नरेन्द्र मोदी का विकास माडल

आगामी लोकसभा चुनावों के बारे में अभी तक जो पूर्वानुमान आए है उनमें भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को सर्वाधिक सीटें मिलने की उम्मीद है और भाजपा का यह सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन होगा। नरेन्द्र मोदी जनता की पहली पसंद माने जा रहे हैं। कांगे्रस नेतृत्व वाले संयुुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) को भारी पराजय का सामना करना पड़ेगा। अनुमान तो यह भी है कि कांगे्रस का सूपड़ा साफ होगा और उसे 1952 के बाद सब से निराशाजनक परिणामों का सामना करना पड़ेगा।

ये पूर्वानुमान सच्चाई के अधिक निकट प्रतीत होते हैं। मेरी नजर में इसके चार कारण हैं- पहला यह कि दावोद के विश्व आर्थिक मंच में वित्त मंत्री और कांगे्रस के शीर्ष नेता पी चिदम्बरम ने चुनावों के बाद आने वाले अपने उत्तराधिकारी की जबावदेही को एक कठिन कार्य बताकर अपनी पार्टी की पराजय अप्रत्यक्ष रूप से कबूल कर ली। दूसरा कारण यह है कि कांग्रेस ने राहुल गांधी का पार्टी के प्रधान मंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में नामांकन से कन्नी काट ली। तीसरी घटना गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी का भाषण है। उन्होंने लोक-लुभावन वायदों और लोक-लुभावन अराजकता के प्रति चेतावनी दी है। उनका आशय बीते साढ़े 6 दशकों की विफलता, गरीबी, निरक्षरता, बेरोजगारी की ओर ध्यान आकर्षित करना तो है ही, साथ ही केजरीवाल सरकार के धरना-आंदोलन और अराजकता की ओर है। चौथा कारण यह है कि हाल में हुए पांच राज्यों के चुनाव में कांग्रेस का सफाया हो गया। मिजोरम को छोड़ दिया जाए तो शेष चार राज्यों में से मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ में भाजपा ने अपनी सत्ता कायम रखी तो राजस्थान को कांग्रेस से पुनः छीन लिया। दिल्ली में भी उसे सर्वाधिक सीटें मिलीं। आप कांग्रेस समर्थन से सत्ता में आ गई, लेकिन इससे यह बात तो स्पष्ट है कि देश में कांग्रेस विरोधी अंतर्प्रवाह है। गांधी-नेहरू वंश का आभा मंडल अपनी चमक खो चुका है।

कांगे्रस उपाध्यक्ष राहुल गांधी देश में व्याप्त गरीबी को मनोदशा बता रहे है। कांगे्रस मंहगाई और भ्रष्टाचार को कोई मुद्दा ही नहीं मानती। ऐसे में भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता, प्रधान मंत्री पद के प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी ने पार्टी की राष्ट्रीय परिषद के मंच से विजन-2014 के रूप में देश के समक्ष समस्याओं के समाधान की एक स्पष्ट रूपरेखा पेश की है। मंहगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार पर सुशासन और विकास से लगाम लगाने की ठोस बात की है। विकास के माडल के रूप में उन्होंने स्मार्ट-सिटी, सैटेलाइट-सिटी सहित 5-टी का फार्मूला दिया है। ये 5-टी हैं- टैलेंट, ट्रेडिशन, टूरिज्म, ट्रेड, टेक्नोलॉजी। इनका भरपूर उपयोग कर विकास किया जायेगा। उन्होंने कहा कि हेल्थ इन्श्योरेंस नहीं, आम आदमी को कम्पलीट एश्योरेंस (भरोसा) चाहिए। हर राज्य में आईआईटी, आईआईएम, एम्स की सुविधा दी जायेगी। 100 स्मार्ट-सिटी बनाये जायेंगे। सैटेलाइट सिटी बनाकर झोपड़पट्टियों को पक्के मकानों में बदला जायेगा। सार्वजनिक परिवहन सरल-सुलभ करने के लिए उत्तर-दक्षिण एवं पूर्व-पश्चिम को बुलेट ट्रेनों से जोड़ा जायेगा। देश के कालेधन को लाकर सुस्त पूंजी को कार्यशील पूंजी में बदला जायेगा। मंहगाई को द़ृष्टि में रखकर गरीबी उन्मूलन के लिए विशेष कोष बनाया जायेगा। अंतिम व्यक्ति को ध्यान में रखकर एक सर्वसमावेशक योजना बनाकर उस पर तेजी से और प्रभावी ढंग से अमल किया जाएगा। नरेन्द्र मोदी की घोषणा के बाद राष्ट्रीय परिषद की बैठक में जो उल्लास दिखा उसने साबित कर दिया कि आजादी के बाद लोकसभा के इस चुनाव में जनता का जितना उत्साह है उतना कभी नहीं रहा। लेकिन वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी मह कहना नहीं भूले कि हमें अति विश्वास में आकर 2004 की तरह अवसर नहीं गंवाना है।

