दुराचार का गढ़ बना सूबा राजस्थान…

कुछ हकीकतें दिल को हैरान कर देती हैं। जैसे कोई कहे कि देश का सर्वाधिक साक्षर प्रदेश केरल और महिला अस्मिता की हजारों कहानियों को जीता राजस्थान, औरत की अस्मतरेजी यानी बलात्कार में पूरे मुल्क में अव्वल हैं तो शायद आसानी से विश्वास नहीं होगा। लेकिन एनसीआरबी द्वारा वर्ष 2019 के जारी किए गए आंकड़े इस बात की तस्दीक करते हैं कि दोनों सूबों में औरत की अस्मत की निगेबानी करने में वहां की हुकूमतें असफल रही हैं। महिला संबंधी जघन्य अपराधों का गढ़ बने आत्म मुग्ध वाम शासन से शासित केरल हो या कांग्रेस शासित राजस्थान दोनों, स्त्री को देवी मानने वाले देश के लिए शर्म का कारण बन गए हैं।

विदित हो कि, किसी भी समाज में महिला सुरक्षा की हालत, वहां कानून-व्यवस्था की “हैसियत” का बुनियादी मापक होती है। उत्तम शासन व्यवस्था के दर्पण में ही सुरक्षित स्त्री का अक्स उभरता है। उस लिहाज से देखें तो भारत में सबसे अधिक जनसंख्या वाले राज्य उत्तर प्रदेश की स्थिति देश के 25 केंद्रशासित प्रदेशों और राज्यों से कहीं बेहतर है। काफी हद तक इसका श्रेय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की “जीरो टालरेंस” नीति को जाता है।

एनसीआरबी द्वारा जारी ‘भारत में अपराध -2019’ रिपोर्ट बताती है कि चंडीगढ़ में प्रति एक लाख महिला आबादी पर बलात्कार की दर 20.7 है तो राजस्थान और केरल में क्रमशः 15.9 और 11.1 की दर से महिलाओं के साथ दुष्कर्म जैसा जघन्य कुकृत्य हुआ है। इस राष्ट्रीय आकलन रिपोर्ट के अनुसार प्रति एक लाख महिला आबादी पर बलात्कार के अपराधों में उत्तर प्रदेश की अपराध दर 2.8 प्रतिशत है, जो देश के 25 अन्य राज्यों एवं केन्द्रशासित प्रदेशों की अपराध दर से कहीं बेहतर है। यही नहीं, सिर्फ महिला संबंधी अपराधों की दृष्टि से ही नहीं उत्तर प्रदेश राज्य की स्थिति समग्र अपराध नियन्त्रण में भी अच्छी है।

अपराध दर की कहानी, आंकड़ों की जुबानी

उत्तर प्रदेश में हाथरस की घटना के बाद राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने बाकायदा ट्वीट कर यूपी में कानून-व्यवस्था की बदहाल स्थिति होने की घोषणा कर दी। लेकिन हैरत होती है कि सप्ताह भर के अंदर अलवर के तिजारा, सीकर, आमेर, सिरोही, अजमेर और बारां में दुष्कर्म व गैंगरेप की घिनौनी वादरातें हुईं, लेकिन मुख्यमंत्री एवं गृहमंत्री गहलोत की जुबान-ए-खंजर पूरी तरह खामोश रही? न जाने क्यों, उत्तर प्रदेश में महिला सुरक्षा के लिए चिंतित तथा व्यथित दिखाई पड़ रहे राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के संवेदनशील मन ने राजस्थान की पीड़िताओं के लिए कोई सहानुभूति नहीं दिखाई। ना ही राजस्थान सरकार को कोई सख्त नसीहत ही दी। अब इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि धौलपुर जिले के बसेड़ी थाना क्षेत्र के एक गांव में नाबालिग बालिका के साथ अवैध पिस्टल की नोक पर हुई हैवानियत भी इन “डिजाइनर” रहनुमाओं को हस्तक्षेप के लिए उद्वेलित नहीं कर पाई। आखिर में नाबालिग ने दुष्कर्म के बाद लोकलाज के डर से आत्महत्या कर ली। यह महज ‘एक सप्ताह’ के राजस्थान की तल्ख हकीकत है। सोचिए, पूरा साल के राजस्थान में “कानून” की आबरू कितनी बार तार-तार हुई होगी।

