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2014 का चुनाव परिवर्तन का मात्र एक आगाज था, लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण पड़ाव तो 2019 है। इस चुनाव में दो प्रवृत्तियों में से एक को चुनना है। एक राष्ट्रपरिवार से जुड़ी है, जबकि दूसरी परिवारवाद, बाजारवाद से जुड़ी है। इसमें मतदाता चूके तो सब कुछ रेत की तरह हाथ से फिसल जाएगा।

हम आकाश में लड़ेंगे, जमीन पर लड़ेंगे, पहाड़ों में लड़ेंगे,  समुंदर में लड़ेंगे- विंस्टन चर्चिल के ये उद्गार आज याद आ रहे हैं। उसका कारण है, भारत में होने वाले आगामी आम चुनाव। 2019 के चुनाव जीतने के लिए भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दल आने वाले तीन महीनों में भरपूर जोर लगाने वाले हैं। देखते-देखते 2014 में सत्ता में आई मोदी सरकार का कार्यकाल समाप्त होने को आ गया है। इसी कारण सत्तारूढ़ और विरोधी दल लोकसभा चुनाव की अभी से तैयारियां कर रहे हैं। किसी न किसी मुद्दे पर सत्तारूढ़ और विरोधी दलों में एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप हो रहे हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि, पांच राज्यों के हाल के विधान सभा चुनावों के नतीजों ने भाजपा विरोधी खेमे के लिए एकजुट होने की नितांत आवश्यकता निर्माण की है। विरोधी खेमा संगठित हो तो भाजपा को हराया जा  सकता है, यह भावना भाजपा विरोधी खेमे में निर्माण हो गई है।

क्या आम चुनाव के बाद केंद्र में फिर से नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार आएगी? इस पर सम्पूर्ण देश भर में गली से लेकर दिल्ली तक जोरों से चर्चा शुरू है। 2014 के आम चुनाव में भाजपा ने ‘अबकी बार मोदी सरकार’ का नारा दिया था। 2019 के आम सभा चुनाव में भी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने ‘फिर एक बार मोदी सरकार’ का नारा ट्वीट किया है। 2014 में भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिला था। यह उल्लेखनीय इसलिए भी है कि गत 24 सालों में किसी भी राजनीतिक दल को केंद्र में स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था। कांग्रेस नेतृत्व महागठबंधन कराने का प्रयास कर रहा है। चंद्राबाबू, ममता बैनर्जी, नवीन पटनायक, अखिलेश यादव, मायावती कांग्रेस के निकट आने के लिए तैयार नहीं हैं। कांग्रेस और भाजपा के बगैर गठबंधन में  उन्हें दिलचस्पी है। इन विरोधियों में जितनी फूट पड़ेगी उतनी भाजपा के लिए खुशखबरी होगी।

नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता, पार्टी संगठन और भाजपा विरोधी राजनीतिक दलों में एक न होने देने पर भाजपा का ध्यान केंद्रित है। भारतीय जनता पार्टी और मोदी को चुनौती देने वाला अन्य दूसरा कोई दल या नेता भी विरोधी खेमे में नहीं है। फिर भी, ‘अबकी बार फिर मोदी सरकार’ का माहौल भारत भर में निर्माण होना अत्यंत आवश्यक लगता है।

चुनाव केवल घोषणाएं करने का मंच नहीं है। चुनाव तो समाज की आत्मा को टटोलने का सुनहरा मौका होता है। यह मौका प्रत्याशी और मतदाता दोनों के लिए होता है। इस मौके का ठीक तरह से उपयोग करना मतदाताओं के हाथ में होता है। इसी के आधार पर भारत के भविष्य के अगले 5 सालों का सफर तय होना है। गांधी परिवार देश की सत्ता को अपने बाप-दादा की जायदाद समझता है, संविधान और कानून को अपनी उंगलियों पर नचाने का प्रयास करता है, सरकारी संस्थाओं का अपनी चौखट पर झुके हुए गुलामों की तरह उपयोग करता है और देश की आम जनता को भेड़ बकरियां समझता है। कांग्रेस के इस इतिहास को देखते हुए गांधी परिवार के किसी भी सदस्य पर उंगली उठाना दशकों तक जहां अपराध समझा जाता था, आज उसी परिवार के दामाद रॉबर्ट वॉड्रा से प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने घंटों पूछताछ की है। गांधी परिवार ने यह कभी ख्वाबों में भी नहीं  सोचा होगा।

