फेक न्यूज, वामियों की वैचारिक विफलता

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मुंबई पत्रकार संघ सहित अनेक पत्रकार संघों ने इस घटना पर विरोध जताया, जो स्वाभाविक था। यह लोग 'द वायर' के प्रबंधन जैसे अपने ही पत्रकार को तोप के मुंह मे थोड़े ही जाने देते? पर हां, ये सब पत्रकार संघ किंकर्त्तव्यमूढ़ की स्थिति में थे। आखिर सटिक विरोध किसका किया जाय? क्योंकि 'द वायर' के प्रबंधन ने अपनी गलती स्वीकार करते हुए वे तीनों ही लेख वापिस ले लिए थे. अर्थात अनजाने ही क्यों न हो, पर किसी षडयंत्र का हिस्सा बनना उन्होंने स्वीकार किया था और अपने ही एक पत्रकार को बलि का बकरा बनाया था। तब उनपर पुलिस कार्यवाही सही या गलत ? इस संभ्रम में अनेक पत्रकार संघ थे / हैं. 

युगदृष्टा एवं राष्ट्रऋषि श्री दत्तोपंत ठेंगड़ी

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श्री दत्तोपंत जी ने आर्थिक क्षेत्र में साम्यवाद एवं पूंजीवाद के स्थान पर राष्ट्रीयता से ओतप्रोत एक तीसरे मॉडल का सुझाव दिया था। साम्यवाद और पूंजीवाद दोनों विचारधाराओं को, भौतिकवादी विचार दर्शन पर आधारित होने के चलते, आपने अस्वीकार कर दिया था एवं आपने हिन्दू विचार दर्शन के आधार पर “थर्ड वे” का रास्ता सुझाया। अर्थात, हिन्दू जीवन मूल्यों के आधार पर ही आर्थिक व्यवस्था के लिए तीसरा रास्ता निकाला था। पाश्चात्य आर्थिक प्रणाली भारतीय परम्पराओं के मानकों पर खरी नहीं उतरती है। भारत में तो हिंदू अर्थव्यवस्था ही सफल हो सकती है।

सरसंघचालक इंद्रनाथ बेरी जी को भावपूर्ण श्रद्धांजली

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सुप्रसिद्ध उद्योगपति एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मार्वे भाग सरसंघचालक इंद्रनाथ बेरी जी का बीते दिनों अकस्मात स्वर्गवास हो गया। हिंदी विवेक मासिक पत्रिका से हितचिंतक के रूप में निरंतर जुड़े हुए थे। पुरे विधि विधान से उनका अंतिम संस्कार किया गया. उनकी अंतिम यात्रा में सैकड़ों की संख्या में लोग शामिल होकर उन्हें अंतिम विदाई दी. इसके बाद मालाड पश्चिम स्थित सुन्दर नगर के गीता भावना में चौथा एवं पगड़ी कार्यक्रम किया गया. जहाँ उनके आत्मीय जनों ने उन्हें अपनी ओर से भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की. राष्ट्र, धर्म व समाज की सेवा के लिए संघकार्यों से जुड़े इन्द्रनाथ जी ने आजीवन अपने सभी दायित्वों का पूरी निष्ठा से निर्वहन किया.

महाराजा हरिसिंह के साथ इतिहासकारो ने न्याय किया है?

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यह सर्वविदित है कि 22 अक्तूबर 1947 को कबायलियों के वेष में पाकिस्तानी हथियारबंद सेना कश्मीर में दाख़िल हुई और सीमावर्त्ती प्रजा के साथ लूट-मार, महिलाओं के साथ दुराचार आदि बर्बरता करती हुई बड़ी तेज़ी से श्रीनगर की ओर बढ़ने लगी। यद्यपि महाराजा प्रारंभ से ही भारत में विलय के पक्षधर थे, जुलाई 1947 में वे इसकी अनुशंसा नेहरू से कर चुके थे, फिर भी स्वतंत्रता के सात दशक बाद तक काँग्रेसी एवं वामपंथी दलों द्वारा यही प्रचारित किया जाता रहा कि विलय में देरी उनकी ओर से की गई। जबकि तथ्य यह है कि विलय की प्रक्रिया में देरी तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की ओर से की गई थी। उन्होंने कहा था कि ''अभी विलय का उपयुक्त समय नहीं आया है, कि वे विलय से और भी अधिक 'कुछ' चाहते हैं।'' 24 जुलाई 1952 को, शेख अब्दुल्ला के साथ समझौते के बाद नेहरू ने ख़ुद लोकसभा में यह बात बताई थी कि ''आज़ादी मिलने के एक माह पूर्व यानि जुलाई 1947 में ही महाराजा हरि सिंह ने उनसे भारत में जम्मू-कश्मीर रियासत के विलय को लेकर संपर्क साधा था और तब उन्होंने महाराजा को फटकार लगाते हुए उनके अनुरोध व प्रस्ताव को ख़ारिज कर दिया था।

