साम्प्रदायिकता विरोधी विधेयक हिन्दुओं के खिलाफ साजिश

यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहाकार परिषद ने हाल में साम्प्रदायिक हिंसा पर प्रस्तावित कानून का एक मसौदा जारी किया है। यह प्रारूप जनचर्चा के लिए पेश है। यह विधेयक यदि पारित हो गया तो सबसे ज्यादा खतरा बहुसंख्यक समाज अर्थात हिंदुओं के लिए होगा। इस प्रारूप में जो प्रावधान हैं वे समाज का बहुसंख्यक और अल्पसंख्सक इस तरह विभाजन करते हैं और अल्पसंख्स्यकों को निरपराध मान कर बहुसंख्यकों को दोषी करार देते हैं। वास्तव में कानून के सामने तो सभी समान होने चाहिए। इसलिए ये प्रावधान नैसर्गिक न्याय के सिध्दांत को पूरी तरह तिलांजलि देते हैं।

इस कानून में ‘पीड़ित समूह’ की जो परिभाषा दी गई है उसमें केवल धार्मिक व भाषाई अल्पसंख्यक, अनुसूचित जाति व जनजातियों को शामिल किया गया है। बहुसंख्यक समाज का कोई व्यक्ति पीड़ित हो सकता है, यह इस परिभाषा में मान्य नहीं है। इस तरह साम्प्रदायिक भेदाभेद को प्रारूप एक तरह से बढ़ावा दे रहा है। स्वाधीनता के बाद शायद ही कोई ऐसा प्रारूप आया हो जो हमारे संघीय ताने‡बाने ओर बहुसंख्यक‡अल्पसंख्यक सद्भाव को ध्वस्त करने पर तुला हुआ हो। यह प्रारूप एक तरह से अल्पसंख्यक साम्प्रदायिकता ही है और कांग्रेस और उनके नुमाइंदों ने अपने ‘वोट बैंक’ को ध्यान में रख कर इसे बनाया है। इस विधेयक में शिया‡सुन्ना संघर्ष, ईसाई गुटों में आंतरिक झगड़े या मारकाट अथवा अल्पसंख्यकों के बीच हुए आंतरिक दंगों को साम्प्रदायिक हिंसा मानने से इनकार किया गया है। मतलब यह कि बहुसंख्यक समाज या उसके संगठन का प्रतिनिधि यदि उसके साथ जुड़ा होगा तभी वह साम्प्रदायिक हिंसा मानी जायेगी। इसका दूसरा अर्थ यह है कि अल्पसंख्यकों को पूरी तरह निर्दोष मान लिया गया है। विव्देष प्रचार के बारे में भी कानून में भेदभावमूलक प्रावधान है। यदि अल्पसंख्यक किसी को ‘काफिर’ कह दें तो वह विव्देष प्रचार की परिभाषा में शामिल नहीं होगा, इसलिए दण्डनीय नहीं होगा, लेकिन यदि ऐसी ही कोई बात बहुसंख्यक कहेंगे तो उसे विव्देष माना जायेगा और दण्डनीय होगा। इस तरह यह विधेयक नकारात्मक प्रभाव उत्पन्न करता है और देश की एकता और एकात्मता के लिए इससे बड़ा खतरा पैदा होने वाला है।

इस विधेयक की दूसरी विशेष बात यह है कि इसमें केंद्रीय व राज्य स्तर पर साम्प्रदायिक हिंसा की रोकथाम और पीड़ितों को मुआवजे के लिए स्वतंत्र प्राधिकरण की नियुक्ति का प्रस्ताव है। कानून व व्यवस्था राज्यों का विषय है। इसके बावजूद प्राधिकरण जैसी एक और व्यवस्था कायम करने की जरूरत ही क्या है? यही नहीं, प्रारूप में प्राधिकरण को व्यापक अधिकार दिए गए हैं और राज्यों के प्रशासनिक ढांचे पर इसका विपरीत असर होगा। प्राधिकरण संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों की जांच कर सकेगा और उन पर कार्रवाई की सिफारिश कर सकेगा। इससे संबंधित अधिकारी कार्रवाई के भय से अति उत्साह में काम कर सकता है, जिसका खामियाजा बहुसंख्यक समाज को ही भोगना पड़ेगा। यही नहीं, किसी संगठन को साम्प्रदायिक करार देकर उसके पदाधिकारियों को भी दण्डित किया जा सकता है। कुल मिला कर यह प्रारूप देश के लिए घातक साबित होगा इसलिए वह कुड़ेदान में फेंकने लायक है और सभी को इसका डट कर विरोध करना चाहिए।

