महात्मा ज्योतिबा फुले क्रांतिकारी समाज सुधारक

19 वीं शताब्दी के प्रबोधनकाल के अधिकांश समाजसुधारक उच्चवर्णीय थे तथा उनके सुधार का विषय सफेदपोश शहरी थे। इस पार्श्वभूमि में महात्मा ज्योतिबा फुले बहुजन, दलित, किसान की उन्नति के लिए वातावरण निर्माण करने वाले बहुजन समाज के पहले समाज सुधारक, वैचारिक लेखक थे। भारत में स्त्री शिक्षा की नींव इन्होंने ही रखी, उनके शैक्षणिक विचारों तथा कार्यों का स्वयं ब्रिटिश लोगों ने खुला सम्मान किया था। महात्मा फुले के पूरे कार्य में उनकी पत्नी सावित्री बाई का बहुमूल्य योगदान रहा है।

महाराष्ट्र को साधु संतों की वैभवशाली परंपरा प्राप्त हुई, वैसी ही कृतिशील समाजसुधारक- प्रबोधनकारों की बहुत बड़ी परंपरा भी मिली है, उनमें भारतीय स्त्री शिक्षा की नींव रखने वाले क्रांतिकारी समाज सुधारक-वैचारिक लेखक महात्मा ज्योति राव गोविंद राव फुले (गोरे) का भी अग्रणी नाम है। 19 वीं शताब्दी के ब्रिटिश शासनकाल में महाराष्ट्र के नवजीवन के अभियान यानि प्रबोधन जागृति का जिन महापुरुषों ने विवेकपूर्वक बीजारोपण किया, उनमें बहुजन समाज के पालनहार दीनबंधु महात्मा फुले को अग्रणी स्थान प्राप्त है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और संविधान निर्माता डॉ बाबा साहेब आंबेडकर भी महात्मा फुले के सामाजिक कार्यों तथा विचारों से बहुत प्रभावित थे। डॉ आंबेडकर तो महात्मा फुले को अपना गुरू ही मानते थे। महात्मा फुले के कार्यो तथा विचारों का प्रभाव दूर-दूर तक था। भारत की पहली मजदूर यूनियन स्थापित करने वाली मेधा जी लोखंडे तथा मुस्लिम सत्यशोधक संघ की स्थापना करने वाली हमीद दलवाई के प्रेरणा स्त्रोत भी महात्मा फुले ही थे। महात्मा फुले के कार्यो की महत्ता को ध्यान में रखते हुए स्वयं ब्रिटिश सरकार ने उनके पुणे के विश्रामबाग में स्थित आवास पर सत्कार किया था।

19 वीं शताब्दी के ब्रिटिश शासनकाल में अंग्रेजी शिक्षा तथा पाश्चात्य विचारों ने भारतीय जीवन पद्धति तथा सांस्कृतिक मूल्यों को जबर्दस्त चुनौती दी। इस चुनौती का सीधे-सीधे मुकाबला न करके श्रृतिस्मृतिपुराणोक्त पुराने, जीर्ण, कालबाह्य हो चुके अवैज्ञानिक मूल्यों के अनावश्यक दुराग्रह को ही स्वीकार करने वाले परंपरावादी समाजसुधारकों का एक वर्ग अपनी धन्यता मानता था, ऐसे दौर में बहुजन- दलित समाज के हितों की रक्षा का लक्ष्य सामने रखकर सामाजिक न्याय की प्रतिस्थापना के लिए महात्मा फुले संघर्षरत थे। उस दौर में पुणे में महाराष्ट्र के अन्य दूसरे समाजसुधारकों के भी कार्य थे, लेकिन उनमें से अधिकांश उच्चभ्रू विचारक थे। उनके सुधार का विषय शहरी तथा सफेदपोश लोग थे। बहुजन समाज, दलित समाज, महिलाओं तथा किसानों की समस्याएं लेकर वातावरण तैयार करने वाले पहले समाज सुधारक यानि महात्मा फुले। उनके कुल कार्यो में विशेष रूप से महिला विषयक शैक्षणिक सामाजिक कार्यों में उनकी सुविद्य तथा निडर धर्मपत्नी सावित्री बाई का भी अहम योगदान रहा है। ज्योतिबा तथा सावित्री भारत के इतिहास के पहले समाज-सुधारक पति-पत्नी हैं। फुले नामक पति-पत्नी का यही जोड़ा कार्यों की एतिहासिक ऊंचाई का एक मानक है।

