भारतीय संस्कृति में वेशभूषा का महत्व

भारत संभवत: दुनिया के उन शुरुआती गिने-चुने देशों में से है, जहां कपास का उपयोग सबसे पहले किया गया था। कपास का नाम भी भारत से ही विश्व की अन्य भाषाओं में प्रचलित हुआ, जैसे- संस्कृत में ‘कर्पस’, हिन्दी में कपास’, हिब्रू में ‘कापस’, यूनानी तथा लैटिन भाषा में ‘कार्पोसस’ आदि। अत: यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि हर तरह के परिधानों का आविष्कार भारत में ही हुआ है।

किसी भी इंसान द्वारा उपयोग किये जानेवाले वस्त्रों एवं परिधानों की प्रकृति का निर्धारण किसी भी देश तथा उसके अंचलों के भौगोलिक, ऐतिहासिक, धार्मिक व सांस्कृतिक परिस्थिति के आधार पर किया जाता है, जो कि धीरे-धीरे उस क्षेत्र या स्थान विशेष के फैशन ट्रेंड के रूप में जाना जाने लगता है। लोग किसी ट्रेंड को तभी फॉलो करते हैं, जब वो उसे अपने क्षेत्र की संस्कृति के अनुरूप पाते हैं। इस लिहाज से अगर हम भारत की बात करें, तो न सिर्फ भारत की जलवायु बल्कि लोगों के जीवनयापन के तरीकों में भी काफी विविधता देखने को मिलती है। इसकी वजह से यहां के लोगों द्वारा पहने जानेवाले वस्त्रों की प्रकृति में विविधता देखने को मिलती है।

भारतीय संस्कृति में सदियों से वेशभूषा का अपना एक विशिष्ट महत्व रहा है, जो कि भारतीय समाज की विचारधारा को दर्शाता है। हम अगर भारतीय इतिहास पर नजर डालें, तो पायेंगे कि समय-समय पर परिस्थितिनुसार इसमें कई तरह के बदलाव भी हुए हैं । विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक घटकों ने समय-समय पर भारतीयों की वेशभूषा और रहन-सहन को प्रभावित किया है और यह प्रभाव लंबे समय तक रहा है। बावजूद इसके संपूर्ण विश्व पटल पर भारतीय वेशभूषा अपना अग्रणी स्थान बनाये हुए हैं ।

विभिन्न कालखंडों में वस्त्रों एवं परिधानों का विकास

भारत में आदि काल से ही श्रेष्ठ वस्त्र-निर्माण कला का विकास हो चुका था। ऋग्वेद में उल्लेख आता है कि ’माताएं पुत्र के लिए वस्त्र बुनती है’। मानव सभ्यता को कपास की खेती तथा उनसे निर्मित सूती वस्त्र भी भारत की ही देन है।

सिंधु घाटी सभ्यता काल (2600 से 1400 ईसा पूर्व)

भारतीय वेशभूषा का सर्वप्रथम परिचय हमें सिंधु घाटी से मिले हड़प्पा और मोहनजोदड़ो सभ्यता के प्रागैतिहासिक साक्ष्यों से प्राप्त होता है। हालांकि सिंधु घाटी सभ्यता में उपयोग किये जानेवाले वस्त्रों के प्रमाण संरक्षित वस्त्रों के रूप में उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन पांच हजार वर्ष पूर्व हड़प्पा के अवशेषों में चांदी के गमले में कपास, करघना तथा सूत कातना और बुनती आदि इस बात का स्पष्ट प्रमाण हैं कि उस काल के लोग वस्त्र निर्माण की कला से पूरी तरह परिचित थे। सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेषों के अलावा चट्टानों की कटाई की मूर्तियां, गुफा चित्रों, मंदिरों और स्मारकों में पाए जाने वाले मानव कला के रूपों से प्राप्त मूर्तियों में भी प्राचीन भारतीय कपड़ों के अवशेष प्राप्त हुए हैं।