मुख्य प्रावधान

साम्प्रदायिक एवं लक्षित हिंसा (न्याय व क्षतिपूर्ति) विधेयक 2011 में नौ अध्याय व 138 धाराएं हैं। चार परिशिष्ट हैं, जिनमें सशस्त्र सेनाओं से संबंधित कानून, भारतीय दण्ड विधान के अंतर्गत परिभाषित अपराध, और मुआवजे का फार्मूला दिया गया है।

परिभाषाएं:

धारा 3 में परिभाषाएं दी गई हैं। इस घारा की उपधारा (सी) में साम्प्रदायिक एवं लक्षित हिंसा किसे कहा जाये इस बारे में यह परिभाषा है- ‘ऐसी कोई कार्रवाई या कार्रवाइयां, चाहे स्वयंस्फूर्त हो या नियोजित, जिनसे किसी व्यक्ति या सम्पत्ति को नुकसान पहुंचता हो, और किसी समूह की सदस्यता के कारण जानबूझकर निर्देशित हो और जिससे देश के धर्मनिरपेक्ष ढांचे को नुकसान पहुंचता हो।’ इसी धारा की उपधारा (ई) में समूह की व्याख्या की गई है, जिसके अनुसार ‘समूह‘ का मतलब देश के किसी राज्य के धार्मिक व भाषाई अल्पसंख्यक अथवा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 366 धारा 24 व 25 में उल्लेखित अनुसूचित जाति व जनजाति होगा। इसी धारा की अगली उपधारा (जे) के अनुसार ‘पीड़ित व्यक्ति’ वह माना जाएगा, जो इस कानून के अंतर्गत परिभाषित समूह का होगा, जिसका इस कानून के अंतर्गत परिभाषित अपराधों के कारण शारीरिक, मानसिक, आर्थिक उत्पीड़न हुआ होगा या सम्पत्ति की हानि हुई होगी। पीड़ित व्यक्तियों में उसके रिश्तेदार, कानूनी संरक्षक और उत्तराधिकारी शामिल होंगे।

अपराध

अध्याय 2 में इस कानून के अंतर्गत अपराधों का ब्योरा दिया गया है। इसमें 5 से 17 तक धाराएं हैं। धारा 6 में कहा गया है कि अनुसूचित जाति जनजाति अत्याचार कानून, 1989 के अंतर्गत शामिल होने वाले अपराध इसमें अतिरिक्त रूप से शामिल किये जाएंगे। इसके अलावा बलात्कार (धारा 7), विद्वेष प्रचार (धारा 8), संगठित अवैध गतिविधियां (धारा 9), धन या साधन मुहैया करना (धारा 10), प्रताड़ना (धारा 12), सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों का कर्तव्य न निभाना (धारा 13), दोषी सरकारी सेवकों का दण्डित करना (धारा 14‡ इस धारा में नया प्रावधान जोड़ा गया है, जिसके अंतर्गत सर्वोच्च सरकारी अधिकारियों को जिम्मेदार करार दिया गया है।) इत्यादि प्रावधान किये गये हैं।

कर्तव्य

अध्याय 3 में धारा 18 से 20 के अंतर्गत साम्प्रदायिक उपद्रवों और लक्षित हिंसा को रोकने के लिए कर्तव्य निर्धारित किए गए हैं। धारा 18 की उपधारा (3) में नया प्रावधान किया गया है, ‘इस कानून के अंतर्गत अधिकार प्राप्त अपने कर्तव्य का निर्वाह अविलम्ब, निष्पक्ष और भेदभावरहित ढंग से करेगा।’

प्राधिकरण का गठन

अध्याय 4 में धारा 21 के अंतर्गत प्रावधान किया गया है कि इस कानून को लागू करने के लिए केंद्र सरकार ‘राष्ट्रीय साम्प्रदायिक सौहार्द, न्याय व मुआवजा प्राधिकरण’ का गठन करेगी। उपधारा (3) में कहा गया है कि ‘प्राधिकरण में अध्यक्ष, उपाध्यक्ष के अलावा पांच अन्य सदस्य भी होंगे। अध्यक्ष और उपाध्यक्ष समेत कम से कम चार सदस्य निम्न समूह में से होंगे‡ 1 अनुसूचित जाति या जनजाति में से एक 2 चार महिलाएं‡ अध्यक्ष, उपाध्यक्ष समेत। अध्यक्ष, उपाध्यक्ष समेत दो सदस्य निवृत्त सरकारी अधिकारी होंगे। प्राधिकरण का महासचिव केंद्र सरकार के सचिव स्तर का अधिकारी होगा और वही मुख्य प्रशासकीय अधिकारी होगा।

