राजग की बगिया में फिर बहार

मनुष्य का स्वभाव है कि वह एक समय के बाद परिवर्तन चाहता है। यूं देखा जाये तो नीतीश सरकार के हिस्से में बढ़ी खामी, आलोचना या कमी नहीं थी, फिर भी एकरसता को वजह माना जा रहा था। राजग का शीर्ष नेतृत्व सरकार बना लेने के प्रति निश्चिंत नहीं था। राजग का सबसे प्रबल सहयोगी भाजपा भी महसूस कर रहा था कि नीतीश कुछ हद तक अप्रासांगिक हो रहे हैं। उसे नीतीश से परहेज नहीं रहा, लेकिन अन्य सहयोगी दल परे हट रहे थे। जिसका सबसे बड़ा उदाहरण बने लोकतांत्रिक जनशक्ति पार्टी के चिराग पासवान।

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन व देश के लिये खासी अहमियत रखने वाले बिहार विधानसभा चुनाव में जिस तरह से जनादेश एक बार फिर से राजग के हक में आया है, वह लोकतंत्र में मतदाता के मत और आम आदमी के अभिमत की ताकत का अहसास करा गया। चुनाव कार्यक्रम की घोषणा से लेकर प्रचार प्रारंभ होने और मतगणना शुरू होने तक चारों तरफ महागठबंधन की सरकार बनने की अटकलें लगती रहीं। वह तो बिहार का जागरूक, परिपक्व और लोकतांत्रिक मतदाता ही था, जो खामोशी से सारा तमाशा देख रहा था। उसने अपना फैसला जिसके हक में करना था, कर दिया और दुनिया ने सही वक्त पर जान लिया। बिहार के चुनाव नतीजों ने एक बार फिर भारत के लोकतंत्र की मजबूती का परचम फहरा दिया। इस बार जिस तरह से बिहार के परिणामों ने चौंकाया, वैसे ही नीतीश को फिर मुख्यमंत्री बनाना भी हैरत में डाल गया। हालांकि राजग नेतृत्व के इस फैसले ने यह भी साबित किया कि राजनीति में नैतिकता अभी बाकी है और यह प्रतिष्ठा भाजपा के खाते में दर्ज़ हुई है। बड़ी पार्टी होने के बावजूद उसने चुनाव प्रचार में ही स्पष्ट कर दिया था कि उनका बहुमत आया तो नीतीश ही मुख्यमंत्री होंगे और इस पर वह अपने दल के कुछ प्रमुख नेताओं की नाराजगी के बावजूद कायम रही। यह भाजपा का बड़प्पन है कि उसने घोषित कर दिया कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश ही रहेंगे। यह संभवत उनकी सम्मानजनक विदाई का जतन भी हो। संभव है, कुछ अरसे उन्हें बिहार में बनाये रखकर केंद्र में लेकर बिहार में भाजपा का मुख्यमंत्री बना दिया जाये।

देश की राजनीति को उत्तर प्रदेश व बिहार के चुनाव काफी हद तक प्रभावित करते रहे हैं। इन दोनों ही राज्यों की लोकसभा सीटों की जीत-हार का देश में सरकार के गठन पर असर होता है। इस लिहाज से इन राज्यों के विधानसभा चुनाव भी अहम होते हैं। खुद राजग नेतृत्व यह मानकर चल रहा था कि इस बार सत्ता दूर की कौड़ी है। तब ऐसा क्या हुआ कि बाजी पलट गई और लालू पुत्र तेजस्वी यादव का तेज बढक़र भी वह चमक नहीं बिखेर पाया, जिससे सत्तारोहण की रोशनी फैल पाती?

यूं तो मतदाता का मन पूरी तरह टटोल पाना टेढ़ी खीर रहता है। अटकल पच्चीसी चलती रहती है। लग जाये तो तीर नहीं तो तुक्का। दरअसल, नीतीश कुमार के दस वर्षीय कार्यकाल की निरंतरता राजग की संभावित पराजय का सबसे बड़ा कारण मानी जा रही थी। यह माना जाता है कि मनुष्य का स्वभाव है कि वह एक समय के बाद परिवर्तन चाहता है। यूं देखा जाये तो नीतीश सरकार के हिस्से में बढ़ी खामी, आलोचना या कमी नहीं थी, फिर भी एकरसता को वजह माना जा रहा था। राजग का शीर्ष नेतृत्व सरकार बना लेने के प्रति निश्चिंत नहीं था। राजग का सबसे प्रबल सहयोगी भाजपा भी महसूस कर रहा था कि नीतीश कुछ हद तक अप्रासांगिक हो रहे हैं। उसे नीतीश से परहेज नहीं रहा, लेकिन अन्य सहयोगी दल परे हट रहे थे। जिसका सबसे बड़ा उदाहरण बने लोकतांत्रिक जनशक्ति पार्टी के चिराग पासवान।

