फिल्म जगत में रोज ही दिवाली

दिवाली और फिल्म जगत का नाता बहुत ही घनिष्ठ, बहुरंगी और पुराना है जो कि पर्दे पर अर्थात ऑनस्क्रीन तथा पर्दे के बाहर अर्थात ऑफस्क्रीन दोनों ओर देखने को मिलता है। हिंदी फिल्म के मुहूर्त से प्रीमियर तक और सफलता की ‘पेज थ्री पार्टी’ की सालभर रहनेवाली चमकदमक देखकर मजाकिया तौर पर कहा जाता है कि यहां हमेशा ही दिवाली होती है। हालांकि ऐसा कहनेवालों की भी कोई गलती नहीं है। दिवाली में मिठाई, व्यंजन, शुभकामनाएं और विभिन्न आवाजों और नजारोंवाले पटाखे इत्यादि से सराबोर स्वच्छंद वातावरण होता है ना? ऐसा वातावरण तो सालभर फिल्म जगत में किसी न किसी कारण से रहता ही है। कामयाब फिल्म के डेढ़-दो करोड़ के आंकडे से लेकर पूरे साल के ‘कलरफुल एंटरटेंमेंट’ तक दिवाली के जैसा ही वातावरण होता है। किसी क्षेत्र की इस प्रकार की खासियत भी हो सकती है और हम हैं कि फिल्म को अनेक प्रकार की कला, विज्ञान और नये प्रोद्यौगिकी के संगम के रूप में देखते रहते हैं। आज के फिल्म जगत में इस प्रकार की मानसिकता का प्रभाव नजर नहीं आता। यहां दिखाई देता है तो बस दिवालीवाला वातावरण ही, जो कि यहां ऊर्जा भरता है।

प्रमोद चक्रवर्ती की फिल्म ‘जुगनू’ में नायक धर्मेन्द्र बच्चों के साथ छोटे-छोटे प्यारे-प्यारे रे गीत गाते दिखाई देते हैं तो दूसरी ओर प्रकाश मेहरा की ‘जंजीर’ में दीवाली के ही दिन क्रूर तेजा(अजीत) विजय (अमिताभ बच्चन) के माता-पिता का खून करता है। हिंदी सिनेमा के परदे पर ‘भाईदूज’ भी दिखाई देती है। इस संदर्भ में ‘बेईमान’ फिल्म का उल्लेख किया जा सकता है। उपग्रह वाहिनियों पर चलने वाले महाधारावाहिकों में पिछले कुछ सालों में दिवाली जोरशोर से मनाई जाती है। वैसे भी इतने महीनों तक धारावाहिक प्रसारित करने के कारण उन्हें तात्कालिक घटनाओं और त्यौहारों का समावेश करना पड़ता है। अधिकांश धारावाहिकों में देखा जाता है कि वे अपनी कथा के अनुसार चलते ही नहीं। दिवाली आते ही इनकी कथा को उस ओर मोड़ कर ही उसकी मिठास बरकरार रखी जा सकती है। कलाकार भी दिवाली के जोश में होते हैं। दर्शकों को भी घर की दिवाली के साथ छोटे परदे की दिवाली देखनें में बहुत आनंद आता है। दोनों का तालमेल बहुत अच्छा जमता है और दर्शकों की घर बैठे ही अच्छी दिवाली हो जाती है।

दिवाली का प्रसन्न वातावरण, दर्शकों की पैसे खर्च करने की मानसिकता और चार-पांच दिन की छुट्टी का भरपूर फायदा उठाने का व्यावसायिक गणित इन तीन सूत्रों के कारण दिवाली में बड़ी-बडड़ी फिल्में रिलीज करने का फैशन सा बन गया है। 1995 से इसे अधिक गति मिली। उस साल यशराज फिल्म्स द्वारा निर्मित और आदित्य चोपड़ा द्वारा निर्देशित ‘दिलवाले दुल्हनियां ले जायेंगे’ इस कदर सुपर हिट रही कि वह आज भी दिवाली में सिनेमाघरों में दिखाई जाती है। सौ सालों के हिंदी सिनेमा के प्रवास का यह सबसे उत्तम दिवाली उपहार रहा। सन 1995 की दिवाली में मुंबई में उसका मुख्य सिनेमाघर रहा न्यू एक्सलसियर। वहां सिनेमा पचास हफ्तों तक चला। 1996 की दिवाली में उसे मराठा मंदिर में सुबह के मैटिनी शो में चलाया गया। तब से उसकी वहां घुड़दौड़ चल रही है। अब वह अपने एक हजारवें सप्ताह में पहुंच गया है। अर्थात हफ्तों के हिसाब से उसका नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में दर्ज किया जा सकता है। अब आप ही बताइये हमारे हिंदी सिनेमा को दिवाली फलती है या नहीं?

