बलात्कार की मानसिकता और उसका निदान

रेप’ या ’बलात्कार’… एक ऐसा शब्द, जो बोलने या सुनने में तो बहुत छोटा-सा लगता है, लेकिन इसकी पीड़ा कितनी लंबी और दुखदायी हो सकती है, इसका अंदाजा सिर्फ और सिर्फ वही लगा सकती है, जिसके साथ यह बर्बरता होती है। बाकी लोग बस इसके बारे में तरह-तरह की बातें ही कर सकते हैं।

हाल के समय में ’बलात्कार’ शब्द शायद सबसे ज्यादा खबरों में रहा है। करीब सात वर्ष पूर्व दिल्ली में घटित ’निर्भया कांड’ के बाद जिस तरह से लोग दोषियों को सजा देने की मांग को लेकर सड़कों पर उतर आए थे, उसे देख कर लगा कि अब तो ऐसी घटनाएं थमेंगी, पर अफसोस कि ऐसा हो नहीं पाया। वर्ष 2012 से पहले भी बलात्कार हो रहे थे और आज भी आए दिन ऐसी खबरें पढ़ने-सुनने को मिल ही जाती हैं। कुछ रोज पहले देश के सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में से एक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय यानी जेएनयू के एक छात्र द्वारा कैंपस में छात्रा के कथित यौन उत्पीड़न की खबरें आई। गत वर्ष 2019 की बात करें, तो देश में कुल 30 जघन्य एवं क्रूरतम स्तर के रेप अपराध हुए। इनमें उन्नाव व कन्नौज (यूपी), जयपुर (राजस्थान), रांची (झारखंड), दिल्ली, हैदराबाद (तेलंगाना), कोलकाता (पश्चिम बंगाल), मुजफ्फरपुर (बिहार) आदि मामलों में तो अपराधियों ने क्रूरता की सारी हदें ही पार कर दीं। आखिर क्यों करता है कोई इंसान बलात्कार?

आपको क्या लगता है कि किसी अपराधी द्वारा रेप जैसे घिनौने कृत्य को अंजाम देने की मुख्य वजह क्या हो सकती है- छोटे कपड़े? लड़कियों द्वारा रात में अकेले निकलना या फिर लड़कों के साथ उनकी दोस्ती? मेरे विचार से ये सारी सतही वजहें हैं, जो इस घिनौने कृत्य का अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन करती हैं, क्योंकि अगर ऐसा होता, तो दुनिया का हर पुरुष बलात्कारी होता, जो कि नहीं है। बलात्कार दरअसल एक मानसिकता है, जिसके निदान के लिए हमें उन सभी कारकों पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है, जो इसके लिए उत्तरदायी हैं, वरना हम कितने भी कानून क्यों न बना लें या फिर अपनी बेटियों को सेल्फ-डिफेंस की कितनी भी तरीके क्यों न सिखा दें, यह अपराध समूल नष्ट करने के लिए नाकाफी ही साबित होगा।

इंसान की दिमाग में घुसा है बलात्कार

याद कीजिए 80-90 के दौर में बनने वाली ज्यादातर फिल्मों के पोस्टर्स को जिसके कोनों में जान-बूझकर ऐसे दृश्यों को हाइलाइट करके लगाया जाता था, ताकि लोगों को यह पता चल सके कि इस फिल्म में बलात्कार का दृश्य भी है। कई बार सिनेमा घर के बाहर की पान की दुकानों पर खड़े पुरुष दर्शकों के बीच यह चर्चा आम रहती थी कि यार, इस फिल्म के पोस्टर में जिस तरह से दर्शाया गया था, फिल्म में बलात्कार का सीन वैसा तो फिल्माया ही नहीं गया। लड़की के कपड़े तक भी ठीक से नहीं फाड़े गए। साला, ‘मज़ा’ नहीं आया। हालांकि यह कहना मुश्किल है कि उस दौर के फिल्मकारों ने लोगों की इस मानसिकता को अच्छी तरह समझ कर इस ट्रेंड को भुनाना शुरू किया था या फिल्मकारों द्वारा इस रूप में परोसे गए दृश्यों की वजह से लोगों की रुचि और मानसिकता इस प्रकार की बन गई थी, पर सच यही था। आज फिल्मों के अलावा टीवी शोज और वेबसीरीज के जरिये भी ऐसे दृश्य खुलेआम परोसे जा रहे हैं। कारण ऐसे दृश्यों के दर्शकों का हमेशा से एक बड़ा वर्ग रहा है।

