पूंजी औऱ सियासी खेल को समझने की दरकार

बाबा रामदेव की कोरोनिल दवा के विवाद को लेकर दो आयाम समझने की जरूरत है। एक- बाबा ने अतिशय उत्साह दिखाया, जिससे यह दुनिया के बहुराष्ट्रीय दवा कारोबार के लिए एक जलजला है। दूसरा- वे तथाकथित लिबरल वामपंथी गिरोह हैं, जो वेद, योग व आयुर्वेद के सहसम्बंध को स्वीकार नहीं करने की सियासत करते रहे हैं।

बाबा रामदेव की कोरोनिल दवा के विरुद्ध भारतीय लिबरल गैंग औऱ कांग्रेसी सरकारें क्यों युद्ध स्तर पर सक्रिय हुईं? इस सवाल के जबाब में बहुपक्षीय आयाम को समझने की आवश्यकता है। पूरी दुनिया में हथियारों के बाद एलोपैथिक दवाओं का कारोबार सर्वाधिक होता है और वुहान वाइरस यानी कोरोना महामारी के इलाज को लेकर एलोपैथी जगत की अब तक की नाकामी और इसमें छिपे अथाह कारोबार को आसानी से समझा जा सकता है। वर्ष 2018 में यह कारोबार लगभग 1400 बिलियन अमेरिकी डॉलर का था और भारत मे यह आंकड़ा करीब 5.2 बिलियन यूएस डॉलर का रहा। अगर कोरोना का टीका या अन्य दवा के वैश्विक कारोबार को देखें तो इस पूंजीवादी दवा कारोबार को कोई कैसे भारतीय पैथी के हवाले छोड़ सकता है?

जाहिर है बाबा रामदेव अगर यह दावा करते हैं कि उनकी रिसर्च ने कोरोनिल दवा को अचूक माना है तो यह दुनिया के दूसरे सबसे बड़े कारोबारी जगत के लिए जलजला सा ही साबित होता और ऐसा हुआ भी। यह भी तथ्य है कि बाबा रामदेव ने अतिशय उत्साह दिखाने का काम भी इस मामले पर किया। बेहतर होता वह सरकार को पुख्ता भरोसे में लेकर इस आशय पर वैसा ही स्टैंड लेते जैसा दो रोज पहले आयुष मंत्रालय की अनुमति के बाद लिया गया है।

लेकिन इस तथ्य के आलोक में कुछ सवालों के जबाब जरूर हमारे लिबरल्स गैंगों के लिए बेनकाब करने वाले रहे। एक किस्म की जेहादी नफरत से भरे इस देश के एकेडेमिक्स औऱ नेताओं ने बाबा के विरुद्ध ऐसे मोर्चा खोल दिया जैसे बाबा ने कोई आतंकी घटना कर दी हो। राजस्थान, छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकारों ने दवा पर प्रतिबंध लगा दिया। बीसियों स्थानों पर राजस्थान पुलिस ने एफआईआर तक दर्ज कर दीं। जबकि इन्हीं राज्यों में कोरोना बचाव के लिए जारी एडवाइजरी में उन्हीं आयुर्वेदिक दवाओं के सेवन का उल्लेख है जिनसे मिलकर बाबा ने कोरोनिल दवा बनाने का दावा किया है। जितने सवाल इस दवा को लेकर खड़े किए गए क्या वे तार्किक औऱ प्रमाणिक कहे जा सकते थे? तब जबकि दुनिया में केवल इम्युनिटी बढ़ाने को ही कोरोना बचाव का एकमात्र विकल्प बताया जा रहा हो और कई राज्य सरकारें अपने नागरिकों को मुफ़्त में देशी काढा उपलब्ध करा रही हो। तब कोरोनिल का कुछ राज्यों में इतना प्रतिक्रियावादी विरोध विशुद्ध राजनीतिक ही है। इसका एक आयाम उस वाम साम्राज्य की दुःखती रग भी है जो 2014 के बाद से लगातार खुद को राजनीतिक और विमर्श जगत में आइसोलेटेड महसूस कर रहा है। इस वर्ग की नफरत भारतीय परम्परा औऱ संस्कृति से चिरस्थायी है। समस्या रामदेव के संन्यासी बाने से है। पतंजलि औऱ वैदिक सह सम्बंध से है जिसे भारत के जेहादी एकेडेमिक्स 70 साल से खण्डित औऱ अस्वीकृत कर खुद को प्रगतिशील के रूप में अधिमान्य करते रहे हैं। आयुर्वेद से इनकी नफरत केवल इसलिए है क्योंकि वह भारतीय सनातन मानबिन्दुओं को संपुष्ट करता है और यही मानबिन्दु सेकुलरिज्म की दुकान पर स्वीकार नहीं है।

असल में रामदेव के विरोध से जुड़े इको सिस्टम को इसी लिबरल्स गिरोह के तानेबाने में समझने की जरूरत भी है जो मूलतः स्वदेशी औऱ भारतीयता के विचारों के शत्रु हैं। आयुर्वेद का उद्भव वेदों के साथ है इसलिए वेदविरोधी औऱ आर्य अनार्य विवाद खड़ा करने वालों की कुत्सित मानसिकता को समझना कठिन नहीं है। एलोपैथी दवा से जुड़ी एमएनसी और देशी कम्पनियों की विफलता कोरोना ने प्रमाणित कर दी है। इस नाकामी के साथ उन्हें खरबों का संभाव्य कारोबार भी डूबता हुआ नजर आ रहा है क्योंकि इम्युनिटी डेवलप की कारगर दवाएं तो आयुर्वेद में ही उपलब्ध हैं और बाबा रामदेव ने योग के जरिये जिस तरह अपनी स्वीकार्यता भारतीय जनमानस में सुस्थापित की है उससे कोई असहमत नहीं हो सकता है।

योग मूलतः आरोग्य का ही मंत्र है और भारत के बाहर वैश्विक मान्यता के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जो काम किया है उसे मोदी विरोधी मन से स्वीकार नहीं कर पाते हैं। यही कारण है कि एक वर्ग मोदी और रामदेव के विरोध में अंधा होकर आयुर्वेद को खारिज करने से भी नहीं चूकता है। ताजा विवाद को इसी नजरिये से समझने की आवश्यकता भी है।
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