फिल्मी सितारों की बिगड़ती छवि

‘वास्तव’ फिल्म की शूटिंग के दौरान हुई बातचीत में शिल्पा शिरोडकर ने एक ‘वास्तविक’ घटना बताई। उन्होंने कहा कि इस फिल्म में शरीर विक्रय करने वाली एक युवती की भूमिका करने से जूही चावला ने जब इनकार कर दिया, तो मैंने उसे स्वीकार किया। जूही को लगा कि इस भूमिका स्वरूप उसकी रफ भाषा, कुछ सीन में उसका बीड़ी पीना इत्यादि देखकर दर्शकों को ऐसा लगेगा कि असल जिन्दगी में भी जूही वैसी ही है। परन्तु मैंने सोचा कि मैं तो जिन्दगी में ऐसी नहीं हूं, केवल भूमिका की मांग के कारण मैंने सब कुछ किया। पर्दे के सामने और पीछे मैं अलग हूं। शायद इसीलिए मैं इतनी आसानी से बात कर सकती हूं।

जो बात नम्रता शिरोडकर की समझ में आई वह वास्तविक रूप से संजय दत्त की तरफदारी करने वालों की समझ में क्यों नहीं आती? मुंबई में 1993 में हुए बम धमाकों के एक आरोपी के रूप में न्यायालय ने उसे पांच साल की सजा सुनायी। सजा सुनते ही न जाने क्यों कुछ लोग ‘वह निर्दोष है, उसे माफ किया जाये’ इत्यादि मांगें करने लगे। लगे रहो मुन्ना भाई में उन्होंने सभी को गांधीगिरी का पाठ पढ़ाया। उनकी इस समाजसेवा को ध्यान में रखकर उनकी सजा को कम करने की मांग कुछ लोग कर रहे हैं । वे लोग इस बात का ध्यान क्यों नहीं रखते कि उन्होंने जो भी किया वह फिल्म में उनकी भूमिका थी। सुनील दत्त और नरगिस का बेटा होने के कारण वह संवेदनशील और मासूम अभिनेता हो सकता है, परन्तु अपनी असली जिन्दगी में एक व्यक्ति के रूप में वह मगरूर, अय्याश और कुख्यात व्यक्तियों का मित्र बना। इन्हीं पापों का फल वह भोग रहा है।

संजू बाबा ने देशद्रोही घटना में सहभागी होने का पाप किया है। सलमान खान की प्रगति पुस्तक भी ऐसी ही बेफिक्र और विवादास्पद घटनाओं से भरी हुई है। सलमान ने एक बार देर रात को शराब के नशे में चूर होकर बांद्रा के एक फुटपाथ पर सोये हुए कुछ निर्दोष व्यक्तियों पर गाड़ी चढ़ा दी, जिससे उनकी मृत्यु हो गयी। जोधपुर में ‘हम साथ‡साथ हैं’ की शूटिंग के दौरान उनके अन्दर का ‘शिकारी’ जागृत हो गया और उन्होंने वहां काले हिरनों का शिकार किया। इस दौरान उनके साथ सैफ अली खान, तब्बू, नीलम और सोनाली बेन्द्रे इत्यादि लोग थे। इस पूरे मामले की न्यायालयीन जांच होना आवश्यक है। ये कलाकार शायद यह सोच रहे हैं कि वे पर्दे के सामने जो भी करें, वह सब चलता है, लोग उसे पसन्द करते हैं और असल जिन्दगी में भी यदि वे वही सब करेंगे तो भी कोई कुछ नहीं कर सकेगा। क्या ये उनकी गलतफहमी नहीं हैं? इसका जवाब हां ही देना पड़ेगा। कई कलाकारों को यह बात ध्यान में ही नहीं आती कि पर्दे पर साकारने वाली नकली भूमिका और असली जीवन में बहुत अन्तर होता है। वे वास्तविकता भूल जाते हैं और अधिक से अधिक मगरूर होते हैं। स्टारडम, पैसा, घमण्ड, इत्यादि दुर्गुण उनमें बढ़ते जाते हैं और वे बदलते जाते हैं। इन सारी बातों के बीच वे भूल जाते हैं कि वे स्वयं एक ऐसे इंसान हैं, जिनमें कई तरह की भावनाएं हैं। यही भूल उनके लिए घातक सिद्ध होती है। उन पर किसी का अंकुश नहीं होता और कई तरह के भ्रम निर्माण होते हैं। उन्हें ऐसा लगने लगता है कि प्रसार माध्यम, पुलिस, कानून, प्रशासन इत्यादि सभी उनके स्टारडम का ध्यान रखेंगे और कई बातों के लिए उन्हे सुविधाएं मिलती जाएंगी। तात्पर्य यह है कि फिल्म के सेट पर पहुंचने पर वे अपनी भूमिका निभाएं और बाहर आने पर इस लोकतान्त्रिक देश के एक सामान्य नागरिक की तरह ही बर्ताव करें। प्रशंसकों, कुछ ईवेन्ट और सार्वजनिक स्थानों पर अपना स्टारडम कैश करना, कुछ स्टाइल दिखाना, भाव खाना इत्यादि उनके लिए आवश्यक फंडे बन गये हैं। परन्तु इन सभी के बीच उन्हें अपनी मर्यादाएं नहीं लांघनी चाहिए। सामाजिक बन्धनों को नहीं तोड़ना चाहिए।

