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आज देश की करीब ६५ फीसदी कार्यशील युवा आबादी है और यही जनसांख्यिकी लाभांश भारत की मौजूदा समय में सब से बड़ी पूंजी है। इसी कार्यबल का यदि सदुपयोग हो जाए, तो कोई वजह नहीं बचती कि भारत विश्व शक्ति न बन पाए। इसके लिए पहली शर्त तो यही मानी जाएगी कि देश का हर हाथ, विशेषकर युवा राष्ट्रीय उत्पादन में यथासंभव सहयोग करे, लेकिन इसी उज्ज्वल व आशाओं से भरी तस्वीर का चुनौतीपूर्ण पहलू यह भी है कि इतनी बड़ी आबादी को उत्पादन की किन क्रियाओं में लगाया जाए, क्योंकि सरकारी या निजी क्षेत्र के विभिन्न उपक्रमों में इतनी बड़ी आबादी के लिए कामकाज का बंदोबस्त किया जा सकता है, ऐसी कल्पना भी अव्यावहारिक है। लिहाजा यही से स्वरोजगार की जमीन तैयार होती है।

हालांकि समाज की रोजगार संबंधी चाहत रूतबेदार सरकारी पदों या निजी कम्पनियों के शानदार वेतनमान से ही चिपकी रही है और इसी हसरत को साथ लिए आज भी कई युवा बेकार घूम रहे हैं। कहना न होगा कि इस अवस्था ने देश-प्रदेश में बेरोजगारी की स्थिति को बद से बदतर बनाया है। भविष्य में यह स्थिति और भी भयंकर रूप अख्तियार न कर ले, इससे पहले ही समाज, विशेषकर युवाओं को नौकरी के फितूर की सीमाएं लांघ कर स्वरोजगार की संभावनाओं को तलाशना होगा।

हमारा मानना है कि बेरोजगारी से निपटने और राष्ट्रीय उन्नति के योगदान हेतु स्वरोजगार एक महत्वपूर्ण जरिया साबित हो सकता है। यकीनन जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में भी स्वरोजगार का विकल्प उतने ही मायने रखता है, जितना भारत के किसी अन्य हिस्से के लिए। ऐतिहासिक, प्राकृतिक व आध्यात्मिक दृष्टि से संपन्न जम्मू-कश्मीर में स्वरोजगार की संभावनाएं कम नहीं हैं। हैरानी यह कि न तो कभी प्रशासन ने इन अछूती संभावनाओं का लाभ लेने का प्रयास किया और न ही युवाओं ने कभी इस दिशा में स्वावंबन की राहें ढूंढी। आज से करीब दो दशक पहले विकसित किया गया मां वैष्णो देवी मंदिर का नाम यदि आज देश के पांच सब से अमीर मंदिरों की सूची में दर्ज है, तो इसके मार्फत आज हजारों स्थानीय लोगों को यहां से रोजगार के अवसर भी मिले। संपूर्ण जम्मू-कश्मीर राज्य में ऐसे धार्मिक स्थानों की एक लंबी फेहरिस्त है जो पर्यटकों, खास कर धार्मिक पर्यटकों को अपनी ओर खींचने की क्षमता रखते हैं। आज जरूरत है कि प्रदेश के युवा सरकारी सहयोग लेकर ऐसे महत्वपूर्ण पावन स्थानों को चिह्नित करके पर्यटन की दृष्टि से विकसित करें। इसके जरिए न केवल प्रदेश में गंभीर होती बेरोजगारी की समस्या से राहत मिलेगी, बल्कि जम्मू-कश्मीर की ओर बहने वाली पर्यटन की फिजाओं को इसकी वास्तविक खूबियों से भी तो रू-ब-रू करवाया जा सकेगा। कहना न होगा कि इस आध्यात्मिक पर्यटन के विकास के बहाने पूरा देश सूबे की समृद्ध सभ्यता, संस्कृति व आस्था के प्रतीकों से परिचय हो पाएगा। अगर योजनाबद्ध ढंग से इस दिशा में सरकार व समाज के स्तर पर प्रयास किए जाते हैं, तो यह काम ज्यादा कठिन भी नहीं है।

