शिक्षा में नवाचार

जीवन में ज्ञान की आवश्यकता को नकारा नहीं जा सकता। बहुत सारी समस्याएं अज्ञान से ही पैदा होती हैं। इसीलिए कहा गया है- ‘नाणं पयासयरं।’ ज्ञान प्रकाश करता है। सचमुच यह एक बहुत मूल्यवती अनुभव-वाणी है। दुनिया में यदि महान कष्ट है तो वह अज्ञान ही है। ज्ञान के बिना आदमी अंधे के समान है। जैसे सब कुछ दृश्य होते हुए भी अंधे के लिए कुछ भी नहीं है। उसी प्रकार ज्ञान के बिना सब कुछ होते हुए भी नहीं होने के समान है। वैज्ञानिक अनुसंधानों से हमें बहुत कुछ ज्ञात हुआ है, पर हमारे सामने अज्ञान की भी कोई कमी नहीं है। हमारे अपने शरीर में भी न जाने कितना रहस्य छिपा पड़ा है? अपने अज्ञान के कारण हम उन सबका उपभोग नहीं कर सकते। अज्ञान के कारण ही आदमी अनंत कठिनाइयों को भोग रहा है। ज्ञान ही बदल सकता है। इसीलिए साक्षरता से लेकर पीएच. डी. तथा उससे आगे भी अनेक प्रकार की उपाधियां बांटी जा रही हैं। आदमी के पास ज्ञान का काफी बोझ हो गया है।

ज्ञान आचरण बने

पर एक स्वर यह भी उभरता रहा है- ‘यथा खरो चंदन भारवाही भारस्य वाही न तु चंदनस्य।’ गधा जैसे अपने पर चंदन के भार को ढोता है उसी प्रकार ज्ञान ही पर्याप्त नहीं है उसके साथ आचरण भी जरूरी है। समस्त के प्रति संवेदना जगाने वाला ज्ञान ही सच्चा ज्ञान है। जो ज्ञान स्वार्थ केन्द्रित, अन्य निरपेक्ष है वह अज्ञान है। यह एक बहुत महत्त्वपूर्ण बात है कि ज्ञानी होते हुए भी आदमी अज्ञानी कहलाता है। ज्ञान खराब नहीं है, वह मनुष्य की अनुपम उपलब्धि है, पर यदि वह सम्यग् नहीं है तो उसके खतरे भी कम नहीं हैं। ऐसे अज्ञानियों ने अर्थात् निरपेक्ष ज्ञानियों ने, संवेदना शून्य ज्ञानियों ने दुनिया को अनेक बार तबाह किया है।

आज भी इस सत्य की उपेक्षा हो रही है। आज ज्ञान का पक्ष तो उभर रहा है पर आचार-पक्ष निर्बल हो रहा है। उच्च, उच्चतर तथा उच्चतम शिक्षा का प्रसार तो हो रहा है पर उसके साथ समस्त के संवेदना का भाव कम हो रहा है। अनेक लोग डॉक्टर, इंजीनियर तथा मैनेजमेंट शिक्षा से तो जुड़ रहे हैं पर दूसरों की संवेदना से कट रहे हैं। यही कारण है कि बड़े से बड़े डॉक्टर को केवल पैसे से सरोकार है। यदि पैसा नहीं मिलता है तो बीमार मर भी जाए तो भी उसको दु:ख नहीं होता। केवल डॉक्टर का ही सवाल नहीं है। हर व्यवसाय, टेक्नोलोजी या विधिशास्त्र का अध्ययन करने वाला आदमी पैसे को ही अधिक महत्त्व देता है। यद्यपि सभी लोग ऐसे ही हों यह जरूरी नहीं है, पर अधिकांश लोग इसी दृष्टि वाले हो गए हैं, इसीलिए शिक्षा के लिए यह एक विचारणीय विषय बन गया है।