सदस्यों की नियुक्ति

प्राधिकरण के सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति करेंगे। प्राधिकरण के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष के चयन के लिए एक चयन समिति होगी। चयन समिति के अध्यक्ष प्रधान मंत्री होंगे। समिति के अन्य सदस्य होंगे‡ लोकसभा में विपक्ष के नेता, केंद्रीय गृह मंत्री, लोकसभा में मान्यताप्राप्त राष्ट्रीय दलों के नेता (धारा 22 उपधारा (1)। सामान्य बहुमत से चयन किया जाएगा (उप धारा 3)।

योग्यता

धारा 23 में प्राधिकरण के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सदस्यों की योग्यता निम्नानुसार तय की गई है‡ (ए) कानून और आपराधिक न्याय या मानव अधिकारों के प्रति विशेषज्ञता रखता हो (बी) साम्प्रदायिक सौहार्द संवर्धन के लिए कार्य किया हो (सी) उच्च दर्जे का नैतिक चरित्र्य, निष्पक्षता और ईमानदारी हो (डी) चयन के पूर्व एक वर्ष तक किसी भी राजनीतिक दल का सदस्य न हो। अयोग्यता के लिए उपधारा (2) के अंतर्गत निम्न प्रावधान हैं‡ (ए) किसी कानून के अंतर्गत जांच जारी न हो अथवा ऐसे अपराध के लिए सजा न सुनाई गई हो (बी) किसी भी समूह के प्रति किसी भी तरह से पक्षपात न किया हो‡ गतिविधियों, लेखन अथवा अन्य किसी तरीके से (सी) सरकारी सेवक या अन्य पर किसी तरह से अनुशानात्मक कार्रवाई न चल रही हो अथवा ऐसी किसी जांच में दोषी न करार दिया हो। उपधारा (3) में प्रावधान है कि राष्ट्रीय प्राधिकरण के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष या सदस्य अपनी अवधि पूरी होने के बाद दो वर्ष तक चुनाव नहीं लड़ सकेंगे, अपवाद केवल राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति पद के चुनाव का होगा। धारा 24 के अंतर्गत सदस्यों की अवधि 6 वर्ष की होगी बशर्ते कि पहले चयन में दो सदस्य दो वर्ष के लिए, अन्य दो सदस्य चार वर्ष के लिए और शेष 6 वर्ष के लिए होंगे। उपधारा (2) के अंतर्गत अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का कार्यकाल दो वर्ष का होगा। उसी पद पर उसी व्यक्ति की पुन: नियुक्ति नहीं होगी (उपधारा 3)।

पदच्युत करने का अधिकार

धारा 25 के अंतर्गत दुर्व्यवहार साबित होने पर या उच्चतम न्यायालय को मामला संदिर्भित करने के बाद अक्षमता साबित होने पर राष्ट्रपति प्राधिकरण के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष या सदस्य को पद से हटा सकेंगे। यदि अध्यक्ष, उपाध्यक्ष या सदस्यों में से कोई बाहर लाभ के पद पर कार्य करता हो, मानसिक स्थिति ठीक ने हो या नैतिकता के आधार पर किसी मामले में सजा सुनाई गई हो तो ऐसे व्यक्ति को पद से हटाया जा सकेगा। यदि कोई पद रिक्त हो गया हो तो वह दो माह के भीतर भरा जायेगा और नया व्यक्ति शेष अवधि के लिए पद पर बना रहेगा।

प्राधिकरण के उद्देश्य

धारा 30 के अंतर्गत प्राधिकरण के निम्न उद्देश्य होंगे‡ साम्प्रदायिक एवं लक्षित हिंसा की किसी भी कार्रवाई, ढांचे, प्रोत्साहन या फैलने से रोकना, संगठित साम्प्रदायिक एवं लक्षित हिंसा को नियंत्रित करना, इस कानून के अंतर्गत अपराधों के लिए चलने वाली जांच, अभियोजन या सुनवाई की निषपक्षता से निगरानी करना, इस कानून के अंतर्गत पीड़ितों को उचित राहत और मुआवजा निष्पक्ष रूप से वितरित होने की निगरानी करना।

