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सेवा ,सावधानी , स्वदेशी और स्वावलम्बन आज का मूलमंत्र – पू. मोहनजी भागवत

कोरोना संकट के दौरान संघ स्वयंसेवक पुरे समाज की आत्मीयता के साथ सेवा कर रहे हैं। यह भी संघ कार्य ही है। प्रस्तुत है सरसंघचालक पू. मोहनजी भागवत के कोरोना संकट और हमारे कर्तव्यों पर प्रदीर्घ भाषण का सेवा और स्वावलम्बन से सम्बधित सम्पादित अंश –

हमारी परम्परा में ऐसा कहा जाता है कि एकांत में आत्म साधना और लोकांत में परोपकार है। यही जीवन का स्वरूप है और यही संघकार्य का स्वरूप है। अपने स्वयंसेवक नित्य शाखा के कार्यक्रमों में अभी जितना करना संभव है, उतना कर रहे हैं। बाकी कार्यक्रमों का स्वरूप बदल गया है। सेवा का कार्य आज का स्वरूप है। हम आज जो कर रहे हैं, वह भी कार्यक्रम बदलकर संघ का ही कार्य कर रहे हैं, यह भावना मन में रही तो केवल संघ के लोगों के लिए ही नहीं, अपितु सभी के लिए कुछ बातें स्पष्ट हो जाएंगी।

समाज के प्रति आत्मीयता ही सेवा की प्रेरणा

हम यह सेवा क्यों कर रहे हैं? उसकी हमारी प्रेरणा स्वार्थ की नहीं है। हमें अपने अहंकार की तृप्ति और अपनी कीर्ति प्रसिद्धि के लिए यह सेवाकार्य नहीं करना है। जो लोग सहयोगी बनना चाहते हैं, उनको समुचित जानकारी हो, इसलिए कुछ प्रसिद्धि भी करनी पड़ती है। अपने कार्य की रचना में हम सबको सविस्तर वृत्त ठीक-ठीक पता चले, इसलिए उसको प्रकाशित करना पड़ता है। लोगों को प्रेरणा मिले, इसलिए भी ऐसे कार्य में आने वाले अनुभवों का लेखनप्रक  राशन करना पड़ता है। परंतु अपना डंका बजाने के लिए हम ये काम नहीं कर रहे हैं। यह अपना समाज है, अपना देश है, इसलिए हम कार्य कर रहे हैं। स्वार्थ, भय, मजबूरी, प्रतिक्रिया या अहंकार-इन सब बातों से रहित आत्मीय वृत्ति का परिणाम है यह सेवा। और इसलिए इस सेवा में हम लोगों को निरंतर निरहंकार वृत्ति से लगना है तथा श्रेय दूसरों को देना है।

सावधानीपूर्वक कार्य करें

अभी चल रही विशिष्ट आपत्ति में जो सेवा करनी है, उसमें सेवा के साथ ही लोगों का प्रबोधन भी करना पड़ता है। कई बातें बतानी पड़ती हैं। बताने का परिणाम तभी होता है, जब हम उसका पालन स्वयं करते हैं। इसलिए कोराना की महामारी के समय में अपने स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने के जो-जो नियम विदित हैं, अन्य लोगों को उन्हें बताने से पहले, हमें स्वयं उनका पालन करना है। नियमों का पालन करते हुए हमें काम करना है। घर के बाहर निकलना पड़ेगा, लेकिन नियम बनाए हैं कि उसके लिए अनुमति चाहिए। लॉकडाउन है तो अनुमति मिलने के बाद ही काम करना है। परस्पर अंतर रखना है। अंतर रखकर ही काम करना पड़ेगा। छोटी-छोटी बातों के लिए भी सहज रहकर स्वयं उसके पालन का उदाहरण बनकर हमें शेष लोगों को बताना है और यह हम कर सकते हैं।

सेवा करते हुए हनुमान जी के चरित्र का अनुसरण करें

सबके लिए काम करना है और उनमें कोई भेद नहीं करना है। जो-जो पीड़ित हैं, वे सब हमारे अपने हैं। भारत ने जिन दवाओं के निर्यात पर प्रतिबंध लगाया था, दुनिया के हित के लिए उस प्रतिबंध को हटाकर और स्वयं थोड़ा नुकसान सहकर भी हमने
दूसरे देशों को दवाइयां भेजी हैं। जो मांगेंगे, उन्हें देंगे; क्योंकि यह हमारा स्वभाव है। हम मनुष्यों में भेद नहीं करते और ऐसे प्रसंगों में तो बिल्कुल नहीं करते। सब अपने हैं। जो-जो पीड़ित हैं और जिस-जिस को आवश्यकता है, उन सबकी सेवा हम करेंगे। जितनी अपनी शक्ति है, उतनी सेवा करेंगे। यह सेवा करते समय कोई स्पर्धा तो है ही नहीं। अपनी कीर्ति दुनिया में फहराने के लिए हम काम नहीं कर रहे हैं। यह ध्यान में रखकर जो इस काम में लगे हुए हैं, उन सबको साथ लेकर और उन सबके साथ मिलकर काम करना है। सामूहिकता से काम करना है। इस प्रकार से हम सेवा करेंगे तथा लोगों को जो बताना है, वह बताएंगे; लोगों से जो करवाना है, वह करवाएंगे। अपने कार्य का आधार है -अपनत्व की भावना। स्नेह और प्रेम अपने व्यवहार में दिखना चाहिए।

