सिंह बन्दर

सिंह बन्दर को अंग्रेजी में ‘लायनटेल्ड मकाक मकाका साइलेनस’ (थ्ग्दहूग्त् श्म श्म्म् एग्तहल्े) कहा जाता है। हिन्दी में सिंह बन्दर या शेर बन्दर कहते हैं।

‘मृगपक्षीशास्त्र’ में इसका निम्नलिखित प्रकार से वर्णन किया गया है-
‘‘वनौकसो मर्कटास्तु वनवासैक लोलुपा:॥
स्थलांतराणि नीतास्ते भीता: प्राणविवर्जिता:॥
नितरां तुंगकायाश्च कृष्णा: स्थूला: प्रकीर्तिता:॥
भृशकर्कश दीर्घागं रुह संवृतकायका:॥
स्थूलोदरा दृढपदा भीषणाकृतयश्च ते॥
दंष्ट्राकरालवदना: कृष्णवक्राश्च ते मता:॥
प्राणिहिंसनलोलाश्च नानासत्वविनाशिन:॥
गूढात्मानश्च नितरां निंद्यकार्याश्च ते मता:॥
भल्लक सद्दशांगाश्च सांत्ववाक्यादिदूरगा:॥
दुर्घर्षा दुरहंकाराश्चालख्या वनवासिभि:॥
प्रचंड बलसंपन्ना ज्वलन्नेत्राश्च ते मता:॥
केचित्स्वस्थलशूराश्च केचित्क्रांत परस्थला:॥
केचित्तु नितरां भिता रोगसंपीडिता: परे॥
गुणजातिक्रियाभेदान्नाना देशनिवासिन:॥
एवं बहुविधा लोके मर्कटा: संभवंति हि॥
केचितु क्षुद्र वालास्ते केचित्पुच्छविहीनका:॥
मर्कटयो वानरसमगुण कार्यादि शीलका:॥
श्लक्ष्णरोमांगका: कामं स्वल्पसौंदर्यमंडिता:॥
स्वल्पकोपा: स्वल्पमदा: पूर्णकामजवान्विता:॥
डिंभवात्सल्यवत्यश्च तल्लीलादर्शनोत्मुका:॥
एवमदि क्रियाभेदात्त त्तज्जातिषु ता मता:॥
सप्रमावधि तेषां तु यौवनं परिकीर्तितम्।
अत: परं ते जरया पीडितांगा विनिश्चिता:॥’’

अर्थात यह जंगली बन्दर केवल वनों में ही रहता है। अन्यत्र ले जाने पर भय से मर जाता है। आकार में ऊँचा, मजबूत और रंग में काला होता है। अत्यन्त घने एवं बड़े बाल होते हैं। पेट बड़ा और पैर लंबा होने के कारण देखने में भीषण दिखायी पड़ता है। दांत विकराल होते हैं। मुंह काला होता है। स्वतभावत: हिंसक होता है और अनेक प्राणियों का संहार करता है।

अश्व की तरह दूर से दिखायी देता है। पकड़ना बहुत कठिन होता है। दुराभिमानी स्वभाव वाला होता है। शिकारी तथा जाल द्वारा फंसाकर पकड़ने वालों की पकड़ में जल्दी नहीं आता। अत्यन्त बलवान होता है और आंखें चमकीली होती हैं।

कुछ शरीर से मोटे होते हैं। कुछ सिंह बन्दर अपना निवास बदलते रहते हैं। गुण, जाति एवं कार्य की दृष्टि से अनेक देशों में अलग-अलग प्रकार का पाया जाता है। इस दृष्टि से सिंह बन्दर कई प्रकार के होते हैं। कुछ की पूंछ बड़ी, तो कुछ सिंह बन्दरों की पूंछ छोटी होती है। कुछ पुच्छहीन होते हैं।

सिंह बन्दर अन्य बन्दरों की ही तरह होते हैं, किन्तु उनके बाल सधन चमकीले और बड़े होने के कारण ये सुन्दर दिखाई देते हैं। इनमें क्रोध एवं प्रसन्नता दोनों कम ही दिखाई देती है। जोड़े बनाने में माहिर होते हैं। सिंह बन्दर अपने बच्चों से खूब प्रेम करते हैं। उन्हें उछल-कूद करते हुए देखकर सिंह बन्दर प्रसन्न होते हैं।

सातवें वर्ष में सिंह बन्दर तरुण हो जाते हैं। उसके उपरान्त मृत्यु तक वृद्धावस्था पीड़ादायक होती है। सामान्यतया सिंह बन्दर की आयु दस वर्ष होती है।

बड़े सिर और फूले हुए गाल, उस पर चमकीले बाल होने के कारण सिंह बन्दर अन्य प्राणियों से अलग ही दिखायी देता है। इसके पूंछ का आखिरी छोर शेर की पूंछ की तरह होता है, इसलिए इसे सिंह पुच्छ बन्दर भी कहा जाता है। नर की अपेक्षा मादा कुछ छोटी होती है। इनके शरीर की औसत लम्बाई 46 से 60 सेमी. और वजन 6 से 8 किग्रा. होता है।

सदा हरे-भरे अथवा अर्ध सदाहरित घने, दुर्गम जंगलों के भीतर सिंह बन्दर रहते हैं। घने जंगल की शान्ति इन्हें पसन्द होती है। आस-पास के अंधकार से मेल खाते इनके रंग के कारण ये बहुत मुश्किल से दिखायी पड़ते हैं। वृक्षों के हरे-भरे पत्तों में इनका आहार-विहार चलता रहता है। वृक्षों से प्राप्त होने वाले फल-फूल तथा कोमल पत्तों से सिंह बन्दर अपनी उदरपूर्ति करते हैं। सितम्बर महीने में ये बन्दर दिखायी देते हैं।

एक समय भारत के दक्षिणी जंगलों, पश्चिमी घाट में ये पाये जाते थे। इस समय नीलगिरी, अन्नामलाई और अन्य पहाड़ियों पर और पेरियार सरोवर के आस-पास के घने वनों में सिंह बन्दर दिखाई देते हैं। सिंह बन्दरों के निवास वाले घने वनों को नष्ट किया जा रहा है। इसी तरह अंधविश्वास के कारण इनका शिकार भी किया जा रहा है। इससे इनकी संख्या कम होती जा रही है। इस समय सिंह बन्दर की गणना विलुप्त प्राणी की श्रेणी में की जाने लगी है। यह बन्दर जाति अब अपना अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष कर रही है।
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