नरेन्द्र मोदी के ‘कांगे्रस मुक्त भारत’ के आव्हान के सिलसिले में याद आता है कि कांगे्रस की हठवादिता, अधिनायकवादी प्रवृत्ति के विरूद्ध यह आवाज देश में पहली बार नहीं उठी है। अंतर यही है कि कांगे्रस मुक्त भारत बनाने के लिए जितना व्यापक और प्रबल समर्थन नरेन्द्र मोदी ने बटोरा है वहीं अभूतपूर्व है, जिसका सुफल द़ृष्टिगोचर होने लगा है। कांगे्रस मुक्त भारत की पहली आवाज डॉ. राममनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण ने पं. नेहरू मंत्रिमंडल के दौरान यह कहकर उठायी थी कि सरकारी योजना का लाभ अंतिम व्यक्ति को नहीं मिल पा रहा है। इसलिए वे कांगे्रस से अलग हो गये थे। यहीं से वंशवाद की परंपरा चिन्हित हुई और देश का प्रथम परिवार जन आलोचना की परिधि में आ गया था। इसके बाद 70 के दशक में ‘सम्पूर्ण क्रांति’ का नारा देकर लोकनायक ने इंदिरा हटाओ अभियान चलाया था। परिणाम स्वरूप मोरारजी भाई और किसान नेता चरणसिंह का सत्ता में आरोहण हुआ। तत्पश्चात भ्रष्टाचार केन्द्रित मुहिम के नायक वी पी सिंह बने और कांगे्रस को सत्ताच्युत किया गया। राष्ट्रीय भावनाओं के चरम उत्कर्ष के रूप में पोखरण विस्फोट के प्रवर्तक अटल बिहारी वाजपेयी की लोकप्रिय प्रथम गैर कांगे्रसी सरकार का गठन हुआ जिसने देश-विदेश में भारत में विकास और सुशासन का नया अध्याय लिखकर चौधराहट करने वाली शक्तियों को चेताया था।

कांगे्रस मुक्त भारत के अभियान में देश को 7 प्रधानमंत्री मिले। इन्हें मिलाकर अब तक 13 प्रधानमंत्री देश के सत्ता सिंहासन पर आरूढ़ हो चुके हैं। इनमें कांगे्रस दल के तीन प्रधानमंत्री पं. नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी एक ही वंश परंपरा के रहे हैं। लेकिन कांगे्रस एक ही वंश परम्परा में गुंफित होकर रह गयी जिससे उसका विचार स्रोत सूख चुका है। आजादी के बाद जितनी भी सरकारें बनीं उनमें हाल के 10 वर्षों में जो यूपीए सरकार गठित हुई उसका कार्य दिशाहीन रहने से बेलगाम मंहगाई, निरकुंश भ्रष्टाचार के रूप में जनता ने भुगता है। कांगे्रस अपने ही बोझ से बोझिल हो चुकी है। लोकसभा चुनाव में उसे अपनी पराजय का अहसास हो चुका है और नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी और सहयोगी घटकों की सरकार बननें में कोई अंदेशा नहीं रह गया है। यही कारण है कि क्षेत्रीय दलों में मोदी रूझान देखने में आ रहा है। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में बनने वाली सरकार को रोकना कांगे्रस के वश की बात नहीं रही। मंहगाई, भ्रष्टाचार, असुरक्षा का दंश भुगत रही देश की जनता के नाम नरेन्द्र मोदी का यह आव्हान जनता का मर्म छू रहा है कि शासकों (कांग्रेस) को 60 वर्ष दिये, सेवक (नरेन्द्र मोदी) को 60 माह देकर ऐतबार करें।
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