मोदी सरकार विकास की दिशा में कदम उठा रही है और भ्रष्टाचारियों को आड़े हाथ ले रही है। ऐसी स्थिति में कांग्रेसियों का बेताब होना स्वाभाविक है। आज राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनने के लिए उतावले दिखाई दे रहे हैं। भारत विश्व को आकर्षित करने वाला  महत्वपूर्ण बाजार है। राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने पर भारत का यह बाजार उनकी मुट्ठी में आ जाएगा। फिर उसे वे रसभरे नींबू के मुताबिक निचोड़ कर चस्का ले लेकर पी सकते हैं। मोदी सरकार ने तो फर्जी कंपनियों के नाम बाहर से आने वाले पैसे को रोकने के लिए कड़ा कानून बनाया। विदेश से आने वाले पैसे का स्रोत और उसके उपयोग के बारे में पूछते ही जवाब देने के बजाय 20,000 से अधिक फर्जी कंपनियां अपने कार्यालयों में ताले ठोककर भाग खड़ी हुईं। कांग्रेस ने इसी प्रकार के भ्रष्टाचार को गत 60 सालों में पनाह दी। मोदी सरकार आने से यह सब उनकी हाथों से छीन गया है। जब सत्ता के सभी सूत्र अपने हाथ में हो तब कांग्रेस को अपना असली एजेंडा चलाने का सूत्र भी मिल सकता है। हर दूसरे दिन राफेल को लेकर आरोप लगाने वाले राहुल गांधी और कांग्रेसियों का असली मकसद यही है।

ऐसे भ्रष्टाचारी कांग्रेस की शक्ति को छोटा करके आंकना बहुत बड़ी भूल होगी। अब कांग्रेस के जीवन-मरण का प्रश्न है। सत्ता पाने का पागलपन कांग्रेसियों को किसी भी हद तक ले जा सकता है। लोकसभा के चुनाव सिर पर हैं। विरोधी दलों ने महागठबंधन के प्रयास तेज कर दिए हैं। भाजपा को भी एहसास हो गया है कि 2019 का चुनाव जीतने के लिए उन्हें जी-जान से जुटना होगा। भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय परिषद की बैठक में भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह ने विपक्ष को निशाना बनाया है। विरोधियों के महागठबंधन को ढकोसला करार दिया है। इसके साथ ही अमित शाह ने पार्टी के कार्यकर्ताओं को चेतावनी दी है कि, सभी कार्यकर्ता आने वाले चुनाव को अत्यंत गंभीरता से लें। 2019 का चुनावी युद्ध पानीपत के युद्ध जैसा होगा। जो दशकों तक देश की राजनीति को प्रभावित करता रहेगा।

2019 का चुनाव वैचारिक चुनावी युद्ध है। दो विचारधाराएं आमने सामने खड़ी हैं। एक ओर परिवारवाद में लगी अत्यंत लालची प्रवृत्ति है और दूसरी ओर व्यक्ति, समाज, राष्ट्र के हित में निरंतर कार्य करने वाली प्रवृत्ति है। यह आने वाला चुनाव भारत के गरीबों, युवकों और उन करोड़ों भारतीयों के लिए खास महत्व रखता है, जो दुनिया में भारत को गौरवपूर्ण रूप में देखना चाहते हैं। भाजपा राष्ट्र के कल्याण के विषय को लेकर आगे बढ़ रही है। साथ में सांस्कृतिक राष्ट्रीयता को स्थापित करने का प्रयास कर रही है, जबकि विपक्षी केवल सत्ता हथियाने के लिए इकट्ठा हुए हैं। अभी-अभी हुए पांच राज्यों के चुनावों के नतीजों को ध्यान में रखते हुए 2019 का चुनाव किसी भी राजनीतिक पार्टी के लिए आसान नहीं है।