हड़प्पा सभ्यता के निवासी वस्त्र निर्माण के लिए कपास का उपयोग करते थे। कई अन्य देशों में इन वस्त्रों का बहुतायात में निर्यात भी किया जाता था। भारत संभवत: दुनिया के उन शुरुआती गिने-चुने देशों में से है, जहां कपास का उपयोग सबसे पहले किया गया था। कपास का नाम भी भारत से ही विश्व की अन्य भाषाओं में प्रचलित हुआ, जैसे- संस्कृत में ‘कर्पस’, हिन्दी में कपास’, हिब्रू में ‘कापस’, यूनानी तथा लैटिन भाषा में ‘कार्पोसस’ आदि। अत: यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि हर तरह के परिधानों का आविष्कार भारत में ही हुआ और आज के आधुनिक परिधान प्राचीन भारतीय परिधानों का ही विकसित रूप हैं।

हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की खुदाई में प्राप्त मूर्तियों को देख कर इस कालखंड में प्रचलित वस्त्रों का अनुमान लगाया जा सकता है। एक मनुष्य की मूर्ति प्राप्त हुई है, जो एक लंबी चादर पहने हुए है, जो कि संभवत: बैठने पर पैरों पर पहुंच जाती थी। इस चादर से उसकी छाती ढंकी है और उसका एक सिरा बाएं कंधे पर डाल दिया गया है, जबकि बायां हाथ खाली है। हालांकि चादर पहनने या ओढ़ने का यह ढंग अनियमित था, क्योंकि विभिन्न मूर्तियों में इसकी शैली में भिन्नता देखने को मिलती है। कुछ समुदायों में पगड़ी पहनने का प्रचलन भी था, क्योंकि कुछ पुरुष मूर्तियां ऐसी वेशभूषा में भी मिली हैं।

हड़प्पा और मोहनजोदड़ो से अभी तक जो सामग्री मिली है, उनके आधार पर यह कहना मुश्किल है कि उस काल में लोग सिले हुए वस्रों से परिचित थे या नहीं। अब तक केवल एक ऐसी मूर्ति मिली है, जो कमीज जैसा वस्त्र पहने है, जिसके चारों ओर कमर पर एक डोरी बंधी हुई है। हड़प्पा और मोहनजोदड़ो में प्राप्त मिट्टी की स्त्रैण मूर्तियों के धड अधिकतर निर्वस्त्र दिखते हैं।

महिलाएं सामान्यत: घुटने तक लंबी संकरी स्कर्टनुमा पोशाक पहनती थीं, जिसे कमर से बांधने के लिए मेखला पहनने का चलन था। यह मेखला लड़ी, मनकों, सादे कपड़े, बुने कपड़े के फूदने आदि से बनी होती थी। मिट्टी की एक स्त्री मूर्ति घोघी पहने दिखती है, जिसके पीछे स्त्री के हाथ छिपे हैं और वह लंगोटी सा स्कर्टनुमा आवरण निचले छोर तक नहीं पहुंचता। स्त्री-पुरुष दोनों ही पंखे के आकार का एक शिरोवस्त्र पहनते थे।

सिंधु घाटी सभ्यता में सूत कातने और उन्हें रंगने के प्रमाण भी मिलते हैं। सूती वस्त्र उद्योग पर्याप्त विकसित थी। उस समय प्रयुक्त हो रहे कुछ तरीके आज भी चलन में हैं। उस समय तक पांच तरह के मूल रंगों की पहचान कर ली गई थी, जिन्हें शुद्ध वर्ण कहा जाता था। इंडिगो और सैफ्लावर सामान्य रूप से प्रचलित रंग थे। इन्हें विभिन्न मात्राओं में मिला कर नए रंग बनाए जाते थे, जिन्हें मिश्रित वर्ण कहते थे। आम तौर पर कपड़ों के लिए कपास, सन, रेशम, ऊन, लिनन, चमड़े आदि का इस्तेमाल होता है। अवशेषों में शामिल लाल रंग की मधुशाला से रंगा हुआ रंगीन कपड़े का एक टुकड़ा यह दर्शाता है कि हड़प्पा सभ्यता के लोग अपने सूती कपड़े रंगों से रंगा करते थे।

वैदिक काल (1500 और 500 ईसा पूर्व)