रामविसाल पासवान के पुत्र चिराग राजग से अलग होकर अपनी पार्टी लोजपा को उस तरह से रोशन तो नहीं कर पाये, लेकिन राजग की रोशनी को प्रभावशाली बनाने में अड़ंगा जरूर डाल गये, बावजूद इसके कि राजग की सरकार बनने जा रही है। उन्होंने करीब 30 सीटों पर जदयू के प्रत्याशियों के वोट काटे, अन्यथा उतनी सीटें राजग की बढ़ जातीं। राजग को अभी जो 125 सीटें मिली हैं, वे डेढ़ सौ के पार होतीं। दरअसल चिराग को नाराजगी नीतीश कुमार से थी, जो बिहार में एकछत्र साम्राज्य बनाते नजर आ रहे थे। सीटों के बंटवारे में भी लोजपा को प्रधानता न मिलते देख चिराग ने अलग राह पकड़ी। राजग से चिराग की दूरी नीतीश की वजह से थी, इसलिये उसने भाजपा नेतृत्व पर निशाना साधने से परहेज किया। यही वजह रही कि उसने अपने प्रत्याशी भी संयुक्त जनता दल (जदयू) के प्रत्याशियों के सामने ही उतारे। जदयू के सामने उसके 112 प्रत्याशी थे, जिसने जदयू को 30 सीटें जीतने से रोक दिया, जो प्रकारांतर से राजग की सीटों में ही इजाफा करता।
राजग की राह में बड़ी रुकावट बन रहे थे राजद के तेजस्वी यादव। उन्होंने कांग्रेस और वामपंथी दलों के साथ मिलकर महागठबंधन बनाया था, जो अंत तक आगे होता नजर आ रहा था। तेजस्वी की धुंआधार सभाएं, रैलियां, भाषण और वादे लोगों को आकर्षित कर रहे थे। एक तरफ वे मीडिया में चर्चा बटोर रहे थे तो दूसरी तरफ युवाओं को लुभा रहे थे। तेजस्वी ने सरकार बनने पर 10 लाख नौकरियों का वादा किया था। बावजूद इसके कि किसी भी दल के ऐसे किसी वादे का कोई व्यावहारिक धरातल नहीं होता, फिर भी युवा उस मुद्दे को लपक लेते हैं। कुदरतन राजनीतिक कलाबाजियां प्राप्त तेजस्वी के इर्द-गिर्द बढ़ती भीड़ राजग नेताओं के चेहरों पर चिता की लकीरें खींच रही थीं। तेजस्वी ने पहली बार स्वतंत्र रूप से चुनाव अभियान का संचालन किया और अपने दम पर 75 सीटें राजद की और 110 सीटें महागठबंधन की हासिल कर अपनी नेतृत्व क्षमता का लोहा मनवाया है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि लालू यादव यदि जेल से बाहर होते तो महागठबंधन सत्ता में आ सकता था, लेकिन वे यह भूल रहे हैं कि लालू अब बिहार की राजनीति में श्रीहीन हो चुके हैं और वे बाहर होते तो महागठबंधन के प्रभाव को कम करते, क्योंकि तब युवा मतदाता बहक जाता।

बिहार के चुनाव में असदुद्दीन औवेसी की पार्टी ने भी समीकरण बिगाड़े, लेकिन महागठबंधन के। उसने मुस्लिम बहुल 20 सीटों पर महागठबंधन को झटका दिया। 2018 के चुनाव में इन 20 सीटों में से राजग ने केवल 3 सीटें जीती थी, जबकि इस बार राजग ने 12 सीटें जीती हैं। मायावती ने यूं तो 74 प्रत्याशी मैदान में उतारे थे, जिसमें से जीता तो महज एक, किंतु उसकी वजह से बंटे वोटों के कारण इनमें से करीब 60 प्रतिशत से ज्यादा सीटें राजग जीत गई। ओवैसी ने बिहार में जनाधार न होते हुए मुस्लिम वोटों के भरोसे 5 सीटें जीतकर कांग्रेस और राजद को तगड़ा झटका दिया है। अगला चुनाव ओवैसी अपनी शर्तों पर लड़ेंगे और राजद व कांग्रेस को उनकी बात माननी पड़ेगी, यदि अपना नुकसान काम करना होगा तो।

