कंचन चन्द्र स्त्री-विमर्श की चित्रकार हैं

राजधानी की बहुचर्चित चित्रकार कंचन चन्द्र का कहना है कि ‘कला सामाजिक स्थितियों से उत्पन्न होती है। कला का सर्जक और उसकी कृति-दोनों समाज की शक्तियों से बंधे होते हैं, जो कि कला का स्वरूप गढ़ने के लिए उत्तरदायी होती है। मुझ पर भी यही नियम लागू होता है।’ वे अपने विशिष्ट डेकोरेटिव काम के लिए जानी जाती हैं। ‘टोरसो’ यानी कबंध या धड़ पेंट करके अक्सर उन्होंने चित्र-शृंखला प्रदर्शित की है जो अलग से ही पहचानी जाती रही है। पिछली बार वे ‘टोरसो’ के अलावा ‘देवी’ शीर्षक चित्र भी प्रदर्शित कर चुकी हैं। यह चित्र-शृंखला दुर्गा-काली-पार्वती के बहाने स्त्री-विमर्श को भी सामने लाती है और इसके जरिये वे एक एक्टिविस्ट के रूप में भी प्रतिष्ठित हो चुकी हैं।

कंचन चन्द्र (जन्म 1957) ने नई दिल्ली के आर्ट कॉलेज से शिक्षा लेने के बाद बर्लिन, पेरिस और चिली में प्रशिक्षण लिया। पिछले दिनों वे ऑस्ट्रेलिया में आर्टिस्ट-इन-रेजिडेंस रहीं और वहां की चित्रकार हेलेन जियोर के साथ काम किया। उन्होंने एक चित्र-शृंखला ‘वात्सल्य’ नाम से भी बनायी थी, जिसमें माँ और बच्चे के रिश्तों को बखूबी पेश किया गया था। बच्चा अपनी माँ पर निर्भर रहता है, उसी तरह माँ भी अपने बच्चे से जुड़ी रहती है। इसी तरह ‘फेबिल्स रिटोल्ड’ भी ऐसी ही चित्र-शृंखला है, जो माँ और बच्चे के संबंधोंं पर है। यह चित्र शृंखला काफी सराही गयी है। इसमें बच्चों की देशी-विदेशी बहुप्रचलित कहानियों का आधार लेकर चित्र बनाये गये थे। उनके चित्रों को सुर्रियलिस्टिक शैली में माना जाता है और प्रायः सभी चित्रों में देशज एलिमेंट्स होते हैं और वे भारत की लोक-कला से भी प्रेरणा लेती रही हैं। जाहिर है कि इसी वजह से उनके चित्र खूब चटख रंगों वाले होते हैं।

इधर उन्होंने एक नई चित्र-शृंखला पर काम किया है जो सिनेमा की नगरी मुंबई की प्रसिद्ध तारिकाओं और हॉलीवुड की कुछ बहुप्रसिद्ध नायिकाओं के पोट्रेट पर आधारित है। इस चित्रों में हीरोइनों के ब्लैक एंड व्हाइट फोटो को हार्डबोर्ड पर चिपका कर उन पर लोक-कला से प्रेरित बेलबूटों से चित्रकारी की गई है। तितलियां, फूल तथा कुछ जानवर, जैसे खूबसूरत बिल्ली भी इन चित्रों की सजावट में शामिल हैं। कुछ पेंटिंग्स में हीरे और सेमीप्रेशस नग भी जड़े गये हैं। सोने और चांदी के वर्क का इस्तेमाल भी किया गया है। इस प्रकार ये चित्र बहुत कीमती हो गये हैं। इन चित्रों को पूर्व और पश्चिम के मिलन के रूप में भी देखा जा सकता है, क्योंकि यह चित्र-शृंखला बॉलीवुड-हॉलीवुड के शीर्षक से पेश की गई है, इनमें वहीदा रहमान, मीना कुमारी के अलावा हॉलीवुड की हीरोइने भी हैं, जैसे मर्लिन मुनरो या सलमा हायक। एक चित्र माधुरी दीक्षित का है जिसमें आधा चेहरा माधुरी का और आधा फ्रिडा का है। फ्रिडा केहलो अमेरिका की सबसे प्रसिद्ध सेल्फ-पोट्रेट चित्रकार रही हैं, उनका जन्म 6 जुलाई 1907 में हुआ था और निधन 13 जुलाई 1954 में। आत्मचित्र की चित्रकार के रूप में उनकी प्रसिद्धि इतनी थी कि उनके जीवन पर 2002 में फिल्म भी बनी है, जिसे विश्व विख्यात छह ऑस्कर पुरस्कार भी मिले थे। फ्रिडा केहलो की भूमिका हॉलीवुड की विख्यात अभिनेत्री सलमा हायक ने अदा की थी।

