सत्ता का केन्द्र उत्तर प्रदेश

उत्तर प्रदेश उत्तर वैदिक काल में ब्रह्मर्षि देश या मध्य देश के नाम से जाना जाता था। यह वैदिक काल में कई महान ऋषियों, मुनियों जैसे भारद्वाज, गौतम, याज्ञवल्क्य, वशिष्ठ, विश्वामित्र और वाल्मीकि आदि की तपोभूमि रहा। गंगा- यमुना के मैदान का यह विस्तृत क्षेत्र सदा से जम्बू द्वीप और भरतखण्ड का मर्मस्थल रहा है। भगवान श्री राम की जन्मभूमि अयोध्या और भगवान श्री कृष्ण की नगरी मथुरा इस राज्य के प्रमुख नगर हैं। हिंदू धर्म की धार्मिक राजधानी वाराणसी, साहित्य और राजनीति का केन्द्र इलाहाबाद इसी राज्य में है।
सन 1602 में नार्थ वेस्ट प्रोविन्स का नाम बदल कर यूनाइटेड प्रोविन्स ऑफ आगरा एण्ड अवध कर दिया गया। साधारण बोलचाल की भाषा में इसे यूपी कहा गया। सन 1620 में प्रदेश की राजधानी इलाहाबाद से लखनऊ कर दी गयी । स्वतंत्रता के बाद 12 जनवरी सन 1650 में इस क्षेत्र का नाम बदल कर उत्तर प्रदेश रखा गया।

करीब 19 करोड़ की जनसंख्या के साथ उत्तर प्रदेश केवल भारत की अधिकतम जनसंख्या वाला प्रदेश नहीं है, बल्कि विश्व के पांच राष्ट्र- चीन, स्वयं भारत, अमेरिका, इण्डोनेशिया और ब्रजील के बाद सबसे अधिक जनसंख्या वाला क्षेत्र है । प्रदेश की विशालता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि एक ओर इसकी सीमाएं उत्तरांचल, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान जैसे उत्तरी व पश्चिमी राज्यों से लगती हैं तो दूसरी ओर मध्य व पूर्वी भारत के राज्य मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखण्ड और बिहार से लगती हैं।

सन 1947 में फिरंगियों के सत्ता हस्तांतरण के बाद जवाहर लाल नेहरू देश के पहले प्रधानमन्त्री बने। सन 1951‡52 में प्रथम चुनाव तक देश की सर्वोच्च सत्ता पर नेहरू कुल का वर्चस्व स्थापित हो चुका था। गांधी‡नेहरू परिवार की स्वाभाविक सत्ता का केन्द्र भी उत्तर प्रदेश ही रहा है।
कोट‡परिमट‡लाइसेंसराज और भ्रष्टाचार से देश त्रस्त हो चुका था। काली अर्थ व्यवस्था भारत का प्रतीक बन गयी। उस समय देश में कांग्रेस विरोधी लहर उत्तर प्रदेश से चली। सन 1956‡60 में डॉ. राम मनोहर लोहिया ने छात्र राजनीति को प्रोत्साहन देना शुरू किया और इलाहाबाद को प्रमुख केन्द्र बनाया। उन्होंने अपने क्रान्तिकारी विचारों से किसान आन्दोलन में नयी चेतना का संचार किया। तत्कालीन प्रधानमन्त्री जवाहर लाल नेहरू के खिलाफ स्वयं इलाहाबाद के फूलपुर संसदीय क्षेत्र से लोकसभा चुनाव लड़े । परिणाम पराजय रहा; पर हार न मानी। आन्दोलन और प्रबल किया सन 1963 में हुए तीन उप चुनावों में गैर कांग्रेसवाद के आधार पर सीधी टक्कर देकर कांग्रेस को तीनों स्थानों पर हरा दिया।

केन्द्र की सत्ता में हमेशा उत्तर प्रदेश का दबदबा रहा। देश के प्रथम प्रधानमन्त्री पं. जवाहर लाल नेहरू से लेकर श्री अटल बिहारी वाजपेयी तक देश के आठ प्रधानमन्त्री इसी राज्य से रहे। उत्तर प्रदेश हमेशा से सत्ता का केन्द्र रहा है। कहा जाता है दिल्ली की सत्ता का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर जाता है। लोकतंत्र में संख्या का महत्व है। पांच सौ तैंतालीस सदस्यों की लोकसभा में उत्तर प्रदेश से अस्सी सांसदों की टोली का संवेदनशील प्रभाव अनिवार्य है। जिस दल ने यहां से ज्यादा सीटें जीतीं केन्द्र की सत्ता की चाभी हमेशा उसी के हाथ रही है। आजादी के बाद से सन 1989 तक केन्द्र में कांग्रेस के एकछत्र राज और यहां तक कि जब 1966 और फिर 1989 में केन्द्र में गैर कांग्रेसी सरकारें बनीं तो उसमें भी सबसे महत्वपूर्ण भूमिका उत्तर प्रदेश की ही थी। लेकिन 1989 के बाद मण्डल, मन्दिर और जातिगत राजनीति की अलग-अलग धाराओं ने उत्तर प्रदेश की राजनीति को एक नया रूप दे दिया।

