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संवेदना हमारे तत्व दर्शन में है और शक्ति समाज के संगठन और जन-जन के सशक्तिकरण में है। उच्च आध्यात्मिक मूल्यों से प्रेरित यही धर्म की अवधारणा है। यह हमारा विकास का सनातन मॉडल है। यह हमारी चिर परिभाषित राष्ट्रीयता है।

भारत में राष्ट्र की अवधारणा मूलतः सर्व कल्याणकारी रही है। भारत की प्रज्ञा ने इस देश को देवनिर्मित बतलाया। बार्हस्पत्य शास्त्र कहता है

हिमालयात समारभ्य यावदिन्दु सरोवरम।
तं देवनिर्मितं देशं हिन्दुस्थानं प्रचक्षते।

अर्थात, हिमालय से लेकर दक्षिण में इंदु सरोवर (हिन्द महासागर) तक देव निर्मित यह देश हिंदुस्थान कहलाता है। सबसे पहले चिंतन करना चाहिए कि देव निर्मित से आशय क्या है? देवता किसे कहते हैं?
पश्चिम के व्याख्याकारों ने जिस प्रकार से देवताओं की संकल्पना प्राचीन ग्रीक और रोम आदि के देवताओं के सन्दर्भ में प्रस्तुत की है कि देवता मानो सब पर शासन करने वाले तानाशाह हैं, वैसा आशय भारत में कभी नहीं रहा। भारत में सबके कल्याण का भाव रखने वाली उच्च स्तरीय उन्नत आत्माओं को देवता कहा

गया है। इसी का स्मरण करवाने के लिए प्राचीन समय में पुरुषों के नाम के साथ देव और स्त्रियों के नाम के साथ देवी जोड़ने की परंपरा रही है। देव शब्द के अनेक आयाम हैं। लोक और परलोक में सबके कल्याण का आचरण करने वाले देवता कहे गए। सब के अंदर एक ही जीवात्मा है। इस जीवात्मा के निरंतर नए देह धारण करते हुए उत्तरोत्तर विकास को ही पशु योनि, मनुष्य योनि और देव योनि आदि कहा गया है। मृत्यु उपरांत अतृप्त वासनाओं को लेकर व्यथित रहने वाले जीव को प्रेत जबकि अपने सत्कर्मों के अभ्यास के कारण मृत्यु उपरांत भी सबका कल्याण करने को प्रयत्नशील जीवात्मा को देव कहा गया है। इसी संदर्भ में पृथ्वीलोक तथा इससे सूक्ष्म अन्य लोकों की चर्चा शास्त्रों और पुराणों में आती है। जैसे मानव के अस्तित्व के अनेक आयाम हैं। सबसे स्थूल देह, फिर उससे सूक्ष्म प्रवृत्तियां या संस्कार समूह, विचार, भाव, अहम् का बोध आदि है, उसी प्रकार सृष्टि के भी सूक्ष्म से सूक्ष्मतर आयाम कहे गए हैं। ये चेतना के विकासक्रम हैं। जिनके मूल में एकत्व का साक्षात्कार है। इसीलिए सबको आत्मस्वरूप मानकर सबके कल्याण की कामना और प्रयास है।

इसी सन्दर्भ में दूसरा शब्द ऋषि है। ऋषि शब्द को लेकर आधुनिक समाज में एक भ्रम प्रचलित है। ऋषि का आशय संन्यासी से लिया जाता है। जबकि प्रायः सभी प्राचीन ऋषि गृहस्थ रहे हैं। संन्यास तो प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में अपेक्षित एक आश्रम (चौथा आश्रम) अथवा अभ्यास है लेकिन ऋषित्व तो बिरलों ने ही प्राप्त किया। अपने तप-साधना से लोक कल्याण करने वाले और जन जीवन को समग्रता की ओर ले जाने वाले ऋषि कहलाए।
जैसा कि इस वेद मंत्र में कहा गया है —