प्राधिकरण के कार्य

धारा 31 के अंतर्गत प्राधिकरण इस कानून से संबंधित अपराधों के बारे में जानकारी इकट्ठा करेगी और उसकी जांच करेगा। यह जानकारी वह अपनी ओर से या अन्य किसी भी स्रोत से प्राप्त प्राप्त कर सकेगा। समुदाय के प्रति किसी भी तरह से प्रचार, पत्रव्यवहार, लोगों को संगठित करने आदि के बारे में सूचनाएं और जानकारी इकट्ठी करेगा। राज्य सरकारों से जानकारी प्राप्त करेगा, राहत शिविरों को भेट देगा, अपराधों की जांच के लिए जेल में बंद किसी भी व्यक्ति से जाकर सूचनाएं ले सकेगा।

प्राधिकरण के अधिकार

धारा 33 के अंतर्गत प्राधिकरण को व्यापक अधिकार दिए गए हैं। वह केंद्र व राज्य सरकारों के अलावा अन्य से भी जानकारी मांग सकेगा। जांच‡पड़ताल के लिए किसी व्यक्ति की नियुक्ति कर सकेगा। जांच के संबंध में राज्य सरकारों को निर्देश दे सकेगा। उपधारा (2) के अंतर्गत प्राधिकरण को सिविल कोर्ट के अधिकार दिए गए हैं। इसका माने यह कि कोड ऑफ सिविल प्रोसीजर कानून 1908 के अंतर्गत सिविल अदालत को जो अधिकार प्राप्त है वे प्राधिकरण को प्राप्त होंगे। प्राधिकरण ऐसे किसी व्यक्ति को भी जांच के लिए बुला सकता है, जिसे कानून के अंतर्गत विशेषाधिकार प्राप्त है। प्राधिकरण जरूरत पड़ने पर किसी भी इमारत या जगह में प्रवेश कर दस्तावेज या उनकी प्रतियां प्राप्त कर सकता है। भारतीय दण्ड विधान, 1860 के अंतर्गत आने वाले मामले निर्धारित जज या अदालत के पास भेजेगा। प्राधिकरण की हर जांच न्यायिक जांच मानी जाएगी। भारतीय दण्ड विधान की धाराओं 175, 178, 179, 180 और 228 के अंनर्गत प्राधिकरण को सिविल अदालत के अधिकार होंगेा

जांच-पड़ताल

धारा 34 के अंतर्गत प्राधिकरण को जांच‡पड़ताल के लिए केंद्र व राज्य सरकारों की किसी भी जांच एजेंसी या अधिकारी सेवाएं लेने का अधिकार होगा। यदि जांच में कोई दोषी पाया या सरकारी कर्मचारी व्दारा हिंसा रोकने में लापरवाही बरतने पर प्राधिकरण संबंधित सरकार को उचित कार्रवाई के लिए कहेगा (धारा 36)। प्राधिकरण अपनी जांच रिपोर्ट सरकार की टिप्पणियों के साथ प्रकाशित करेगा (उपधारा 4)। शिकायतकर्ता को जांच रिपोर्ट की प्रति देना प्राधिकरण का कर्तव्य होगा (धारा 37)। एक नया प्रावधान यह जोड़ा गया है कि केद्र सरकार व राज्य सरकार या संबंधित अधिकारी जांच रिपोर्ट पर कार्रवाई करने के लिए बाध्य होंगे (धारा 39)। प्राधिकरण पीड़ित व्यक्ति या सूचना देने वाले की पहचान गुप्त रखेगा (धारा 40)। जिला मजिस्ट्रेट या पुलिस आयुक्त को हिंसा का अविलम्ब जानकारी प्राधिकरण को देनी होगी (धरा 41)। प्राधिकरण अपनी वार्षिक रिापोर्ट पेश करेगा।

राज्य प्राधिकरण

विधेयक के पांचवें अध्याय में केंद्र की तरह राज्यों में भी प्राधिकरण के गठन का प्रस्ताव है। केंद्रीय प्राधिकरण में केंद्र की जो भूमिका है, लगभ्भग उसी तरह की राज्य प्राधिकरण में राज्य सरकार की होगी। धारा 44 से लेकर 56 तक इसमें प्रावधान हैं।

