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जिस राजनीति में धन और पद का अहंकार नेता जी की पहली पहचान बन गई है, वहां पर्रीकर एक गजब के अपवाद थे जिनकी सादगी और अपनेपन ने राजनीति के साधक रूप का दर्शन कराया।

अपने दिल से पूछ विश्वास से कह सकें कि चाहे कुछ भी हो जाए, वह नेता न गलत काम करेगा, न पैसा खाएगा ऐसे कितने नेता होंगे? अंग्रेजी का एक शब्द है इनकरप्टिबल। इसका अर्थ है कि वह व्यक्ति जिसे किसी भी सूरत में भ्रष्ट न किया जा सके। मनोहर पर्रीकर एक ऐसे ही भारतीय नेता थे जिन्हें कभी भी प्रचार की भूख ने नहीं सताया और जिनके बारे में सामान्य धारणा है कि वे न तो झूठ बोलते थे और न गलत काम करते थे। कोई सूचना नहीं देनी है तो वह मना कर देते थे पर झूठी जानकारी या झूठा आश्वासन कभी नहीं देते थे। समझ में नहीं आता उनके बारे में मैं कहां से शुरू करूं।

शर्ट, पैंट और हवाई चप्पल। हेलमेट लगाया और स्कूटर पर चल पड़े पणजी की सड़क पर। देखने वाले पहचान ही नहीं पाते कि ये मुख्यमंत्री पर्रीकर हैं या कोई मीडिया वाला। एक बार मुझे विश्व प्रेस दिवस पर प्रदेश के सूचना विभाग ने व्याख्यान के लिए बुलाया। बड़ा कार्यक्रम था। मुख्यमंत्री को उद्घाटन करना था। मैं बंद गला और बूट पहने गया। पन्द्रह मिनट बाद सूचना सचिव ने कहा, सर चलिए मंच पर, सी.एम. साहब आ गए हैं। कहां? मैं यहां हूं- आवाज मेरे पीछे से आई। वे कर्मचारियों के साथ चाय पी रहे थे- तौबा! वे चप्पल, और शायद बिना इस्त्री किए पैंट बुशर्ट में थे। अपने भाषण में मैंने कहा, क्षमा करें। मैं शायद मुख्यमंत्री की ड्रेस में आया लगता हूं और आप जेनुइन पत्रकार लग रहे हैं! सब हंसे – मन्नोहर पर्रीकर का ठहाका सबसे मुखर था।

कुछ दम चाहिए कुछ अलग होकर भी सर्वप्रिय सर्वमान्य होने के लिए। कोंकणस्थ ब्राह्मण, संघ स्वयंसेवक पर गोवा के कट्टर कैथोलिक में भेद नहीं करते। पर्रीकर मांडवी के जल पर चल सकने वाले, याने असंभव को संभव कर दिखाने वाले बने।

गोवा छोटा, राजनीति क्षणभंगुर। कब सरकार बनती है, गिरती है- इसका कोई अंदाज नहीं लगा सकता। 1961 में गोवा पुर्तगाली कब्जे से स्वतंत्र हुआ। 1963 में पहली निर्वाचित सरकार बनी। तब से अब तक 55 वर्षों में 23 मुख्यमंत्री बदले, पांच बार राष्ट्रपति शासन लगा। महाराष्ट्रवादी गोमंतक पार्टी, कांग्रेस को पीछे कर भाजपा का गोवा को चार बार (लक्ष्मीकांत पर्सेकर मिलाकर) मुख्यमंत्री देना एक चमत्कार से कम नहीं। कैथोलिक भाजपा को वोट देंगे? यह संभव मनोहर पर्रीकर ने किया। गोवा के अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के नाते प्रतिष्ठित कर इस मनोहारी प्रदेश को उन्होंने विश्व स्तर के निजी समारोहों, कार्यक्रमों का सर्वप्रिय, शांत और सुरक्षित स्थान बना दिया।

जब मैं गत सितम्बर में एम्स में उनसे मिला तो वे ढांचा मात्र रह गए थे। पर मुस्कराते थे, बात करते थे। एम्स के जो डॉक्टर उनका ईलाज कर रहे थे वे आश्चर्यचकित थे। उनमें से एक ने कहा इतना अधिक कैंसर फैलने पर भी पर्रीकर जी का अभी तक भी जीवित रहना एक आश्चर्य है। केवल दृढ़ इच्छाशक्ति से ही संभव है। मनोहर पर्रीकर जिंदा रहे मांडवी पर 4.2 किमी. लंबे पुल के श्रीगणेश को देखने के लिए। यह पुल गोवा का आर्थिक कायांतरण कर देगा। उनके परम सखा नितीन गडकरी ने भी जिद के साथ पर्रीकर का यह स्वप्न पूरा किया। जब मनोहर ने अंतिम श्वास ली होगी, तो वे संतुष्ट मना थे, यह कहा जा सकता है।