काम अच्छा होना चाहिए। सेवा का काम किसी पर उपकार तो नहीं है। हम अपने लोगों का काम कर रहे हैं, इसलिए वह उत्तम होना चाहिए तथा प्रेमपूर्वक होना चाहिए। हनुमान जी के चरित्र के बारे में, वाल्मीकि रामायण में एक प्रसंग पर देवों ने उनकी
स्तुति की। उसमें उनके चार विशिष्ट गुणों का उल्लेख किया -धृति, दृष्टि, मति और द्राक्ष्य (दक्षता/सावधानी)। हम जो काम करेंगे, उसमें सावधानी आवश्यक है। हम काम करते रहे और काम करते-करते बीमार न हो जाए, इसलिए आयुष मंत्रालय के द्वारा बताया गया जो काढ़ा है, उसका हम सेवन करें। कार्य करते हुए मास्क लगाना, अंतर रखना, हाथ धोना, स्वच्छता रखना – इस सबका पालन करें। हम स्वयं चिंता करें कि हम काम करने लायक रहे। अपनी मदद की जिनको वास्तविक आवश्यकता है, उन तक पहुंचे। दुनिया में धूर्त लोग भी रहते हैं, वे हमारी मदद लेकर न चले जाएं इसलिए बहुत सावधानी पूर्वक सजगता से काम करना पड़ेगा। जिनको आवश्यकता है, उन सबके पास मदद पहुंचे, कोई छूट न जाए -इस प्रकार से हमको काम करना
पड़ेगा।

बुद्धि ठीक रखनी पड़ेगी। किसको, किस बात की आवश्यकता है? सामान्य सूचनाएं सबके लिए दी जाती हैं, लेकिन कुछ विशेष परिस्थितियां भी होती हैं, उसमें उस प्रकार की छूट मिले – ऐसा प्रयत्न करना पड़ता है। इसलिए लीक पर चलते हुए भी, लीक के बारे में विचार कर चलना पड़ता है। अनुशासन में चलते हुए भी इतना लचीला होना पड़ता है कि अपने सेवा के दायरे में सेवा के लाभ लेने वालों में जिनको भी आवश्यकता है, वे सब लोग आ जाएं।

फिर दृष्टि की बात है। हम सब बातें बताएंगे और साथ ही करवाएंगे भी, ताकि लोगों की आदतें ठीक रहे। आदतें ठीक न रखने के कारण भी ये बीमारियां आती हैं, यह अनुभव लोग ले रहे हैं। अब उनकी मनोभूमिका तैयार है। हमने अच्छाई का प्रचार-
प्रसार भी लगे हाथ करते रहना चाहिए। ये केवल कार्यक्रम नहीं है, इस प्रकार हम लोगों के जीवन को सुरक्षित कर रहे हैं और उनके जीवन को गढ़ भी रहे हैं।  अपने पवित्र समाज का संरक्षण और सर्वांगीण उन्नति – यह हमारी प्रतिज्ञा है। इसलिए उस दृष्टि को ध्यान में रखकर हमको धैर्यपूर्वक काम करना है। कितने दिन अभी और काम करना होगा, ऐसा सोच करके कार्य नहीं होगा। जब तक काम पूरा नहीं होता, तब तक सतत करते रहना है। ऐसा करते रहना और ऐसा करते हुए हनुमान जी के
गुणों का स्मरण भी करते रहना है।

स्वदेशी एवं स्वावलंबन आज की आवश्यकता

सारी दुनिया में एकसाथ, इस प्रकार की यह बीमारी पहली बार आई है। शायद पिछले कुछ शतकों के इतिहास में विेश पहली बार ऐसे संकट का सामना कर रहा है। इस संकट से हम लड़ भी रहे हैं, लेकिन साथ ही यह संकट हमें कुछ सिखा भी रहा है।
जैसे प्रधानमंत्री जी ने ही पिछले दिनों सरपंचों से कहा कि यह संकट हमको स्वावलंबन की सीख दे रहा है। यह संकट जाएगा तो जो अस्त-व्यस्त हो गया, उसको यथावकाश हम ठीक कर लेंगे। लेकिन इस संकट के अनुभवों से कुछ सत्य फिर एक बार उजागर होकर हमारे सामने आए हैं। उनसे पाठ-बोध लेकर अपने जीवन की रचना को उसके अनुसार परिवर्तित करने का एक बड़ा काम है। एक तरह से राष्ट्र पुनर्निर्माण के कार्य के अगले चरण को परिणाम में लाना पड़ेगा। बहुत से लोग शहरों से चले गए अपने-अपने गांव में, क्या वे सब वापस आएंगे? जो गांव में रह जाएंगे, उनके रोजगार की क्या व्यवस्था होगी? जो वापस अपने काम पर आएंगे, क्या उन सबको काम देने की उद्योगों की या उनके मालिकों की स्थिति होगी! क्योंकि उनके भी सारे काम ठप पड़े हैं। ऐसी अवस्था में उनका रोजगार भी कायम रहे और उस समय के सीमित साधनों में सब चल सके, इसके लिए सबको कुछ न कुछ छोड़ना पड़ेगा। उसके लिए मन की तैयारी करनी पड़ेगी, समझदारी बरतनी पड़ेगी। उसका भी उपदेश करना पड़ेगा। सबको समझाना भी पड़ेगा।

