मुसलमान बेबाकी से राय और वोट दें

 ‘कांग्रेस मुसलमानों के मत प्राप्त करने के लिये मोदी का भय निर्माण कर रहे हैं,’ यह आरोप सैयद महमूद मदनी ने कांग्रेस पर लगाया है। सैयद महमूद मदनी जमियत-ए-उलेमा-ए-हिंद के प्रमुख हैं। अत: उनका वक्तव्य महत्वपूर्ण है। आजकल मुसलमान समाज के कई नेताओं के मोदी पर विश्वास व्यक्त करने वाले बयान आ रहे हैं। नरेन्द्र मोदी की विकास की संकल्पना के बारे में मुसलमान जनता के मन की भावना उनके नेताओं के बयानों से स्पष्ट हो रही है। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में गुजरात में हुआ विकास, उस विकास के कारण मुसलमान जनता को मिला लाभ बहुत बड़ा है। इसी वजह से गुजरात और पूरे देश के मुसलमानों के मन में मोदी की कार्यपद्धति के प्रति विश्वास निर्माण हो रहा है। नरेन्द्र मोदी के द्वारा ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ तत्व सामने रखकर किया गया विकास और सन 2014 में संपन्न होनेवाले चुनावों में नरेन्द्र मोदी की विकास की संकल्पना का समर्थन करने की मुसलमानों की उजागर होती मंशा का पेश है लेखाजोखा-

गुजरात के मुख्यमंत्री और भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी ने हरिद्वार में हुई एक सभा में कहा था कि “मैं स्वयं को किसी एक समाज का नेता नहीं मानता। ‘हिंदू भवन्तु सुखिन: नहीं वरन् सर्वे भवन्तु सुखिन:’ तत्व को लेकर ही मैं काम करता हूं।” उनका यह व्यक्तव्य भारतीय समाज की ओर देखने के उनके दृष्टिकोण को अधोरेखित करता है। तथाकथित मानवाधिकारवादियों और सेक्युलरिस्टों की टोली ने हमेशा की तरह अल्पसंख्यक समाज को नरेन्द्र मोदी के नाम से भयग्रस्त करने का प्रयत्न जारी रखा है। परंतु इन अथक प्रयासों के बावजूद भी मोदी को 2012 के गुजरात चुनावों में स्पष्ट जनादेश मिला। देशभर के अल्पसंख्यक समुदायों का नेतृत्व करनेवालों की गौरवपूर्ण टिप्पणियों को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि गुजरात अन्य राज्यों की तुलना में बहुत आगे निकल चुका है। जिस दूरदर्शी नेतृत्व के कारण यह कायालपट हुई है उस पर जनता अटूट विश्वास करती हैं और यह कामना भी करती है कि हमारे देश के उज्ज्वल भविष्य के लिये देश के भावी प्रधानमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी ही जिम्मेदारी संभालें। आज गुजरात विकास के जिस पायदान पर है वहां हिन्दू और मुसलमान बराबरी से लाभान्वित हो रहे हैं। गुजरात में हुए गोधरा कांड के लिये नरेन्द्र मोदी ने कभी माफी नहीं मांगी परंतु राज्य को विकास के मार्ग पर ले जाने का लक्ष्य रखा। राज्य का प्रशासन अपने नियंत्रण में रखकर उसे दिशा देनेवाले ‘प्रभावी’ प्रशासक और लोगों की नब्ज को अचूक पहचानने वाले ‘लोकमान्य’ राजनेता की दोहरी लोकप्रियता उन्हें प्राप्त है। व्हायब्रैंट गुजरात परिषद में वे बड़े-बड़े उद्योगपतियों को एक मंच पर लाये और उनका ध्यान गुजरात पर केन्द्रित किया। नरेन्द्र मोदी को अब कॉर्पोरेट जगत में भी पसंद किया जा रहा है। किसी एक राज्य का मुख्यमंत्री पूरे भारत की राजनैतिक बिसात पर केंद्रीय भूमिका निभाये यह शायद पहली बार हो रहा है। उनकी मौजूदगी के कारण ही आज राजनैतिक रंगमंच पर कई बातें तय हो रही हैं। किसी जमाने के ‘संघ प्रचारक’ से लेकर ‘विकास पुरुष’ तक और अब भारत के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार तक का प्रवास देखते हुए निश्चित ही ‘मोदीत्व’ एक ब्रैण्ड के रुप में सामने आ रहा है। यह भी सही है कि मोदी की शैली पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की याद दिलाती है। इंदिरा गांधी की तरह मोदी भी करिश्माई नेता हैं।

