राजनीतिक अंधकार का एक दशक

बढ़ती बेरोजगारी, दरकती हुई कानून-व्यवस्था, संस्थागत भ्रष्टाचार, बंद होते उद्योग, प्रतिभाओं का होता पलायन, दलीय निष्ठा में रंगी नौकरशाही, जातिवाद के जहर में जर्जर होती संवैधानिक संस्थाएं आदि कुछ ऐसी उपलब्धियां हैं जो विगत दस वर्षों के मायावती और अखिलेश के राज में देश के सब से बड़े प्रांत उत्तर प्रदेश के खाते में दर्ज हुई हैं। लेकिन अब भाजपा के सत्तारूढ़ होने से इस राजनीतिक अंधकार में उजाले की आस बंधी है।

१८ मंडल, ७५ जनपद, ३१२ तहसीलें, ८० लोकसभा, ३० राज्यसभा सीटों के साथ ४०३ सदस्यीय विधान सभा और १४ करोड़ से अधिक मतदाता वाले सूबे उ.प्र. के मुकद्दर में विगत एक दशक से कायम काली रात ने प्रदेश में सरकार और व्यवस्था के मायनों को ही बदल दिया था। जाति और धर्म की बुनियाद पर शासन करने वाली उ.प्र. की दोनों क्षेत्रीय पार्टियों को जनता ने अपना विश्वास और समर्थन दिया। २००७ में जहां बहुजन समाज की नुमाइंदगी का दावा करने वाली बसपा को जनता ने अपनी मोहब्बतों से नवाजा तो २०१२ में समाजवादी पार्टी पर जनता ने अपना विश्वास लुटाते हुए प्रचंड जनादेश सौंपा।

यह वह कालखंड था जब उ.प्र. के जनमानस ने राष्ट्रीय पार्टियों के स्थान पर क्षेत्रीय दलों को प्रदेश के भविष्य को आकार देने की जिम्मेदारी देना बेहतर समझा था। दिलचस्प था कि अनेक बड़ी राजनीतिक शख्सियतों और विचारधारा की विरासत वाले बड़े दल हाशिये पर थे और क्षेत्रीय, जातीय और पंथीय संकीर्णता वाली पार्टियां सत्ता दल और प्रतिपक्ष की भूमिका निभा रही थीं। किंतु मजबूत कानून-व्यवस्था और विकास की रोशनी की चाह रखने वाली उ.प्र. की जनता के लिए ये १० साल, अमावस्या से कम नहीं गुजरे। साम्प्रदायिक दंगों की आग ने जहां कौमी एकजहती को तोड़ा वहीं जातीय गोलबंदी ने सामाजिक ताने-बाने को तहस-नहस कर दिया। कानून-व्यवस्था की हालत तो कुछ ऐसी थी मानो कार्यक्रम हो समुद्र मंथन का और असुरों के हाथ प्रबंधन हो। गर सूबे के सामाजिक फलक पर गूंज रही आवाजों को ध्यान से सुना जाए तो बुलन्दशहर में हुए गैंग रेप की सिसकियां आज भी इंसाफ मांगती सुनाई पड़ जाएंगी। दंगों के दावानल में जले- अधजले घर अपनी बर्बादी का सबब साम्प्रदायिक दंगों की रिकार्डधारी स्पेशलिस्ट सरकार से आज भी जानना चाहते हैं।

अपराध नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि पिछले पांच वर्षों में प्रदेश में महिलाओं के खिलाफ अपराध में ६१ प्रतिशत वृद्धि हुई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष २०१२-१३ में महिलाओं के खिलाफ २४५५२ आपराधिक घटनाएं हुईं। वहीं वर्ष २०१३-१४ में यह बढ़ कर ३१८१० हो गईं। वहीं वर्ष २०१६ के मार्च से अगस्त महीने तक में ही प्रदेश में बलात्कार की १०१२ और महिला उत्पीडऩ की ४५२० घटनाएं हुईं। कैग की रिपोर्ट से सपा सरकार में कानून व्यवस्था की लगातार बिगड़ती स्थिति की तस्दीक स्वयं हो जाती है।

