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हाल ही में हुए पांच राज्यों के विधान सभा चुनावों में मिली सफलता के बाद भारतीय जनता पार्टी ने जिस तरह बहुमत हासिल किया है उससे कहीं न कहीं पार्टी का मनोबल भी बढ़ा दिया है। उत्तर प्रदेश में तो परिणामों ने भाजपा के लिए चमत्कारिक काम किया है। इससे सबसे अधिक प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रतिष्ठा उभर कर सामने आई है। चार राज्यों में से पंजाब में कांग्रेस ने बहुमत हासिल किया है वहीं गोवा, मणिपुर और उत्तराखंड में अब सरकार भाजपा की ही होगी। इन समीकरणों ने भाजपा को राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ी जिम्मेदारी के साथ जनता से भी जुड़ऩे का जो अवसर मिला है। उसे मोदी और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह पूरा करने का अवसर भी लगता है नहीं छोड़ेंगे। देश के सबसे बड़े ४०३ विधान सभा सीट वाले राज्य उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी ने पूर्ण बहुमत के साथ ३२५ विधान सभा क्षेत्र में जीत के साथ जो चमत्कारिक आंकड़ा हासिल किया है उससे यहीं अंदाजा लगाया जा सकता है कि कहीं न कहीं केन्द्र में भाजपा सरकार की नीतियां और प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी की कार्यशैली को जनता ने पसंद किया है।
राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण उत्तर प्रदेश में भाजपा ने सत्ता से १५ साल के वनवास के बाद अपनी धमाकेदार वापसी की है और भाजपा ने उप्र में सत्तारूढ़ सपा, उसके गठबंधन सहयोगी कांग्रेस एवं मायावती की बसपा को काफी कम सीटों पर समेट दिया है। इस जीत के समीकरण भले ही कुछ हो लेकिन प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी और राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की प्रतिष्ठा के भी यह चुनाव बन गए थे, यहां से भाजपा ने अपना कोई भी मुख्यमंत्री दावेदार पेश नहीं किया था। प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने २०१४ के संसदीय चुनाव की तरह इस बार भी भारी सफलता पाने के लिए कार्यकर्ताओं के साथ मिल कर कड़ी मशक्कत की।
उत्तर प्रदेश में चुनावी रणनीति को बनाने एवं उसे अंजाम देने वाले शाह ने कहा कि इस जीत ने मोदी को आजादी के बाद सब से बड़े नेता का दर्जा प्रदान कर दिया है। नेशनल कांफ्रेन्स नेता उमर अब्दुल्ला ने नतीजों को सुनामी करार दिया और भविष्यवाणी की कि भाजपा न केवल २०१९ बल्कि २०२४ में भी संसदीय चुनाव जीतने की स्थिति में है। उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में भाजपा की शानदार जीत के एक दिन बाद प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि भारत उभर रहा है और वह विकास का पक्षधर है। उन्होंने जनता से कहा कि वह नए भारत के निर्माण का संकल्प लें और नरेंद्र मोदी मोबाइल एप पर अपनी प्रतिबद्धता जताए मोदी ने ट्वीट किया, ‘एक नया भारत उभर रहा है, जिसके पास १२५ करोड़ भारतीयों की ताकत और क्षमता है। यह भारत विकास का पक्षधर है।’ उन्होंने आगे लिखा, ‘वर्ष २०२२ में जब हम आजादी के ७५ वर्ष पूरे करेंगे तब तक हमें ऐसा भारत बना लेना चाहिए जिस पर गांधी जी, सरदार पटेल और डॉ. बाबासाहब आंबेडकर को गर्व हो।’
उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड विधान सभा चुनाव में प्रचंड बहुमत से सरकार बनाने जा रही भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए अच्छी खबर यह है कि अब राष्ट्रपति का चुनाव भी वे आसानी से जीत सकेंगे। आगामी जुलाई में राष्ट्रपति का चुनाव होना है और ऐसे में भाजपा अब आसानी से अपनी पसंद के उम्मीदवार को राष्ट्रपति के पद पर आसीन कर सकती है। यह संभव हुआ है पांच राज्यों के विधान सभा चुनाव की नतीजों से। भाजपा गठबंधन को उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में ३२५ सीटें मिली हैं। जिसके जरिए भारतीय जनता पार्टी को प्रदेश से मूल्यवान ६७६०० निर्णायक वोट वैल्यू मिला है; जबकि पांचों राज्य के वोट वैल्यू की बात करें तो यह करीब ९५, ५०८ होता है जो कि राष्ट्रपति पद के लिए काफी है। दिलचस्प बात यह है कि कांग्रेसनीत गठबंधन (यूपीए) और तीसरा मोर्चा मिला कर भी वे राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के करीब नहीं आ सकेंगे।
हालांकि पंजाब में परिणाम कांग्रेस के पक्ष में रहे। कांग्रेस ११७ सदस्यीय पंजाब विधान सभा में ७७ सीटें जीत कर स्पष्ट रूप से विजेता है। भाजपा तीन सीटों के साथ चौथे स्थान पर रही। आप २० सीटों के साथ दूसरे स्थान पर है। अकाली दल को १५ सीटें मिली हैं। मणिपुर की ६० सदस्यीय विधान सभा में भाजपा ने २१ और कांग्रेस ने २८ सीटों पर जीत दर्ज की है। टीएमसी को एक सीट मिली है जबकि अन्य के खाते में १० सीटें गईं हैं। गोवा की ४० सदस्यीय विधान सभा में १७ सीटें कांग्रेस ने जीती हैं और भाजपा को १३ सीटों पर जीत मिली है। १० सीटें अन्य दलों के खाते में गई हैं। मणिपुर और गोवा में कोई भी दल बहुमत हासिल नहीं कर पाया है।
उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी में परिवारवाद की राजनीति ने भी चुनावों को प्रभावित किया है जिससे कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव कोई जादुई चमत्कार यहां नहीं कर सके। नैया पार लगाने के लिए सपा ने कांग्रेस से भी हाथ मिलाया था वह भी यहां की जनता ने नकार दिया। यहां जीत का असर देखा जाए तो पूर्वांचल की ८९ सीटों पर मतदान से पहले प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी लगातार तीन दिनों तक वाराणसी में रोड शो करते नजऱ आए, जिसका असर चुनावी रुझानों में दिखा है। आखिरी दो चरण के मतदान में, जो कि ४ मार्च और ८ मार्च को हुए, पूर्वांचल की ८९ सीटों पर मतदान हुआ और इस दौरान भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह उत्तर प्रदेश प्रचार मुख्यालय को राज्य की राजधानी लखनऊ से हटा कर वाराणसी ले गए। वहीं पर आगे की रणनीति तैयार हुई कि किस तरह से विपक्ष को चारों खाने चित किया जाए। हालांकि शुरुआती चरणों के मतदान की बागड़ोर भी अमित शाह ने अपने कंधों पर ले रखी थी और चुनाव की सारी तैयारियों का नेतृत्व वे ख़ुद कर रहे थे। उत्तर प्रदेश की जनता भाजपा को मज़बूत विकल्प के तौर पर भी देख रही है।
विधान सभा चुनावों से पूर्व जिस तरह से समाजवादी पार्टी में विवाद शुरू हुए, उससे प्रदेश की जनता में गलत संदेश प्रसारित हुआ। चाचा शिवपाल यादव और पार्टी सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव से अखिलेश यादव की तकरार ने समाजवादी पार्टी का ही नुकसान किया। पार्टी तो टूटने से बच गई, लेकिन कार्यकर्ता दो खेमों में बंट गए। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की ७३ सीटों पर विजेता होना, ने भी टॉनिक का काम किया।
इसके साथ ही प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के नोटबंदी अभियान का दुष्प्रचार उनके (मोदी के लिए) लिए फायदेमंद ही साबित हुआ। उत्तर प्रदेश की सभी बड़ी पार्टियों ने नोटबंदी की जम कर आलोचना की थी चाहे वे प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव हों या फिर बसपा सुप्रीमो मायावती। लेकिन इसका उलटा असर होता नजऱ आ रहा है। विपक्ष ने नोटंबदी के लिए प्रधान मंत्री की नकारात्मक छवि पेश करने की कोशिश की, लेकिन पीएम के लिए विधान सभा चुनाव में यह सकारात्मक संदेश लेकर आई।
भाजपा की जीत का एक अहम कारण यह भी होगा कि इस बार वह विवादों से बचते नजर आई। भाजपा नेताओं की ओर से ऐसा कोई भी विवादास्पद बयान नहीं दिया गया जिससे कि उन्हें वोटों का ख़ामियाज़ा भुगतना पड़े। प्रधान मंत्री मोदी कब्रिस्तान-श्मशान वाले बयान को विपक्ष ने हवा देने की कोशिश की, लेकिन नाकामयाब रहे। दरअसल उत्तर प्रदेश विधान सभा के चुनाव भारतीय जनता पार्टी के लिए इतने महत्वपूर्ण थे कि वे केन्द्र की मोदी सरकार के लिए वह प्रतिष्ठा का प्रश्न बन चुके थे।
उत्तर प्रदेश विधान सभा के चुनाव परिणाम भारतीय जनता पार्टी नीत केन्द्र सरकार को नई दिशा भी प्रदान कर सकते हैं और अपनी रीति-नीति में बदलाव के लिए भी विवश कर सकते हैं। दरअसल उत्तर प्रदेश विधान सभा के चुनाव न केवल केन्द्र सरकार के लिए विशेष महत्पूर्ण थे बल्कि प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता एवं भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के चुनावी रणनीतिक चातुर्य की परीक्षा भी इन चुनावों में थी। गौरतलब है कि २०१४ के लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने जो शानदार बहुमत हासिल किया था उनमें उत्तर प्रदेश का योगदान सर्वाधिक था जहां पार्टी ने ८० में से ७३ लोकसभा सीटों पर कब्जा करने में सफलता अर्जित की थी। इस सफलता का श्रेय भाजपा के तत्कालीन उत्तर प्रदेश प्रभारी अमित शाह के रणनीतिक चातुर्य को दिया गया था जिन्हें बाद में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष से नवाजा गया परंतु इस हकीकत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि भावी प्रधान मंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता के बिना अमित शाह की रणनीतिक सफलता की कल्पना ही नहीं की जा सकती थी। मोदी को उत्तर प्रदेश की वाराणसी सीट से चुनाव लड़ाने का फैसला भी भाजपा की राज्य में ऐतिहासिक सफलता का मार्ग प्रशस्त करने में महत्वपूर्ण कारक बना। प्रधान मंत्री लोकसभा में जिस राज्य के एक लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हों उस राज्य के विधान सभा चुनाव निश्चित रूप से प्रधान मंत्री के खुद के लिए भी उतने ही महत्वपूर्ण थे जितने कि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए। इसलिए इनमें दो राय नहीं हो सकती कि उत्तर प्रदेश विधान सभा के चुनाव प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के लिए अन्य दलों के सुप्रीमो से कहीं अधिक महत्वपूर्ण थे। इन चुनावों में मिली जीत से अब भाजपा को अगला अवसर तो मिल गया है कि लेकिन देखना यह है कि २०१९ में होने वाले लोकसभा चुनावों में वह कितना अपना वर्चस्व कायम रख सकती है।

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