दलित नेतृत्व का अभाव

पिछले दिनों राहुल गांधी ने कहा था कि मायावती किसी दलित नेता को उभरने नहीं देती हैं। उन्होंने सच कहा था। इसका स्वागत किया जाना चाहिए कि उन्हें दलितों की चिंता है। वास्तव में देश में दलित नेताओं का अभाव है। सवर्णो एवं पिछड़ों के मुकाबले दलित नेता नहीं के बराबर हैं। जब भारतीय जनता पार्टी की रैली होती है तो मंच पर लालकृष्ण आडवाणी, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, नितिन गडकरी, नरेंद्र मोदी, मुरली मनोहर जोशी आदि सवर्ण दिग्गज नेता तो दिखते हैं, लेकिन एक भी दलित नहीं होता। उसी तरह से कांग्रेस के मंच पर दलित नेता नहीं दिखते और कभी-कभार होते भी हैं तो पार्टी द्वारा प्रमाणित दलित नेता न कि दलित समाज द्वारा। पार्टियों के अलावा मीडिया की भी बड़ी भूमिका होती है नेतृत्व उभारने में। जब 2010 में अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर गांधी समाधि से जंतर-मंतर तक प्रदर्शन किया था तो सौ से भी कम लोग उनके साथ थे। 2011 में जब मीडिया ने उन्हें प्रोजेक्ट किया तो वह देश में ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में अपनी छाप छोड़ गए। भारत जातियों का देश है और जब तक सभी जातियों की समुचित भागीदारी नहीं होगी, देश कमजोर ही रहेगा।

नेता को बनाया भी जा सकता है और नहीं भी। केवल पार्टी या नेतृत्व चाहे कि बड़ा दलित नेता पैदा हो जाए, तो यह संभव नहीं है। अगर न उभरने देने का मन बना लिया तो भी बड़ा दलित नेतृत्व पैदा नहीं हो सकता। प्रश्न उठता है कि क्या कांग्रेस में दलित नेतृत्व है? जवाब मिलेगा कि वहां भी मध्यम स्तर के दलित नेता ही हैं, शीर्ष स्तर के नहीं। कांग्रेस ने क्यों नहीं बड़ा दलित नेतृत्व उभारने का कार्य किया? वर्तमान में कांग्रेस के पास एक भी ऐसा दलित चेहरा नहीं है, जिसकी पहचान राष्ट्रीय स्तर की हो। कांग्रेस चाहे भी तो पैदा नहीं कर सकती, क्योंकि उसके पास इस समय ऐसा कोई दलित है ही नहीं। बड़ा नेतृत्व उभारने के लिए पार्टी और मीडिया आदि के सहयोग के साथ-साथ खुद में प्रतिभा और क्षमता का होना भी जरूरी है। आशीर्वाद और विरासत की भूमिका की सीमाएं हैं। नेता संघर्षों की उपज होता है। ज्ञान और क्षमता का होना तो जरूरी है ही। जब ये तत्व विद्यमान हों तो पार्टी का सहयोग भी काम आता है। भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों के पास वर्तमान में ऐसा चेहरा नहीं है।

अगर देखा जाए तो मायावती का उभार परिस्थितिजन्य ज्यादा है। कांशीराम ने जब दलितों को गोलबंद करना शुरू किया तो उस समय मैदान साफ था और दलितों में भूख थी कि कोई उनका अपना नेता हो। बामसेफ और बहुजन समाज पार्टी में मायावती से भी ज्यादा काबिल और वरिष्ठ दलित नेता थे, लेकिन कांशीराम ने उन्हें नहीं उभरने दिया। उनकी विशेष कृपा मायावती पर थी और इसी वजह से सभी बड़े नेताओं ने उनका साथ छोड़ दिया।

जो बात राहुल गांधी ने कही मैं उसी को दूसरे तरीके से कहता रहा हू्ं। मुझे मायावती से कुछ सवाल पूछने हैं। पिछले 15 सालों में आरक्षण लगभग एक-तिहाई खत्म हो चुका है। क्यों नहीं वह इस पर जनआंदोलन करतीं। महंगाई और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भी धरना-प्रदर्शन नहीं किया जाता। आरक्षण कानून बनाने के लिए संसद में 2004 से विधेयक लंबित है, वह क्यों चुप हैं? कैसे उनके समय में पदोन्नति में आरक्षण उत्तर प्रदेश में खत्म हुआ? क्यों नहीं पार्टी के नेताओं को बोलने और फैसला लेने का अधिकार देतीं? क्या एक नेतृत्व से दलितों का सशक्तिकरण हो जाएगा? लोकसभा और राज्यसभा दोनों में बसपा के करीब 40 सांसद हैं। उन्हें क्यों नहीं आजादी देतीं कि जहां भी अधिकारों की कटौती हो, जुल्म व अत्याचार हो, वहां पहुंचें और संघर्ष करें। दलित कर्मचारियों-अधिकारियों का नाना प्रकार से उत्पीड़न होता है। उनके मामलों को उठाने और संबंधित अधिकारियों व मंत्रियों से मिलकर समाधान करवाने की क्यों नहीं इजाजत है? इन्हीं कर्मचारियों व अधिकारियों ने बामसेफ, कांशीराम और मायावती को स्थापित किया था। आज उन्हीं से दूरी क्यों? ऐसा तो दूसरी पार्टियां भी नहीं करतीं।

अधिकतर दलित मायावती को उनके कार्यों की वजह से समर्थन नहीं दे रहे हैं, बल्कि इसलिए कि वह एकमात्र बड़ा नेतृत्व हैं जिसे वे सुरक्षित रखना चाहते हैं। आम दलित सोचता है कि सवर्ण और पिछड़े नेता ही हमें क्या दे देंगे? तो कम से कम मान-सम्मान और मनोवैज्ञानिक तुष्टि के लिए इस नेतृत्व को क्यों कमजोर करें, भले ही उसे कोई फायदा न हो रहा हो। अगर मायावती ने अपना रवैया नहीं बदला तो वह भी दिन दूर नहीं जब उनका नाम लेने वाले बहुत कम रह जाएंगे। क्या देश में दो-चार दलित भी नहीं हैं जो सतीश मिश्रा, शशांक शेखर, स्वामी प्रसाद मौर्य और नसीमुद्दीन सिद्दीकी के कद के हों? क्यों मंच पर कोई दलित नहीं बैठता? हद तो यह है कि जिस पार्टी से मायावती का संबंध है, उसमें भी दलित नेता को उभरने नहीं देतीं। यदि मायावती अपने रुख में बदलाव के लिए तैयार हों तो सारे दलितों को उनके साथ खड़ा करने का बीड़ा उठाया जा सकता है। चाहे आज संभव न लगता हो, रामविलास पासवान और रामदास आठवले से भी बात की जा सकती है।
आशीष नंदी का बयान याद आता है। उन्होंने कहा था कि बंगाल में सौ साल में कोई दलित नेता नहीं उभरा। वहां पर कम्युनिस्ट पार्टी का लगभग 35 साल तक शासन रहा। क्यों नहीं दलित नेतृत्व उभरा? ताज्जुब भी होता है क्योंकि कम्युनिस्ट पार्टियों का नेतृत्व सर्वहारा वर्ग से होता है और दलितों, आदिवासियों से बड़ा सर्वहारा कौन है?

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