सवाल यह है कि, 2014 के आम चुनाव से 2019 का यह चुनाव किस मायने में अलग होगा? अंतर यही है कि 2014 के  चुनाव के समय विपक्ष कमजोर था। आज स्थिति अलग है। हाल ही में मिली पांच राज्यों की जीत के कारण कांग्रेस कार्यकर्ता उत्साहित हैं। फिर भी आज किसी एक दल के पास अपने बलबूते पर भाजपा को चुनौती देने की ताकत नहीं है। इसलिए सब जुट रहे हैं। गठबंधन के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती तो अपना नेतृत्व चुनने की है। आखिर इस गठबंधन का नेता कौन? गठबंधन का मुकाबला संगठित शक्तिशाली भाजपा से है। मोदी के नाम पर संगठन में भी भरपूर ऊर्जा का संचार हो रहा है।

कोलकाता के ऐतिहासिक परेड ग्राउंड पर सभी विरोधी दलों के नेता एक मंच पर इकट्ठा हुए थे। इस राजनीतिक आयोजन की सबसे बड़ी कमजोरी यह थी कि वहां देश के लिए किसी विकल्प पर कोई विचार ही सामने नहीं आ रहा था। कोई भी नेता बोलने की तैयारी करके वहां पहुंचा नहीं था। वही घिसीपिटी बातें- राफेल, सांप्रदायिकता, ईवीएम, सीबीआई, संविधान का दमन- नेताओं के मुख से झर रही थीं। मोदी और अमित शाह को लोकतंत्र का हत्यारा कह रहे थे पर पश्चिम बंगाल की अत्यंत दमनकारी नेता ममता बनर्जी के साथ ये सब नेतागण मंच साझा कर रहे थे। यह तमाशा देखकर देश भर के लोगों के मन में यह प्रश्न निर्माण होना स्वाभाविक है कि क्या इन नेतागणों कों ममता बैनर्जी का दमनकारी आचरण दिखाई नहीं देता? अरविंद केजरीवाल, नरेंद्र मोदी और अमित शाह को हिटलर बता रहे थे, लेकिन उसी केजरीवाल ने उनकी पार्टी ‘आप’ से कई अपने सहयोगियों को बेरहमी से बाहर का रास्ता दिखा दिया। फारूक अब्दुल्ला इसी मंच से भारतीयता, लोकतंत्र बचाने की बातें कर रहे थे। देश की जनता जम्मू -कश्मीर के राजनीतिक इतिहास को अब तक भूली नहीं है। कोलकाता में देश के इन कथित बड़े नेताओं का यह जमावड़ा अनेक प्रश्न उपस्थित कर रहा था।

वास्तव में भारतीय राजनीति की त्रासदी यह है कि महज राजनीतिक विरोध के लिए विरोध किया जाता है। लेकिन भाजपा का विकल्प पेश करने और राजनीति की भविष्य की रूपरेखा रखने का सामर्थ्य विपक्षियों के इस जमावड़े में कहीं दिखाई नहीं दिया। जो नेता मंच पर आए उनमें से कोई भी ऐसा नहीं था, जिनसे राष्ट्रीय नेतृत्व की उम्मीद लगाई जाए। इसका यह अर्थ नहीं है कि आगामी आम चुनावों के लिए परेड ग्राउंड में संपन्न हुई सभा का कोई महत्व ही नहीं है। एक मंच पर इकट्ठा होने का मतलब यह नहीं है कि वे आम चुनाव एकसाथ मिल कर लड़ेंगे। स्वयं ममता बैनर्जी ने कांग्रेस को गठबंधन में शामिल करने की कोई घोषणा यहां नहीं की। उन्होंने केवल मोदी सरकार को उखाड़ फेंकने का आवाहन किया है। इन नेताओं के इकट्ठा होने से देश का राजनीतिक माहौल गर्म हो गया है। इन सभी का स्वर यही था कि हमारे बीच भले कोई भी मतभेद हो पर भाजपा को हराने के मामले में हम सब एक हैं।

इस परिपेक्ष्य में देखा जाए तो, 2014 की मोदी लहर अब महसूस नहीं हो रही है। 2014 के चुनाव की तरह स्पष्ट बहुमत भाजपा को 2019 के चुनाव में क्या फिर से मिल पाएगा? यह प्रश्न विचारणीय है। अलबत्ता, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने भाजपा संगठन मजबूत करने पर विशेष ध्यान दिया है। कांग्रेस और मोदी विरोधी खेमा भी दो-दो हाथ करने की तैयारी कर रहा है। मुलायम सिंह यादव ने संसद भवन में अंतिम दिवस के समारोह भाषण में ‘फिर से नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनने चाहिए यह मेरी इच्छा है।’ यह सदिच्छा व्यक्त करके मोदी सरकार के समन्वय और राज्य के विकास के लिए अच्छे योगदान का जिकर करके कांग्रेस के साथ सभी विपक्ष की हवा ही निकाल दि है।