हिंदी भाषा में चिकित्सा की पढ़ाई ऐतिहासिक पहल  

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केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने इस पहल के लिए शिवराज सरकार को बधाई देते हुए कहा कि आज का दिन शिक्षा के क्षेत्र में नवनिर्माण का दिन है। शिवराज सरकार ने देश में सर्वप्रथम चिकित्सा की हिंदी में पढ़ाई प्रारम्भ करके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की इच्छा की पूर्ति की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हिंदी, तमिल, तेलुगू, मलयालम, गुजराती, बंगाली आदि सभी क्षेत्रीय भाषाओं में चिकित्सा एवं तकनीकी शिक्षा उपलब्ध कराने का आह्वान किया था।

विश्व स्तर पर हिन्दू विरोधी घटनाओं का सच

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इस तरह की स्थिति एकाएक और अनायास पैदा नहीं हुई है। आप देखेंगे कि पिछले कुछ समय से भारत की शासन व्यवस्था, माहौल, सत्तारूढ़ पार्टी ,संघ परिवार और इससे जुड़े संगठनों आदि को लेकर दुनिया भर में नेताओं, एनजीओ, थिंक टैंक, मानवाधिकार संगठनों और मीडिया के के एक तबके ने जबरदस्त दुष्प्रचार अभियान चलाया है। जिस ढंग से पिछले कुछ सालों में भारत वैश्विक स्तर पर प्रखर और मुखर हुआ है तथा विश्व भर में भारतीय अपने सभ्यता संस्कृति धर्म पहचान आदि के साथ भारत के हित में खुलकर सामने आए हैं तब से उनकी आंखों के कांटा बन गए हैं । दूसरे कट्टर मुस्लिम भी इसमें भूमिका निभा रहे हैं। कई जगह पाकिस्तानी मुसलमानों पर आरोप लगा कर मामले को छोटा कर दिया जाता है।  अमेरिका और ब्रिटेन में मस्जिदों की भारी संख्या है ।

सब पर लागू होने वाली जनसंख्या नीति बननी चाहिए

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि देश में जनसंख्या विस्फोट चिंताजनक है। इसलिए इस विषय पर समग्रता से व एकात्मता से विचार करके सब पर लागू होने वाली जनसंख्या नीति बननी चाहिए। उन्होंने कहा कि देश के संसाधन सीमित हैं। इस पर देश में जन जागरण व प्रबंधन की आवश्यकता है।

अनूसूचित जाति के हितों पर डाका बर्दास्त नहीं -विहिप

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मतांतरित अनुसूचित समाज को आरक्षण का लाभ दिलाने की मांग न केवल संविधान विरोधी और राष्ट्र विरोधी है अपितु अनुसूचित जाति के अधिकारों पर खुला डाका है। विश्व हिंदू परिषद के संयुक्त महामंत्री डॉ सुरेंद्र जैन ने पत्रकारों को संबोधित करते हुए कहा कि मिशनरी व मौलवी बार-बार यही दोहराते हैं कि उनके मजहब में जाति के आधार पर कोई भेदभाव नहीं है और उनका मजहब स्वीकार करने के बाद कोई पिछड़ा नहीं रह जाता है। इसके बावजूद जब वे मतांतरितों के लिए बार-बार आरक्षण की मांग करते हैं तो न केवल उनका समानता का दावा खोखला सिद्ध होता है अपितु, उनके गलत इरादों का भी पर्दाफाश होता है। उनका उद्देश्य न्याय दिलाना नहीं अपितु मतांतरण की प्रक्रिया को तेज करना है। यह अनुचित मांग न केवल सामाजिक न्याय अपितु संविधान की मूल भावना के विपरीत किया गया एक षड्यंत्र है।

