‘गुलाबी गैंग’ की मर्दानगी

अंधकार मानव के जीवन में कई रूपों में आता है। कभी-कभी यह अंधेरा इतना घना होता है कि इसे मिटाने के लिये दीप नहीं मशाल की आवश्यकता महसूस होने लगती है। बुंदेलखंड में सन 1962 की दीपावली को जन्मीं संपत पाल ने अपने जीवन को एक ऐसी ही मशाल बनाया। इस मशाल ने न सिर्फ अपने बल्कि अन्य कई महिलाओं के जीवन का अंधेरा दूर किया।

पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं का स्थान देश, काल और समाज व्यवस्था के अनुरूप बदलता रहा है। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि हम पर जिन आक्रांताओं ने राज किया वे अपने साथ अपनी संस्कृति भी लाये और चाहे अनचाहे उसका प्रभाव हम पर भी पड़ा। बलात्कार, स्त्री भ्रूण हत्या, घरेलू हिंसा जैसे शोषण के विभिन्न प्रकारों का सामना महिलाओं को करना पड़ रहा है। गंभीर बात यह है कि उच्च शिक्षित और धनाढ्य परिवारों में भी यह समस्या है। मूलत: यह समस्या समाज की मानसिकता से जुड़ी हुई है। अगर उनकी मानसिकता का विकास नहीं हुआ तो महिला उत्पीड़न की समस्या में कोई सुधारात्मक परिवर्तन नजर नहीं आयेगा।

जिस तरह समस्या का स्वरूप, काल, स्थान और सामाजिक स्थिति के अनुरूप होता है उसी तरह उस समस्या का समाधान भी इसी अनुसार निकाला जाता है। समस्या की गंभीरता को देखते हुए उसके निर्मूलन के लिये किये जानेवाले प्रयास भी अधिक दमदार होते जाते हैं। संपत पाल देवी द्वारा शुरू की गई ‘गुलाबी गैंग’ भी ऐसे ही दमदार उपायों, योजनाओं और उनके कार्यान्वयन के लिये प्रसिद्ध हैं। महिलाओं पर होनेवाले हर तरह के अत्याचारों के खिलाफ यह गैंग न सिर्फ आवाज उठाती है वरन स्थिति की गंभीरता को देखते हुए लाठियों का सहारा भी लेती है।

बेटी के जन्म को जहां बोझ समझा जाता है ऐसे परिवार में संपत पाल का जन्म हुआ। उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में रहनेवाला यह परिवार बड़ी ही कठिनाई से जीवन-यापन करता था। माता-पिता और 4-5 भाई-बहनों के परिवार में सन 1962 की दीवाली को संपत का जन्म हुआ। संपत पाल का परिवार पिछड़ी जातियों में गिना जाता था अत: एक तरह से समाज से बहिष्कृत ही था। जहां दो समय के खाने के लाले पड़े हों वहां शिक्षा प्राप्त करने की सोचना (और वह भी महिलाओं का) बहुत कठिन काम था। अत: संपत पाल का किताबी ज्ञान केवल अक्षरों की पहचान तक ही सीमित रह गया। माता-पिता का भी मानना यही था कि अगर बेटे को पढाएंगे तो वह आगे जाकर कमाऊ पूत बनेगा, बेटी तो पराया धन है उसे पढ़ाने से कोई फायदा नहीं होगा। अशिक्षित होते हुए भी संपत स्वाभिमानी थी। रूढियों और परंपराओं के बोझ तले दबकर जिंदगी गुजारना उसे पसंद नहीं था। परिवार में उसके भाई का बहुत लाड-प्यार होता था परंतु उसे और उसकी बहनों को हमेशा काम करना पड़ता था और फिर भी केवल आधी रोटी ही खाने को मिलती थी। माता-पिता का यह व्यवहार धीरे-धीरे उसके मन में क्रोध पैदा करने लगा था परंतु इस क्रोध की परिणिती कभी प्रत्यक्ष रूप में नहीं हुई।

इसी अवस्था में बारह वर्ष की आयु में अर्थात वयस्क होने के पहले ही उसका विवाह कर दिया गया। इसके लिये न तो वह शारीरिक रूप से तैयार थी और न ही मानसिक रूप से, परंतु माता-पिता को तो जैसे उससे मुक्ति ही चाहिये थी। ससुराल का वातावरण भी मायके से कुछ भिन्न नहीं था। दिनभर काम करना और रात में पति की मार और अत्याचार सहन करना ही जैसे उसकी दिनचर्या बन गयी थी। संपत केवल पंद्रह वर्ष की आयु में पांच बच्चों की मां बन चुकी थी। इतनी कम उम्र में पांच बार मातृत्व सहन करनेवाली स्त्री के शरीर और मन का ध्यान रखने की बात तो किसी के जेहन में आने का प्रश्न ही नहीं था। संपत का पति घर-घर जाकर कुल्फी बेचा करता था। उसकी आमदनी से परिवार का खर्चा चलना मुश्किल होने लगा। सास-ससुर की ओर से संपत को आदेश मिलने लगे कि बेटियों को पढ़ाने से अच्छा है किसी काम पर लगा दिया जाये जिससे घर का खर्चा चलने में आसानी हो सके। खुद के द्वारा झेली गयी सारी यातनाओं को फिर से अपनी बेटियों पर हावी होते देख संपत का क्रोध बढ़ने लगा। उसने अपनी बेटियों की पढाई तो बंद नहीं की वरन खुद ही आंगनबाडी की नौकरी कर ली जिससे घर का खर्च चलाने में थोडी मदद मिल सके।