कार्य परिस्थितियों का प्रभाव

बलात्कार के कुल आंकड़ों पर अगर हम गौर करें, तो हमें दो श्रेणियों के अपराधी मिलते हैं- पहली श्रेणी ऐसे बलात्कारियों की है, जिन्हें इस बात का एहसास भी नहीं होता कि वे कुछ अपराध भी कर रहे हैं। वे अक्सर नशे या मानसिक दिवालियापन की गिरफ्त में होते हैं। उनकी इस प्रवृत्ति पर उनकी परवरिश और परिवेश का व्यापक प्रभाव होता है। ये लोग अपने घर-परिवार से दूर दूसरे शहर की दमघोंटू परिस्थितियों में काम करने को मजबूर होते हैं। इनमें ड्राइवर, क्लीनर, खलासी, रेहड़ी, फैक्ट्ररी वर्कर, आदि के अलावा कुंठित बेरोजगार भी शामिल होते हैं। इनकी इतनी कमाई नहीं होती कि ये अपने परिवार को अपने साथ रख सकें, लेकिन इससे शरीर की जरूरतें तो नहीं खत्म हो जातीं। ऐसे में सर्वसुलभ और आसानी से उपलब्ध सस्ती कामुक सामग्री इनकी कामुकता को इनकी समझ के दायरे से बाहर कर देती है और क्षणिक आवेश में उत्तेजित होकर ये लोग कभी अकेले तो कभी समूह में बलात्कार जैसी घिनौनी कृत्य को कर गुजरते हैं। ऐसी घटनाओं की पीड़िता अक्सर कोई अनजान या अकेली ही होती है, जिन्हें ये शायद ही पहले से जानते हों। विकृत मानसिकता वाले इन बलात्कारियों ने हाल के दिनों में पाशविकता की सीमाएं पार कर दी हैं।

सभ्यतामूलक चुनौती भी है बलात्कार

ऐसा नहीं है कि बलात्कारियों में केवल गुंडे और असामाजिक तत्व ही शामिल हैं। आज यदि हम बलात्कार के आरोपितों की प्रोफाइलिंग करें, तो पाएंगे कि इनमें कई पुलिस कर्मी, वकील, जज, मंत्री, शिक्षक, डॉक्टर, इंजीनियर, उच्चाधिकारी, लोकप्रिय फिल्म अभिनेता व निर्देशक, सामाजिक कार्यकर्ता और नामचीन पत्रकार आदि सफेदपोश लोगों के नाम भी जुड़े हैं। इनके अलावा निकट के परिजन, दोस्त, प्रेमी और जानकार से लेकर पिता, भाई और पति तक ऐसी हिंसा में लिप्त पाए गए हैं। मतलब बलात्कार की यह मानसिकता किसी खास आयु वर्ग, पेशा, क्षेत्र या शिक्षित-अशिक्षित होने तक सीमित नहीं है। यह एक सभ्यतामूलक चुनौती है, जिसके मूल में हमारे समाज की पितृ-सत्तात्मक सोच है।