पसमांदा मुस्लिम समाज को साथ लाने का भाजपा प्रयास

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लखनऊ पसमांदा मुस्लिम समाज के सम्मेलन को देखकर ऐसा लगा कि विकास के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अब सभी का विश्वास  भी जीतने की ओर अग्रसर हो रहे हैं। भाजपा आगामी निकाय चुनावों में मुस्लिम बहुल इलाकों में पसमांदा मुस्लिम समाज के लोगों को अधिक से अधिक टिकट देने पर भी विचार कर रही है। लखनऊ में आयोजित सम्मेलन में कई ऐसे चेहरे थे जो आगामी चुनावों में टिकट के प्रबल दावेदार भी थे। लखनऊ में आयोजित पसमांदा बुद्धिजीवी सम्मेलन में गले में भगवा गमछा और सिर पर भगवा टोपी पहने पिछड़ा वर्ग के मुस्लिम समाज के लोग दोनों हाथ ऊपर उठाकर भारत माता की जय और वंदेमातरम के गगनभेदी नारे लगा रहे थे। सम्मेलन में पधारे पसमांदा मुस्लिम समाज के सभी लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा बिना भेदभाव योजनाओ को लाभ दिये जाने से प्रसन्न दिखाई पड़े। 

छात्रों में राष्ट्रप्रेम की अलख जगाती ‘प्रतिज्ञा’

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यह राष्ट्रीय प्रतिज्ञा हमें यह एहसास दिलाती है कि हमारा एक व्यक्ति के रूप में अस्तित्व क्या है? यह हमें देश की महत्ता से परिचित करवाती है। यह प्रतिज्ञा देश के लोगों को अपनी संस्कृति पर नाज़ करने की सीख देती है। यह राष्ट्रीय प्रतिज्ञा ही है, जो हमें देशवासियों के प्रति वफादार होने का पाठ पढ़ाती है। गौरतलब हो कि राष्ट्रीय प्रतिज्ञा ही है, जो आमतौर पर सार्वजनिक कार्यक्रमों में और लगभग देश के सभी स्कूलों में रोज़ पढ़ी जाती है। इस राष्ट्रीय प्रतिज्ञा के पीछे की भी अपनी एक कहानी है। इसे सर्वप्रथम हिंदी भाषा में नहीं, बल्कि तेलुगू भाषा में लिखा गया था। जिसके बाद धीरे धीरे इसकी महत्ता एक राष्ट्र के सापेक्ष बढ़ती गई। जो युवाओं में राष्ट्रवाद की भावना जागृत करने के साथ, सामूहिक उत्तरदायित्व की भावना जगाने का काम करने लगी। 

आपातकाल के प्रखर प्रतिरोधी प्रभाकर शर्मा

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कुछ ही देर में चिता और उनका शरीर धू-धू कर जलने लगा; पर उनके मुंह से एक बार भी आह या कराह नहीं निकली। इस प्रकार लोकतंत्र और वाणी के स्वातं×य की रक्षा हेतु एक स्वाधीनता सेनानी ने बलिदान दे दिया। चिता पर चढ़ने से पूर्व उन्होंने एक खुले पत्र में इंदिरा गांधी और उनके काले कानूनों को खूब लताड़ा है। यह पत्र आपातकाल के इतिहास में बहुत चर्चित हुआ। 

यह आतंकवाद है या भयंकर युद्ध?

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एक बार प्रसिद्ध लेखक सलमान रुश्दी ने पूछा था, ''जिस मजहबी विश्वास में मुसलमानों की इतनी श्रद्धा है, उसमें ऐसा क्या है जो सब जगह इतनी बड़ी संख्या में हिंसक प्रवृत्तियों को पैदा कर रही है?'' दुर्भाग्य से अभी तक इस पर विचार नहीं हुआ। जबकि पिछले दशकों में अल्जीरिया से लेकर अफगानिस्तान और लंदन से लेकर श्रीनगर, बाली, गोधरा, ढाका तक जितने आतंकी कारनामे हुए, उनको अंजाम देने वाले इस्लामी विश्वास से ही चालित रहे हैं। अधिकांश ने कुरान और शरीयत का नाम ले-लेकर अपनी करनी को फख्र से दुहराया है। इस पर ध्यान न देना राजनीतिक-बौद्धिक भगोड़ापन ही है।

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