वैदिक साहित्य में भी सूत कातने तथा अन्य प्रकार के साधनों के प्रयोग के उल्लेख मिलते हैं। ऋग्वेद काल में उन्नत श्रेणी के वस्त्रों का निर्माण होने लगा था, जो प्रायः स्त्रियों द्वारा बुने जाते थे। ऋग्वेद में उल्लेख आता है कि ’माताएँ पुत्र के लिए वस्त्र बुनती है’। इस प्रकार भारत में आदि काल से ही श्रेष्ठ वस्त्र-निर्माण कला का विकास हो चुका था।

ऋग्वेद में अनेक प्रकार के वस्त्रों का उल्लेख मिलता है। वस्त्र निर्माण के साथ-साथ लोग उसे बुनना और अन्य धातुओं के तारों से (यथा सोने के तार) सजाना भी जानते हैं । ऋग्वेद में एक शब्द प्रयुक्त हुआ है- ‘पेशस‘, जिसका अर्थ है नर्तकियों द्वारा पहना जानेवाला जरी का काम किया हुआ वस्त्र। इससे यह विदित होता है कि ऋग्वेद काल में ऋषि न केवल साधारण कपड़े की बुनाई से परिचित थे, बल्कि जरी युक्त कपड़ों को बुनने की उनकी कला भी में निष्णात थे।

ऋषि ऊन को उत्तर से प्राप्त करता था। ऊन के लच्छों को ’परुष’ कहते थे एवं नदी के किनारे भेड़ें बहुत पाली जाती थीं, इसलिए उस नदी का नाम परूष्णी पड़ गया। ऋग्वेद में एक स्थान पर यह उल्लेख है कि मरुत परुष्णी के ऊपर से आ रहे है और ऊनी वस्त्र पहने हुए हैं। इसी सूक्त में मरुतों के लिए ’पारावता’ विशेषण प्रयुक्त हुआ है जिसका अर्थ होता है दूर देश से आने वाला। इससे यह स्पष्ट होता है कि उस वक्त अन्य देशों के साथ भी भारत का व्यापार संबंध था।

महिलाओं और पुरूषों के शरीर का ऊपरी भाग निर्वस्त्र रहता था। सिले हुए कपड़े पहनने का प्रचलन नहीं था, क्योंकि सिलाई को अपवित्र समझा जाता था । सबसे पहले कपड़े को जांघिया के रूप में पहना गया, जिससे पुरूष अपने निजी अंगों को ढंकते थे। ‘कुर्ला’ और ‘अन्प्रतिधि’ नामक अंगवस्त्रों का उल्लेख ऋगवेद में मिलता है।

अथर्व वेद में, वस्त्रों के आंतरिक आवरण, बाहरी आवरण और छाती-आवरण के रूप में बने होने उल्लेख मिलता है।  शरीर के अन्य भागों को ढंकने के लिए निवी, वार्वरी, उपवासान, कुम्बा, उंल्सा, और टर्टल का उल्लेख अथर्ववेद में शामिल है, जो कि अंडरवियर, ऊपरी वस्त्र, घूंघट और आखिरी तीन कुछ प्रकार के सिर-पोशाक को दर्शाते हैं।

सबसे पहले यजुर्वेद में ’साड़ी’ शब्द का उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद की संहिता के अनुसार यज्ञ या हवन के समय पत्नी के साड़ी पहनने का विधान है और विधान के क्रम से ही साड़ी जीवन का एक अभिन्न हिस्सा बनती चली गई। पौराणिक ग्रंथ महाभारत में द्रौपदी के चीरहरण के प्रसंग से सिद्ध होता है कि साड़ी लगभग 3500 ईसा पूर्व से ही प्रचलन में है। हिन्दू धर्म, जैन धर्म तथा बौद्ध धर्म का स्पष्ट प्रभाव इसमें देखा जा सकता है।

यूरोपवासियों को कपास की जानकारी ईसा से 350 वर्ष पूर्व सिकंदर महान के सैनिकों के माध्यम से हुई थी। उस समय तक सभी वर्गों के लोग (देवता, मुनि, ब्राहण आदि) लोग अपने शरीर को ढंकने के लिए जानवरों की खालों का उपयोग किया करते थे।

मौर्य वंश (322-185 ईसा पूर्व)