भद्रमिच्छन्तः ऋषयः स्वविर्दः तपोदीमुपासेदुरग्रे।
ततो राष्ट्रं बलमोजस्वजातमं तस्मै देवाः उपसन्नुमंतु।

भावार्थ है कि ’भद्रमिच्छन्तः’कल्याण की कामना रखने वाले ऋषियों ने तप किया। उनके तप से उत्पन्न बल और ओज से यह राष्ट्र हमें मिला जिसे देवता भी नमस्कार करते हैं।
दोनों ही श्लोकों में भाव एक ही है। देव निर्मित कहें अथवा ऋषि निर्मित, भारत की प्रज्ञा राष्ट्र को सबके कल्याण की कामना से निर्मित ही मानती है। कल्याण का यह भाव सारी सृष्टि को अपने में समेटे हुए है। कोई मनुष्य अथवा जीव इस कल्याण कामना के दायरे से बाहर नहीं है।
भारत के ऋषियों ने कहा है —

सर्वे भवन्तु सुखिनः। सर्वे सन्तु निरामया।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु। मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत।

भावार्थ, सभी सुखी हों। सभी निरोगी हों। सबका कल्याण हो। किसी को दुःख न हो।
हिन्दुओं का यह मंत्र सिर्फ हिंदुओं के कल्याण का संकल्प नहीं है। न ही, सब मनुष्यों के लिए है। ये तो सारी सृष्टि, सभी भूतों के लिए है। ये भारत की राष्ट्र की संकल्पना है।

कल्याण की सार्वभौमिक -सर्वकालिक अवधारणा
कल्याण की अवधारणा बड़ी महत्वपूर्ण है। संतुलन बड़ा बारीक है। अतीत में मानव जीवन और सृष्टि को असंतुलित कर देने वाले सब प्रयोग भलाई की घोषणा करके ही किए गए हैं। इसमें व्यक्तिगत स्वतंत्रता, परिवार, समाज और संस्कृतियों की बलि चढ़ाई गई। नस्ल, राज्य, मज़हब और वाद के नाम पर हुए इन प्रयोगों ने सिद्ध किया है कि एकांगी दृष्टि संकीर्णता और फिर अंततः विनाश की ओर ही ले जाती है।

सेमेटिक मज़हब में (यहूदियों को छोड़कर ) इस्लाम और ईसाइयत विस्तारवादी रहे हैं। डेढ़ से दो सहस्त्राब्दियों में फैले इतिहास में राजनीति इनका अभिन्न अंग रही। इन्हीं के अंदर से और कम-अधिक मात्रा में, इनकी प्रतिक्रिया स्वरूप निकले दो वाद – एक कम्युनिज़्म और दूसरा असीमित उपभोगवाद (जिसे पूंजीवाद कहा जाता है) जरा विचार करके देखें। नस्लवाद -मज़हब और लालच के कारण अमेरिका, न्यूज़ीलैंड और ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासी मिटा दिए गए। इन द्वीपों और महाद्वीपों पर आज यूरोपीय आक्रांताओं की संततियां निवास कर रही हैं। ग्रीक, रोम, मिस्र और ईरान की प्राचीन संस्कृति काल के गर्भ में विलीन हो चुकी है।

ईसा बाद पहली सहस्त्राब्दी में यूरोप के प्रकृति पूजक अपनी परंपराओं को त्यागने को विवश किए गए और दूसरी सहस्त्राब्दी में अफ्रीकियों के साथ ऐसा हुआ। कन्वर्जन उद्योग आज भी ज़ोर-शोर से चल रहा है। इस्लामिक स्टेट और तालिबान आज भी ‘काफिरों’ के गले रेत रहे हैं। व्यक्तिगत स्वतंत्रता का ह्रास भी एक भयंकर इतिहास है। जहां एक ओर, उपरोक्त इतिहास क्रम में वैयक्तिक स्वातंत्र्य के मूल्यों की धज्जियां उड़ा दीं गईं, वहीँ स्वर्णमुद्राओं के लालच में सदियों तक अफ्रीकी अश्वेतों का अपहरण कर उन्हें सुदूर अरब, यूरोप और अमेरिका की यूरोपीय कॉलोनियों में बेचा जाता रहा।

