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वर्तमान वर्ष के बजट में हमने जीडीपी में लम्बी छलांग लगाने समेत कई बड़े लक्ष्य रखे हैं। लेकिन आम आदमी के सरोकारों पर भी गौर करना होगा। यदि उसकी क्रय शक्ति न बढ़ी तो सारे प्रयास व्यर्थ हो जाएंगे। हालांकि, मोदी सरकार के आत्मविश्वास की स्पष्ट झलक बजट में दिखाई देती है। 

बजट-2019 के माध्यम से सर्वाधिक जोरदार तरीके से प्रस्तुत हुई है, राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को अनंतिम मानक ऊंचाइयों तक ले जाने की वैश्विक महत्वाकांक्षा। विगत आम चुनावों में, जनता द्वारा व्यक्त पूर्ण विश्वास के साथ पुन: सत्ता में आई मोदी सरकार 2.0 के पूर्ण आत्मविश्वास की झलक स्पष्ट रूप से दिखी बजट-2019 में। पिछले मात्र 5 साल के कार्यकाल के दौरान हमारी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था 2.7 लाख करोड़ डॉलर के स्तर पर पहुंच कर विश्व की सबसे बड़ी छठी अर्थव्यवस्था बन गई है। अब अगले 5 वर्षों में 5 लाख करोड़ डालर के स्तर पर पहुंचा कर भारतीय राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को 2024 तक इंग्लैण्ड व जर्मनी से आगे 4थी पायदान पर पहुंचाना है। प्रथम बार बजट प्रस्तुत कर रही वित्त मंत्री निर्मला सीतारामन द्वारा बजट को भारतीय परम्परानुसार, बहीनुमा खाते की तरह लाल कपड़े में बांध कर लाना निश्चित तौर पर भारतीय लेखा-जोखा संस्कृति के अनुरूप न केवल सराहनीय है, अपितु घिसी-पिटी पाश्चात्य परम्पराओं का बोझ ढोती बीमार भारतीय मानसिकता के विरूद्ध, सरकारी कार्य संस्कृति के भारतीयकरण करने का एक सशक्त प्रतीक है। परंतु राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के समग्र महत्वाकांक्षी लक्ष्य को अमेरिकन डॉलर में व्यक्त करने का विरोधाभास, भारतीय मन की समझ से परे है। संभवत: केवल वैश्विक स्तर पर अपनी महत्वाकांक्षा व प्रयासों को उद्घाटित करने के लिए ऐसा किया गया है।

अपनी वैश्विक महत्वाकांक्षा की ओर बढ़ती भारतीय अर्थव्यवस्था के जी.डी.पी. लक्ष्य को प्राप्त करने की आर्थिक रणनीति का संकेत भी दे गया है, यह बजट। विदेशी प्रत्यक्ष विनियोग में अधिक से अधिक उदारता दिखाते हुए अधिकांश क्षेत्रों में 100 प्रतिशत एफ डी आई की छूट, मेक इन इंडिया द्वारा विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का उदार शर्तों पर स्वागत, विदेशी आयात को कम करते हुए निर्यात में वृद्धि कर विदेशी मुद्रा के सापेक्ष भारतीय मुद्रा को सशक्त करना, सार्वजनिक बैंकों का रू. 70,000 करोड़ का पुनर्पूंजीकरण कर उनकी औद्योगिक ॠण क्षमता में वृद्धि, रू. 400 करोड़ तक के उत्पादन पर उत्पादन शुल्क में 5 प्रतिशत की कमी आदि ऐसे उपाय हैें जिनसे कि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था वांछित छलांग लगा सकती है। कुल मिलाकर एक बड़े लक्ष्य की पूर्ति के लिए हमारा बजट-2019 औद्योगिक विनियोजन प्रधान हो गया है। भारत में बढ़ती हुई जनसंख्या, साक्षरता व स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार से बढ़ी जीवन प्रत्याशा तथा विस्तृत संचार सुविधाओं व तीव्र औद्योगीकरण से जीवन द़ृष्टिकोण में आई व्यवसायिकता की प्रवृति के चलते न केवल शहरी अपितु ग्रामीण क्षेत्रों के मध्यम आय वर्ग (रू. 5 लाख से 25 लाख की वार्षिक आय वर्ग) ने, भारत में आवश्यक एवं सम्मानपूर्ण जीवन स्तर की वस्तुओं व सेवाओं के बाजार को अति विस्तारित किया है। इसी कारण न केवल घरेलू उद्योग क्षेत्र को बढ़ावा मिला है बल्कि उन्नततम राष्ट्रों की बहुराष्ट्रीय कम्पनियां भी, भारत में निवेश में प्रत्यक्षत:/अप्रत्यक्षत: भागीदारी करने को उत्सुक हैं।