बसपा राज में आधा दर्जन मंत्री-विधायक वसूली, लूट और बलात्कार के आरोपों में जेल में बंद हुए थे। वर्ष २००७ से २०११ तक बसपा राज में प्रति दिन औसत चार से पांच बलात्कार की घटनाएं हुई थीं। गर बुलन्दशहर में मां और बेटी के साथ हुई रेप की घटना आज लोगों की जबान पर है तो निघासन कांड के दाग भी लोग भूले नहीं हैं।

सपा के शासनकाल में दंगों की फसल भी खूब लहलहाई। बीते साल मथुरा के जवाहरबाग कांड, मुरादाबाद कांड और सहारनपुर कांड की साम्प्रदायिक वारदातों का असर आज भी प्रदेश में दिखाई देता है। एनसीआरबी के आकड़ों के मुताबिक अखिलेश राज में साम्प्रदायिक दंगों में बढ़ोतरी आई है। पिछली बसपा सरकार में २२,३४७ दंगे हुए थे तो अखिलेश सरकार में यह आंकड़ा बढ़ कर २५,००७ हो गया। बसपा के शासनकाल में प्रति दिन औसतन ५,७८३ आपराधिक घटनाएं घटित हुईं तो सपा के शासनकाल में यह संख्या ६,४३३ प्रति दिन पहुंच गई। वर्ष २००७ से २०१७ तक का निजाम कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर तो जनता के लिए एक श्राप से कम नहीं था। लिहाजा जनता ने इस बार अंधकार युग से बाहर निकलने के लिए नया प्रयोग कर भाजपा की ओर रुख कर लिया है।

अब बात विकास की। गौरतलब है कि सन २०१२ में जब प्रदेश में अखिलेश यादव की सरकार बनी, तब से लेकर २०१७ मार्च तक प्रदेश की विकास दर ३.९ प्रतिशत से ६.५ प्रतिशत के बीच ही हिचकोले खाती रही, जबकि इसी अवधि में देश की विकास दर ५.६ प्रतिशत से ७.६ प्रतिशत रही है। तात्पर्य यह है कि अखिलेश राज के पूरे कालखंड में प्रदेश की विकास दर देश की आर्थिक वृद्धि दर के निकट तक नहीं हो पाई। इसे देखते हुए अनुमान जताया जा रहा है कि अगर सूबे की विकास की गति ऐसी रही तो उसे विकास के रास्ते पर देश के साथ कदमताल करने में दशकों लग जाएंगे। यही नहीं, उत्तर प्रदेश में प्रति व्यक्ति आय का औसत भी देश की प्रति व्यक्ति आय की औसत से आधा है। राजस्थान जो कभी प्रति व्यक्ति आय के मामले में यूपी से पीछे हुआ करता था, अब वह भी आगे निकल गया है।

जब विकास की जमीनी स्थिति ऐसी है, फिर सवाल उठता है कि अखिलेश यादव आखिर किस आधार पर राज्य में विकास का ढोल पीटते रहे हैं? आधारभूत संरचना के मामले में जिस आगरा-लखनऊ ६ लेन राजमार्ग की बात अखिलेश यादव करते हैं, वह उनके निर्वाचन क्षेत्र के निकट है, जहां से उनकी पार्टी को सब से ज्यादा वोट प्राप्त होते हैं। अब इस राजमार्ग के निर्माण कार्य में जो धनराशि व्यय हुई है, वह राजमार्ग के किमी निर्माण हेतु निर्धारित राशि का लगभग दुगुना है। ऐसे में, इस परियोजना को लेकर अखिलेश सरकार को संदेह की दृष्टि से देखा जाना गलत नहीं होगा। अखिलेश यादव को बताना चाहिए कि इस परियोजना में निर्धारित धन राशि से दुगुनी राशि क्यों लगी?