सन 1991 में भाजपा ने उत्तर प्रदेश की 51 लोकसभा सीटें जीतीं जो कि सोशल इंजीनियरिंग का पहला सफल प्रयोग था। कांग्रेस का एकछत्र साम्राज्य खत्म हो गया। केन्द्र में गठबन्धन की राजनीति शुरू हो गयी। कांग्रेस अब हासिये पर जाने लगी। हांलाकि नरसिम्हाराव ने सरकार बनायी और कार्यकाल पूरा किया।

सन 1996 और 1999 में भाजपा ने क्रमश: 52 और 57 सीटें राज्य में जीतीं। भाजपा सत्ता तक तो पहुंची लेकिन गठबन्धन की राजनीति ने श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के नेतृत्व वाली सरकार को ज्यादा समय नहीं चलने दिया। फिर 1999 के आम चुनावों में उत्तर प्रदेश में भाजपा का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा, केवल29 सीटें ही जीती जा सकीं। कारण रहा क्षेत्रीय पार्टियों का प्रदेश की रजनीति में वर्चस्व। सन 2004 और 2006 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन प्रदेश में कुछ अच्छा नहीं रहा। वह केवल 10 सीटें जीत सकीं। अब ऐसा लग रहा था कि राष्ट्रीय राजनीति खासकर केन्द्र की सत्ता की चाभी सपा, बसपा जैसे क्षेत्रीय दलों के हाथ लग गयी है।

राजनीति की प्रयोगशाला‡

जातिवाद उत्तर प्रदेश की राजनीति का पुराना राग है। लेकिन मण्डल आयोग के बाद उत्तर प्रदेश राजनीति की नयी प्रयोगशाला बन गया, कइयों के लिए रंगभूमि, जहां ‘तिलक’, ‘तराजू’ और ‘तलवार’ का नारा लगाते हुए मायावती ने दलित राजनीति में खुद को स्थापित किया और राज्य की कई बार मुख्यमंत्री भी बनीं। वहीं मुलायम सिंह यादव अपने को मुसलमानों का सबसे बड़ा मसीहा साबित करने में लग गये। जातिगत राजनीति को सपा, बसपा अच्छी तरह समझते और भुनाते भी हैं, फायदा भी खूब पाते हैं। आखिर हो भी क्यों न जाति और राजनीति उत्तर प्रदेश में इस तरह गुत्थम गुत्था हैं कि पहचानना भी मुश्किल है। यूपी के बारे में एक कहावत बहुत प्रचलित है कि यहां के मतदाता अपना वोट नेता को नहीं, अपनी जाति को देता है। हर बार मतदाता अपनी जाति को वोट देगा तो राजनीति होगी ही। संयोगवश किसी क्षेत्रीय दल के पास न तो कोई मुद्दा है न ही कोई एजेंडा । यहां केवल जातीय समीकरण है। यहां 90 फिसदी सीटें जातीय समीकरण से जीतते हैं। प्रदेश में 16 फीसदी सवर्ण, 35 फीसदी पिछड़ा वर्ग, 25 फीसदी दलित, 19 फीसदी मुस्लिम और बाकी अन्य मतदाता हैं। मुलायम सिंह यादव की नजर (एम+वाई) मुस्लिम और यादव समीकरण पर रहती है जो लगभग 31 फीसदी है और मायावती 25 फीसदी दलित वोटों पर नजर रखती हैं। अपनी जातीय राजनीति के सहारे सपा, बसपा केन्द्र में सरकारें बनाती और गिराती हैं।