हमारी फिल्म इण्डस्ट्री के डगमगाने की शुरुआत कहां से हुई? सत्तर के दशक में कुछ कुप्रसिद्ध लोगों ने फिल्म जगत में प्रवेश किया। उन दिनों मनुनारंग एक स्मगलर के रूप में प्रसिद्ध था। उसने ‘पांच दुश्मन’ नामक फिल्म बनायी। इसके बाद चर्चा शुरू हो गयी कि फिल्मोंमें स्मगलिंग का पैसा लगाया जा रहा है । सलीम और जावेद की पटकथा और यश चोपड़ा के निर्देशन में बनी ‘दीवार’ के किरदार ‘विजय’ (अमिताभ बच्चन) के बारे मेंभी यह चर्चा थी कि यह किरदार हाजी मस्तान से मिलता‡जुलता है। कुछ लोगों के मन में इस बात से कौतुहल निर्माण हुआ तो कुछ लोगों को यह फिल्मी जगत के लिए खतरे की घण्टी लगी। कुछ समय बाद हाजी मस्तान ने अपनी प्रेमिका सोना जो कि अभिनेत्री थी, के लिए फिल्म निर्माण में कदम रखा और यही उसका फिल्मी जगत में प्रत्यक्ष आगमन रहा।

नब्बे के दशक की शुरुआत में हिंदी फिल्म जगत के नामी कलाकारों के मनोरंजन के कार्यक्रम अरब देशों में शुरू हुए। इनमें दुबई के कुछ दौरे वादग्रस्त रहे। क्योंकि दाउद इब्राहिम वहां रहता है। मनोरंजन के एक भाग के रूप मेंजॉनी लीवर ने हमारे राष्ट्रगीत का मजाक उड़ाया था, जिस पर अनिल कपूर, गोविन्दा, चंकी पांडे इत्यादि कलाकार खूब जमकर नाचे। इसकी चित्रफीत (रील) जब भारत पहुंची तो यहां बहुत हंगामा हुआ। इसके बाद भारतीय फिल्मों और अंडरवर्ल्ड के सम्बन्धों की चर्चाएं होने लगी। इन फिल्मी हस्तियों को यह गलतफहमी हो गयी कि उनके पास (अंडरवर्ल्ड की) ‘शक्ति’ है और ‘सुपर स्टार’ की शान है, इसलिए वे कुछ भी कर सकते हैं। संजय दत्त के पिता सुनील दत्त तो कांग्रेस के सांसद थे। अत: स्वाभाविक है कि उन्हें विश्वास था कि उनके पिता उनका बचाव करेंगे ही। सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक प्रसार माध्यम और कानून से जुड़े कई व्यक्तियों की भी बड़े कलाकारों से दोस्ती रखने में गर्व महसूस होता है। इनके कारण एक बड़ा दायरा तैयार होता है, जिनमें ये लोग एक‡दूसरे के हित‡सम्बन्धों को सम्भाल