यह भी उल्लेखनीय होगा कि जिन बीमारू राज्यों की अवधारणा दशकों पहले प्रस्तुत की गई थी, उसमें शामिल मध्य प्रदेश, राजस्थान आदि राज्य भाजपा शासन में विकास के कीर्तिमान स्थापित कर खुद को इस श्रेणी से कब का बाहर कर चुके हैं, लेकिन सपा-बसपा शासन में उलझा उत्तर प्रदेश अब भी बीमारू राज्य की श्रेणी में ही बना हुआ है। ज्ञातव्य है कि मायावती राज में जिस तरह से चीनी मिलों को औने-पौने दाम पर बेचा गया था, वह बसपा सरकार की औद्योगिककरण की दिशा की पोल खोल देता है। दीगर इसमें से अधिकांश चीनी मिलें पोंटी चड्ढा गु्रप को बेची गई थीं। चीनी मिलों की बिक्री की कीमत इतनी कम रखी गई थी कि चीनी मिल एरिया की जमीन का सर्किल रेट ही बेची गई कीमत से कहीं अधिक था। तब विपक्ष में बैठे समाजवादी पार्टी के नेताओं ने ताल ठोंक कर दावा किया था कि उनकी सरकार बनेगी तो चीनी मिल बिक्री घोटाले की जांच की जाएगी और दोषियों को जेल की सलाखों के पीछे जाना होगा, लेकिन पांच वर्षों तक अखिलेश सरकार ने कुछ नहीं किया। इस पर यही समझा गया कि अखिलेश सरकार पोंटी चड्ढा ग्रुप के दबाव में थी, जिससे सपा के कई बड़े नेताओं और पार्टी को फायदा मिल रहा था। जबकि २०१२ में ही भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक ने उत्तर प्रदेश में औने-पौने दाम में चीनी मिलें बेचने के मामले में कई हजार करोड़ रुपये के घोटाले की पुष्टि की थी।

हैरत है कि अखिलेश सरकार ने महालेखाकार की रिपोर्ट पर कार्रवाई करने की बजाय मायावती सरकार में हुए ११८० करोड़ रूपये चीनी मिल ब्रिकी घोटाले की जांच नवंबर २०१२ में लोक आयुक्त को सौंप दी थी। तत्कालीन लोकायुक्त न्यायमूर्ति एन के मेहरोत्रा ने डेढ़ साल से ज्यादा समय तक जांच भी की, लेकिन नतीज शून्य रहा। उत्तर प्रदेश का अतीत देखें तो मिलता है कि समाजवादी सरकार से पहले वाली बहुजन समाज पार्टी पर विकास इस कदर हावी हो गया था कि उन्होंने पूरे सूबे को खासतौर से राजधानी लखनऊ और नोएडा को पत्थरों और हाथियों से पाट दिया था। गुजरी सरकार में ऐसी सोशल इंजीनियरिंग हुई कि राज्य के सारे ठेकेदार और इंजीनियर चन्द वर्षों में ही रोड पति से करोड़पति हो गए और आज यादव सिंह और गायत्री प्रसाद प्रजापति विकास आइकॉन के रूप में उभरे हैं।

अभी एक माह पूर्व यूपी विधान सभा में प्रस्तुत की गई सीएजी रिपोर्ट ने अखिलेश सरकार के काम काज पर सवाल खड़े किए हैं। रिपोर्ट में यूपी में बड़े पैमाने पर हुए अवैध खनन का पूरा विवरण चौंकाने वाला सामने आया है। कैग की रिपोर्ट में सपा सरकार के दौरान अवैध खनन से करोड़ों की हानि का विवरण दिया गया है। यह भी कहा गया है कि यूपी में बगैर पर्यावरण मंजूरी और तय सीमा से ज्यादा खनन किया गया है। सीएजी रिपोर्ट के यूपी सरकार में अवैध खनन से १७९.५७ करोड़ का नुकसान हुआ है। मानकों के विपरीत कीमती खनिजों के खनन से २८२ करोड़ का नुकसान सामने आया है। यही नहीं रॉयल्टी के अपडेट न होने से ४७७.९३ करोड़ के राजस्व का नुकसान हुआ है। यह सपा और बसपा शासन काल में संस्थागत हुए भ्रष्टाचार का एक ट्रेलर है, जबकि पूरी फिल्म ने तो भ्रष्टाचार और कदाचार के क्षेत्र में नए मानक स्थापित कर दिए हैं।