सामाजिक न्याय के इस संघर्ष में ज्योतिराव तथा सावित्री बाई को बहुत विरोध तथा परेशानी का सामना करना पड़ा। अनेक संकटों से मुकाबला करना पड़ा। स्वजनद्रोही, धर्मद्रोही, राष्ट्रद्रोही, ऐसे शब्दों में उनकी निंदा की जाती थी। रास्ते से गुजरते वक्त उन पर गोबर, कीचड़ फेंका जाता था। इतना ही नहीं फुले पति-पत्नी की हत्या करने का प्रयत्न भी किया गया। लेकिन इन सभी संकटों से वे घबराये नहीं। प्रखर विरोध सहन करने के बाद भी उन्होंने अपना काम निष्ठा तथा समर्पित भाव से तेज गति से जारी रखा। सनातनीयों के दबाव के कारण महात्मा फुले के पिता घबराये और उन्होंने ज्योतिराव से काम बंद करने या घर छोड़कर जाने के आदेश दे दिए। ज्योति राव ने पत्नी के साथ पिता का घर छोड़ दिया, लेकिन पति-पत्नी अपने ध्येय से रत्ती भर भी नहीं डिगे। संकटों की श्रृंखला यहीं नहीं रुकी। कालांतर में उन्हें सामाजिक बहिष्कार के संकट का भी सामना करना पड़ा, लेकिन ऐसी प्रतिकूल स्थिति में भी बड़े धैर्य तथा संयम के साथ उन्होंने अपने हाथ में लिए कार्यो को बड़ी कुशलता से आगे बढ़ाया। महात्मा फुले के विचारों के क्रातिकारी स्वरुप तथा प्रगतीशील विचारों को आज भी समाज पचा नहीं सका है। प्रखर बुद्धि इमानदारी, उदार उद्दात मानववाद, स्त्री-पुरुष समानता तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता महात्मा फुले के कार्यो के चार सूत्र थे।

बहुजन समाज तथा स्त्रियों से संबंधित सभी प्रश्नों की महात्मा फुले ने बुद्धि के आधार पर स्वतंत्र रूप से पड़ताल की तथा चर्चा करायी। अब हमें आपके ब्रह्समाज तथा प्रार्थना समाज नहीं चाहिए। बहुत हुआ आपका मनमानापन, ऐसे शब्दों में महात्मा फुले ने ब्रह्म समाज तथा प्रार्थना समाज के सामाजिक परिवर्तन के लक्ष्य पर भी सीधे तौर पर संदेह व्यक्त किया। इतना ही नहीं उन्होंने अपनी जागरुकता की दृष्टि से इतिहास को भी नए रूप से सामने रखा। छत्रपति शिवाजी महाराज को उन्होंने किसानों का राजा तो वारकरी संत तुकाराम महाराज को किसानों का संत कहकर लोगों के सामने लाया।

संघर्षमय पारिवारिक जीवन

महात्मा फुले का पूरा नाम ज्योतिराव गोविंद राव फुले था, उनका जन्म महाराष्ट्र के सातारा जिले के कटगुण में 11 अप्रैल, 1827 को माली परिवार में हुआ था। इनकी माता का नाम चिमणा बाई था। ज्योतिबा जब छोटे थे, तभी उनकी माता का निधन हो गया था, इसलिए ज्योति बा का बचपन माँ की प्रेम भरी छाया से वंचित रह गया। उस समय की सामाजिक प्रथा के अनुसार ज्योति बा का 13 वर्ष की आयु में सातारा जिले के ही नायगांव के खंडोबा नेवासे पाटिल की सुपुत्री सावित्री से विवाह हो गया। आदर्श पति-पत्नी के रूप में उनका वैवाहिक जीवन सफल रहा। इस दंपत्ति को संतान सुख नहीं मिला, लेकिन उन्होंने एक विधवा की संतान को गोद लेकर उसका पालन-पोषण किया, यही उनका दत्तक पुत्र यशवंत है। 61 वर्ष की आयु में महात्मा ज्योतिबा फुले लकवा रोग से ग्रस्त हुए और 63वर्ष की आयु में सन् 1890 में उनका निधन हो गया। महात्मा फुले के निधन के बाद सावित्री बाई ने सात वर्ष तक सामाजिक कार्यों को जारी रखा। 1897 में सावित्री बाई का भी निधन हो गया।

