चल रे कावंरिया शिव के धाम…

सावन मास में उत्तरी राज्यों में शिवभक्तों की कावड़ यात्रा अपूर्व पर्व है। इसमें भक्त गंगा जल कावर में भरकर उसे शिव मंदिर में जाकर चढ़ाते हैं। चारों ओर कावर कंधे पर धरकर पैदल जाते इन भक्तों के काफिले शिव के नारों से आकाश को गुंजायमान कर देते हैं।

देवाधिदेव महादेव शिवशंकर भोलेनाथ का देव, दानव एवं मानव सहित सभी चराचर सृष्टि पूजन करती है। ओमकार की ध्वनि सारे ब्रह्माण्ड में सदैव गुंजायमान रहती है। ऐसे सर्वमान्य लोकप्रिय आदियोगी अखिलेश्वर शंभुनाथ का परम पवित्र पर्व है श्रावण मास। पूरे भारतवर्ष में श्रावण मास को एक पर्व के रूप में मनाया जाता है। शिवभक्त पूरी श्रध्दाभाव से अपने आराध्य रुद्रदेव की पूजा अर्चना व आराधना करते हैं।

कहते हैं श्रावण मास के सोमवार को शिवलिंग पर जलाभिषेक करने से भक्तों के मनोरथ पूर्ण होते हैं और उन पर शिवजी की कृपा सदैव बनी रहती है। इसलिए देश के चारों कोनों से भक्त पवित्र निर्मल नदियों से विशेषकर गंगा जल लेकर कावड़ यात्रा में शामिल होते हैं। चायनीज वायरस कोरोना के संकट को देखते हुए इस बार सामूहिक रूप से कावड़ यात्रा को स्थगित कर दिया गया है। बावजूद इसके शिवभक्तों के उत्साह में कोई कमी नहीं आई है। सभी भक्त इस उम्मीद में बैठे है कि जैसे ही प्रशासन से इसकी अनुमति मिलेगी वे कावड़ यात्रा में शामिल होने के लिए चल पड़ेंगे। मुंबई के एक परम शिवभक्त राजकुमार ने कहा कि वह हर साल श्रावण मास में अपने दोस्तों की टोली के संग भीमाशंकर ज्योर्तिलिंग सहित अन्य किसी न किसी ज्योर्तिलिंग के दर्शन करने अवश्य जाते हैं और अनेक कावड़ यात्रा में भी सहभागी होते हैं। इस बार यदि उन्हें यह मौका नहीं भी मिला तो क्या हुआ? तन से ना सही लेकिन मन से तो जरूर कावड़ यात्रा कर गंगाधर को जलाभिषेक कर श्रध्दा सुमन अर्पित करेंगे। इसी तरह की जनभावना कमोबेस सभी शिवभक्तों के मन में है।

सांस्कृतिक धार्मिक जुड़ाव से ही भारत की सामाजिक एकता सुरक्षित

कावड़ यात्रा वैसे तो भगवान शिव को समर्पित हैं लेकिन इसका भारत के सामाजिक व सांस्कृतिक चेतना से भी सरोकार है। बहुत कम लोगों का ध्यान इस ओर गया होगा। कावड़ यात्रा भक्ति के साथ ही सामाजिक शक्ति का भी केंद्र है या यूं कहे कि आधार स्तंभ है। जात-पात, भाषा, प्रांत, पंथ, धर्म, छुआछूत आदि अनेक प्रकार के भेदभाव को ख़त्म करने का सामर्थ्य कावड़ यात्रा में है। कावड़ यात्रा के दौरान किसी प्रकार का भेदभाव दिखाई नहीं देता। सामाजिक सौहार्द और सामाजिक समरसता की यह अनोखी मिसाल है। इससे स्पष्ट होता है कि सांस्कृतिक जुड़ाव से ही भारत की सामाजिक एकता सुरक्षित व संवर्धित है। युगों – युगों से यह सांस्कृतिक अमृतधारा ही इस सनातन पुरातन राष्ट्र को संजीवनी प्रदान कर सामाजिक एकता के सूत्र में बांधे हुए है।

वर्तमान समय में हर राज्य, हर प्रांत में बड़े ही धूमधाम से कावड़ यात्रा का भव्य दिव्य आयोजन किया जाता है। जिसमें हर पंथ, हर जाति के लोग शामिल होते हैं। कावड़ यात्रा के दौरान बोल बम, हर हर महादेव, ॐ नमः शिवाय, चल रे कावंरिया शिव के धाम और बाबा नगरिया दूर है जाना जरूर है। इन जैसे अनेक नारों की गूंज सुनाई पड़ती है। भारत में महाकुंभ के बाद कावड़ यात्रा को ही दुनिया के सबसे बड़े आयोजनों में से एक माना जाता है। हालांकि यह एक स्थान पर न होकर देश के सभी क्षेत्रों में आयोजित होती है।