कीन्स ने जिस भयंकर वैश्विक मंदी काल में ‘प्रभावी मांग’ (इफेक्टिव डिमांड) को बढ़ाने की आवश्यकता बताई थी वह थी उपभोक्ता को उच्चतम क्रय शक्ति प्रदान करने वाली उपभोग योग्य वास्तविक आय जो कि सीधे से प्रभावित होती है, परिवार के कमाऊ सदस्य को अधिकतम आय देने वाला क्षमतापरक रोजगार, परिवार में बढ़ती हुई सदस्य संख्या, परिवार के सक्षम बेरोजगारों को रोजगार तथा बाजार में मूल्य स्तर। इस वास्तविक उपभोग योग्य आय पर समाज कल्याणकारी योजनाओं का भी अप्रत्यक्ष सकारात्मक प्रभाव पड़ता हैै। यदि अर्थव्यवस्था के अमीर/अति अमीर वर्ग की लगभग 10 प्रतिशत (यद्यपि राष्ट्रीय सकल आय का 51 प्रतिशत से अधिक हस्तगत करने वाली)जनसंख्या को छोड़ दिया जाए, तो देश 90 प्रतिशत जनसंख्या, (जिसमें से लगभग 60 प्रतिशत बाल, वृद्ध, अक्षम व बेरोजगार युवा गैरकमाऊ वर्ग है), में से मात्र लगभग 30 प्रतिशत कमाऊ मध्यमवर्गीय जनसंख्या ही उपभोक्ता बाजार की प्रभावी मांग को प्रभावित करती है। कहना न होगा कि चाहे देशी ब्रांड हो या विदेशी ब्रांड, यही वर्ग है जिसकी वास्तविक उपयुक्त आय ही दोपहिया/चार पहिया निजी वाहन के आटो उद्योग, व्यवसायीकृत होते शिक्षा उद्योग, रेडीमेड वस्त्र उद्योग, पर्यटन उद्योग, इलेक्ट्रोनिक उपभोग वस्तुओं के उद्योग, ऑनलाइन डिजिटल मार्केंटिंग, होटल तथा रेस्टारेंट उद्योग, माल संस्कृति तथा भवन निर्माण उद्योग को प्रभावित करती है।  यदि राष्ट्रीय विकास के उच्च लक्ष्यों के चलते, इस 30 प्रतिशत वर्ग की वास्तविक उपभोग योग्य आय नहीं बढ़ी, तो घरेलू प्रभावी मांग में कमी, उद्योग क्षेत्रों को शिथिलता एवं राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को क्रमश: मंदी की ओर ले जा सकती है। इस मध्यम आय वर्ग की वास्तविक उपभोग्य आय के घटने का ही परिणाम है आटो क्षेत्र, वित्तीय सेवा क्षेत्र, बीमा क्षेत्र तथा बैंक सावाधिक जमा में वर्तमान शिथिलता के संकेत।

इसमें कोई संदेह नहीं कि विगत 5 वर्षों में सरकार की भारत आयुष्मान योजना, उज्ज्वला योजना, घर-घर में विद्युत एवं जलापूर्ति योेजना, कन्या विवाह योजना, स्वसहायता समूह योजना, कौशल विकास योजना आदि जैसी कुछ महत्वाकांक्षी योजनाओं से आम आदमी व गरीब तबके के लोगों की वास्तविक आय में अप्रत्यक्ष: वृद्धि हुई है। बजट 2019 में इन योजनाओं को आगे भी चलाते रहने तथा नए लक्ष्य पूर्ति करने की बात भी कही गई है। ध्यान देने वाली बात यह है कि इनमें से कई योजनाओं में कई राज्यों के द्वारा समयावधि के पूर्व ही 100 प्रतिशत या अधिक लक्ष्यपूर्ति की घोषणा भी समाचारों में आती रही है। परंतु इसकी धरातलीय वास्तविकता जानने के लिए सरकार द्वारा कोई भी सार्थक प्रयास नहीं किए गए कि कहीं कार्यपालक अधिकारियों द्वारा, मात्र कागजी खानापूर्ति कर लक्ष्य प्राप्ति के आंकड़े तो नहीं दिए गए। उज्ज्वला योजना में यह जानने की आवश्यकता थी कि कितने लाभार्थी वास्तव में ईंधन गैस का प्रयोग करते पाए गए। कहीं उन्होंने अपने सिलिण्डर तथा चूल्हे अन्य व्यवसायिक उपयोगकर्ताओं को तो नहीं बेच दिए। कितने आदिवासी तथा अति गरीब परिवारों के पास प्रति माह 2 सिलिण्डर अर्थात रू. 1600-1700 खर्च करने की क्षमता थी। भारत आयुष्मान योजना में भी लाखों गरीब परिवारों ने सरकारी अस्पतालों में उन्नत चिकित्सा सुविधा का नि:शुल्क लाभ भी उठाया। पर बजट 2019 में डॉक्टरों की कमी, उन्नत सरकारी चिकित्सालयों में आधुनिक उपकरण एवं व्यय बजट की कमी तथा ग्रामीण क्षत्रोेंं में एक न्यूनतम निर्धारित दूरी के अंदर नए उन्नत सरकारी चिकित्सालयों को खोलने के लिए कोई प्राविधान नहींं किया गया है। प्राइमरी से लेकर सामान्य, तकनीकी एवं व्यवसायिक उच्च शिक्षा को निजी व्यवसाय क्षेत्र, जिसका लक्ष्य शैक्षणिक गुणवत्ता की अपेक्षा अधिकतम कमाई करना ही रहा है, के सहारे छोड़ दिया गया है। कौशल विकास योजना में प्रशिक्षित युवाओं के आंकड़े तो गिनाए गए लेकिन उनमें से कितने युवाओं को प्रभावी एवं सार्थक रोजगार प्राप्त हुआ है, यह जानने का प्रयास नहीं किया गया। सरकार की स्टार्टअप योजना के अंतर्गत रोजगार बहुल विनिर्माण इकाइयां कम बल्कि डिजिटल मार्केटिंग, फाइनेंस सर्विस इकाइयां अधिक खोली गईं और उनकी भी सफलता दर कितनी है और उनमें कितने बाहरी युवाओं केा रोजगार अवसर प्रदान किए गए, यह जानना भी जरूरी था।