बेरोजगारी के दंश ने यूपी के युवाओं को बेहाल कर रखा है। एक दशक के अंधकार ने रोजगार की रोशनी को लील लिया। बेरोजगारी पर जारी एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक करीब २१ करोड़ की आबादी वाले उत्तर प्रदेश में ५ करोड़ से ज्यादा बेरोजगार युवा ठोकरें खा रहे हैं, और ये सब तब है, जबकि राज्य में लगभग ५ लाख सरकारी पद खाली पड़े हैं। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन के ६६वें दौर (एनएसएसओ) की रिपोर्ट के मुताबिक बेरोजगारी के आंकड़ों के आधार पर उत्तर प्रदेश ११हवें पायदान पर आता है। आंकड़ों के मुताबिक उत्तर प्रदेश में प्रति १००० व्यक्ति ३९ व्यक्ति बेरोजगार हैं। भारत के लिए यही आंकड़ा ५० व्यक्ति का है। उत्तर प्रदेश में शहरी आबादी में प्रति १००० व्यक्ति २९ लोग बेरोजगार हैं जबकि ग्रामीण आबादी में १००० आदमी पर केवल १० आदमी बेरोजगार है। अब अभी हाल ही में निकली भर्ती का हाल देखिए… प्रदेश में करीब चालीस हजार सफाई कर्मचारियों की भर्ती होनी थी। कानपुर नगर निगम में निकली ३२७५ सफाई कर्मचारियों की भर्ती के लिए ३,३०,८२६ फार्म जमा हुए। इस संख्या के अनुसार एक पद के लिए करीब सौ-सवा सौ दावेदार हो गए। इस पद के लिए बी.टेक व बीएड के साथ बीबीए तथा पोस्ट ग्रेजुएट ने भी फार्म भरा था।

मुलायम सिंह, मायावती और अखिलेश के राज में भले ही यूपी को किसी कल-कारखाने का तोहफा न मिला हो, मगर उन्होंने खाद-पानी देकर सूबे में एक नए तरह की इंडस्ट्री जरूर तैयार की। यह इंडस्ट्री रही हजारों करोड़ कमाई वाली ट्रांसफर-पोस्टिंग की। बापू भवन के पंचम तल से आइएएस-आइपीएस की मनमानी ट्रांसफर-पोस्टिंग से कमाने की रवायत चली तो जिले के साहबान भी नक्शेकदम पर चले। देखादेखी जिले के बीएसए साहब भी शिक्षकों को २५-२५ हजार में फेंटने लगे। यह देख डीपीआरओ साहब से भी नहीं रहा गया। उन्होंने पांच-पांच हजार में सफाईकर्मियों को फेंटना शुरू किया। इस कारोबार को इसलिए बढ़ावा दिया गया, क्योंकि हाकिमों के घर के तहखाने में छुपाई तिजोरियों को भरने से इसका कनेक्शन जुड़ा रहा।

बढ़ती बेरोजगारी, दरकती हुई कानून-व्यवस्था, संस्थागत भ्रष्टाचार, बंद होते उद्योग, प्रतिभाओं का होता पलायन, दलीय निष्ठा में रंगी ब्यूरोक्रेसी, जातिवाद के जहर में जर्जर होती संवैधानिक संस्थाएं आदि कुछ ऐसी उपलब्धियां हैं जो विगत दस वर्षों (२००७-२०१७) में देश के सब से बड़े प्रांत उत्तर प्रदेश के खाते में दर्ज हुई हैं। लाजिम है कि उपरोक्त उपलब्धियों के बाद उ.प्र. के उत्तम प्रदेश बनने की अवधारणा को सबसे बड़ा धक्का सपा और बसपा शासन के कालखंड में लगा होगा। किंतु यह स्थापित सत्य है कि अंधेरे को हर हाल में उजाले से हारना पड़ता है अत: २०१७ उ.प्र. राज्य के हिस्से में एक नई उम्मीद, एक नई किरण ले कर आया है। आशा है विगत दशक (२००७-२०१७) के अंधेरों को यह नया सवेरा लील जाएगा और उत्तर प्रदेश, उत्तम प्रदेश बनने की अवधारणा को मूर्त रूप प्रदान करने में सक्षम होगा।

आपकी प्रतिक्रिया...