सन 2002 के गोधरा हत्याकांड के बाद वहां साम्प्रदायिक दंगे हुए थे। अन्य कोई नेता होता तो इन दंगों में भस्म हो जाता; परंतु भारतीय राजनीति को विकास की दिशा में सोचने के लिये बाध्य करने वाले नरेन्द्र मोदी के बारे में विचार किया जाये तो प्रखर राष्ट्रवाद और विकास की स्पष्ट संकल्पना के कारण वे तीन बार गुजरात चुनावों में विजयी हुए। आगामी 2014 के लोकसभा चुनावों की पार्श्वभूमि में भारत के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में वे ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ का अभियान भी चला रहे हैं। भ्रष्टाचार में लिप्त होने के कारण यूपीए लाचार है और सत्ता के लिये होनेवाले इस संघर्ष में सबसे लोकप्रिय नेता और विजेता भारतीय जनता पार्टी की कमान संभाल रहा है। पिछले एक दशक से पराभव सहन कर रही भाजपा के सत्ता में आने का अवसर दिखाई दे रहा है।

देश की दशा और दिशा बदलने की क्षमता अब कांग्रेस में दिखाई नहीं दे रही है। गुजरात का समग्र विकास आज देश के विकास का माडल बन रहा है। गुजरात में जनता को अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक के चश्मे से नहीं देखा जाता। यही विचार राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकारने और अमल करने की आवश्यकता है, ऐसा देश की हिन्दू-मुसलमान जनता को लगने लगा है।

गुजरात की मुसलमान जनता ने नरेन्द्र मोदी पर 2012 में संपन्न हुए चुनावों में अपना विश्वास प्रगट करके समाज में द्वेष और तिरस्कार की भावना फैलानेवाली सेक्युलर नीतियों को साफ नकार दिया। सेक्युलरिस्टों की वोट बैंक राजनीति का शिकार होकर मुसलमानों ने वस्तुत: अपने समाज का नुकसान ही किया है। अब ऐसा वातावरण नजर आ रहा है कि गुजरात की तरह ही देश के अन्य राज्यों के मुसलमान भी गुजरात के जनादेश में सहभागी होकर 2014 के लोकसभा चुनावों मे सकारात्मक विकास की दिशा में अपना सहभाग स्पष्ट करेंगे। साथ ही मुसलमानों को काकबगुआ दिखाकर सदैव भयभीत करनेवाले, ब्लैकमेल करनेवाले और प्रत्यक्ष विकास से दूर रखनेवाले तथाकथित सेक्युलर दलों को उनकी असली जगह भी दिखा देंगे।

गुजरात और नरेन्द्र मोदी देश के विकास के प्रतीक बन गये हैं। सन 2002 की तुलना में सन 2012 में हुए गुजरात विधानसभा के चुनावों में 31% अधिक मुसलमानों ने भारतीय जनता पार्टी को मतदान किया। 8 में से 6 मुस्लिम बहुल मतदान क्षेत्रों में भाजपा के प्रत्याशी विजयी हुए थे। भारतीय जनता पार्टी को मतदान करने वाले मुसलमान समाज की बढ़ती संख्या महानगर पालिका चुनावों में भी दिखाई दे रही है। इसका कारण साफ है। मोदी ने गुजराती समाज को शांति और न्याय का वरदान दिया है। गुजरात के साठ साल के इतिहास पर नजर डालें तो यह पहला दशक है जिसमें गुजरात दंगों से मुक्त रहा। दुनिया की सभी संस्कृतियों में लोग उसी नेता को पसंद करते हैं जो शांति और न्याय प्रदान कर सकता है। मोदी के कठोर परिश्रम के कारण ही आज गुजरात की सारी जनता उनके साथ है। देश के हिंदू मुसलमान और अन्य धर्मों को माननेवाले लोग भी नरेन्द्र मोदी की ओर भविष्य की आशा के किरण के रूप में देख रहे हैं।