यह एक बहुत महत्त्वपूर्ण बात है कि आदमी ज्ञानी होते हुए भी अज्ञानी कहलाये। ज्ञानकुत्सित नहीं है, वह मनुष्य की अनुपम उपलब्धि है, पर यदि वह सम्यग् नहीं है तो उसके खतरे भी कम नहीं है। ऐसे ज्ञानियों या अज्ञानियों अर्थात् मिथ्याज्ञानियों ने ही दुनिया को अनेक बार तबाह किया है। परमाणु बम की खोज बहुत महत्त्वपूर्ण थी, आज भी है, पर जब वह खोज अज्ञानियों के हाथों में पहुंच जाती है तो उसके खतरों का अनुमान भी रोमांच खड़े कर देने वाला होता है। अक्षर शिक्षा विद्या को जगा सके तभी उसकी सार्थकता है। तभी वह संवेदनशील तथा सर्वक्षेमंकरी बन सकती है।

सम्यग् दृष्टि या विद्यावान् पुरुष बनने की कुछ पहचान हैं। पहली पहचान तो है अपने आवेगों तथा आवेशों पर अंकुश लगाना। सचमुच यह बहुत बड़ी शर्त है। आवेग और आवेश न जाने कहां-कहां से आदमी का पीछा कर रहे हैं। थोड़ा-सा मन के विपरीत हो जाते ही आदमी न जाने क्या-क्या नहीं कर लेता है। बहुत बार तो वह आदमी नहीं राक्षस बन जाता है। भगवान महावीर ने ठीक ही कहा है-

अह पंचहिं ठाणेहिं, जेहिं सिक्खा न लब्भई
थंभा, कोहा, पमाएण, रोगेणालस्स एणए। उत्तरा. 11-3

अहंकार, क्रोध, प्रमाद, रोग और आलस्य ये पांच ऐसे कारण हैं जिनसे आदमी शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकता।
ठीक इसके विपरीत आठ ऐसे कारण भी उन्होंने बताये हैं जिनसे व्यक्ति शिक्षाशील बनता है-

अह अट्ठहिं ठाणेहिं सिक्खासीलेत्ति बुच्चइ
अहस्सिरे सया दंते न य मम्म मुदाहरे। उत्तरा. 11-4

नासीले न विसीले न सिया अहलोलुए
अकोहणो सच्चरए सिक्खासीलेत्ति बुच्चइ। उत्तरा 11-5

अर्थात् जो हास्य नहीं करता, जो सदा इन्द्रिय और मन का दमन करता है जो मर्म का प्रकाशन नहीं करता, जो सच्चरित्र होता है, जिसका चरित्र दोषों से कलुषित नहीं होता, जो रसों में लोलुप नहीं होता, जो क्रोध नहीं करता तथा जो सत्य में रत रहता है उसे शिक्षाशील या विद्यार्थी कहा जाता है।

उन्होंने कहा है-

जे यावि होइ निव्विज्जे, थद्धे लुद्धे अणिग्गहे
अभिक्खणं उल्लवई अविणीए अबहुससुए। उत्तरा. 11-2

वह बहुश्रुत होकर भी अविद्यावान है जो अभिमानी, लुब्ध, अजितेन्द्रिय तथा असम्बद्ध वक्ता है। ऐसे लोगों की शिक्षा सुफल नहीं होती। दशवैकालिक सूत्र में कहा है- जो आचार्य और उपाध्याय की सुश्रुषा करता है उसकी शिक्षा जल-सिकता वृक्षों की तरह फलित होती है।

असल में मूर्ख और मूढ़ ये दो शब्द हैं। मूर्ख तो इतनी ही दूर तक है कि वह अज्ञानी है। पर मूढ़ तो वह व्यक्ति है जो मोहग्रस्त है, दिग्भ्रांत है आवेग तथा आवेश से संग्रस्त है। वह मूर्ख से भी ज्यादा खतरनाक है।

असम्यग् दृष्टि पुरुष की दूसरी पहचान यह है कि वह पदार्थ में आसक्त रहता हैं। ऐसे व्यक्ति इच्छाओं के दास होते हैं। आज की पूरी व्यवस्था मनुष्य को उसकी आवश्यकताएं बढ़ाने की बात कहती है। इसी से उपभोक्तावाद का जन्म होता है। शिक्षा भी संयम की बात नहीं करती। इससे यह परम्परा आगे से आगे बढ़ती जा रही है। यह सही है कि मनुष्य की कुछ अनिवार्य आवश्यकताएं होती हैं, पर जब आवश्यकताएं अनियंत्रित हो जाती हैं तो वे न केवल दूसरों के अधिकारों को छीनने लग जाती हैं अपितु अंतत: व्यक्ति के स्वयं के लिए भी दुखदायी बन जाती हैं।