संपत की यह कहानी केवल उस अकेली की नहीं थी। गांव की सभी महिलाओं की कहानी भी यही थी। किसी में भी इस परिस्थिति का विरोध करने की हिम्मत नहीं थी। संपत के क्रोध और संयम का ज्वालामुखी भी तब फूटा जब उसने गांव की एक अन्य स्त्री को अन्याय सहन करते हुए देखा। उस स्त्री को उसके घरवाले बेदर्दी से मारपीट रहे थे। संपत से यह देखा नहीं गया और वह उसे बचाने कूद पडी। इस सब में उसे भी मार सहन करनी पड़ी। उस स्त्री को अपने घर लाकर संपत ने उसकी मरहमपट्टी की। संपत के घरवालों ने इस सब को उसकी व्यर्थ की समाज सेवा करार देते हुए तुरंत बंद करने के आदेश सुना दिये और साथ में यह धमकी भी दी गयी कि अगर यह सब जल्द ही बंद नहीं हुआ तो उसकी खैर नहीं।

अपने परिवार के विरोध को सहन करते हुए संपत ने अपना कार्य जारी रखा और अपने सभी बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलवाई। अपनी घर की परिस्थिति से तो वह लड़ रही थी परंतु अपने आस-पास की महिलाओं की दुर्दशा उससे देखी नहीं जा रही थी। फिर उसने निश्चय किया कि इस समस्या को जड़ से मिटाने के लिये अब कुछ ठोस कदम उठाने ही होंगे। फिर वह धीरे-धीरे आस-पास की महिलाओं से मिलने लगी और उन्हें इस अन्याय के विरुद्ध लड़ने के लिये प्रेरित करने लगी। धीरे-धीरे इन महिलाओं में साहस जागा। ये महिलाएं पीडित महिला के घर जाकर पहले उसके पति और परिवारवालों को समझाती थीं कि महिलाओं पर अत्याचार करना कानूनन गुनाह है। फिर भी अगर अत्याचार का क्रम अनवरत शुरू रहता तो संपत और उसके साथ और पांच-सात महिलाएं पीड़ित महिला के घर लाठियां लेकर जाती थीं और उसके पति और परिवारवालों की खूब पिटाई करती थीं। इस सब के कारण संपत अपने ही घरवालों की आंखों में खटकने लगी और एक दिन उन लोगों ने संपत को घर से बाहर निकाल दिया। सौभाग्य से संपत के बच्चे उसकी ओर थे। सन 2006 तक गांव की महिलाओं में काफी एकजुटता निर्माण हुई और अत्याचार के विरोध में लड़ने का साहस भी निर्माण हुआ। इस आंदोलन के लिये गणवेश निर्धारित हुआ गुलाबी साड़ी और महिलाओं के इस दल का नाम हुआ ‘गुलाबी गैंग’। ‘महिलाओं के द्वारा महिलाओं के लिये चलाया जानेवाला झटपट न्यायालय’ कुछ ऐसी ही भूमिका थी इस गैंग की। न्यायालय में वर्षों तक चलनेवाले प्रकरणों को भी ‘गुलाबी गैंग’ ने झटपट सुलझाया। इस गैंग का काम तो बढ़ रहा था परंतु संपत को रहने के लिये जगह नहीं थी। उसने अपने बच्चों के साथ लगभग सात साल बेघर ही गुजारे, हालांकि आंगनबाडी का काम चल रहा था। फिर ‘गुलाबी गैंग’ की महिलाओं ने ही उनके रहने की व्यवस्था की।

अब ‘गुलाबी गैंग’ का कार्य काफी फैल चुका है। आसपास के 5-7 जिलों की महिलाएं इसकी सदस्य हैं। सदस्य संख्या भी 22 हजार को पार कर चुकी है। इसकी दहशत के कारण उस क्षेत्र में रहनेवाली महिलाओं पर होनेवाले अत्याचारों में काफी कमी आई है।

‘गुलाबी गैंग’ के इस काम को देखकर कुछ लोगों ने उन्हें आर्थिक मदद करने की इच्छा जताई परंतु वे लोग उसका श्रेय चाहते थे और साथ ही यह भी चाहते थे कि ‘गुलाबी गैंग’ उनकी कार्यपद्धति से कार्य करे। इसलिये ‘गुलाबी गैंग’ ने उनके प्रस्ताव नहीं माने। इनके कार्यों पर विदेशियों ने फिल्म भी बनाई। ‘गुलाबी गैंग’ और संपत को उनके साहस के लिये राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिले। परंतु संपत को सबसे अधिक खुशी तब हुई जब उसका बेटा सरपंच बना और इस घटना के कारण संपत ने अपने बच्चों सहित सम्मान से घर में फिर से प्रवेश किया।
छोटे से कस्बे से शुरू हुआ यह अभियान आज महिलाओं की एकता, आत्मसम्मान और साहस का प्रतीक बन गया है। ‘गुलाबी गैंग’ महिलाओं को यह संदेश दे रहा है कि अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ स्वयं सिद्ध होने का समय आ गया है।
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