राजग के फिर सत्तारूढ़ होने पर ऐन वक्त नीतीश द्वारा चला गया तुरुप का पत्ता भी रहा, उनके वह जुमला कि यह उनका आखिरी चुनाव रहेगा। उनकी इस भावुकता भरी बात का असर हुआ और लोग पिघल गये। वैसे यह पत्ता चुनाव के आखिरी चरण के वक्त चला गया, जो कामयाब रहा। यूं उनकी नीतियों की काफी धज्जियां तेजस्वी ने उड़ाई है, जिसमें से एक प्रमुख शराबबंदी रही। इस फैसले को शराब माफियाओं के फायदे का बताकर राज्य में शराब की तस्करी और महंगी शराब का मुद्दा काफी चर्चाओं मे रहा। अब देखना होगा कि अपने तीसरे कार्यकाल में नीतीश शराबबंदी को जारी रखते हैं या हटा देते हैं।

इस चुनाव में नीतीश का जादू तो खत्म हो गया, क्योंकि पिछले चुनाव में 71 सीटों की तुलना में उसे इस बार 43 सीटें ही मिली हैं, जो 28 कम हैं। उधर, भाजपा को पिछली बार 53 सीटों की बजाय इस बार 21 सीटें बढक़र 74 सीटें मिली हैं। भाजपा ने 110 व जदयू ने 115 प्रत्याशी मैदान में उतारे थे। उस लिहाज से भी भाजपा की उपलब्धि ज्यादा है।

कहने को तो बिहार में राजग फिर से सत्ता पाने में कामयाब हुआ है, किंतु उसके पास चिंतन के अनेक पहलू हैं। सबसे पहला तो यह कि क्या नीतीश सर्वमान्य नेता रह गये हैं? नीतीश की बड़ी विफलता न होने के बावजूद उनका अडियलपन कभी-कभी भाजपा को भी खलता रहा है। चिराग पासवान ने राजग से किनारा इसीलिये किया था। बिहार में सरकार बनाते समय या कुछ अरसा बाद भाजपा चिराग को फिर से राजग से जोड़ सकती है। वह जानती है कि चिराग अलग रहे तो आगामी लोकसभा चुनाव(2024) के वक्त नुकसान पहुंचा सकते हैं। चिराग ने भी भाजपा या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमलों से परहेज कर अपने लिये वापसी का विकल्प खुला रखा है। भाजपा चिराग को तेजस्वी से मुकाबले के लिये तैयार कर सकती है।

भाजपा अब अपने हिसाब से सरकार को चलाने में सक्षम है। पहले नीतीश को बाध्य नहीं किया जा सकता था, इसीलिये अनेक मौके ऐसे आते थे, जब उनके व भाजपा के प्रदेश नेतृत्व के बीच मतभेद सार्वजनिक होते थे। वह नीतीश को मुख्यमंत्री बनाकर भी ऐजेंडा अपना लागू कर सकती है। शराबबंदी गले की ऐसी हड्डी है, जिससे निजात पाना आसान नहीं होगा। सरकार के खजाने में बड़ा हिस्सा शराब से आय का होता है। शराबबंदी की वजह से एकमुश्त उसमें कमी आ जाती है, जबकि शराब बिकना बंद नहीं होता, बल्कि बढ़ जाता है। इससे पुलिस और आबकारी विभाग की काली कमाई बढ़ जाती है और सरकार खाली हाथ रहती है।

भाजपा को तेजस्वी के 10 लाख नौकरियां देने के वादे को बेअसर करने पर भी काम करना होगा। लोकसभा चुनाव में समर्थन पाने और अगले विधानसभा चुनाव में भी उन युवाओं को अपनी ओर आकर्षित करने के लिये उसे रोजगार के अवसर बढ़ाने होंगे। वह नौकरियों के साथ-साथ स्वरोजगार भी हो सकता है। उसे तेजस्वी के बढ़ते प्रभाव को भी थामना होगा, नहीं तो वे लोकसभा चुनाव में तकलीफ दे सकते हैं। राजग की कोशिश यह हो सकती है कि उसका गठबंधन मजबूती पाए और तेजस्वी के प्रयासों से विपक्ष का जो महागठबंधन बना था, वह कमजोर बने।

बिहार में राजग की वापसी में भाजपा की बड़ी भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति लगाव ने बिहार को राजग के पास बने रहनेे दिया है। बिहार की जीत से भाजपा को अन्य राज्यों में सीटों के तालमेल में मदद मिलेगी और वह अपना दायरा फैला सकेगी। कांग्रेस का जिक्र करना फिजूल है। उसे पिछले चुनाव से 8 सीटें कम मिली हैं। उसके मुकाबले वाम दलों ने 16 सीटों का इजाफा कर अपनी ताकत बढ़ाई है। इन चुनाव में मतदाता के मन की थाह ले पाना एक बार फिर विकट मसला बनकर पेश हुआ है, जो मतदाता की और लोकतंत्र की वास्तविक जीत है।

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