आलम यह है कि सरकार-ए-सरजमीन राजधानी जयपुर तक अपराधों से कराह रही है। जयपुर पुलिस कमिश्नरेट द्वारा साल 2019 में हुए अपराधों का आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2018 की तुलना में वर्ष 2019 में 46 फीसदी अपराध बढ़े हैं। महिला संबंधी अपराधों में भी 66 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। वर्ष 2019 में राजस्थान में महिलाओं के साथ हुए अपराधों में 46 फीसदी का इजाफा हुआ है।

जबकि उसी जगह उत्तर प्रदेश के गृह विभाग द्वारा जारी किए गए विगत आठ वर्षों के तुलनात्मक आंकड़े अपराधों की दर को उत्तरोत्तर कम होने की तस्दीक कर रहे हैं। दीगर है कि, 01 जनवरी से 31 जुलाई यानि 07 माह के आकड़ों के तुलनात्मक दर्पण पर उभरती छवि के अनुसार डकैती के मामलों में वर्ष 2016 के सापेक्ष वर्ष 2020 में 74.50 प्रतिशत तथा 2012 के सापेक्ष वर्ष 2020 में 74.67 फीसदी की गिरावट दर्ज हुई है।

यही नहीं लूट के मामलों में भी यूपी में साल 2016 के सापेक्ष वर्ष 2020 में 65.29 प्रतिशत तथा साल 2012 के सापेक्ष वर्ष 2020 में 54.25 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई। ऐसे ही हत्या के मामलों में उत्तर प्रदेश में वर्ष 2016 के मुकाबले साल 2020 में 26.43 प्रतिशत तथा साल 2012 के सापेक्ष वर्ष 2020 में 29.74 प्रतिशत की कमी दर्ज हुई है।

बलात्कार के प्रकरण में उ.प्र. वर्ष 2013 के मुकाबले साल 2020 में 25.94 प्रतिशत, वर्ष 2016 के सापेक्ष वर्ष 2020 में 38.74 फीसदी की कमी आयी है।

फिरौती के लिए अपराध के मामलों में भी साल 2016 के सापेक्ष वर्ष 2020 में 54.55 प्रतिशत तथा वर्ष 2012 के मुकाबले साल 2020 में 64.29 फीसदी कमी दर्ज हुई।

यूपी में रोड होल्ड अप के मामलों यह गिरावट 100 प्रतिशत रही। वर्तमान सरकार के कार्यकाल में वर्ष 2017 से लेकर वर्ष 2020 तक रोड होल्ड अप की एक भी वारदात नहीं हुई है।

अब यदि राष्ट्रीय फलक पर देखें तो प्रति एक लाख आबादी पर दलित महिलाओं के साथ गंभीर अपराध के मामलों की दर में 4.6 प्रतिशत के साथ केरल सबसे आगे है। उसके बाद दूसरे पायदान पर 4.5 प्रतिशत के साथ राजस्थान है।

यही नहीं प्रति एक लाख आबादी के हिसाब से गंभीर अपराधों के मामलों की दर में भी राजस्थान सबसे आगे है, यहां पर इसका 15.9 प्रतिशत निकलता है। उसके बाद केरल (11.1) का (10.9) नंबर आता है।

ज्ञातव्य है कि प्रति लाख दलित आबादी पर सबसे अधिक अपराधों में राजस्थान शीर्ष पर है। यहां प्रति लाख दलित आबादी पर 56 अपराध
हुए हैं। किन्तु दलित अपराधों में सजा दिलाने में उत्तर प्रदेश शीर्ष स्थान पर है। एनसीआरबी-2019 की रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश 66.1 प्रतिशत और मध्य प्रदेश 51.1 फीसदी के साथ दलितों पर अत्याचार के मामले में सजा दिलाने में अव्वल हैं।

संक्षेप में कहा जाए तो राष्ट्रीय अपराध नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों की श्रृंखला देश में अपराध की स्थिति को पारदर्शी तरीके से बयान कर रही है किन्तु “वल्चर-कल्चर” वाली सियासी जमातों और कुछ मारीच मीडिया पहरुओं को राजस्थान का आर्तनाद और केरल की कराह, सुख और खुशी की सरगम प्रतीत हो रही है। यह “सलेक्टिव विरोध” हिंदुस्तान की जम्हूरियत के लिए बेहद खतरनाक है। बस एक ही सवाल मन में गूंज रहा है कि

दुराचार का गढ़ बना सूबा राजस्थान
फिर भी ख़ामोश हैं मारीच सियासतदान

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