मीरा और पन्ना की धरती राजस्थान

वीरों और पराक्रमियों की भूमि है राजस्थान और इसकी कोख से महान ललनाओं ने भी जन्म लिया है। इतिहास के पन्ने पलटना शुरू करते ही इन नारी‡रत्नों की एक के बाद एक गाथाएं सामने आने लगती हैं।

भक्ति योग का उच्चतम आदर्श मीरा

राजस्थान का नाम लेते ही सबसे पहले याद आती हैं‡ अतीव सामर्थ्य‡सम्पन्न भगवती मीरा, जिन्होंने अपने जीवन का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए भक्ति मार्ग को चुना। मुस्लिम आक्रमणकारियों के उस काल में समाज का मनोबल बनाये रखने के लिए भक्ति मार्ग की आवश्यकता थी। भगवती मीरा ने अपने स्वयं के उदाहरण के द्वारा भक्ति मार्ग की सार्थकता को समाज के सामने रखा।

मेड़ता के राठौड़ रतन सिंह के घर श्रावण शु. 1 वि. 1561 (सन 1504) के दिन कुड़की दुर्ग में जन्म लिया था मीरा ने। विवाह हुआ राणा संग्रम सिंह के बड़े पुत्र भोजराज से। विवाह तो हो गया, पर मीरा तो स्थित प्रज्ञ हो चुकी थीं। श्री कृष्ण के दिव्य जीवन का चिन्तन‡मनन करना तथा उनके यशोगान करने वाले पदों की रचना करना उनकी एकमात्र दिनचर्या रह गयी। विवाह के दस साल बाद उनके पति की मृत्यु के बाद विरोध का दौर शुरू हुआ। जैसा कि प्रत्येक नवीन विचार के साथ होता है, उनके देवर ने मीरा बाई को कई बार मारने का भी प्रयत्न किया। हर बार प्रभु‡कृपा से उनकी प्राण‡रक्षा हुई तथा अन्त में भक्त‡शिरोमणि एवं क वयित्री के रूप में सारे भारत ने उनको स्वीकार किया एवं मान्यता दी।

त्याग की पराकाष्ठा‡पन्ना धाय

इतिहास के पन्ने और पलटेंगे तो एक सुनहरे पृष्ठ पर चमकता हुआ नाम दिखायी देगा पन्ना धाय का। मेवाड़ के राजकुमार उदय सिंह की धाय पन्ना का त्याग भी अप्रतिम है। मेवाड़ याने विदेशी मुगल आक्रमणकारियों के प्रतिरोध का केन्द्र बिन्दु, उसी मेवाड़ के अबोध राजकुमार की हत्या के लिए दासी‡पुत्र बनवीर आ गया। बनवीर अपने देश की स्वार्थ‡लिप्सा की प्रवृत्तियों का प्रतिनिधि था, उन्हीं प्रवृत्तियों का जिनके कारण भारत को गुलामी का अभिशाप सहना पड़ा और बनवीर जब अपनी पद‡लिप्सा के वशीभूत होकर उदय सिंह को मारने आया तो पन्ना ने अपने पुत्र को उदय सिंह बताकर उसके सामने कर दिया। कैसा कलेजा रहा होगा पन्ना का, अपनी आंखों के सामने अपने लाडले को तलवार से दो‡टूक होते देखती रही। पन्ना के उस महान त्याग ने देश की स्वतंत्रता के सूर्य को बचा लिया। यह देश जब तक रहेगा, पन्ना धाय का नाम भी अमर रहेगा।