आध्यात्मिक रोजगार के क्षेत्र में स्वरोजगार का एक विस्तृत आधार तैयार करने की दिशा में सब से पहले प्रदेश भर में ऐसे स्थल चिह्नित करने होंगे, जिनकी एक उल्लेखनीय व ऐतिहासिक पृष्ठभूमि होने के बावजूद आज बहुत कम लोगों को ही इनकी जानकारी है। ऋषि-मुनियों, साधु-संतों व देवी-देवताओं की इस धरा में ऐसे बहुत से स्थान हैं, जिनका भारतीय इतिहास में एक खास महत्व व पहचान रही है। जम्मू संभाग की बात करें, तो इसकी सुंदरता कश्मीर घाटी से किसी भी मायने में कम नहीं। दुखद यह कि अपेक्षित प्रचार-प्रसार के अभाव में अब तक यह क्षेत्र प्रर्यटन की दृष्टि से उपेक्षित ही रहा है। जम्मू में मान तलाई, भद्रवाह, पत्निटाप, सुद्ध महादेव, बाबा धनसर, रघुनाथ मंदिर, बावे वाली माता सरीखे अनेकों स्थल आध्यात्मिक पर्यटन का केंद्र बन सकते हैं।

सुंदर-मनोरम पहाडियों के बीच बसे मान तलाई का विशेष महत्व है। कहा जाता है कि भगवान शिव और मां पार्वती का विवाह इसी पवित्र स्थल पर हुआ था। इंदिरा गांधी के योग गुरु धीरेद्र ब्रह्माचारी जी का आश्रम भी इसी स्थान पर अवस्थित है। इंदिरा गांधी अपने गुरु से मिलने के लिए अक्सर यहां आया करती थीं और प्राकृतिक सुंदरता से ओत-प्रोत यह स्थल पूर्व प्रधान मंत्री के दिल के बेहद करीब था। इसके महत्व को समझते हुए यहां अंतरराष्ट्रीय योग केंद्र स्थापित करने की पहल की है। यहां हर वर्ष तीन दिवसीय यात्रा आयोजित की जाती है। आने वाले वक्त में यह केंद्र आध्यात्मिक अनुभूतियों को करीब से महसूस करने वाले लोगों को अपनी ओर खींच सकता है, बशर्ते प्रभावी प्रचार-प्रसार के साथ-साथ यहां आवश्यक सुविधाओं का विकास हो।

कुछ इसी तरह की महत्ता भद्रवाह भी रखता है। जड़ी-बूटियों के अमूल्य भंडार के साथ यहां के राजमा-चावल बेहद प्रसिद्ध हैं। सरकार चाहे तो इसे बतौर ब्रांड के पेश करके यहां आने वाले लोगों में परोस सकती है। इसके अलावा जम्मू क्षेत्र में ही रावी नदी के तट पर बसा बसोहली ऐतिहासिक, कला व सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। बसोहली जहां नकली रंगों से अछूत चित्रकला का अनूठा एहसास करवाती है, वहीं बसोहली किला इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का प्रतिनिधि माना जाता है। बसोहली के पशमीना कारोबार की देश भर में अपनी एक अलग पहचान है। बसोहली पशमीना की खास बात यह कि इसके आयात बाहर से नहीं किया जाता, बल्कि स्थानीय लोग ही उच्च गुणवत्ता का उत्पादन कर इस क्षेत्र को स्वावलंबी बनाते हैं। पशमीना निर्मित उत्पादों को यदि सही ढंग से प्रचारित-प्रसारित किया जाए, तो कई युवा इस काम में जुट कर व्यक्ति व प्रादेशिक आर्थिकी को सुदृढ़ करेंगे, वहीं बसोहली की इस कला को राष्ट्रीय-अंतरराष्टी्रय फलक पर विशेष पहचान मिलेगी।

इन स्थानों के अतिरिक्त जय वैली, सुबट नाग, रोशेरा माता, सरथल वैली देवछत्र आदि स्थानों को आध्यात्मिक पर्यटन के लिए विकसित करने की जरूरत महसूस की जा रही है।

जम्मू-कश्मीर के कश्मीर संभाग में पर्यटन विकास की दृष्टि से बेशक कई प्रयास हुए हैं और पर्यटक यहां आना पसंद करता है, फिर भी यहां कई स्थल ऐसे हैं, जो गुमनामियों तले दबे हुए हैं। यदि इन स्थानों को पर्यटन की दृष्टि से प्रचारित किया जाए, तो भविष्य में यहां आने वाले पर्यटकों की संख्या में इजाफा होगा, वहीं दो दिन के लिए यहां आने वाला पर्यटक कुछ और दिन यहां बिता कर जाएगा। इसका अंतत: प्रदेश की आर्थिकी को ही लाभ होगा। दूसरी ओर पर्यटकों की बढ़ी आमद के साथ स्वरोजगार के अवसर भी तो सृजित होंगे, वहीं कई बेरोजगार युवा खुद-ब-खुद इस क्षेत्र में स्वरोजगार के लिए आकर्षित होंगे।