गुजरात विकास के कारण आई आर्थिक संपन्नता ने मुसलमानों के घरों में भी प्रवेश किया है। उसी के परिणामस्वरूप नरेन्द्र मोदी को मतदान करने के लिये मुस्लिम बड़ी संख्या में मतदान केन्द्रों पर कतारें लगाते रहे हैं। यह दृश्य इस बात का द्योतक है कि मोदी की सर्वसमावेशी विकास संकल्पना में अल्पसंख्यक समाज भी लाभान्वित हो रहा है। मुस्लिम समाज की ओर से आये विविध संकेतों पर नजर डालने पर यह निश्चित रूप से दिखाई देगा। गुजरात में सबसे अधिक गति से विकास करनेवाले जिले कच्छ और भरूच हैं, जहां मुस्लिम जनसंख्या अधिक है। गुजरात में मुसलमानों की प्रति व्यक्ति आय 879 रुपये है। इसके बाद दूसरा क्रमांक आता है कर्नाटक का। वहां मुसलमानों की प्रति व्यक्ति आय 785 रुपये है। सरकारी नौकरियों में मुसलमानों की हिस्सेदारी के संदर्भ में भी गुजरात देश में सबसे आगे है। गुजरात में पिछले दस सालों में कोई भी दंगा नहीं हुआ। केवल इतना ही नहीं, साम्प्रदायिक तनाव निर्माण हो या कर्फ्यू लगाना पडे ऐसी कोई घटना नहीं हुई। बहुसंख्यक समाज के साथ ही अल्पसंख्यक समाज भी अपना व्यापार-उद्योग बराबरी के अधिकार से कर रहा है। यही बात तथाकथित मानवाधिकारवादी और सेक्युलरिस्टों को बहुत दुख पहुंचाने वाली है।

महाराष्ट्र के भूतपूर्व पुलिस महानिदेशक एस. एम. मुश्रफ कहते हैं कि ‘मोदी के विरोध में तिरस्कार और नफरत का अभियान चलानेवालों की ओर अब कोई अधिक ध्यान नहीं देता; क्योंकि निरंतर होने वाले मीडिया ट्रायल के बाद भी गुजरात की जमीनी हकीकत कुछ और ही है। आज मुसलमानों के लिये गुजरात सबसे सुरक्षित स्थान है।” जब-जब मुस्लिम समाज के किसी भी व्यक्ति ने तथाकथित मानवाधिकारवादी और सेक्युलरिस्टों के अभियान के विरुद्ध आवाज उठाने का प्रयत्न किया है तब-तब उन पर अत्यंत क्रूर तरीके से बौद्धिक हमला किया गया। अत्यंत सम्मानित और सुप्रसिद्ध मुस्लिम विद्वान मौलाना वस्तानवी को ऐसे ही कट्टर विरोध का सामना करना पड़ा, क्योंकि उन्होंने कहा था कि ‘गुजरात में मुसलमानों को मोदी सरकार की सर्वसमावेशकारी विकास नीति का लाभ मिला है।’ मोदी के लिये कहे गये इन सत्यवचनों के कारण उन्हें अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से तथाकथित मानवाधिकारवादी और सेक्युलरिस्टों के बौद्धिक हमलों का सामना करना पड़ा।
सैयद महमूद मदनी जमियत-ए-उलेमा-ए-हिंद के प्रमुख हैं। जयपुर में आयोजित एक समारोह में उन्होंने कांग्रेस को खरी-खरी सुनाई थी। उन्होंने अपने भाषण में कहा था कि ‘कांग्रेस वाटे पाने के लिये मोदी का डर निर्माण कर रही है। मोदी भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनने के कारण मुसलमानों को डरने की कोई आवश्यकता नहीं हैं।’ इस वाक्य को कहते हुए उन्होंने कांग्रेस को इशारा किया कि पांच राज्यों में होनेवाले चुनावों में मुस्लिम जनता कांग्रेस को सबक सिखायेगी। किसी को लेकर डर निर्माण करके मुस्लिम मत प्राप्त करने के बजाय कांग्रेस द्वारा मुस्लिम समाज की भलाई के लिये काम करना अधिक महत्वपूर्ण है।

भारत के प्रसिद्ध फिल्म लेखक सलीम खान ने एक साक्षात्कार में एक वरिष्ठ पत्रकार से कहा था कि ‘क्या किसी को याद है कि 1991 में मुंबई में हुए दंगों के समय महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री कौन थे? क्या उनका नाम भी याद है कि मालियाना और मेरठ दंगों के समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री कौन थे? भागलपुर और जमशेदपुर दंगों के समय बिहार का मुख्यमंत्री कौन था किसी को याद है? गुजरात में मोदी सरकार आने के पूर्व कांग्रेस के काल में सैकडों दंगे हुए, क्या किसी को याद है? 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिखों का कत्लेआम किया गया। उस समय दिल्ली की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी थी, किसी को याद है? अकेले नरेन्द्र मोदी पर ही उंगली क्यों उठाई जाती हैं? वही लोग उंगली उठाते हैं जिनके शासनकाल में निरंतर कत्लेआम हुए हैं। सेक्युलर प्रसार माध्यम इन सभी को भूल चुके हैं। पिछले दस सालों में इन लोगों ने सुनियोजित तरीके से गुजरात दंगों की आग को धधकाए रखा है। देश में स्वतंत्रता के बाद लगभग 40 साल तक केन्द्र और अधिकांश प्रदेशों नें कांग्रेस का एक छत्र राज्य था। तब कांग्रेस के शासन काल में मुसलमानों की स्थिति क्यों नहीं सुधरी? क्यों उन्हें विकास से वंचित रखा गया? गुजरात की वर्तमान स्थिति यही सिद्ध करती है कि अगर राजनैतिक इच्छाशक्ति हो तो 10 सालों में राज्य की दशा और दिशा बदली जा सकती है। पिछले 9 सालों में देश में कांग्रेस नेतृत्ववाली यूपीए सरकार का राज है। परंतु इस काल में देश की प्रगति होने के बजाय सभी तरह से अधोगति ही हो रही है।