कर चलते हैं। कई बड़े कलाकारों को भी अपने कुछ अच्छे-बुरे कामों के लिए इन लोगों को यहां तक कि अंडरवर्ल्ड के लोगों की भी जरूरत होती है । इस तरह दोनों ओर से यह सम्बन्ध मजबूत होता जाता है । इन सब बातों में कलाकार फंसता ही है। इसलिए वह समाज विरोधी कार्य करे, ऐसा अर्थ नहीं होता। अपने वास्तविक जीवन का असर फिल्मी परदे की भूमिका पर पड़ सकता है। अपनी मांग तथा लोकप्रियता को प्रभावित कर सकता है। इसका भान हर सफल कलाकार को रखना ही होगा। शायनी आहुजा ने इस तथ्य को नजरअंदाज किया और घर की नौकरानी को देखकर उसके मन में जो राक्षसी प्रवृत्ति उत्पन्न हुई । शायनी सल्लु‡सलमान की तरह फिल्म जगत का बेटा नहीं होने के कारण उसे इस प्रकारण में फिल्मी कलाकारों का साथ तत्व सहानुभूति नहीं मिली। आलम आरा फिल्म में काम दिलवाने का आश्वासन देकर मधुर भंडारकर ने कई बार शारीरिक सम्बन्ध रखे, ऐसा आरोप लगाकर अभिनेत्री प्रीति जैन ने खलबली मचा दी। जैन के आरोप से इस बात का खुलासा हो गया कि फिल्मी दुनिया में क्या चल रहा है। इस प्रकारण में मधुर भंडारकर को कोर्ट की सीढ़ियां चढ़नी पड़ीं। किसी इंसान से कोई गम्भीर अपराध कर सकता है। कुछ अपराध अनजाने में होते हैं, ऐसी बात अक्सर सुनने में आती है।

फिल्म जगत में कार्य करते समय कुछ पार्टियों की ओर से अलग तरह का वातावरण दिखायी देता है। पर इन्ही लोगों की अत्यन्त निजी पार्टियां, निजी बैठकें, निजी मुलाकातें सामान्य जनता की सुनने में आती रहती हैं। किसी चैनल का प्रतिनिधि उसका स्ट्रिंग ऑपरेशन करके खलबली मचता है। लेकिन क्या इस स्ट्रिंग ऑपरेशन से हालात बदलेंगे? ऐसा नहीं लगता। सफलता, धन, महत्वाकांक्षा की बढ़ती भूख के कारण कुछ लोग कुछ भी कर गुजारने के लिए तैयार हो जाते हैं। यह एक प्रकार का सांस्कृतिक अपराध ही है। किसी निर्माता को अंडरवर्ल्ड का पैसा अच्छा लगता है, किसी ग्लैमर में बने रहने के लिए किसी को प्रसन्न रखना पड़ता है। मराठी फिल्म जगत में भी इस तरह की फौज बढ़ रही है।