फिर रूस में कम्युनिज्म का उदय हुआ। और एक बार फिर करोड़ों मानवों, लाखों परिवारों और हज़ारों बसाहटों का विनाश प्रारंभ हुआ। ये क्रम चीन, कंबोडिया, कोरिया समेत कई देशों में दुहराया गया। अमेरिका और यूरोप ने व्यापारिक साम्राज्य के जिस मॉडल को अपनाया उसने इस धरती को कचराघर, बहुमूल्य संसाधनों को लालच पूर्ति का साधन बना डाला और बाजार को समाज की व्यासपीठ पर स्थापित कर दिया। आज बाज़ार चाहता है कि कुटुंब व्यवस्था एकाकी परिवारों में परिवर्तित हो, ताकि उपभोग बढ़े। बाजार चाहता है कि व्यक्तिवाद परिवार पर हावी हो ताकि उपभोग गुणित होता रहे। पर्यावरण के नाश के संदर्भ में इतना ही कहना पर्याप्त है कि धरती पर तीस प्रतिशत प्रदूषण सिर्फ ८० कंपनियों ने फैलाया है।

इन सभी अतिवादों और अत्याचारों के अपने तर्क भी हैं। यूरोप, अमेरिका और अफ्रीका में लोगों को सता रहे मिशनरी उन्हें मुक्ति का मार्ग दिखा रहे थे, तो तलवार के ज़ोर पर इस्लाम फैलाने निकले औरंगज़ेब, टीपू
सुलतान, तैमूर, ग़ज़नवी, गोरी और चंगेज़ अपना मज़हबी फ़र्ज़ निभा रहे थे। साम्यवाद क्रांति के नाम पर करोड़ों किसानों, मज़दूरों और ज़मींदारों की हत्याएं करने वाले लेनिन, स्टालिन, माओ और पोलपोट मज़दूरों और किसानों की भलाई का दावा कर रहे थे।

इन एकांगी वादों के विपरीत प्राचीन समय में ही भारत ने एक समग्र जीवन दृष्टि का मॉडल दिया। उस मॉडल का नाम है धर्म। धर्म का अर्थ (जैसा कि बाद में विकृत कर दिया गया) पूजा-उपासना- पंथ-संप्रदाय आदि नहीं है। धर्म आत्मा के प्रकाश को, एकात्मता के दर्शन को दैनिक व्यवहार में लाने का प्रयास है। धर्म का अर्थ अपने अंतःकरण में झांककर, सबके अंदर एक ही चेतना का दर्शन करते हुए, सबके अंदर अपने ही प्राण मानते हुए किया गया कल्याणकारी आचरण है। तभी माता का धर्म, पिता का धर्म, पुत्र का धर्म, पति-पत्नी का धर्म, राजा-प्रजा का धर्म, सैनिक-व्यापारी-चिकित्सक का धर्म आदि और फिर राष्ट्र धर्म एवं मानव धर्म कहा गया। इन शब्दों का अर्थ हर भारतवासी समझता है। जीव धर्म, दया धर्म, आदि भी कहे गए हैं। पर्यावरण और जल संरक्षण, संसाधनों का संरक्षण इन सभी की शास्त्रों ने धर्म कार्य के रूप में चर्चा की है। व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अस्मिता को महत्व देते हुए देह धर्म, गुणधर्म और स्वधर्म की भी बात हुई। इस धर्म की रक्षा का निर्देश किया गया। धर्मो रक्षति रक्षितः, अर्थात तुम धर्म की रक्षा करो, धर्म तुम्हारी रक्षा करेगा, ये भारत की कल्याण की अवधारणा है। तुम दूसरे की चिंता करोगे तो तुम्हारी कुशलता अपने-आप ही सुनिश्चित हो जाएगी। सोचना पड़ता है कि यदि मार्क्स को धर्म की इस अवधारणा का पता होता, यदि रूसो और वाल्टेयर जैसे पश्चिमी विचारकों ने सत्यकाम जाबाल और धर्मव्याध के प्रसंग सुने होते, और यदि अब्राहम लिंकन ने राजा शिवि का त्याग सुना होता तो शायद पश्चिम बहुत पहले अपनी दिशा बदल चुका होता।