बार-बार देखी गई घटनाओं का प्रभाव

आधुनिक मनोवैज्ञानिक अध्ययनों से यह स्पष्ट हो चुका है कि जिन कार्यों और बातों को हम बार-बार पढ़ते, देखते, सुनते, कहते या करते हैं, उनका हमारे मन-मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ता है। यही नहीं, यह हमारे निर्णयों और कार्यों का स्वरूप भी तय करता है। अमेरिकी लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता रॉबिन मॉर्गन ने 1974 में लिखे अपने प्रसिद्ध लेख ‘थ्योरी एंड प्रैक्टिस : पोर्नोग्राफी एंड रेप’ में लिखा था कि पोर्नोग्राफी उस सिद्धांत की तरह काम करता है, जिसे व्यावहारिक रूप से बलात्कार के रूप में अंजाम दिया जाता है। पोर्न या सिनेमा और अन्य डिजिटल माध्यमों से परोसे जाने वाले सॉफ्ट पोर्न का असर हमारे दिमाग पर होता ही है और यह हमें यौन-हिंसा के लिए मानसिक रूप से तैयार और प्रेरित करता है। इस लेख के पक्ष और विपक्ष में कई तरह की शोध और दलीलें अब तक प्रस्तुत की जाती रही हैं। अत: अभिव्यक्ति या रचनात्मकता की नैसर्गिक स्वतंत्रता की आड़ में पंजाबी पॉप गानों से लेकर फिल्मी ‘आइटम साँग’ और भोजपुरी सहित तमाम भारतीय भाषाओं में परोसे जा रहे स्त्री-विरोधी, यौन-हिंसा को उकसाने वाले और महिलाओं का वस्तुकरण करने वाले गानों की वकालत करने से पहले हमें गंभीरतापूर्वक विचार करने की जरूरत है।

सिर्फ कानून और प्रशासन के जरिये नहीं संभव है समाधान

तकनीकें और माध्यम बदलते रहते हैं, लेकिन हमारी प्रवृत्तियां कायम रहती हैं या स्वयं को नए माध्यमों के अनुरूप ढाल लेती हैं। कभी फुटपाथ पर बिकने वाले अश्लील साहित्य से लेकर टीवी-वीसीआर-वीसीडी और सिनेमा के रास्ते आज हम यू-ट्यूब तक पहुंच चुके हैं, लेकिन एक समाज के रूप में हमारी यौन-प्रवृत्तियां बद से बदतर होती गई हैं। ऐसे में सिर्फ कानून-प्रशासन के जरिए बलात्कार-मुक्त समाज बनाने की कोशिश एक धोखे से ज्यादा कुछ नहीं है। दुनिया की कोई भी सरकार पोर्न, साहित्य और सिनेमा को बैन करने में न तो पूरी तरह सफल हो सकती है, और न ही बैन या सेंसरशिप इसका वास्तविक समाधान है। हमें अपनी जीवन-शैली और दिनचर्या को भी समझने की जरूरत हो सकती है। हम और हमारे बच्चे क्या पढ़ते हैं, क्या देखते-सुनते हैं, क्या हम और हमारे बच्चे किसी व्यसन का शिकार तो नहीं हैं, हमारे घर और आस-पास का वातावरण हमने कैसा बनाया हुआ है, इस सबके प्रति सचेत रहना होगा। इंटरनेट और सोशल मीडिया इत्यादि का विवेकपूर्ण और सुरक्षित ढंग से उपयोग सीखना और सिखाना भी इसी निजी सतर्कता का हिस्सा है।

वर्ष 2017 में भारत में महिला हिंसा के कुल 3,59,849 मामले दर्ज किए गए, जिनमें से 32,500 मामले रेप के थे यानी कि हर दिन 90 रेप हुए।

* इनमें से सबसे ज्यादा 56,011 मामले उत्तर प्रदेश में दर्ज हुए। उसके बाद क्रमश: महाराष्ट्र, पश्चिमी बंगाल और मध्यप्रदेश में ऐसे मामलों की संख्या देखी गई।

* वर्ष 2017 में भारतीय न्यायालयों द्वारा मात्र 28,300 मामलों का निपटारा ही किया जा सका, जबकि वर्षांत तक 1,27,800 मामलों की सुनवाई पेंडिंग रह गई।

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