मौर्य काल में भारतीय संस्कृति ने काफी उन्नति की। हालांकि इस युग की वेशभूषा की जानकारी हमें उस कालखंड में लिखे गये इतिहास से मिलती हैं, क्योंकि उस युग की प्राप्त मनुष्य मूर्तियों की संख्या बेहद कम है। इस युग की राजव्यवस्था और सामाजिक व्यवस्था का सुंदर निरूपण हमें ’महाभारत’ सभा-पर्व और कौटिल्य द्वारा लिखित ‘अर्थशास्त्र’ से मिलता है। इन ग्रंथों से यह भी पता चलता है कि उस दौर में भारत और मध्य एशिया के बीच व्यापारिक संबंध थे। चीन, बलख, अफगानिस्तान और तजाकिस्तान से यहां रेशमी व ऊनी कपड़े, खालें और समूर का आयात होता था। मौर्य शासन और यूनानियों के आक्रमण के समय भी लोग वैदिक युग में प्रचलित कपड़ों को पहनते थे।

आम लोग प्राय: खालों से निर्मित वस्त्र ही धारण करते थे, जबकि ’शतपथ ब्राह्मण’ में उल्लेखित सोम वस्त्रों को प्राचीन राजाओं का परिधान माना गया है, जिसे वे यज्ञ विधियों को संपन्न करने के दौरान धारण किया करते थे। इन परिधानों में ‘उष्णीव’, ‘चादर‘ और ‘धोती‘ मुख्य थी। हालांकि उनके पहनने कीकिसी निश्चित शैली के बारे में कोई विशेष जानकारी उपलब्ध नहीं है। इस दौर की महिला पोशाक की स्पष्ट झलक हमें मौर्य काल में प्राप्त यक्षिणी की मूर्ति से मिलती है। कहीं-कहीं घाघरा के प्रचलन में आने के प्रमाण भी मिलते हैं, जिसके साथ ऊपरी भाग को ढंकने के लिए महिलाएं कंचुका पहनती थी। यह कवच की तरह का होता था।

विश्व का सबसे महीन सूती कपड़ा बनाते थे भारत के बुनकर

मार्क्स द्वारा 10 जून 1853 को लिखे एक लेख में भारत को ’सूती वस्त्र का कारखाना’ कहा है। उनके अनुसार भारत की समृद्धि में अन्य उद्योग के साथ कपड़ा उद्योग की महत्वपूर्ण भूमिका थी। भारत के बुनकर विश्व का सबसे महीन सूत का कपड़ा बनाते थे जो कि लगभग 2300 काउण्ट (धागे की मोटाई नापने की इकाई) का होता था। आज विश्व की आधुनिकतम मशीनों के बावजूद भी हम इतना महीन सूत बनाने में सफल नहीं हो सके हैं। भारत की इसी कारीगरी से यूरोप के उद्योगपति प्रभावित हो रहे थे। व्यापारी भारत के कपड़े को पसन्द करते थे क्योंकि यह मुनाफा अधिक देता था इसलिए व्यापारियों के लिए ये लाभकारी था किन्तु यह उद्योगपतियों को बर्बाद कर रहा था। इसलिए उद्योगपति पार्लियामेंट से इसके आयात पर प्रतिबन्ध की माँग करते थे। फलतः इंग्लैण्ड में यह कानून बनाया गया कि जो व्यक्ति भारत के कपड़े को अपने पास रखेगा या बेचेगा उसे 200 पौंड जुर्मना भरना होगा। विलियम तृतीय, जार्ज पंचम, जार्ज द्वितीय, जार्ज तृतीय सदृश अनेक राजाओं के जमाने में ऐसे कानून बनाए गए, जिससे भारत का माल इंग्लैण्ड में बिकना बंद हो गया।

कुषाण काल (लगभग 30 ई। से लगभग 225 ई। तक)

कुषाण वंश के शासन काल में लिखे गये साहित्य से उस युग की वेशभूषा के बारे में कुछ विशेष ज्ञात नहीं होता है। इस युग के कपड़ों के बारे में हमें थोड़ी-बहुत जानकारी ‘पेरिपल्स ऑफ द एरिथ्रियन सी’ नामक पुस्तक से प्राप्त होती है, जिसे एक यूनानी नाविक ने ईसा पहली शताब्दी में भूमध्य और हिंद महासागर के व्यापारिक संबंधों के परिप्रेक्ष्य में लिखा है। दौरान रोम से व्यापार होने लगा था। इससे ड्रेपिंग की विभिन्न शैलियां अस्तित्व में आयीं, जो आज भी साड़ी पहनने के तरीकों में दिखती हैं। भारत के पश्चिमी इलाकों में पारसियों के बसने से पारसी टोपी अस्तित्व में आई।