14 फरवरी के दिन श्रीनगर ले जा रहे बसों के काफिले पर आतंकवादियों ने भीषण घातक हमला किया।जिसमें अब तक 42 जवानों की दर्दनाक मृत्यु हो गई। यह आतंकी घटना होने से पहले जो वक्तव्य जैसे मोहम्मद आतंकी संगठन से जुड़े हुए फिदायीन हमलावर ने की है, उसने जो बात कही है उस बातों में इतिहास, वर्तमान और भविष्य में हम भारत की नींद हराम करते रहेंगे,इस प्रकार की भाषा की है। इस भाषा को ध्यान में लेना चाहिए। यह बात अत्यंत आवश्यक है। इस आतंकी घटना में कश्मीर से जुड़े आतंकी संगठन का हाथ प्रत्यक्ष रूप में दिखाई दे रहा है। लेकिन यह बात अत्यंत स्पष्ट है कि, इस आतंक के दु:साहस के पिछे पाकिस्तान के नापाक करतूत भी है। हमें आज दोहरी लडाई लड़नी है। एक कश्मीर के आतंकियों को निपटाना अत्यंत आवश्यक है। कश्मीर की आतंकवादी गतिविधियों से निपटते समय लश्कर को खुली छूट देना अत्यंत आवश्यक है। साथ में आज कंगाल होते जा रहे पाकिस्तान में कभी भी दरार पड़ सकती है। आज पाकिस्तान चार हिस्सों में बंटने के कगार पर आकर खड़ा है। आर्थिक मंदी की मार झेल रहा पाकिस्तान, दर-दर पर भिक्षा की कटोरी लेकर घुम रहा है। ऐसे पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए एक जोर के झटके की आवश्यकता है।अत्यंत सोच-समझ के साथ पाकिस्तान को दिया हुआ एक भी झटका उसकी तबाही के लिए काफी हो सकता है। यह झटका देते समय अंतर्राष्ट्रीय नीतियों को ध्यान में रखकर देना अत्यंत आवश्यक है। इसमें मोदी सरकार की कूटनीतियों की परिक्षा भारतीय जनता के सामने आ जायेगी। पूरा देश आज आपसे चालीस की जगह चार सौ का जबाब चाहता है। एक सर्जिकल स्ट्राइक के बाद पाकिस्तान का आतंकी स्वभाव बदल जायेगा अथवा आतंकवादी अपनी राह छोड़ेंगे, इस प्रकार की समझ को पालना अत्यंत गलत बात है। राष्ट्र के इतिहास में उत्तर को प्रतिउत्तर मिलता ही रहेगा। नीयती ने भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी जी को इस घटना के बाद एक मौका दिया है। उस मौके का इस्तमाल कर के नरेंद्र मोदी सरकार संपूर्ण विश्व के सामने समर्थ भारत को पेश करेंगे?पाकिस्तान का भुगोल बदल डालो और देश का नया इतिहास लिखने की क्षमता नरेंद्र मोदी जी रखतेे है।

2014 का चुनाव परिवर्तन का मात्र एक आगाज था, लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण पड़ाव तो 2019 है। इसमें मतदाता चूके तो सब कुछ रेत की तरह हाथ से फिसल जाएगा। ‘अबकी बार फिर से मोदी सरकार’ का आवाहन जनता को स्वीकार करना चाहिए। इस चुनाव में दो प्रवृत्तियों में से एक को चुनना है। एक राष्ट्रपरिवार से जुड़ी है, जबकि दूसरी परिवारवाद, बाजारवाद और आतंकवाद से भी जुड़ी है। इस बात को ध्यान में रख कर ही हमें आने वाले भविष्य के स्वागत के लिए तैयार रहना है। मोदी हमारे लिए ही नहीं, बल्कि हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए भी अत्यंत जरूरी है।

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