देश के प्रमुख मुसलमान नेताओं के वक्तव्यों में नरेन्द्र मोदी की सीधी प्रशंसा कहीं भी नहीं थी परंतु यह सभी पता है कि गुजरात का आखों में भरने वाला विकास मोदी के नेतृत्व के कारण हो रहा है। ऐसे समय में मुस्लिम समाज के इतने विचारकों द्वारा की गई प्रशंसा गलत नहीं हो सकती है और इतने सारे लोग कभी भी एक साथ गलत नहीं हो सकते। इस बारे में भी कोई शंका नहीं है कि गुजरात के साथ ही अन्य राज्यों के मुसलमान नरेन्द्र मोदी का विचार करने लगे हैं। जब 2014 के चुनाव और देश के भावी प्रधानमंत्री के उम्मीदवार की चर्चा होती है तब नरेन्द्र मोदी का उल्लेख किये बगैर चर्चा पूर्ण नहीं होती। इस बात पर गौर करना आवश्यक है कि 2002 के सांप्रदायिक दंगों के जहरीले सही-गलत आरोपों को सहन करनेवाले मोदी एक सर्वसमावेशक राजनैतिक नेता की ऊंचाई तक कैसे पहुंचे? ऐसी ऊंचाई तो आज तक अन्य किसी राजनैतिक नेताओं को नहीं मिल सकी। अत्यंत प्रतिकूल परिस्थिति होने औरसाम्प्रदायिकता का आरोप होने के बावजूद भी मोदी ने अपना लक्ष्य ‘सबका साथ, सबका विश्वास’ ही रखा।

मुसलमानों को सदैव दहशत के वातावरण में रखकर उनका एकत्रित वोट बैंक के रूप में अब तक दोहन किया जाता रहा है। मोदी के बढ़ते प्रभाव के कारण पारंपरिक मुसलमान समाज का उपयोग करनेवाले लोग अब भयग्रस्त हैं। ‘मोदी फोबिया’ नामक रोग इन तथाकथित मानवाधिकारवादी लोगों की दुनिया में खूब फैल रहा है। भारतीय राजनीति में मोदी फोबिया के कारण वातावरण बहुत दूषित हो चुका है। अगर गुजरात के ग्रामीण इलाकों के रास्तों का गुणगान किया जाये, गुजरात के गांवों तक 24 घंटे बिजली पहुंचती है इस बात की खुशी व्यक्त की जाये तो उसे तुरंत ‘फैसिस्ट समर्थक’ कहा जाता है। धर्मनिरपेक्षवादी लोगों को इस बात की याद नहीं आती या वे याद करना पसंद नहीं करते कि सन 2002 के बाद गुजरात में कोई दंगा नहीं हुआ। गुजरात के विकास के कारण मुस्लिम समाज की विकास दर बढ़ रही है। इस बात की याद धर्मनिरपेक्षतावादी लोगों को नहीं आती। क्योंकि मुस्लिम समाज में आ रही जागृति के कारण धर्मनिरपेक्षतावादी लोगों द्वारा चलाई जा रही दुकानदारी अब बंद पड़ने के कगार पर है। उनकी मूल चिंता यही है।

‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ तत्व आंखों के सामने रखकर गुजरात में मोदी द्वारा किया गया विकास ही देश के विकास का रोल माडल बन गया है। इससे देश के मुसलमान भी लाभान्वित होंगे। देश की आज की परिस्थिति में देश के मुसलमानों की क्या राय है? उन्हें क्या चाहिये? भयग्रस्त वातावरण में मुसलमानों का कांग्रेस द्वारा केवल वोट बैंक के रूप में उनका इस्तेमाल करना या नरेन्द्र मोदी और भाजपा के साथ विकास की दिशा में मार्गक्रमण करना? देश की मुसलमान जनता को अपना स्पष्ट मत बताना है और वह समय अब नजदीक आ रहा है।
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