बाप्पा रावल तथा मेवाड़ की उज्ज्वल परम्परा

प्राचीन काल से ही भारत के राजवंशों को सूर्यवंश चन्द्रवंश, इन दो श्रेणियों में रखा गया। इनमें सूर्यवंश का महत्व तथा प्रतिष्ठा अधिक है। विवस्वान इस वंश के आदि पुरुष माने जाते हैं। विवस्वान का अर्थ है‡ सूर्य, अत: उनके वंशज सूर्यवंशी कहे गये। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम सूर्यवंशी ही थे। उनके पुत्र कुश के वंश में 61 वें राजा सुमित्र हुए। सुमित्र के वंशज कनक सेन ने सौराष्ट्र में अपना राज्य स्थापित किया। उसकी लगभग दस पीढ़ियों के बाद राज्य की बागडोर शिलादित्य के हाथ मेंआयी। हूणों से संघर्ष में वह मारा गया। उसके अल्प वयस्क पुत्र गुहिल को गुप्त रूप से ईडर ले आया गया। यही गुहिल बड़ा होकर मेवाड़ का राजा बना। उसी के नाम से मेवाड़ का राजवंश ‘गुहिलोत’ कहलाने लगा।

गुहिल के वंशज नाथद्वारा के समीप के एक गांव ‘सीसोदा’ के जागीरदार थे। सीसोदा के राणा हम्मीर सिंह के मेवाड़ का सम्राट बनने के बाद से इस राजवंश के साथ सीसोदिया भी जुड़ गया। इस सूर्यवंशी, गुहिलोत या सीसोदिया राजवंश में ऐसे कई राज‡पुरुष हुए जिन्होंने अपने शौर्य, पराक्रम, त्याग और बलिदान से राष्ट्र‡जीवन में महत्वपूर्ण स्थान बना लिया। कालभोज गुहिल की सातवीं पीढ़ी का राजकुमार था। राजनीति और युद्ध कला के ज्ञाता महर्षि हारीत ने कालभोज को शिक्षा देकर उसे योग्य बनाया। देश और धर्म के प्रति उसके कर्तव्य को समझा कर महर्षि ने उसे यह भी बताया कि राजा राज्य का सेवक होता है।

शिक्षा पूरी होते ही कालभोज ने हारीत ऋषि के निर्देशानुसार युगाब्द 3830 (सन 728) में चित्तौड़ जीतकर अपनी शक्ति बढ़ाई। चक्रवर्ती सम्राट कालभोज के नेतृत्व में एक विशाल सेना ने आक्रमणकारी अरबों पर हल्ला बोल दिया। खलीफा को भारत‡भूमि से खदेड़ कर रावल कालभोज ने ईरान और खुरासान को फतह किया। इस प्रकार हमलावरों का पूरी तरह मान‡मर्दन कर उसने ईरान की राजकुमारी से विवाह किया।

परावर्तन के प्रेरक‡ अरब के हमलावरों ने सीमा प्रान्त की काफी बड़ी जनसंख्या को मुसलमान बना लिया था। कालभोज तथा हारीत ऋषि उस काल में भी समझ गये थे कि इस प्रकार बने मुसलमान राष्ट्र के शत्र्ाु ही साबित होंगे। अत: ऐसे लोगों को फिर से हिन्दू बनाया गया। फिर से हिन्दू बने राजवंशियों के साथ कालभोज ने अपने कुल की कन्याओं के विवाह कर उन्हें प्रतिष्ठा प्रदान की।
यह एक क्रान्तिकारी कदम था। इसलिए देश, धर्म और संस्कृति के रक्षक महापुरुषों में रावल कालभोज तथा नागभट्ट परिहार का नाम स्वर्णाक्षरों में लिखा जाना चाहिए। देश की जनता ने कालभोज को बाप्पा के सम्मान सूचक नाम से पुकारना शुरू किया, तभी से वे बाप्पा रावल के नाम से प्रसिद्ध हो गये।

वीरों के वीर‡महाराणा सांगा

महाराणा सांगा के नाम से प्रसिद्ध संग्रम सिंह ने इतने युद्ध किये कि उनके शरीर पर अस्सी घाव हो गये थे। मेवाड़ की शक्ति बढ़ाते हुए मुस्लिम सुल्तानों को लगातार निर्बल करने का महत्वपूर्ण कार्य महाराणा सांगा ने जारी रखा। दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी को उन्होंने पहली बार खातोली और दूसरी बार धौलपुर के युद्ध में हराया। गुजरात के सुल्तान महमूद को गागरौन के युद्ध में पराजित कर उसे बन्दी बना लिया। सुल्तान ने गिड़गिड़ा कर भविष्य में मेवाड़ का साथ देने की शपथ ली तो सांगा ने तीन महीने बाद उसे छोड़ दिया। लेकिन विश्वासघात की कुल‡परम्परा निभाते हुए साल भर बाद ही उसने फिर मेवाड़ पर आक्रमण कर दिया। मालवा का सुल्तान भी उसकी सहायता के लिए आ गया। मंदसौर के पास महाराणा सांगा ने दोनों सेनाओं पर गरुड़‡झपट्टा मारकर उन्हें तितर‡बितर कर दिया।