इन सबकी एक बात समझ में आती है कि संजू बाबा, सल्लू जैसे अपराधी एक दिन में तैयार नहीं होते। उनके मूल स्वभाव में, उनके आसपास कुछ लोगों का उद्देश्य शामिल रहता है। कभी आस‡पास की परिस्थितियों के कारण उनमें एक तरह की लापरवाही नजर आती है।
संजू बाबा के बारे में एक विशेषता जो मेरे ध्यान में आती है, वह आपको बताता हूं । ‘जान की बाजी’ से अब तक डिपार्टमेन्ट में संजू बाबा की भूमिका वाली फिल्मों के सेट पर शूटिंग स्थल पर जाने का अवसर कई बार मिला। उस वक्त संजू बाबा सेट के तकनीशियनों तथा अन्य कर्मियों के साथ एकदम खुलकर बातचीत करते हुए दिखायी दिये और जब निर्देशक चलो शॉट रेडी है, ऐसा कहता है तो उसी संजय बाबा के हावभाव में काफी बदलाव दिखता है, वह अपने किरदार में पूरी तरह से मग्न हो जाता है। इसका अर्थ यह है कि संजू बाबा ऑफ स्क्रीन वह खुद को एडजस्ट करता है। संजू बाबा की मॉनसिंग दल में भी यह गुण था। ऐसे अच्छे गुण होने के बावजूद वह बम विस्फोट जैसे गम्भीर अपराध का एक सहयोगी क्यों बना? शराब, चरस जैसे नशीले पदार्थों का व्यसन, घातक मित्र, सामूहिक दंगल के कारण संजू बाबा की छवि नायक नहीं, खलनायक हूं मैं की बन गयी। सल्लू मियां तो कई बार हम सिने पत्रकार मित्रों से अच्छा बर्ताव नहीं करता था। उसके फिल्मों का मुहूर्त, शूटिंग, पार्टियों में जाने पर वह हमारी उपस्थिति पर कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाता था। मीडिया स्टार नहीं बनाता, उसके अस्तित्व के मुकाबले अपनी ताकत बहुत बड़ी है, ऐसा सल्लू का मानना था। लेकिन रेडी फिल्म के समय उसने फिल्म जारी में कुछ पत्रकारों को बुलाया तथा उनसे दिल खोलकर बातचीत की इस तरह उसने इस बात को स्वीकार कर लिया कि मीडिया के माध्यम से ही हम अपनी इमेज बनाकर रख सकते हैं। पर इसी बात को उसने शराब पीकर कार चलाने से पहले सोचा होता तो सलमान पर गैर इरादतन हत्या का मामला दर्ज नहीं होता। वह एक दुर्घटना थी, उसके मनमौजी स्वभाव के कारण उससे एक ऐसा अपराध हो गया कि वह एक अपराधी बन गया।

अभिनेता से कानून बड़ा होता है। सिनेमा हाल के परदे से समाज का हित बड़ा है। कानूनी शिकंजा कसे जाने के कारण अब भविष्य में फिल्म निर्माण क्षेत्र में कुछ कदम निश्चित तौर पर सावधानी से बढ़ाये जाएंगे ऐसी उम्मीद की जा रही है।

परदे के पीछे जारी अनेक प्रकार के अपराधों पर नियंत्रण हो पाएगा, ऐसा समझना अब गलत नहीं।
3 मई, 1913 को दादा साहेब फालके ने भारतीय फिल्म जगत की नींव रखी। उस वक्त अनेक कलाओं के संगम वाले फिल्मोंका उदय हुआ। इस यात्रा में मेहबूब खान, वी. शांताराम, चेतन आनंद, राज कपूर, के. आसिफ, गुरुदत्त, राज खोसला, अमिया चक्रवर्ती, नितिन बोस, विमल रॉय, विजय आनंद, कमाल अमरोही ने उत्कृष्ट कलाकृति को साकार करते हुए मनोरंजन एक जागरुकता की भूमिका तथा मखना को अपने नेत्रों के सामने रखा। इस तरह की गौरवशाली फिल्मी परम्परा की गाड़ी ट्रैक पर से क्यों नीचे उतरी यह रियालिटी शो दुखदायी है। यह इस व्यवसाय के लिए एक तरह का सांस्कृतिक झटका ही है। फिल्मी कलाकारों द्वारा फिल्म व्यवसाय पर लगाया गया काला दाग आसानी से पोछ पाना मुश्किल है। अपने दुष्कृत्यों से हमने फिल्म जगत का बहुत ज्यादा नुकसान किया है, यह संजय दत्त, सलमान खान व एहान जैसे बड़े अपराध करने वाले फिल्मी कलाकारों को समझ में नही आता, यह बेहद गम्भीर बात है। फिल्म जगत की यही सबसे बड़ी ट्रेजडी है।

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