दीर्घायु एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए भी अनिवार्य है अभिवादनशीलता


भारतीय संस्कृति में अतिथि को भगवान का रूप माना गया है। तैत्रीय उपनिषद् में कहा गया है ‘अतिथि देवो भव’। कथासरितसागर कार सोमदेव भट्ट के अनुसार ‘यथाशक्त्यतिथै: पूजा धर्मो हि गृहमोधिनाम्’ अर्थात् अपनी शक्ति के अनुसार अतिथि का सत्कार करना गृहस्थ का धर्म है। हमारे यहाँ हर उपयोगी तत्त्व को धर्म का रूप देकर उसे दैनिक जीवन में सम्मिलित कर लिया जाता है। क्या अतिथि सत्कार की इस परंपरा के पीछे भी कोई उपयोगी तत्त्व काम कर रहा है। अतिथि सत्कार का वर्तमान स्वरूप क्या हो सकता है तथा क्या वास्तव में हम इससे लाभांवित भी होते हैं?

जब कोई मित्र या अतिथि हमारे घर आता है तो हम न केवल उस समय उसका यथोचित सत्कार करते हैं अपितु जब वह वापस जाता है तो जाते समय भी असे सम्मान के साथ विदा करते हैं। विदा करते समय हम या तो हाथ जोड़कर नमस्कार करते हैं अथवा हाथ हिलाकर अभिवादन करते हैं। कुछ लोग किसी को विदा करते समय किसी भी प्रकार की औपचारिकता का निर्वाह नहीं करते, जो उचित प्रतीत नहीं होता। मेहमान को भी चाहिए कि जाने से पहले उचित रीति से इजाज़त ले। यदि वह जाने की इजाज़त ही नहीं लेगा, तो उसे विदाई कैसे दी जा सकती है अत: जरूरी है कि मेहमान के जाने से पहले उचित रीति से इजाज़त ले और मेज़बान ठीक तरह से उसे विदा करे।

मेहमान को विदा करते समय जिन बातों का ध्यान रखना चाहिए हमें न केवल इनकी जानकारी होनी चाहिए अपितु व्यावहारिक रूप से भी इनका पालन करना चाहिए, जहाँ तक संभव हो मेहमान को बस स्टैंड, ऑटो या रिक्शा स्टैंड अथवा उसके निजी वाहन तक छोड़ने जाएँ। मुझे याद है गाँव में जब भी हमारे घर कोई मेहमान आता था तो उसे बस स्टैंड तक छोड़ने जाते थे और जब तक बस नहीं आती थी वहीं रहते थे। मेहमान का सामान भी खुद उठाकर ले जाते थे। इस प्रक्रिया में एक किलोमीटर का सफर और घंटे-डेढ़ घंटे का समय लगना स्वाभाविक था।

आज लोगों के पास समय की बेहद कमी है। कई बार मेहमान को घर के दरवाजे पर ही विदा करना पड़ता है, ये परिस्थिति जन्य विवशता भी हो सकती है लेकिन यदि हम किसी व्यक्ति को घर के दरवाजे से ही विदा कर रहे हैं तो भी शिष्टाचार वश कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है। कुछ लोग आगंतुक के बाहर निकलते ही एकदम झटके से दरवाजा बंद कर लेते हैं, जो उचित नहीं। आगंतुक के बाहर निकलते ही फौरन दरवाजा बंद न करें अपितु तब तक दरवाजा खुला रखें जब तक मेहमान आँखो से ओझल न हो जाए या कम से कम थोड़ी दूर न चला जाए, उसके बाद बिना आवाज किए धीरे से दरवाजा बंद कर लेना चाहिए।
जैसे किसी के बाहर निकलते ही एकदम भड़ाक से दरवाजा बंद करना अच्छा नहीं लगता, उसी प्रकार यदि रात का समय है तो आगंतुक के बाहर निकलते ही मेन गेट या जीने की लाइट ऑफ करना भी एकदम गलत है। अपरिचित या अवांछित आगंतुक से भी नम्रता से पेश आना चाहिए। इसका ये अर्थ नहीं है कि हम अपनी सुरक्षा का ध्यान न रखें। अपनी सुरक्षा का भी पूरा ध्यान रखें। अपरिचित के लिए मेन गेट या लोहे का जाली वाला दरवाजा एकदम से न खोलें। पूर्ण रूप से आश्वस्त होने पर ही दरवाजा खोलें अन्यथा धीरे से पुन: बंद कर लें।

प्रत्यक्ष रूप से मिलने पर ही नहीं फोन पर बातचीत करते समय भी अभिवादन की औपचारिकता का पालन करना चाहिए। बातचीत की समाप्ति के उपरांत फोन रखते समय भी उचित रीति से अभिवादन के पश्चात ही फोन रखना चाहिए। घंटी बजने पर आराम से फोन उठाएँ तथा बातचीत की समाप्ति के उपरांत भी आराम से ही रखें। दूसरी ओर वाले व्यक्ति की बात समाप्त होने से पहले ही फोन को काटना या पटकना ठीक नहीं। घंटी बजने पर फोन उठाने से पहले निम्नलिखित बातों की ओर ध्यान दें:

1. हमेशा शांत भाव से फोन उठाएँ
2. घंटी बजने पर परेशान होने की बजाए एक खूब गहरी साँस लेकर छोड़ दें, इससे तनावमुक्त होने में मदद मिलेगी
3. फोन उठाने से पहले मुस्कराने का प्रयास करें इससे भी तनावमुक्ति में मदद मिलेगी
4. फोन उठाने पर उचित रीति से सामने वाले का अभिवादन करें तथा सामने वाले के अभिवादन का ठीक से उत्तर दें
5.जिस व्यक्ति का फोन आया है, उसकी बातें धैर्य से सुनें और बार-बार बीच में न काटें
6. धैर्य से पूरी बात सुनने के बाद ही उसका उत्तर दें या अपनी बात कहें
7. किसी को फोन पर ज्यादा देर इंतजार कराना या बातचीत को बेवजह लंबा खीचना भी ठीक नहीं
8. यदि समय की कमी है तो सामने वाले से क्षमायाचना करते हुए बाद में फोन करने के लिए कहें या कहें कि मैं बाद में फोन करता हूं
9. बात पूरी होने पर उचित रीति से ही उसका समापन भी करें। फोन रखने से पहले औपचारिक रूप से इजाजत ले अथवा अभिवादन करें।

शिष्टाचार एवं अनुशासित जीवन का हमारे स्वास्थ्य से भी गहरा संबंध है। इन नियमों का पालन करने से न केवल हमारे संबंध अधिक मधुर एवं अर्थ पूर्ण होंगे अपितु हम तनाव से भी मुक्त रहेेंगे, जिसका हमारे स्वास्थ्य पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

कहा भी गया है- अभिवादनशीलस्य नित्यंवल्दीपसेविन:।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्यायशोबलम्॥

अर्थात् नित्य वृद्धों की सेवा करने वालों तथा उनका अभिवादन करने वालों की आयु, विद्या, यश और बल ये चार चीजें सदैव बढ़ती हैं और जिस व्यक्ति में इन चार चीजों की वृद्धि होगी, उसके स्वस्थ रहने में कोई संदेह नहीं। पुराणों में महर्षि मार्कण्डेय की एक कथा मिलती है कि कैसे अभिवादनशीलता के बल पर वे चिरंजीवी हो गए। महर्षि मार्कण्डेय मृकण्डु के पुत्र थे। महर्षि मार्कण्डेय जब मात्र पाँच वर्ष के थे तभी उनके पिता मृकण्डू को पता चला कि मेरे पुत्र की आयु तो केवल छह महीने की ही बची है तो उन्हें बड़ी निराशा और चिंता हुई। पिता मृकण्डु ने अपने पुत्र का यज्ञोपवीत संस्कार करवाया और उसे उपदेश दिया :

यं कश्चिद् वीक्षसे पुत्रा भ्रममाणं द्विजोत्तमम्।
तस्यावश्यं त्वया कार्यं विनयादभिवादनम्॥

पुत्रा! तुम जब भी किसी द्विजोत्तम को देखो तो विनय पूर्वक उसका अभिवादन अवश्य करना, उसे प्रणाम करना।
मृकण्डु का पुत्र अत्यंत आज्ञाकारी बालक था अत: उसने पिता द्वारा प्रदत्त व्रत को दृढ़तापूर्वक धरण किया। अभिवादन उसके जीवन का अभिन्न अंग बन गया, जो भी बालक के समक्ष आता बालक उसे आदर पूर्वक प्रणाम करना न भूलता। अभिवादनशीलता उसका संस्कार बन गया। एक बार सप्तर्षि भी उस मार्ग से जा रहे थे। बालक मार्कण्डेय ने संस्कार वश अत्यंत आदरपूर्वक उन्हें प्रणाम किया। सप्तर्षियों ने बालक को दीर्घायु होने का आर्शीवाद दिया। सप्तर्षियों के आशीर्वाद से अल्पायु बालक मार्कण्डेय को कल्प-कल्पांत की आयु प्राप्त हो गई। अपनी अभिवादनशीलता के गुण के कारण वे चिरंजीवी हो गए।

दीर्घायु और स्वस्थ बने रहने के लिए अभिवादनशीलता व शिष्टाचार का पालन करना किसी तरह भी मँहगा सौदा नहीं। अतिथि ही नहीं परिचित-अपरिचित हर व्यक्ति का आदर-सत्कार करना हमारे अपने हित में है। ये पूर्णत: हमारे अपने हाथ में है कि हम अशिष्ट बने रहकर विभिन्न व्याधियों को आमंत्रित कर अस्वस्थ बने रहें तथा अल्पायु हों अथवा अभिवादनशीलता व शिष्टाचार का पालन कर स्वस्थ और दीर्घजीवी बनें।

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