शाहरुख खान की फिल्मों के लिये दिवाली का मुहूर्त हुकुम का इक्का साबित होने लगा। वह भी स्वयं की सफलता और इमेज का हमेशा ध्यान रखता है। उसे दिवाली का मंत्र मिल गया। ‘कुछ कुछ होता है’, ‘दिल तो पागल है’,‘मोहब्बतें’, ‘ओम शांति ओम’, ‘रा वन’ इत्यादि जैसी कई फिल्में दिवाली में आईं। हालांकि उनमें से कुछ फिल्में इतनी अच्छी थीं कि किसी भी शुक्रवार को रिलीज होती तो भी हिट होतीं पर उसमें शान और स्टाइल नहीं होती।

‘मिशन कश्मीर’, ‘सांवरिया’, ‘बड़े मियां छोटे मियां’, इत्यादि फिल्में भी दिवाली के अवसर पर झलकीं। कुछ फिल्मों ने सफलता के पटाके फोड़े तो किसी ने निर्माता निर्देशकों का दिवाला निकाल दिया। ये तो चलता ही रहेगा। ऐसा भी नहीं है कि दिवाली के दिन हैं तो फिल्मों को सौ प्रतिशत सफलता मिलेगी ही। इस साल की दिवाली में आनेवाली ‘क्रिश-3’ साइंस फिक्शन है अर्थात ‘फैन्टसी’ को बहुत मौका है। ‘क्रिश’ सीरीज की राकेश रोशन द्वारा निर्मित यह तीसरी फिल्म है। हृतिक रोशन ने भी इस पर काफी मेहनत की है।

महाराष्ट्र में दिवाली के अवसर पर दिवाली अंक प्रकाशित करने की परंपरा है। मोबाइल और इंटरनेट के जमाने में किताबें कौन पढ़ता है जैसे सवाल होने पर भी लगभग तीन सौ-साढ़े तीन सौ दिवाली अंक प्रकाशित किये जाते हैं। इनमें से बीस प्रतिशत के मुखपृष्ठ पर फिल्मी अभिनेत्रियों के ही फोटो होते हैं। बहुत पहले इस पर ‘पारिवारिक प्रतिमावाली मराठी अभिनेत्रियों’ के चित्र हुआ करते थे। विशेषत: सुलोचना का चित्र बड़े पैमाने पर हुआ करता था। दिवाली अंक के मुखपृष्ठ पर झलकनेवाली अभिनेत्रियों में सीमा देव, जयश्री गडकर, उमा भेंडे, आशा काले से होते हुए अलका आठल्ये,अश्विनी भावे, वर्षा उसगांवकर, किशोरी शहाणे, मृणाल कुलकर्णी, सोनाली कुलकर्णी तक यह संख्या बढती गयी। इस वर्ष अर्थात सन 2013 के अंकों के मुखपृष्ठ पर अगर दीपिका पादुकोण दिखाई दे तो आश्चर्य नहीं होगा क्योंकि उसने एक के बाद एक सुपर हिट फिल्में दी हैं।

भाईदूज के दिन एकता और तुषार कपूर की भाईदूज चर्चा का विषय रहती है। अर्जुन और सोनम कपूर की भाईदूज की भी चर्चा होगी ही।
कई कलाकारों का ‘मेरी दिवाली’ स्तंभ के रूप में लिया गया साक्षात्कार भी कई रंगों में प्रकाशित किया जायेगा। इसके साथ ही उनका पसंदीदा व्यंजन, शुभेच्छा पत्र, पटाखे आदि का भी जिक्र होगा ही। वैसे भी मीडिया को चौबीस घंटे कुछ तो चलाना ही पड़ता है। वे ‘लाइव कवरेज’ का आग्रह करते हैं और फिर कोई ना कोई अभिनेत्री फुलझड़ी और अनार जलाती नजर आती है। विशेषत: छोटे परदे पर काम करनेवाले कलाकारों को इस तरह के कवरेज में शामिल होना बहुत अच्छा लगता है। ऐसा लगता है कि उन्हें बताया जाये कि इन सबकी बजाय अभिनय पर ज्यादा ध्यान दें परंतु दिवाली के पटाखों की कर्कश ध्वनि में उन्हें कुछ सुनाई भी नहीं देगी। प्रियंका चोपडा रंगोली डाल रही है यह कल्पना प्रत्यक्ष में उतरी तो दीवाली का आनंद द्विगुणित हो जायेगा।

जो भी हो लेकिन फिल्मी दुनिया दिवाली से दुनिया से एकाकार हो गई है। आप इस ‘कनेक्टिविटी’ की भी तारीफकरेंगे या नहीं?
करीना कपूर की शादी के बाद की यह पहली दीवाली है। वह अधिक से अधिक मिठाई खाये और अपने जीरो फिगर की चिंता को कुछ दिन दूर कर दे यही शुभकामना।
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