं है, उसकी उपस्थित वैश्विक है। वह वैश्विक सूचना-प्रवाह की दृष्टि से निर्णायक कई प्रमुख केंद्रों पर सक्रिय है और मीडिया-मानवाधिकार गठजोड़ के जरिए अंतरराष्ट्रीय अभिमत को अपनी दिशा में मोड़ने की कोशिश कर रहा है।
फई की हिरासत के कारण जम्मू-कश्मीर का अंतरराष्ट्रीयकरण करने की पाकिस्तानी कोशिशों को न केवल झटका लगा, बल्कि पूरी दुनिया में भारतीय सैनिकों को बदनाम करने के उसके षड्यंत्र की कलई भी खुल गई। इस्लामाबाद की यह रणनीति वैश्विक स्तर पर तो असर डाल ही रही है, लेकिन स्थिति तब और गंभीर हो जाती है, जब भारतीय मीडिया और मानवाधिकार का फलक भी इससे प्रभावित होता हुआ दिखाई पड़ता है।
व्यापक क्षेत्रफल और बड़ी जनसंख्या में से घाटी और अलगववादी ही भारतीय मीडिमा के लिए जम्मू-कश्मीर के प्रतिनिधि कैसे बन जाते हैं, यह एक बड़ा रणनीतिक रहस्य है। जम्मू और लद्दाख के क्षेत्र भारतीय मीडिया के लिए उपेक्षणीय क्यों है और वहां की आवाज जम्मू-कश्मीर की आवाज क्यों नहीं मानी जा सकती, इसके कोई ठोस जवाब भारतीम मीडिया के पास नहीं है। इसी तरह आतंकवादियों को मिलने वाली भावुक कवरेज पर भी संदेह तो पैदा होता ही है। बुरहानी की मौत के बाद जिस तरह से उसे एक अध्यापक का बेटा और यूथ आइकन बता कर संप्रेषित करने की कोशिश की गई, उसके जनाजे की तस्वीरों को प्रथम पृष्ठ पर स्थान मिला और मानवाधिकार के प्रश्न उठाए गए, उससे तो यही साबित होता है कि भारतीय मीडिया और मानवाधिकार जगत भी जाने-अनजाने, पाक की रणनीति से प्रभावित होता है।
अफजल गुरु को लेकर भी मीडिया और मानवाधिकार जगत में ऐसी ही हायतौबा मची थी। भारत और पाकिस्तान के बीच होने वाली सीमापार फायरिंग को युद्ध जैसे हालात बताना और पाकिस्तान के पास नाभिकीय हथियारों का अत्यधिक जिक्र भी अप्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तानी एजेंडे को ही साधता है। पाकिस्तान की तो कोशिश ही रहती है कि कश्मीर को न्यूक्लियर फ्लैश प्वाइंट बता कर पूरी दुनिया का ध्यान इस तरफ खींचा जाए और कुछ देशों को मध्यस्थता के लिए तैयार किया जाए। कश्मीर की समस्या को अत्यंत विकट और भयानक बता कर भारतीय मीडिया पाकिस्तान के एजेंडे को ही पूरा करते हैं।
यह एक स्थापित तथ्य है कि मानवाधिकार का प्रश्न मीडिया को एक रणनीतिक हथियार के उपयोग करने की संभावनाएं बढ़ा देता है। अन्य देशों में मीडिया के जरिए वैचारिक घुसपैठ करने का सब से सुगम रास्ता मानवाधिकार होता है। कानून-व्यवस्था को स्थापित करने की प्रक्रिया इतनी जटिल होती है कि कहीं न कहीं उसका सामना उदात्त मानवाधिकारों से हो ही जाता है। इतिहास और वर्तमान में कुछ तानाशाहों की कू्ररता ने भी मानवाधिकारवादियों को हर स्थित में और हर समय में प्रश्न उठाने के मौके उपलब्ध करा दिए हैं। ऐसी स्थिति में जमीनी स्तर पर सब कुछ सामान्य होते हुए भी मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का अभिमत समाचार बन जाता है और उसे इस रूप में प्रस्तुत किया जाता है मानो वही समस्त जनता की आवाज हो। मानवाधिकारवादी मुखौटों को मीडिया मंच उपलब्ध कराता है और मीडिया को मानवाधिकारवादी समाचार गढ़ कर देते हैं। जम्मू-कश्मीर में मीडिया और मानवाधिकारवादियों का यह खेल खुले रूप में चल रहा है। इस गठजोड़ के प्रति जागरूक होने और इसके रणनीतिक उपयोग की बारी अब हमारी है।

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