बजट 2019 में नए रोजगार अवसर सृजित करने की, जो कि इस मध्यम आय वर्ग की उपभोग्य आय में वास्तविक वृद्धि करती हैं, की स्थिति भी स्पष्ट नहींं है। एफ.डी.आई. के अंतर्गत आने वाली बहुराष्ट्रीय कम्पनियां तथा घरेलू उद्योग समूह भी अपनी लागत को कम करने के लिए रोजगार बहुल तकनीक की अपेक्षा, पूंजीगहन उन्नत तकनीक को अपनाते हैं ताकि वे अंतरराष्ट्रीय बाजार प्रतियोगिता में बनेे रह सके। ऐसे में इनसे देश में बहुत अधिक नए रोजगार सृजन अवसरों की आशा रखना व्यर्थ है। रेलवे जैसे सबसे अधिक रोजगार प्रदान करने वाले, सबसे बड़े सार्वजनिक उपक्रम में क्रमश: निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने पर, वह भी तकनीक-गहन होता चला जाएगा। सार्वजनिक बैंकों में भी कम्प्यूटरीकृत कोर बैंकिंग प्रणाली के आ जाने के बाद, वहां लगातार सेवानिवृत्त होते जा रहे कर्मचारियों से रिक्त स्थानों पर कई वर्षों से नियुक्तियां नहींं की जा रही हैं। चुनाव पूर्व रेलवे, डाक तार विभाग व सरकारी बैंकों आदि द्वारा हजारों लाखों की संख्या में रोजगार विज्ञापन दिए गए पर फिर चुनाव संहिता के कारण और अब बजट में उनका कोई उल्लेख नहीं है।

उपभोक्ता बाजार की मांग को प्रभावित करने वाले मध्यम आय वर्ग में भी, सबसे बड़ा तबका है वेतनभोगी वर्ग। परंतु बजट में इस वर्ग के लिए प्रत्यक्ष करों में कोई नई राहत नहीं दी गई है। आर्थिक न्याय एवं तार्किक द़ृष्टि से विचार करेें तो प्रति 10 साल में जो वेतन पुनरीक्षण किया जाता रहा है, वह वास्तव में विगत 10 वर्षों में बढ़ी हुई मंहगाई के सापेक्ष बढ़ाए गए मंहगाई भत्ते का समायोजन मात्र ही होता है। वेतन पुनरीक्षण के नाम पर, इस क्षतिपूरक मंहगाई भत्ते को वेतन में परिवर्तित कर दिया जाता है और उस पर बढ़ती हुई कर देयता, इस आय वर्ग की वास्तविक आय को कम कर देती है। बढ़ती हुई मंहगाई दर के सापेक्ष, करमुक्त आय के स्तर में वृद्धि के पुनरीक्षण की संभावना पर भी सरकार को गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता थी। बजट में अनुमानित आय के लक्ष्य को पूरा करने के लिए भारी विनिवेश, (1,05,000 करोड़) घरेलू व वैश्विक बाजार से भारी ॠण (रू. 7 लाख करोड़) जुटाने, गत वर्ष की तुलना में आय कर, उत्पादन शुल्क, सीमा शुल्क, कम्पनी कर व जी.एस.टी. शुल्क आदि से औसतन लगभग 20 से 30 प्रतिशत अधिक राजस्व प्राप्त करने का अनुमान लगाया गया है। इन सबके पिछले परिणाम आशा के अनुरूप नहीं रहे हैं। यदि आम आदमी की वास्तविक आय में वृद्धि हेतु उन्हें सार्थक रोजगार उपलब्ध नहीं हो सके, उपभोग वस्तुओं की खुदरा मंहगाई वृद्धि बनाम उद्योगपतियों को लाभकारी मूल्य; घरेलू उद्योग समूहों को बढ़ती हुई पूंजीगत आय को दूसरे देशों में विनिवेश करने की बढती प्रवृति बनाम विदेशी प्रत्यक्ष विनियोजन पर हमारी बढ़ती जा रही निर्भरता; घरेलू निर्यातकों को प्रोत्साहित करने बनाम आयात में कमी हेतु आयात शुल्क वृद्धि कर निर्यातक देशों से व्यापार युद्ध जैसी स्थिति; तथा बढ़ती हुई राष्ट्रीय जी.डी.पी. का लाभ उद्योग धनी वर्ग/अति धनी वर्ग बनाम आम आदमी की घटती वास्तविक आय आदि जैसी विरोधाभासी स्थितियों में संतुलन की सार्थक कार्यपालन नीति नहीं अपनाई गई, तो इन बड़े लक्ष्यों की प्राप्ति संदेहास्पद हो सकती है।