स्वास्थ्य की दृष्टि से भी लाभदायक है कावड़ यात्रा

महादेव के अधिकतर प्रसिद्ध मंदिर पर्वत, पहाड़, जंगल, नदी आदि प्रकृति के बीच दुर्गम क्षेत्रों में हैं। श्रद्धालुओं को बेहद कष्टप्रद मार्गों से होकर गुजरना पड़ता है। इससे भक्तों को आध्यात्मिक लाभ तो मिलता ही है, इसके साथ ही शारारिक लाभ भी मिलता है। आपने देखा होगा कि हर साल कावड़ यात्रा में जाने वाले लोग अन्य लोगों की अपेक्षा शारीरिक व मानसिक रूप से बेहद मजबूत होते हैं। सावन के महीने में बरसात का सुहाना मौसम रहता है, जो सभी को हर्षित और रोमांचित कर देता है। हरियाली के मनोभावन दृश्य देखने से आंखों की रोशनी बढ़ती है। बिना चप्पल – जूते पहने कावड़िये महादेव का ध्यान, जप करते हुए बढ़ते जाते हैं। इस दौरान पत्थर, कंकड़ पैरों में धंसते हैं। इससे पैरों के तलुओं का एक्यूप्रेशर हो जाता है। सूर्य की तेज किरणें शरीर को तपाकर उसे निखारती है और रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती है। कावड़ यात्रा के दरम्यान अनेक प्रकार के शारारिक कष्टों को सहना पड़ता है। जिससे हमारे शरीर की सहनशक्ति भी बढ़ती है। इस तरह विभिन्न प्रकार से भक्तो को शारारिक लाभ मिलता है।

वैज्ञानिकों ने भी माना शिव को शाश्वत सत्य

ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति कैसे हुई? ईश्वरकण क्या हैं? सृष्टि का सर्जन और संहार कैसे होता है? इसे जानने और इसकी खोज के लिए दुनियाभर के वैज्ञानिक एकत्रित आकर अनुसंधान कर रहे हैं। कुछ वर्षों पूर्व ‘ईश्वरकण’ (गॉड पार्टिकल) की खोज के प्रयोग से अचंभित करने वाले नाभिकीय अनुसंधान यूरोपीय संगठन (लशीप) का नाम तो विज्ञान प्रेमियों को याद होगा। 113 देशों के 608 अनुसंधान संस्थानों के कुल 7931 वैज्ञानिक एवं इंजीनियर उक्त संस्थान के अंतर्गत अनुसंधानरत हैं। यह प्रयोग फ़्रांस और स्विट्जरलैंड दोनों देशों की भूमि में 100 मीटर गहराई के अंदर हो रहा है। यह अनेक अर्थों में विश्व की विशालतम भौतिकी की प्रयोगशाला है। इस प्रयोगशाला में मूलकणों को तेज से तेज गति से दौड़ाया जाता है। अर्थात यह प्रयोगशाला ‘कण त्वरक’ है जो मूल कणों को प्रकाश गति के निकटतम त्वरित वेग (रिीींळलश्रश रललशश्रशीरीेीं) प्रदान करने की क्षमता रखती है। और फिर इनकी एक दूसरे से टक्कर कराई जाती है (अतएव इसका नाम विशाल हेड्रोन संघटक भी है)। और यह एस तरह नए कणों का निर्माण कर सकती है तथा प्रयोगशाला में ही यह ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति की सूक्ष्म रूप में रचना कर सकती है। न केवल यह आकार और प्रकार में विशालतम है वरन कार्य में सूक्ष्मतम कणों के व्यवहार की खोज करती है। जिनके अध्ययन से इस विराट ब्रह्माण्ड की संरचना समझने के लिए भी मदद मिलती है।

आपको यह जानकार आश्चर्य होगा कि इस प्रयोगशाला में यह स्पष्ट हुआ है कि जिस तरह शिवजी का तांडव नृत्य सृष्टि के विनाश और पुन: निर्माण का द्योतक है, उसी तरह ब्रह्माण्ड प्रयोगशाला में सूक्ष्मतम कण तांडव नृत्य करते हैं, एक दूसरे को नष्ट करते हैं और नए कणों की रचना करते हैं। अर्थात शिवजी का तांडव नृत्य ब्रह्माण्ड में हो रहे मूल कणों के नृत्य का प्रतीक है। बताया जाता है कि वैज्ञानिकों ने भी इस प्रयोगशाला में तांडव नृत्य करते हुए महादेव का साक्षात्कार किया है। उनकी अनुभूति महसूस की है। जिससे प्रभावित होकर इस विशालतम भौतिकी प्रयोगशाला के केंद्र में नटराज शिवजी की विशाल प्रतिमा स्थापित की गई है।

ज्योर्तिलिंगों के स्थान पर पाया जाता है सर्वाधिक रेडिएशन

भारत सरकार के परमाणु सयंत्रों के अलावा सभी ज्योर्तिलिंगों के स्थानों पर सर्वाधिक रेडिएशन पाया जाता है। हालांकि यह रेडिएशन हमारे शरीर को कोई हानि नहीं पहुंचाता बल्कि आध्यात्मिक एवं सकारात्मक ऊर्जा से भर देता है। कई शिवभक्तों ने अपना अनुभव बताया कि ज्योर्तिलिंगों के दर्शन करने मात्र से उनके सारे तनाव नष्ट हो जाते हैं और उनमें एक नई ऊर्जा शक्ति समाहित हो जाती है। उनमें उत्साह व नव चैतन्य का निर्माण होता है। शिवलिंग की महिमा को जानकर ही भाभा परमाणु सयंत्र का डिज़ाइन भी शिवलिंग की तरह ही बनाया गया है। शिवलिंग पर रुद्राभिषेक जैसे अनुष्ठान केवल धार्मिक कर्मकांड का हिस्सा नहीं है अपितु इसका वैज्ञानिक पहलू भी है। संस्कृत मंत्रों का भी हमारे तन, मन और मष्तिषक पर बहुत ही सकारात्मक परिणाम होता है। शिव महिमा को जानकर ही हमारे ऋषि मुनियों ने ‘ं शिवं सत्यं सुंदरम्’ का उद्घोष किया था, जिसे आज ‘सत्यं शिवं सुंदरम ्’ के रूप में जाना जाता है।

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