उनकी हां का अर्थ था एक्शन शुरू। फिर दुनिया की कोई ताकत उसे रोक नहीं सकती थी। देहरादून में पूर्व सैन्य संगठन तीन दशकों से सार्वजनिक क्षेत्र मेें प्रथम युद्ध स्मारक के निर्माण की मांग कर रहे थे। मनोहर पर्रीकर ने रक्षा मंत्री के नाते विषय समझा और कहा ठीक बात है। झालंच पाहिजे-मी करेन. (होना ही चाहिए। मैं करूंगा।) उनकी हां को दबाने कई बाधाएं आईं। वे हंसते और बाधक तत्वों को कूड़ेदान में फेंकते। कहते- देखो तुम्हारे उत्तराखंड के देशभक्त मुझे लिख रहे हैं कि युद्ध स्मारक अभी मत बनाओ। इतना ही नहीं, अपने देहांत से एक माह पूर्व उन्होंने युद्ध स्मारक का संस्थापक संरक्षक बनना स्वीकार किया था।

वे समंदर जैसे धीर, पीड़ा सहने वाले, कम प्रचार और मितभाषी थे। पर अपने मन की मानते थे। लुटियन को दिल्ली का फरेब, दिखावा, छल उन्हें भाया न था। बड़ी मुश्किल से गणतंत्र दिवस के लिए बंद गला और जूते पहनने को उन्हें मनाया गया। गोवा की प्रसिद्ध फिश करी दिल्ली में कहां मिलती?

दिल्ली के अकबर रोड वाले बंगले में सब कुछ इतना निर्विकार वीतरागी भाव जैसा वातावरण पसरा रहता था कि आश्चर्य होता था। सुबह का नाश्ता बस पोहे या परांठा और उनके सब सहयोगी कर्मचारी, अधिकारी उनके साथ नाश्ता करते। नौ बजे दफ्तर आ जाते। शाम समय पर इसलिए घर जाते ताकि अधिकारी भी समय पर घर जा सकें। मैंने उन्हें रात 11-12 बजे तक शांत मना घर में फाइलें निबटाते देखा है।

पर्रीकर ने प्रचार से दूर रहते हुए 28 हजार करोड़ रूपए के हथियारों की खरीद के आदेश पारित किए। वन रैंक वन पेंशन के लागू होने में विलंब उनके लिए असह्य था। सर्जिकल स्ट्राइक और रफायल युद्धक विमान सौदे उनके समय हुए। पर दिल्ली का अहंकार और रूक्ष व्यवहार न उन्हें छू पाया, न उन्हें भाया। बस तय कर दिया गोवा लौटना है तो लौटना ही है। यहां था ही क्या जो वे समेटते।

मैं रक्षा मंत्रालय की स्थायी संसदीय समिति का छह वर्ष सदस्य रहा हूं। थल, जल और नौसेना के वरिष्ठतम अधिकारियों से लेकर सामान्य जवानों, कप्तानों और वायुवीरों से विभिन्न मौकों पर मिलना होता रहा। मनोहर पर्रीकर सेना के सभी स्तरों पर अपनी सादगी, हथियारों के प्रति सूक्ष्म समझ, सैनिकों के प्रति संवेदनशीलता के कारण स्वतंत्र भारत के सबसे लोकप्रिय और सेना का आदर पाने वाले रक्षा मंत्री हुए – यह कहा जा सकता है।

जिस राजनीति में धन और पद का अहंकार नेता जी की पहली पहचान बन गई है, वहां पर्रीकर एक गजब के अपवाद थे जिनकी सादगी और अपनेपन ने राजनीति के साधक रूप का दर्शन कराया। उनके जैसा बनना चाहिए यह हर किसी की साध होना भी संभव नहीं, बन पाना तो कठिन ही है। आईआईटी, मुंबई से इंजीनियर बने पर्रीकर मानवीय संवेदनाओं और संबंधों को भी नया रूपाकार देने वाले अभियंता बने। उन्होंने गोवा को देश का पहला ऐसा राज्य बनाया जहां हर शिक्षा संस्थान में सरकारी खर्च पर डिस्लेक्सिक और मानसिक सहायता पाने के पात्र छात्रों हेतु विशेष अध्यापक नियुक्त किए गए। वरना शायद ही किसी अन्य राज्य में विद्यालय इन छात्रों की मदद करते हैं। इतनी गहराई तक संवेदनशील होना ही पर्रीकर का वैशिष्ट्य था।

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