विद्या का महत्व

पुणे के स्काटिश मिशन स्कूल में उनकी शिक्षा हुई। उनकी बुद्धि बड़ी कुशाग्र थी। अनुशासन प्रिय होने के कारण ज्योतिबा फुले मिशनरी के सभी शिक्षकों के प्रिय बन गए थे, वहां उनकी मिशनरी श्री मरे मिशेल से मुलाकात हुई और उन्हें एक बहुत ही अच्छा मार्गदर्शक मिला। इसी दौर में महात्मा फुले ने उस्ताद लहु जी साल्वे के मार्गदर्शन में बलोपासना की तथा अपने शरीर को बलशाली बनाया। विद्यार्थी अवस्था में रहते समय ही महात्मा फुले को मिशनरियों की ओर से विभिन्न तरह की जानकारी तथा ज्ञान की प्राप्ति हुई। थॉमस पेन नामक लेखक की राइट्स ऑफ मैन पुस्तक उन्होंने पढ़ी। इस पुस्तक का पढ़ना महात्मा फुले के वैचारिक जीवन में बदलाव का सबसे बड़ा कारण बना। सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष करने की ऊर्जा उनके मन में इसी पुस्तक को पढ़ने के बाद निर्माण हुई। समाज के बहुजनों- शुद्रों- स्त्रियों- किसानों की स्थिति- गति को देखकर महात्मा फुले पहले से ही बहुत परेशान थे। अपनी एक कविता में जिसे वे अखंड कहते हैं, उसमें वे कहते हैं-

विद्येविना मति गेली। मती विना नीति गेली।
नीति बिना गति गेली। गति विना वित्त गेली।

वित्त विना शुद्र खचले। अर्थात् विद्या के बिना बुद्धि समाप्त हो गई। बुद्धि के बिना नीति चली गई। नीति के अभाव में गति चली गई और गति के अभाव में वित्त चला गया। वित्त के अभाव में शुद्र की स्थिति खराब हुई। इतने सारे अनर्थ एक विद्या के अभाव, ज्ञान के अभाव में हुए। यह उनका निष्कर्ष, उनका व्यापक अनुभव, व्यासंग तथा चिंतन की परिचायक ही था। इसी वजह से सबसे पहले लड़कियों के लिए स्कूल खोलकर उन्होंने अपने ऐतिहासिक क्रांतिकारी सामाजिक कार्यों का शुभारंभ किया। 1848 में ज्योतिबा फुले ने पुणे में शुरु किए गए लड़कियों के स्कूल ने भारत की स्त्री शिक्षा की नींव डाली। इस महान कार्य के बारे में महात्मा ज्योतिबा फुले तथा उनकी पत्नी सावित्री बाई फुले का हम सभी को सदैव ऋणी रहना होगा। लड़कियों के लिए स्कूल शुरु करने का साहसी निर्णय लेने का क्रांति कार्य करने वाले महात्मा फुले भले ही हों लेकिन देश की पहली शिक्षिका के रूप में उनकी पत्नी सावित्री बाई की जोरदार संघर्ष करने की प्रवृति और उसमें उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। भारत की पहली शिक्षिका के रूप में सावित्री बाई फुले का योगदान अपूर्व तथा ऐतिहासिक है।

सामाजिक कार्यों की विविधता

भारतीय समाज के सभी वर्गों के सभी स्त्रियों के साथ शुद्रों जैसा व्यवहार किया जाता है, ऐसा ज्योतिबा फुले का आरोप था। स्त्रियों को शिक्षा मिलनी चाहिए, साथ ही उन्हें समाज में पुरुषों के बराबर का स्थान मिलना चाहिए, सम्मान तथा सामाजिक प्रतिष्ठा मिलनी चाहिए, ऐसा उनका आग्रह था, इस वजह से बाल विवाह के लिए उनका सख्त विरोध था। इसी तरह वे विधवा स्त्रियों के केश काटने के भी सख्त विरोधी थे। विधवाओं के पुनर्विवाह के वे आग्रही थे। समाज की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए उन्होंने विधवा आश्रम बनवाकर विधवा स्त्रियों को अधिकार तथा गुजारा भत्ता दिलाया। इसी तरह कुमारी माता, विधवाओं की अनाथ संतानों के लिए भी बालकाश्रम शुरु किए। समाम सुधारकों के नेता न्यायमूर्ति म.गो. रानडे पत्नी के निधन के बाद किसी विधवा से विवाह के करने के स्थान पर किसी अल्पवयीन लड़की के साथ विवाह करते हैं तब उनके घर जाकर महात्मा फुले उनके समक्ष विरोध प्रदर्शित करते हैं। यह कृति उनकी हिम्मत के साथ-साथ स्वीकृत कार्य के प्रति उनकी निष्ठा के प्रदर्शन को दर्शाती है। अस्पृष्यों के लिए विद्यालय, उनके घरों के पानी का हौद खुला करके पानी देने, जैसे अनेक तरह के सामाजिक कार्य उन्होंने किए। पुरानी प्रथा, परंपरा, जीर्ण रूढियों के विरोध में उनके द्वारा किए गए प्रखर विरोध के कारण बहुत से लोगों ने उन्हें ब्राह्मण विरोधी करार दिया, लेकिन महात्मा फुले ने कहा कि मैं ब्राह्मण विरोधी न होकर ब्राह्मणी वृत्ति, प्रवृत्ति तथा अहं भाव का विरोधी हूं और उनका यह कहना पूरी तरह से सच भी था, क्योंकि उनके अनेक सहयोगी ब्राह्मण ही थे। उन्हें लड़कियों के लिए स्कूल खोलने के लिए अपना घर देने वाले भिडे, उनके स्कूल में पढाने वाले शिक्षक थत्ते गुरुजी, दूसरे स्कूल के लिए जगह देने वाले अण्णा चिपलूणकर, सखाराम परांजपे ये सभी लोग ब्राह्मण ही थे। वर्चस्ववादी सनातनी वृत्ति के, ज्योतिबा फुले प्रखर विरोधी थे।