जांच, अभियोजन व मुकदमा

प्राधिकरण अपराध प्रक्रिया संहिता 1973 पर अमल करेगा (धरा 57)। इस कानून के अंतर्गत यदि विशेष उल्लेख न हो तो सभी अपराध संज्ञेय और गैर‡जमानती होंगे (धारा 58)। पुलिस उपअधीक्षक या ऊंचे पद का अधिकारी राहत शिविर स्थापित होने के सात दिनों के भीतर शिविर का दौरा करेगा और पीड़ितों के बयान दर्ज करेगा। यह बयान उसी ‘समूह’ या पीड़ित या सूचना देने वालों के दो पंचों के समक्ष दर्ज किया जायेगा। यदि किसी महिला या बच्चे पर लैंगिक अत्याचार हुआ हो तो उसका बयान महिला पुलिस अधिकारी ही दर्ज करेगी (धारा 61 से 63)। मामले के अधिकार क्षेत्र के बाहर का कोई भी महानगर दण्डाधिकारी या न्यायिक मजिस्ट्रेट अनुरोध करने पर बयान को दर्ज करेगा और बाद में वह संबंधित न्यायिक अधिकारी के पास भेजेगा। पी़िड़त या सूचना देने वाला या गवाह अपना बयान सीधे प्राधिकरण को भी भेज सकेगा (धारा 64)। पीड़ित की मेडिकल जांच दो पंजीयत डॉक्टरों से करानी होगी। मृत्यु होने पर तीन डॉक्टरों से पोस्टमार्टम कराना होगा, जिनमे एक महिला होगी पोस्टमार्टम के समय पीड़ित का प्रतिनिधि उपस्थित रह सकेगा और उसकी रिपोर्ट 15 दिनों के भीतर जांच एजेंसी व पीड़ित के प्रतिनिधि को देनी होगी (धारा 65)।

न्यायिक जांच

इस कानून के अंतर्गन आने वाले अपराध जिस राज्य में हुए हो उस राज्य के उच्च न्यायालय के जज उन मामले की न्यायिक जांच करेंगे। यह जांच उन सरकारी अधिकारियों की होगी जिनका ऐसे अपराध रोकना कर्तव्य है। यह जांच पुलिस जांच के अलावा होगी (धारा 72)। धारा 75 के अंतर्गत पद के कारण यदि किसी अधिकारी को अभय दिया गया हो तो वह समाप्त माना जाएगा और उस व्यक्ति पर मामला चलाया जा सकेगा। मामले के लिए विशेष अभियोजकों का पैनल बनाया जाएगा, जिसमें एक तिहाई अभियोजक धार्मिक व भाषाई अल्पसंख्यक, अनुसूचित जाति जनजाति वर्ग के होंगे तथा अन्य एक तिहाई महिलाएं होंगी (धारा 78)। इन मामलों को चलाने के लिए विशेष जज की नियुक्ति होगी और सुनवाई दैनिक आधार पर की जाएगी (धारा 80)।

सम्पत्ति अटैच करना

धारा 82 के अंतर्गत आरोप तय होने पर पदेन जज मुकदमे का फैसला होने तक आरोपी की सम्पत्ति अटैच करने का आदेश दे सकेंगे। मुकदमे के फैसले पर जज अभियुक्त पर यदि कोई जुर्माना करता है तो उसकी वसूली ऐसी सम्पत्ति की बिक्री से प्राप्त की जायेगी। जज को आरोप सिध्द होने पर दोषी को तड़ीपार करने का भी अधिकार होगाा (धारा 83 व 84)।

राहत व मुआवजा

सातवें अध्याय में राहत, मुआवजे का प्रावधान किया गया है। धारा 90 के अंतर्गत सभी पीड़ितों को राहत व मुआवजा देने की व्यवस्था है।
धारा 91 से 113 तक राहत, राहत शिविरों की स्थापना, मुआवजे का तय करना, पीड़ित का पुनर्वसन करना आदि काम संबंधित राज्य सरकार के अधीन किए गए हैं। धारा 112 में केंद्र व्दारा राहत व मुआवजा कोष की स्थापना का प्रावधान है। इस कोष से तुरंत राहत पहुंचाई जाएगीा

सजा व जुर्माना

आठवें अध्याय में धारा 114 से 128 तक अभियुक्त को विभिन्न अपराधों के लिए दी जाने वाली सजा व जुर्माने का प्रावधान है। दोषी व्यक्तियों को कम से कम 7 वर्ष से लेकर 14 वर्ष तक सश्रम कारावास या जुर्माना या दोनों सजाएं हो सकती हैं। विव्देष फैलाने वाले या हिंसा को बढ़ावा देने वाले को जुर्माना व 3 साल की सजा या दोनों हो सकता है। कर्तव्य निर्वाह में चूक करने वाले सरकारी कर्मचारी को 5 वर्ष की कैद व जुर्माना हो सकता है। समूह व्दारा किए गए अपराध के लिए उस समूह के प्रत्येक व्यक्ति ने वह अपराध किया मान कर सजा सुनाई जाएगी

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