समावेशी वित्त (फाइनेशियल इन्क्लूजन) नीति के अंतर्गत आम आदमी की आय का एक बड़ा हिस्सा बैंक डिपाजिट, डाक तार विभाग बचत योजनाओं, बीमा, शेयर मार्केट/म्यूच्युअल फंड को प्रोत्साहन, आयकर, नई पेंशन स्कीम के अंतर्गत बढ़ा हुआ प्राविडेंट फण्ड अंशदान, आदि बचत योजनाओं के माध्यम से उद्योगों तथा सरकारी योजनाओं की ओर प्रेरित किया जा रहा है। तब फिर राष्ट्रीय जी.डी.पी. बढ़ाने के लक्ष्य के तहत, तीव्र भारी उद्योगीकरण के फलस्वरूप उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं को क्रय करने की कितनी वास्तविक क्षमता इस विशालतम मध्यम आय उपभोक्ता वर्ग के पास शेष रहेगी, यह भी विचारणीय है। यदि वास्तविक प्रेरित प्रभावी मांग ही कम होती गई तो बढ़ते हुए उत्पादन को खरीदेगा कौन? अत: आवश्यक है कि इन बड़े राष्ट्रीय लक्ष्यों के अनुशांगिक, हम आम आदमी की वास्तविक उपभोग योग्य आय को भी ध्यान में रख कर, प्रभावी आर्थिक व वित्तीय नीतियों का निर्धारण करें।

आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया था कि बजट निर्धारण रणनीति में नोबल विजेता अर्थशास्त्री रिचर्ड थेलर की व्यवहारिक अर्थशास्त्र को भी ध्यान में रखना होगा। पर ऐसा प्रतीत होता है कि बजट में, आम आदमी की आर्थिक एवं वित्तीय सीमाओं तथा उसके उपभोग एवं बाजार व्यवहार को गंभीरता से नहीं लिया है। ध्यान रखना होगा कि बड़े लक्ष्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के चलते सार्थक मार्गदर्शन एवं लक्ष्यों के मार्ग में आने वाली चुनौतियों को उजागर करती, सकारात्मक समालोचना को, परम्परागत नकारात्मक आलोचना मान कर, धरातलीय वास्तविकताओं से दूर जाते हुए, लक्ष्यपूर्ति में पिछड़ने की संभावना हो सकती है। हमारा महात्वाकांक्षी होना हमारी अपनी क्षमताओं पर विश्वास का द्योतक है। भारतीय अर्थव्यवस्था की क्षमताओं के प्रति वैश्विक द़ृष्टिकोण में भी आशापूर्ण परिवर्तन सुखद संकेत है। पर हमें सतर्क रहना होगा कि जिन बड़ी वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं की होड़ में, हम एक लम्बी रेस तय करने को, तेज गति के जी.डी.पी. घोड़े पर सवार हो रहे हैं, उसी ड्रेगन पर सवारी के चलते अब चीन की राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में भी आती जा रही जी.डी.पी. गिरावट किसी से छिपी नहीं है। अपनी अर्थव्यवस्था की वैश्विक सर्वोच्चता बनाए रखने की होड़ में, अमेरिका तथा चीन का व्यापार युद्ध, अब भारत की चौखट पर भी पहुंचता जा रहा है।

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