भारत की प्रज्ञा ने जीवन के हर पहलू को धर्म के इस सूत्र में गूंथ कर रखा। राज्य-दंड-कर सब कुछ हज़ारों सालों से रहा, लेकिन उस पर जब तक धर्म की इस अवधारणा का नियंत्रण रहा, भारत विश्व का सिरमौर रहा। जब इसे भूले तो राष्ट्र जीवन में अवनति आई। परकीयों के आक्रमण हुए।
भारत का राष्ट्रवाद स्वयं को श्रेष्ठ और दूसरों को हीन समझने वाला यूरोपीय राज्यों का उन्माद नहीं रहा जिसने उन्हें सदियों तक संघर्षों में उलझाए रखा। जिसके चलते उन्हें दुनियाभर के करोड़ों लोगों को गुलाम बनाते हुए पीड़ा नहीं हुई और जिसकी अंतिम परिणति दो विश्वयुद्धों में भीषण नरसंहार के रूप में हुई। भारत में राष्ट्रवाद, राष्ट्रीयता का अहंकार नहीं राष्ट्रीय अस्मिता की अभिव्यक्ति है। इसीलिए हज़ारों वर्षों के इतिहास में भारत ने कभी किसी देश पर आक्रमण नहीं किया। किसी की स्वतंत्रता नहीं छीनी। भारत का राष्ट्रवाद सारी धरती को अपना परिवार मानता है। ये कल्याण अथवा विकास की हमारी सार्वभौमिक- सर्वकालिक दृष्टि है।

राष्ट्र संस्कृति में है
जिस भूमि पर आज पाकिस्तान है वह कभी भारत कहलाती थी। पाकिस्तान आज सारी दुनिया में आतंक का निर्यात करने वाला देश बन गया है। पूरा पाकिस्तानी समाज बारूद के ढेर पर बैठा है। पकिस्तान में क्या बदला जिसके कारण वह ऐसा हो गया। वही धरती-नदी-पहाड़-वन और संपदा है। वही डीएनए है। वही जलवायु है। फिर क्या बदल गया? बदली है संस्कृति। पूरी धरती को अपना परिवार मानने वाली हिन्दू संस्कृति का ह्रास हुआ। और इसी अंतर ने सीमा के इस तथा उस ओर कितना बड़ा अंतर खड़ा कर दिया। हम इस हिंदू संस्कृति के कारण ही हैं यह प्रत्येक भारतवासी को स्पष्ट होना आवश्यक है। तभी एकात्मता उत्पन्न हो सकेगी। अब एक और विचार उठता है कि भले ही हम अपनी हिंदू संस्कृति की विरासत के वारिस है लेकिन क्या हम पूरी तरह अपनी संस्कृति को अपने आचरण में उतार सके हैं? धर्म की जो अवधारणा है उसके अनुसार हमारी ‘धार्मिकता’ कितनी खरी है? क्या अस्पृश्यता और जाति का व्यवहार धर्मानुकूल है? क्या शक्ति उपासकों के देश में नारी की स्थिति गर्व करने लायक है? क्या शिव के उपासकों ने पंक्ति में सबसे पीछे खड़े व्यक्ति को न्याय और आत्मसम्मान दिलाया है? हम जानते हैं कि निष्कर्ष संतोषजनक नहीं है। हममें से ज्यादातर को आज ये सवाल व्यथित करेंगे। हम बदलाव चाहते हैं, लेकिन शक्ति पूरी तरह केंद्रित नहीं है। हमें ध्यान रखना होगा कि हमारे पूर्वज, जिन्होंने उपनिषद् रचे, मानव की समानता का सन्देश दुनिया को दिया वे एक जिंदा कौम थे। सत्य का साक्षात्कार कर उन्होंने कहा था ‘अहं ब्रह्मास्मि’ – मैं ब्रह्म हूं। फिर उन्होंने कहा- तत्वमसि। तुम भी वही (ब्रह्म) हो। धीर गंभीर स्वर एक बार फिर गूंजा – अयमात्मा ब्रह्म, अर्थात सब कुछ ब्रह्म है। मन्त्रद्रष्टाओं ने फिर कहा – प्रज्ञानं ब्रह्म। यह ज्ञान ही ब्रह्म है। यह सारी सृष्टि का स्वीकार है। यह सकारात्मकता ही हमारी संस्कृति है। यही हमारी राष्ट्रीयता है। यह व्यवहार में घटा तो राष्ट्र सिकुड़ा। यह व्यवहार में बढ़ेगा तो राष्ट्र बढ़ेगा। समाज सामर्थ्यशाली बनेगा।