असम्यग् दृष्टि पुरुष की तीसरी पहचान है उसमें करुणा-अनुकम्पा नहीं होती। वह इतना असंवेदनशील हो जाता है कि न केवल दूसरों के कष्टों को देखकर द्रवित नहीं होता अपितु वह दूसरों को दुख देने में भी संकोच नहीं करता। आज मनुष्य-मनुष्य के बीच जो आर्थिक वैषम्य बढ़ रहा है उसका मुख्य कारण करुणा का अभाव ही है। यह सही है कि अभावग्रस्त लोग दरिद्रता के लिए स्वयं ही उत्तरदायी हैं। पर यदि पढ़े-लिखे लोगों में करुणा का भाव जाग जाए तो न जाने वाले दुनिया को कितनी सुखमय बना सकते हैं।

असम्यग् दृष्टि पुरुष की पांचवीं पहचान है- आत्मविश्वास की कमी। भला जो आत्मा को ही नहीं समझता उसका विश्वास क्या होगा। आवश्यकता यही है कि शिक्षा शिक्षार्थी को अपनी आत्मा की पहचान करवाये। यही सम्यग् ज्ञान है।

उपरोक्त सारी चर्चा का सारांश यही है कि शिक्षा आदमी को आत्मवान् बनाये। स्वार्थ केन्द्रित नहीं अपितु आत्म केन्द्रित बनाये। स्वार्थ केन्द्रता के परिणाम सबके सामने हैं। इसी दृष्टि से अणुव्रत के आसपास जीवन विज्ञान के रूप में शिक्षा में आत्मविज्ञान की बात उभरी है। अणुव्रत संकल्प की, व्रत की बात तो शुरू से ही करता था, पर संकल्प को गहरा बनाने के लिए जीवन विज्ञान एक पृष्ठभूमि प्रदान करता है। हजारों-हजार लोगों में इससे परिवर्तन लक्षित हुआ है।

जीवन विज्ञान का अपना एक पूरा दर्शन और पाठ्यक्रम है। उसकी चर्चा भिन्न-भिन्न रूपों में सामने आ रही है। संक्षेप में कहा जाए तो ग्रन्थियों के आन्तरिक स्रावों की दिशा को मोड़ना ही व्यक्ति के व्यक्तित्व को मोड़ने या बनाने का सच्चा विज्ञान है। यह मनोविज्ञान, शरीर-विज्ञान आदि वैज्ञानिक प्रयोगों से सिद्ध है। जो मनुष्य के आन्तरिक स्रावों में परिवर्तन कर उसकी दृष्टि को सम्यग् बना सकती हैं। यह केवल ज्ञानात्मक नहीं है अपितु विशेष रूप से प्रयोगात्मक ही है। जब तक मनुष्य प्रयोगों से नहीं जुड़ेगा तब तक उसमें आन्तरिक परिवर्तन घटित नहीं हो सकते। आज मनुष्य का ज्यादा समय तो अपने आप से लड़ने में ही बीत जाता है। जीवन-विज्ञान मनुष्य को आत्म विजेता बनाता है। महावीर ने कहा है जिसने अपने आपको जीत लिया उसने सबको जीत लिया। युद्ध में दस लाख योद्धाओं को जीतने की अपेक्षा अपने आप पर विजय प्राप्त करना ज्यादा महत्त्वपूर्ण है।
जैन विश्व भारती एवं अणुव्रत विश्व भारती उसी दिशा में प्रस्थित चरण है। अणुव्रत शिक्षक संसद एवं अणुव्रत छात्र संसद सभी इस विचार को मूर्त रूप देने का प्रयत्न है।
‡‡‡‡‡‡‡‡‡‡‡‡‡‡

आपकी प्रतिक्रिया...