रेशम की डोरी से संसार बांधा है

राखी के ये गीत हमें एक ऐसी दुनिया में ले जाते हैं, जहां रिश्तों में ऊष्मा है, आत्मीयता है, अपनापन है, जीवन में छोटी छोटी खुशियां तलाशने की ललक है, अपनों से मिलने की आकांक्षा और न मिल पाने का दर्द है।

सावन का महीना रिमझिम फुहारों के साथ हमारे कई तीज-त्योहार लेकर आता है, जिनमें रक्षाबंधन का स्थान सर्वोपरि है। जब कभी हम रक्षा बंधन के पर्व को याद करते हैं, हमारी स्मृतियों में रेडियो का वह सुनहरा दौर दस्तक देने लगता है, जब राखी के दिन बहन-भाई के नेह में लिपटे सुरीले गानों की स्वर-लहरियार गूंजा करती थीं। इनमें कुछ गीत जहां बहन-भाई में उत्साह और उमंग भर देते थे, वहीं कुछ गीत ऐसे भी होते थे, जिन्हें सुनते ही अनायास आंसू छलक जाते थे। ‘छोटी बहन’ में कविराज शैलेंद्र ने ऐसा ही एक संवेदनशील गीत लिखा था:

भैया मेरे राखी के बंधन को निभाना
भैया मेरे छोटी बहन को ना भुलाना
देखो ये नाता निभाना निभाना
भैया मेरे राखी के बंधन को निभाना

हमेशा सौ-सौ वादकों के साथ गीत बनाने वाले शंकर-जयकिशन इस गीत में निहित भाव को पूरा सम्मान देते हुए बहुत कम वाद्यों के साथ इसे प्रस्तुत करते हैं। राखी में बहन द्वारा भाई के सर पर लगाए जाने वाले टीके को इतनी पवित्रता से अभिव्यक्त किया है कि सुनने वाला द्रवित हुए बिना नहीं रहता:

ये दिन ये त्यौहार खुशी का
पावन जैसे नीर नदी का
भाई के उजले माथे पे
बहन लगाए मंगल टीका
झूमे ये सावन सुहाना सुहाना
भैया मेरे भैया मेरे
राखी के बंधन को निभाना

गीत के अंतिम पद में बहन यह कल्पना भी करती है कि कोई राखी कभी ऐसी भी हो सकती है, जब बहन अपने भाई से मिलने न पहुंच पाए। आज के इस कठिन समय में यह सामान्य बात है कि तीज-त्योहार भी हम अपनों के साथ न मना पाएं, लेकिन जब हम यह गीत सुनते-सुनते लता जी की इन पंक्तियों तक पहुंचते हैं, तो बहन की अनुपस्थिति को हम भी शिद्दत से महसूस करने लगते हैं:

शायद वो सावन भी आए
जो पहला सा रंग न लाए
बहन पराए देश बसी हो
अगर वो तुम तक पहुंच न पाए
याद का दीपक जलाना जलाना
भैया मेरे भैया मेरे
राखी के बंधन को निभाना
भैया मेरे छोटी बहन को ना भुलाना

साठ के दशक का हमारा सिनेमा प्रायः ग्रामीण पृष्ठभूमि पर बना करता था। गांवों में राखी के मौके पर अक्सर बहनें कुछ दिनों के लिए अपने मैके आया करती थीं और अपने परिजनों, सखी-सहेलियों, बड़े-बुजुर्गों से मिलकर दिल हल्का कर लेती थीं। ‘बंदिनी’ में ऐसे ही सावन को याद करते हुए बहन अपने पिता से गांव लिवा ले जाने की गुहार लगाती है:

अब के बरस भेज भैया को बाबुल
सावन में लीजो बुलाय रे
लौटेंगी जब मेरे बचपन की सखियां
दीजो संदेसा भिजाय रे
अब के बरस भेज भैया को बाबुल

बहन सावन के झूले, बरसात की फुहारों, घर के आंगन सहित बचपन की कई स्मृतियों को याद करती है। बहन की इस पीड़ा को शैलेंद्र लोक की भाषा में रचते हैं। एस डी बर्मन का आत्मीय संगीत और आशा भोसले की दर्द भरी आवाज बहन की इस पीड़ा को और भी घनीभूत करते हैं:

अंबुवा तले फिर से झूले पड़ेंगे                   
रिमझिम पड़ेंगी फुहारें
लौटेंगी फिर तेरे आंगन में बाबुल
सावन की ठंडी बहारें
छलके नयन मोरा, कसके रे जियरा
बचपन की जब याद आये रे
अब के बरस भेज भैया को बाबुल

नाज़िमा को साठ और सत्तर के दशक की सबसे लोकप्रिय बहन होने का गौरव हासिल है। ‘आरज़ू’ और ‘अंजाना’ में उन्होंने राजेंद्र कुमार की बहन की भूमिका इतनी संवेदना के साथ जी थी कि दर्शक उनमें ही अपनी बहन की कल्पना करने लगे थे। ‘अंजाना’ में उनके लिए लता ने एक बड़ा खूबसूरत राखी गीत ‘हम बहनों के लिए मेरे भैया, आता है इक दिन साल में’ गाया था। नाज़िमा ने सोहन लाल कंवर की मसाला फिल्म ‘बेईमान’ में बहन की बहुत यादगार भूमिका निभाई थी। इसके एक गीत में वर्मा मलिक ने राखी के त्योहार को हमारी संस्कृति और मूल्यों के साथ जोड़ते हुए सहज-सरल शब्दों में एक नई अभिव्यक्ति दी है:

ये राखी बंधन है ऐसा
जैसे चंदा और किरण का
जैसे बदरी और पवन का
जैसे धरती और गगन का
ये राखी बंधन है ऐसा…

अपने जोड़ीदार जयकिशन के निधन के बाद अकेले पड़ गए शंकर एक महीन सी धुन रचते हैं और लता जी की अति कोमल आवाज के साथ मुकेश की दर्दीली आवाज़ भी चुनते हैं, जो एक ऐसे इंसान की पीड़ा बताते हैं, जिसकी कोई बहन नहीं है:

आज खुशी के दिन भाई के
भर-भर आए नैना
कदर बहन की उनसे पूछो
जिनकी नहीं है बहना
मोल नहीं कोई इस बंधन का
जैसे बदरी और पवन का
जैसे धरती और गगन का
ये राखी बंधन है ऐसा…

सत्तर के दशक में आत्माराम की चर्चित फिल्म ‘रेशम की डोरी’ में धर्मेन्द्र की बहन की भूमिका कुमुद छुगानी ने निभाई थी। इंदीवर मानव मन की कोमल बातों को काव्यात्मक अभिव्यक्ति देने में विशेषज्ञ माने जाते हैं। उन्होंने शंकर-जयकिशन के संगीत निर्देशन में बहुत सुंदर राखी गीत लिखा था:

बहना ने भाई की कलाई से प्यार बांधा है
प्यार के दो तार से, संसार बांधा है
रेशम की डोरी से संसार बांधा है

साठ के दशक में आई ‘अनपढ़’ फिल्म एक ऐसे भाई (बलराज साहनी) की कहानी है, जो अपनी बहन की जरा सी भी तकलीफ बर्दाश्त नहीं कर पाता। एक दिन स्कूल में मास्टर जी द्वारा पढ़ाई के मामले में फटकारे जाने पर बहन रोते-रोते घर आती है तो वह बहन को स्कूल न भेजने का निर्णय ले लेता है। हालांकि उसका यह निर्णय आगे चलकर बहन (माला सिन्हा) के लिए नुकसानदेह सिद्ध होता है। इसमें राजा मेहंदी अली खान ने राखी का एक खूबसूरत गीत लिखा था:

रंग-बिरंगी राखी लेके आई बहना
राखी बंधवा ले मेरे वीर
मैं ना चांदी, ना सोने के हार मांगूं
अपने भईया का थोड़ा सा प्यार मांगूं
थोड़ा सा प्यार मांगूं, सोना हज़ार मांगूं
इस राखी में प्यार छुपा ले आई बहना
राखी बेधवाले मेरे वीर...

राखी के ये गीत हमें एक ऐसी दुनिया में ले जाते हैं, जहां रिश्तों में ऊष्मा है, आत्मीयता है, अपनापन है, जीवन में छोटी छोटी खुशियां तलाशने की ललक है, अपनों से मिलने की आकांक्षा और न मिल पाने का दर्द है। भौतिक जगत से परे यह अलौकिक दुनिया हमें भी लुभाती है, आकर्षित करती है और जड़ों की ओर लौटने को प्रेरित करती है।

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