क्या हो हमारा विकासपथ?
राष्ट्र का विकासपथ राष्ट्र की संस्कृति के अनुरूप ही हो सकता है। सारे वाद सामने रखकर हम अपने सांस्कृतिक दर्शन के प्रकाश में कह सकते हैं कि हम मानवमात्र की एकता में विश्वास रखने वाले परंतु विविधता की समृद्धि के पोषक हैं। हम सब प्रकार की भौतिक समृद्धि और वैभव उत्पन्न करेंगे परन्तु मार्गदर्शक की गद्दी पर धर्म विराजेगा, बाजार नहीं। हम व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करेंगे परन्तु व्यक्ति परिवार और समाज परस्पर पोषक की भूमिका में रहेंगे। हम संसाधन और आकांक्षाओं के बीच संतुलन बिठाएंगे। भारत के शहरी विकास का पैमाना यह नहीं होगा कि सामान्य से सामान्य व्यक्ति कार का उपयोग करता है बल्कि यह होगा कि समृद्ध से समृद्ध व्यक्ति पब्लिक ट्रांसपोर्ट का उपयोग करता है। उच्च गुणवत्तायुक्त वस्तुएं उत्पादित हों, उच्च कोटि की शिक्षा-स्वास्थ्य-संचार सेवाएं सभी को समानता से उपलब्ध हों। तकनीक में मानवीयता का स्पर्श कभी छूटे नहीं। जब दूरदराज की जनजातीय पट्टी में रहने वाला भारतवासी, किसान, श्रमिक अपने अधिकारों के लिए दुनिया में किसी से भी आंखें मिलाकर आत्मविश्वास से बात कर सके तभी हम कह सकेंगे कि हमने अपनी संस्कृति के आदर्शों के अनुरूप विकास संरचना तैयार की है।
हिन्दू संस्कृति शक्ति और संवेदना का संतुलन है। इसलिए हमारे इष्ट एक हाथ में शस्त्र धारण करते हैं और दूसरे हाथ से अभय और आशीर्वाद देते हैं। संवेदना हमारे तत्व दर्शन में है और शक्ति समाज के संगठन और जन -जन के सशक्तिकरण में है। उच्च आध्यात्मिक मूल्यों से प्रेरित यही धर्म की अवधारणा है। यह हमारा विकास का सनातन मॉडल है। यह हमारी चिर परिभाषित राष्ट्रीयता है। यही आज समय की पुकार है।

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