कंचन चन्द्र के चित्रों की इस सीरीज में चित्रकार कंचन चन्द्र स्वयं भी उपस्थित हैं। वे बताती हैं कि फ्रिडा उनकी प्रिय चित्रकार रही हैं। कंचन चन्द्र कहती हैं कि वे फ्रिडा और अमृता शेरगिल से बहुत प्रभावित रही हैं, इतना ही नहीं, उनका यह भी कहना है कि उनका अपना जीवन भी इन चित्रकारों के जीवन की ही तरह तमाम उतार-चढ़ावों से भरा रहा है। फ्रिडा (पूरा नाम: मैडेलना कारमेन फ्रिडा केहलो) को कम उम्र में ही पोलियो हुआ था, फिर एक एक्सीडेंट हुआ था और उसके प्रिय साथी की मौत भी हुई थी। इस तरह उसका जीवन शारीरिक पीड़ा सहते हुए बीता। जबकि कंचन चन्द्र ने खुद काफी मर्मांतक मानसिक पीड़ा सही है।
भारतीय आधुनिक कला में आत्मचित्रों की परंपरा बहुचर्चित चित्रकार अमृता शेरगिल से आरंभ हुई थी। समकालीन चित्रकारों में अंजू डोढिया और कभी-कभी काहिनी आर्ते मर्चेंट अपने कैनवस में स्वयं अपनी आकृति पेंट करना नहीं भूलतीं। बल्कि उनकी पेटिंग्स में तो वे उसका हिस्सा ही होती हैं। एक और युवा चित्रकार हैं-हेमा उपाध्याय, जो अपनी पेंटिंग में अपने फोटो का इस्तेमाल करती हैं। इसी तरह पुष्पमाला भी अपने फोटो के विभिन्न कम्बीनेशंस से चित्र बनाती हैं। कुछ पुरुष चित्रकार भी इस नार्सिस मनोवृत्ति से अछूते नहीं रह पाये हैं।

‘फ्रिडा और मैं’ चित्र-शृंखला में प्रत्येक चित्र में अपनी प्रिय चित्रकार फ्रिडा केहलो के साथ वे खुद भी उपस्थित हैं। ज्यादातर चित्रों में उनकी अपनी आकृति अनुपात में काफी छोटी है। इन चित्रों में भी सोने-चांदी के वर्क, मनके, पंख, फूल-पत्तियां और अलंकरण के सभी तत्व मौजूद होने के अलावा मूल्यवान हीरे भी हैं।

इन चित्रों के अति-अलंकरण के बारे में चित्रकार का कहना है कि मैक्सिको की पारंपरिक संस्कृति हमारी भारतीय संस्कृति के समान ही है। वहां की लोक-कला में भारतीय लोक-कला से अनोखी समानता है। मैक्सिकन पैटर्न देखिये तो उनमें बहुत गाढ़े और चटख रंग इस्तेमाल होते हैं। इनसे प्रभावित होकर कई भारतीय फैशन डिजाइनर अपनी विशिष्ट पोशाकों में मैक्सिको की लोक-कला के मोटिफ और वैसे ही चमकीले रंगों का इस्तेमाल करते हैं और वाहवाही लूटते हैं। उनके नये चित्र पिछले दिनों मुंबई में प्रदर्शित हुये थे, जिन्हें काफी पसंद किया गया। उनकी पेंटिंग्स का नया शो जल्द ही बर्लिन (जर्मनी) में होने वाला है और प्रतिष्ठित इंडिया आर्ट के मेले में भी वे भागीदारी कर रही हैं।
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