उत्तर प्रदेश की राजनीति की खूबी यह भी है कि यह सपने दिखाती है, सपने बेचती है और सपने ही पालती है। राजनीति अंक गणित नहीं है, न ही इसकी गुत्थी सुलझाने के फार्मूले सरल हैं। केन्द्र की सत्ता में उत्तर प्रदेश की अहमियत और जातीय समीकरण को समझते हुए बहुत सारी जातियों ने अपनी स्वयं की पार्टी भी खड़ी कर ली है। प्रदेश में 100 से ज्यादा छोटी‡छोटी पार्टियों हैं। राजभरों की पार्टी भारतीय समाज पक्ष, बिंदों के बीच आधार वाली प्रगतिशील मानव समाज पार्टी, पटेलों की अपना दल, कौमी एकता पार्टी, उलेमा काऊंसिल, जस्टिस पार्टी, पीस पार्टी और अन्य। ये पार्टियां वोट काटने और जातीय समीकरण मजबूत करने का काम करती हैं।

उत्तर प्रदेश की चुनावी शतरंज का खास पहलू है बाहुबल। दाग यहां राजनीति की खूभी माना जाता है और दागी होना सफलता की पहली शर्त। बाहुबली नेताओं का भी अपना महत्व है और राजनैतिक पार्टियों की मजबूरी यही चुनाव जिताते हैं और सदन में विश्वास मत। स्वच्छ राजनीति की भले ही सब बात करते हों, लेकिन राजनीतिक दलों के लिए ऐसे ही दाग अच्छे हैं।

उत्तर प्रदेश एक बार फिर 2014 के महासमर का मुख्य केन्द्र बनता दिखायी दे रहा है। देश की बड़ी पार्टियों कांग्रेस, भाजपा, बसपा और सपा चारों की कोशिश उत्तर प्रदेश से ज्यादा से ज्यादा लोकसभा सीटें जीतने की है। संयोग से इन चारों प्रमुख पार्टियों के अध्यक्ष भी उत्तर प्रदेश से ही आते हैं। वैसे भी उत्तर प्रदेश हमेशा से ही देश की राजनैतिक दशा और दिश तय करता रहा है और इस बार भी राजनैतिक दलों ने सत्ता की राजनीति के लिए उत्तर प्रदेश को ही चुना है।

सपा और बसपा ने लोकसभा के लिए अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर जातिगत समीकरण की जुगत में लग गये हैं। लोक-लुभावन भाषणों से अपनी-अपनी जातियों की गोलबन्दी भी शुरू कर दी है। बसपा सुप्रीमो मायावती इस बार फिर ब्राह्मण वोटों पर नजर लगाये हैं और अपना सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला फिर से दोहराना चाहती हैं। वहीं दूसरी तरफ मुलायम सिंह यादव ने मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति करते हुए आतंकी घटनाओं में शामिल मुस्लिम युवकों को राज्य सरकार की सिफारिश पर जेलों से रिहा करने में लगे हैं; ताकी मुस्लिम वोटों के बिखराव को रोका जा सके।

कांग्रेस राहुल गांधी के सहारे एक बार फिर उत्तर प्रदेश में दांव लगाने जा रही है। संगठन के नाम पर राहुल ब्रिगेड ने उत्तर प्रदेश में मोर्चा सम्भाल लिया है। लम्बे समय से प्रदेश में हाशिये पर रहने का खामियाजा भुगत रही कांग्रेस इस बार अपने सिपहसालारों की सेना उत्तर प्रदेश में उतार रही है।

उत्तर प्रदेश का महत्व भजपा से ज्यादा कौन जान सकता हैं। जनसंघ से भाजपा तक के सफर में उत्तर प्रदेश ने ही पार्टी को शिखर तक पहुंचाया। दो सांसद से सत्ता पक्ष बनने में महत्वपूर्ण योगदान उत्तर प्रदेश का ही रहा। उत्तर प्रदेश को भाजपा ने इस बार अपना प्रमुख लक्ष्य मान कर अमित शाह को उत्तर प्रदेश का चुनाव प्रभारी बनाया है। जोड़‡तोड़ की राजनीति के बजाय सीधे जनता तक सम्पर्क पार्टी का प्रमुख लक्ष्य है।

98 मण्डल, 75 जनपद, 312 तहसील, 80 लोकसभा, 30 राज्यसभा और 19 करोड़ की आबादी वाले इस विशालकाय प्रदेश में विकास कहीं पीछे छूट गया है। प्रदेश राजनीति की प्रयोगशाला बन गया है। केन्द्र की सत्ता में उत्तर प्रदेश की अहमियत हर कोई राजनैतिक दल बखूबी जानते हैं, इसलिए राजनीतिक दल लोकसभा में अधिकाधिक सीटें पाना चाहते हैं ताकि केन्द्र की सत्ता में उनका वर्चस्व कायम रहे।

आपकी प्रतिक्रिया...