महाराणा सांगा बड़े दूरदर्शी थे। मुगल आक्रमणकारियों के रूप में भारत पर मंडरा रहे संकट को उन्होंने भांप लिया था। पानीपत के युद्ध (सन 1526) में बाबर की इब्राहिम लोदी पर जीत के तुरन्त बाद उन्होंने अन्य नरेशों व सुल्तानों से विचार विमर्श कर बाबर का रोकने की योजना बनायी। लोदियों से अपनी शत्र्ाुता भुलाकर राष्ट्रहित में महमूद लोदी को भी उन्होंने साथ लिया। भारत सम्राट संग्रम सिंह तथा मुगल आक्रमणकारी बाबर के बीच खानवा के मैदान में टक्कर हुई। भारतीय सेना के जबर्दस्त आक्रमण को बाबर नहीं झेल पाये तथा उसकी सेना भाग चली। आखिर बाबर ने सन्धि का प्रस्ताव भेजा जिसे महाराणा ने मान लिया। रात को जब भारतीय सेना सो रही थी तो बाबर ने धोखे से आक्रमण कर दिया। फलस्वरूप भारतीय सेना हार गयी और महाराणा सांगा रणथम्भौर चले आये। दुर्भाग्य से कुछ समय पश्चात ही तेज ज्वर से महाराणा का निधन हो गया।

प्रात: स्मरणीय महाराणा प्रताप

मुगल अकबर के समय समाज में व्याप्त हताशा का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि राजस्थान के जो रजवाड़े विधर्मी तथा हमलावर म्लेच्छों के साथ बैठने तक में अपमान समझते थे, वे ही मुगलों को अपनी बहन‡बेटी ब्याहने लगे।

ऐसी स्थिति से समाज को निकाल कर फिर से राष्ट्र जीवन में चैतन्य भरने का महत्वपूर्ण कार्य महाराणा प्रताप ने किया। हल्दीघाटी के युद्ध में मुगल सेना की दुर्गति होने का समाचार बिजली की तरह सारे देश में फैल गया। इसी के साथ अकबर ेके अपराजित होने का भ्रम भी टूट गया। देश के जन‡मानस में स्वाधीनता के लिए संघर्ष करने का साहस जगने लगा। मेवाड़ एकदम से स्वातंत्र्य‡संघर्ष का केन्द्र बन गया। उसके बाद महाराणा प्रताप के संघर्ष तथा चित्तौड़ के अतिरिक्त सारा मेवाड़ फिर से जीत लेने से समाज‡जीवन में व्याप्त हताशा दूर हो गयी।

प्रताप के संघर्षमय जीवन में एक महानायक के सभी गुण श्रेष्ठ रूप में प्रकट हुए। वास्तव में वे जन‡नायक थे। आजादी की लड़ाई को उन्होंने सामान्य‡जन की लड़ाई बना दिया। प्रताप ने वनवासी भीलों को अपना प्रमुख सहयोगी बनाया। अपनी बाल्यावस्था से ही उन्होंने भीलों के साथ खेलना, शस्त्राभ्यास करना, उठना‡बैठना शुरू कर दिया था। युवा होते‡होते प्रताप ने पूरे मेवाड़ की एक‡एक घाटी, एक‡एक पहाड़ी, पहाड़ियों की गुफाओं तथा दुर्गम मार्गें को अपने भील साथियों के साथ छान मारा था। गांव‡गांव में भील युवकों के साथ घूमते हुए प्रताप उन्हें शस्त्रों की शिक्षा भी देते तथा देश, धर्म और समाज की परिस्थितियों का ज्ञान भी कराते।

प्रताप ने अपने कुशल नेतृत्व के बूते पर ही देश और धर्म के लिए मर‡मिटने वाले बेजोड़ स्वातंत्र्य योद्धा तैयार किये। किसी देश के इतिहास में ऐसे क्षण कभी‡कभी ही आते हैं जब बलिदान के लिए तत्पर सहयोगी अपने नेता को आदेश देता हुआ तथा नायक उसे मानता हुआ दिखायी देता है। हल्दी घाटी के युद्ध मेंझाला मन्ना को अपने राज चिन्ह सौंप कर युद्धभूमि से निकल जाने का आदेश प्रताप ने माना। नेता और उसके अनुयायियों में जब किसी श्रेष्ठ लक्ष्य के प्रति पूर्ण समर्पण‡भाव उत्पन्न हो जाता है, तब ऐसी स्थिति आ पाती है। नेता और सहयोगियों के बीच रंच मात्र की भी दूरी न रहे, लोगों में ध्येय निष्ठा उत्पन्न हो, इसके लिए प्रताप ने महलों की सुख‡सुविधाएं छोड़ने, भूमि पर शयन करने तथा पत्तल दोनों में भोजन करने की भीष्म प्रतिज्ञा की थी। मनुष्यों की बात तो अलग है, प्रताप के पारस स्पर्श से चेतक जैसा घोड़ा भी अमर हो गया।

प्रताप का पूरा जीवन उनके शौर्य और साहस का अनुपम उदाहरण है। सैन्य संचालन में भी उनका कोई सानी नहीं था। युद्ध की छापामार पद्धति को अपना कर प्रताप ने इस रणनीति को नयी प्रतिष्ठा प्रदान की। वैसे तो महाराणा हमीर सिंह और उदय सिंह ने भी कुछ काल तक इस प्रणाली को अपनाया, किन्तु प्रताप ने छापामार प्रणाली को और विकसित कर इसे मारक बनाया। भारत के आधुनिक काल के इतिहास में प्रताप को गुरिल्ला‡युद्ध का उन्नायक कहा जा सकता है। महाराणा प्रताप कूटनीति का भी चतुराई से प्रयोग करना जानते थे। मेवाड़ के सिंहासन पर बैठते ही प्रताप समझ गये थे कि राज्य की स्थिति काफी कमजोर है तथा मुगलों से आसन्न संघर्ष की तैयारी के लिए कुछ समय की आवश्यकता होगी। इसके लिए उन्होंने चार वर्षों तक मुगलों को सन्धि‡वार्ता में उलझाये रखा था।

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