कश्मीर में अमरनाथ यात्रा पहले से ही लाखों लोगों की आस्था का केंद्र है, वहीं क्षीर भवानी मंदिर, कोकर नाग यात्रा, शंकराचार्य हिल, मार्तंड मंदिर के विकास पर यदि सरकार ध्यान दे, तो यहां आध्यत्मिक से पर्यटन को एक अलग दिशा मिलेगी। कश्मीर की ही वीरवाह गुफा आध्यात्मिक पर्यटन की अपार संभावनाएं लिए हुए है। महान दार्शनिक अभिनव गुप्त अपने एक हजार अनुयायियों के साथ इस गुफा में शिव में लीन हो गए थे। अध्यात्म के क्षेत्र में इस पावन गुफा को उच्च स्थान हासिल है, फिर भी यदि साधक यहां तक नहीं पहुंच पाते, तो कारण यह कि लोगों को इसकी जानकारी ही नहीं है। यदि आज भी इस स्थल को विकसित करके इसका प्रभावी प्रचार किया जाए, तो अनेकों-अनेक साधक यहां आएंगे। इससे अंतत: राज्य का पर्यटन व्यवसाय भी परवान चढ़ेगा।

जम्मू-कश्मीर के लद्दाख क्षेत्र पर भी कुदरत की नजर-ए-इनायत रही है। यहां यदि लोसर मेला, सिंधु यात्रा (अब तक सीमित स्तर व प्रयासों से होती भी रही है), सैन्य पराक्रम के साक्षी रहे सियाचिन व कारगिल सरीखे स्थानों तक पहुंचने, ठहरने व इनके महत्व को समझाने की यदि व्यवस्था हो जाए, तो निश्चित तौर भारी संख्या में पर्यटक इस वीरभूमि के दर्शन करने आएंगे। वहीं बौद्ध धर्म में आस्था का केंद्र रहे शांति स्तूप और थिकसे मोंटेसरी की ओर पर्यटकों को खींचा जाए, तो स्थानीय लोगों के लिए स्वरोजगार के अवसर यकीनी तौर पर पैदा होंगे।
आज जबकि पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षिक करने की विभिन्न राज्यों में स्पर्धा तेज होती जा रही है, तो इसके लिए तरह-तरह की नीतियां व योजनाएं बना कर पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित किया जा रहा है। इसके लिए कई राज्यों ने तो बाकायदा ब्रांड एंबेसेडर नियुक्त कर रखे हैं। इसके विपरीत जम्मू-कश्मीर पर्यटन किसी ब्रांड एंबेसेडर का भी मोहताज नहीं है। कुदरत की इतनी रहमत रही है कि यहां की हर विधा, हर स्थल, हर परंपरा अपने आप में एक ब्रांड है।

जम्मू-कश्मीर की बासमती का स्वाद में जहां दुनिया भर में कोई सानी नहीं, वहीं केसर के लिए कश्मीर की अपनी एक अनूठी पहचान है। कश्मीरी विल्लो बैट की देश-विदेश से जबरदस्त मांग रही है, वहीं सूखे मेवों के लिए यह प्रांत पूरी दूनिया में मशहूर है। दूध से बनी कलाड़ी को यदि प्रोत्साहित करते हुए पर्यटकों को परोसा जाए, तो यह अजीज पकवान किसी ब्रांड के मानिंद पर्यटकों को बार-बार जम्मू-कश्मीर बुलाता रहेगा।

शासन-प्रशासन व स्थानीय जनता के स्तर पर यदि संजीदगी दिखाई जाए, स्वरोजगार कई मायनों में राज्य की सूरत को बदल सकता है। इसके जरिए राज्य की संस्कृति व सभ्यता की जड़ों को जो पोषण मिलेगा, सो अलग। अत: नौकरी के परंपरागत ढर्रे से उतर कर अब कुछ कदम स्वरोजगार की दिशा में बढ़ाने की जरूरत है।

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