और अगर स्वावलंबन इस आपत्ति का संदेश है तो स्वावलंबन में अपना ‘स्व’ क्या है? उस ‘स्व’ आधारित तंत्र का अवलम्बन
हमको करना पड़ेगा। कम ऊर्जा खाने वाला, रोजगारमूलक, पर्यावरण को न बिगाड़ने वाला विचार हमारे ही पास है। उसके आधार पर अपनी अर्थ नीति की, अपनी विकास नीति की, अपनी तांत्रिकी की एक युगानुकूल रचना हमको करनी पड़ेगी। आधुनिक विज्ञान के आधार पर उसकी कुछ अद्यतन व सहायक बातों को स्वीकार करते हुए परंपरा के आधार पर जो आज सुसंदर्भित है, इस संकट के कारण फिर से हमको एक बार याद आ रहा है, उन दोनों को मिलाते हुए हमको एक नए विकास के मॉडल का निर्माण करना पड़ेगा। हमको करना पड़ेगा यानि कौन करेगा? शासन को विचार करना पड़ेगा, प्रशासन को विचार करना पड़ेगा। मात्र इन दोनों के करने से कुछ नहीं होता। समाज को भी इसमें कुछ करना होता है। समाज को ‘स्व’ का अवलम्बन करना पड़ेगा। यहां की बनी हुई वस्तुएं, जहाँ तक संभव है, उन्हीं का उपयोग करेंगे। ऐसी बहुत सी बातें अपने नित्य व्यवहार में लानी पड़ेंगी। अपने-अपने व्यक्तिगत और परिवार के व्यवहार में हम लोगों को स्वदेशी का आचरण करना पड़ेगा। स्वदेशी का आचरण करने के लिए स्वदेशी के उत्पादन उपलब्ध करने पड़ेंगे। स्वदेशी के उत्पादन उत्कृष्टता के मामले में बिल्कुल उन्नीस ना हों, ऐसी गुणवत्ता उत्पन्न करनी पड़ेगी। उद्योजक, निर्माता, कारीगर सभी को इसके बारे में सोचना पड़ेगा और समाज को स्वदेशी पर दृढ़ होना पड़ेगा। विदेशों के ऊपर अवलम्बन नहीं होना चाहिए। ऐसा हमको सामर्थ्य बनाना पड़ेगा।

नए भारत के उत्थान में सब मिलकर भूमिका निभाएं

उपरोक्त सारे काम शासन एवं प्रशासन की योग्य नीति तथा उनके द्वारा समाज को अपना मानकर इन नीतियों को क्रियान्वित करने का स्वभाव और समाज का अपने आचरण से सहयोग – इन तीनों बातों के एकत्र आने के बाद ही संभव होते हैं। शासन जैसे-जैसे अपने प्रशासन को समाजोन्मुख करेगा, राजनैतिक लोग अपनी राजनीति को स्वार्थमूलक से हटाकर देशहितमूलक बनाएंगे, शिक्षा समाज को संस्कार देने वाली बनेगी तथा हम सब लोगों का आचरण-व्यवहार भी तदनुरुप होना पड़ेगा। भविष्य के लिए भी यह संकट बहुत कुछ बताकर जा रहा है। उसका विचार करते हुए, हमको अपने राष्ट्रजीवन के इस नए मानक का विचार करते हुए उसको आचरण में लाना पड़ेगा।

हम सब लोग मिलकर, आत्मविेशास के साथ, अपने देश और अपने समाज के प्रति अपनत्व को मन में रखते हुए, अपने देश को इस वर्तमान संकट से बाहर निकाल कर सारे विेश की मानवता का नेतृत्व करने वाला देश बनाने के लिए निश्चयपूर्वक प्रयत्नों एवं परिश्रमों का सातत्य अपने कर सूत्रों में रखकर फिर एक बार सक्रिय हों, यह आज की आवश्यकता है। विेश में और अपने देश में आज हमारी भूमिका यही है कि इस संकट को अवसर बनाकर हम एक नए भारत का उत्थान करें। इसके लिए हम सब अपनी-अपनी भूमिका निभाएं।

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