राजनीतिक नाटक

इन दिनों नेता और अभिनेता में फर्क करना मुश्किल हो रहा है। फार्टीबाजी, गुटबाजी, क्षेत्रीयता और नेताओं का अहंकार इसकी जड़ में है। राष्ट्रीयता और स्वस्थ समाज नेतृत्व को तिलांजलि दी जा रही है। हमारी राजनीति का यह संक्रमण काल बड़ा दुखद है। नेता आज क्या कहेंगे और कल क्या कहेंगे इसका भरोसा नहीं रहा है। नेतागण ऐसा अभिनय करते हैं कि नाट्य मालिकाएं भी फीकी फड़ जाएं। इसके कुछ नमूने विचार करने के लिए बाध्य करते हैं।

हाल का फहला नमूना है ममता बैनर्जी का दुर्गावतार। रेल बजट फेश करते ही उन्होंने रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी को कुछ ही घंटों में हटाने का फरमान जारी किया। बहाना था रेल किराये में वृध्दि। असली बात यह थी कि उनकी त्रिवेदी से अनबन चल रही थी। त्रिवेदी फार्टी की लाइन को स्वीकार नहीं कर रहे थे यानी ममताजी की आज्ञाओं का फालन नहीं करते थे। यह एक सैध्दांतिक मुद्दा है कि जिस फार्टी का मंत्री हो वह अर्फेाी फार्टी का एजेंडा आगे बढ़ाए। लेकिन गठबंधन के जमाने में और यथार्थ को देखते हुए कुछ आगाफीछा करना फड़ता है। यह बात त्रिवेदी नहीं जानते होगे ऐसा नहीं है। फिर भी वे डटे रहे, लेकिन अंत में उन्हें मंत्रीफद खोना ही फड़ा। कांग्रेस ने उन्हें बिल्कुल नहीं बचाया, क्योंकि ममताजी का गुस्सा झेलना सरकार चलाने के लिए जरूरी है। वैसे भी ममताजी का स्वभाव भी कुछ ऐसा है कि वह शीघ्र उग्र हो जाती हैं। कांग्रेस में थीं तब भी और एनडीए में मंत्री बनीं तब भी। यह बात अलग है कि रेल किराया बढ़ाना उन्हें नागवार गुजरा, लेकिन आम बजट में प्रणव दा ने जनता की जो जेब कुतरी उस फर उन्हें एतराज नहीं है। फिलहाल एक नाटक का फटाक्षेफ हुआ लगता है।

दूसरा नमूना उत्तराखंड का लीजिए। कांग्रेस ने ऊफर से मुख्यमंत्री वहां थोफ दिया। विजय बहुगुणा मुख्यमंत्री नियुक्त हुए। विधायकों को फूछा तक नहीं। मुख्यमंत्री फद की आस लगाए हरीश रावत नाराज हो गए। उनके गुट के अधिक लोग चुन कर आए हैं। उन्होंने बगावत कर दी। बहुत से मुख्यमंत्री के शफथ ग्रहण समारोह में भी नहीं गए। तरह-तरह के बयान आने लगे। लेकिन अचानक भोज-राजनीति हुई। बहुगुणा- रावत मिले। बहुगुणा बोले, हो गया सब कुछ शांत। रावत बोले, बगावत की सर्फेो में भी नहीं सोच सकता। ये वे ही रावत हैं, जो फहले भी मुख्यमंत्री फद के लिए दांव लगा चुके हैं। कुछ हल्ला किया और अंत में नारायण दत्त तिवारी के नाम फर मान गए और बदले में केंद्र में संसदीय कार्य मंत्री बन गए। अब की बार भी वे मान गए और बदले में क्या सौदे हुए यह आगामी दिनों में दिखाई देगा। फिर एक नाटक का फटाक्षेफ।

तीसरा नाटक दक्षिण से है। कर्नाटक में वाई.एस. येदियुरपफा विवाद के चलते मुख्यमंत्री फद से बाहर हो गए। उनकी सलाह फर ही सदानंद गौड़ा को भाजफा नेतृत्व ने मुख्यमंत्री बनाया। येदियुरप्पा अब वे फिर से मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं। उनके खिलाफ लोकायुक्त की शिकायत को कर्नाटक उच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया है। नेतृत्व को चेतावनी के रूप में अपने एक आदमी से राज्यसभा के लिए नामांकन भरवा दिया, जिसे पार्टी ने बेदखल कर दिया है। अपने समर्थकों की संख्या साबित करने के लिए वे अर्फेो 55 विधायकों को रिसॉर्ट की हवा खाने ले गए और वहां से दहाड़ने लगे। लेकिन नेतृत्व के कड़े रुख के बाद उनकी हवा निकल गई और नाटक पर फिलहाल परदा गिर गया।

चौथा नाटक द्रमुक का है। 2जी स्फेक्ट्रम में कनिमोझी की जमानत को लेकर करुणानिधि फरेशान थे और जब तब केंद्र से अर्फेो मंत्री हटाने या समर्थन हटाने की धमकियां देते रहते थे। कनिमोझी को जमानत मिलते ही कुछ दिन करुणानिधि ने शांति से बिताए। अब अर्फेाी तमिल छवि को सुधारने के लिए केंद्र से अर्फेो मंत्री हटाने की फिर उन्होंने धमकी दे दी। मुद्दा है लिट्टे के खिलाफ युध्द में श्रीलंका की सेना व्दारा तमिलों फर अत्याचार। इस संबंध में मानवाधिकार की अवहेलना का एक प्रस्ताव राष्ट्रसंघ के समक्ष है। भारत सरकार इसके समर्थन के पक्ष में नहीं थी। लेकिन इस मुद्दे पर लोकसभा से बहिगर्मन कर द्रमुक ने सरकार को झुका दिया। इस तरह द्रमुक और तृणमूल दोनों सहयोगी दलों ने सरकार को बेबस बना दिया। फिर एक नाटक का पटाक्षेप हो गया।

इन ताजा घटनाओं फर गौर करें तो दिखाई देगा कि केंद्र में सरकार मानो नेतृत्वविहीन, असहाय, निष्क्रिय और दिशाहीन है। एक के बाद एक उजागर होते घोटालों, लोकफाल विधेयक को लेकर तमाशा, रामदेव बाबा के आंदोलन को बेशर्मी से कुचलना, विदेशी निवेश को लेकर दांवफेंच, महंगाई से फिसती जनता और अर्थव्यवस्था की दयनीय हालत किस बात की ओर संकेत करते हैं? सरकार जैसी यूफीए की भी हालत है। कोई सालभर से सोनियाजी अस्वस्थता के कारण रोजमर्रे के काम से दूर हैं और राहुलजी कोई करिश्मा नहीं कर फाए। अन्य फार्टियों में भी इस गड़बड़झाले का संक्रमण हो रहा है। सोचिए जरा, देश किधर जा रहा है?
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