गुप्त काल (320 ईस्वी से 550 ईस्वी)

भारतीय इतिहास में गुप्त काल भारत का ‘स्वर्ण काल’ कहा जाता है। सम्राट चंद्रगुप्त इस साम्राज्य के संस्थापक थे। सिले वस्त्र इस काल में बहुत लोकप्रिय हुए।

गुप्त वंश के शासन के दौरान महिलाओं में तौलिया लपेटने की जगह लहंगा पहनने की शुरूआत हुई, परंतु रानी और शाही परिवार की स्त्रियां इस मामले में रूढिवादी बनी रही। तौलिया लपेटने की शैली आज भी महाराष्ट्र और दक्षिण भारत की स्त्रियों के पहनावे में देखी जा सकती है। पुरुषों की बात करें, तो कालांतर में जांघिया शैली ने ही लुंगी शैली का रूप ले लिया। उत्तरी और पूर्वी भारत के पुरूषों में लुंगी पहनने की शैली का विकास हुआ ।

मुगल काल (1526 ईस्वी से 1857 ईस्वी तक)

भारत में मुगल सल्तनत के प्रभाववश भारतीय परिधानों में कुर्ता-पायजामा का चलन शुरू हुआ। महिलाओं ने सलवार-कमीज और शरारा पहनना शुरू किया। उस दौर में नाक की नथुनी आकर्षण का केंद्र हुआ करती थी। पश्चिमी भारत में इस प्रचलन को हम आज भी देख सकते हैं, लेकिन शुरूआत में ये परिधान केवल शाही परिवार और सम्मानित व्यक्तियों के पहनावे तक ही सीमित थे। धीरे-धीरे सामान्य लोगों में भी इसका प्रचलन शुरू हुआ। तुर्किस्तान जैसे ठंडे प्रदेशों से आने वाले बाबर ने भारत में कोट पहनने की परंपरा का विकास किया। इसी समय न्यायाधीशों और शिक्षित लोगों ने अरबी वस्त्र गाउन पहनना शुरू कर दिया था। सलवार, शेरवानी और अफगानी कराकुली टोपी मुगलों की ही देन है।

परिधान का आविष्कार भले भारत में हुआ, किंतु समय-समय पर भारतीय परिधानों की वेशभूषा में ग्रीक, रोमन, फारस, हूण, कुषाण, मंगोल, मुगल आदि शासन के प्रभावस्वरूप उसका प्रभाव भी देखने को मिला। इन परिवर्तनों के चलते कई नए वस्त्र प्रचलन में आए और भारतीयों ने भी इसको काफी पसंद किया। अंग्रेजों के काल में भारतीयों की वेशभूषा बिलकुल ही बदल गई।

भारत में कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी और राजस्थान से लेकर नागालैंड तक के परिधान विदेशी संस्कृतियों के यहां आकर बसने से प्रभावित होते रहे हैं। जहां उत्तर-पूर्वी राज्यों में मंगोल जाति के पहनावे का असर दिखता है। वहीं उत्तर-पश्चिम के राज्यों में यूनानियों, अफगानियों और मध्य एशिया के देशों के परिधानों का प्रभाव दिखता है। भारतीय वस्त्रों के कलात्मक पक्ष और गुणवत्ता के कारण उन्हें अमूल्य उपहार माना जाता था। खादी से लेकर सुवर्णयुक्त रेशमी वस्त्र, रंग-बिरंगे परिधान, ठंड से पूर्णत: सुरक्षित सुंदर कश्मीरी शॉल भारत के प्राचीन कलात्मक उद्योग का प्रत्यक्ष प्रमाण थे, जो ईसा से 200 वर्ष पूर्व विकसित हो चुके थे। कई प्रकार के गुजराती छापों तथा रंगीन वस्त्रों का मिस्र में फोस्तात के मकबरे में पाया जाना भारतीय वस्त्रों के निर्यात का प्रमाण है।

 

 

 

 

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