राजकुमारी कृष्णा ने भी अपना बलिदान देकर स्वतंत्रता संग्रम अगुआ मेवाड़ को बचा लिया। जोधपुर नरेश से विवाह कर वह मेवाड़ और जोधपुर में स्थायी सम्बन्ध बनाकर मुगलों के विरुद्ध एक मजबूत मोर्चा बनाना चाहती थीं। उधर मुगलों की गुलामी कर रहे जयपुर नरेश इस मोर्चेबन्दी को तोड़ना चाहते थे, इसलिए उन्होंने महाराणा भीम सिंह को कृष्णा से विवाह का प्रस्ताव भेजकर साथ में आक्रमण की धमकी भी दी। राजकुमारी ने सोचा मुगलों की गुलामी करने वाले जयपुर नरेश से विवाह से तो मृत्यु अधिक ठीक है। अत: उसने विषपान कर अपना बलिदान दे दिया। इस तरह मेवाड़ का मान‡सम्मान और शक्ति बच गयी।

राजमाता कर्मदेवी तथा महारानी पद्मिनी

राजस्थान ही नहीं सम्पूर्ण देश के स्वाभिमान के प्रतीक मेवाड़ की तो प्रत्येक क्षत्राणी ने अपने वीरता, त्याग और बलिदान से इतिहास रचा। उसमें से एक राजमाता कर्मदेवी राजस्थान की जीजाबाई ही थीं। मेवाड़ के राणा समर सिंह पृथ्वीराज चौहान के साथ मोहम्मद गोरी से युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हो गये थे। उनका पुत्र युवराज कर्ण छोटा था। महारानी कर्मदेवी ने मेवाड़ का राज्य प्रबन्ध अपने हाथों में ले लिया तथा कर्ण को उचित शिक्षा मार्गदर्शन देने लगीं। इसी बीच गोरी के सेनापति कुतुबुद्दीन ने मेवाड़ पर भी आक्रमण कर दिया।

सरदारों को चिन्ता में पड़े देख राजमाता कर्मदेवी ने उनका हौसला बढ़ाते हुए कहा कि युद्ध में सेना का नेतृत्व वे खुद करेंगी। तत्पश्चात राजमाता ने शस्त्र धारण किये और अपने तीव्रगामी घोड़े पर बैठकर किले से निकल पड़ीं। उनके पीछे‡पीछे मेवाड़ के वीर थे। राजमाता सिंहनी की तरह हमलावर पठानों पर टूट पड़ीं। भीषण मार‡काट हुई तथा कुतुबुद्दीन मात खाकर ऐसा भागा कि कई वर्षों तक मेवाड़ की ओर आंख उठाने की हिम्मत भी किसी की नहीं हुई।

अप्सराओं जैसी रूपवान तथा अत्यन्त तेजस्वी महारानी पद्मिनी द्वारा अलाउद्दीन खिलजी के मान‡मर्दन तथा अपने स्वत्व की रक्षा के लिए जौहर की ज्वालाओं में बलिदान की गौरव‡गाथा से तो प्रत्येक भारतवासी परिचित हैं। अपने मान‡सम्मान पर आंच आती देख क्षत्रणियां बड़ी सहजता से ‘जौहर’ कर लेती थीं।

जवाहर बाई

महाराणा संग्रम सिंह के बाद उनका पुत्र विक्रमादित्य मेवाड़ की गद्दी पर बैठा। उसके समय में गुजरात और मालवा के पठानों ने मेवाड़ पर आक्रमण किया। कायर विक्रमादित्य भाग छूटा तो उसकी वीर पत्नी जवाहर बाई अपनी स्त्री‡सेना के साथ दुश्मनों पर टूट पड़ीं। युद्ध भूमि में पठानों के छक्के छुड़ाते हुए उन्होंने वीरगति प्राप्त की। महाराणा उदय सिंह विक्रमादित्य के छोटे भाई थे।

तारा बाई

वीरांगना तारा बाई टोंक के राव सुरनाथ की पुत्री थीं। उनका विवाह मेवाड़ के राणा रायमल्ल के पुत्र पृथ्वीराज से हुआ। तारा बाई युद्ध‡कला में निष्णात थीं। अफगानों के विरुद्ध सभी युद्धों में वे पृथ्वीराज के साथ युद्धभूमि में रहीं। टोंक तथा मेवाड़ से उन्होंने यवनों को मार भगाया।

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