महात्मा फुले का विचार विश्व तथा ग्रंथ लेख

महात्मा फुले प्रगतिशील विचार धारा के जरूर थे, लेकिन वे नास्तिक नहीं थे। ईश्वरी शक्ति पर उनका विश्वास था, लेकिन मूर्ति पूजा उन्हें स्वीकार्य नहीं थी। ईश्वर को वे सृष्टि का निर्माता कहते हैं। उनका वेदों पर विश्वास नहीं था, इसी तरह वेद ईश्वर निर्मित है, इस कल्पना पर भी उनका विश्वास नहीं था। इसलिए वर्णभेद को वेद प्रणित, ईश्वर निर्मित मानने पर उनका विरोध था। ईश्वर एक है और हम सभी उनकी संतान हैं, इस वजह से वर्ण भेद, जाति भेद ये मनुष्य निर्मित हैं और यह मानवता के लिए कलंक है। सूर्य, सरिता, मेघ जिस तरह से किसी भी तरह का भेद नहीं करते, उसी तरह ईश्वर की दृष्टि में सभी समान हैं। विश्व के सभी धर्म तथा धर्म ग्रंथ मानव निर्मित कृति हैं, ईश्वर निर्मित नहीं हैं। ईश्वर का एक ही धर्म है, वह है सत्य धर्म। मानव का धर्म एक ही होना चाहिए, सत्य के साथ वर्ताव करने का, ऐसा ज्योतिबा फुले का कहना है। ज्योति बा फुले की ग्रंथ संपदा जाज्वल्य क्रांतिकारी विचारधारा का शब्दीक दर्शन है। उन्होंने बहुत सी कविताएं लिखीं, उन पर संत तुकाराम महाराज के अभंग का विशेष प्रभाव था। वे तीर्थ क्षेत्र देहू में तुकाराम बीज के उत्सव में अपने सहयोगी श्री पडवल, श्री नवरंगे के साथ शामिल हुए थे। मराठी संतों की काव्य रचना को अभंग कहा जाता था, तो ज्योतिबा अपनी काव्य रचना को अखंड कहते थे। तुकोबा के अभंग तथा ज्योतिबा के अखंड में रचना और आशय दोनों दृष्टि से बहुत समानता है। वारकरी संतों के हरिपाठ की तरह ही ज्योति बा फुले ने सत्यपाठ की रचना की।

‘सर्व साक्षी जगत्पति। त्याला नको मध्यस्ती।’ यह घोषवाक्य नेत्रों के सामने रखकर महात्मा फुले ने सत्यशोधक समाज संस्था की वर्ष 1873 में स्थापना की। कालांतर में उन्हीं की प्रेरणा से भालेकर बंधुओं ने वर्ष 1877 में दीनबंधु नामक साप्ताहिक का शुभारंभ किया और महात्मा फुले के विचारों का प्रसार करने के साथ ही साथ महात्मा फुले के खिलाफ हो रही टिपप्णियों का भी प्रति उत्तर देते हुए महात्मा फुले तथा सत्यशोधक समाज विरोधी गुटों के मुंह पर भी विराम लगाया। महात्मा फुले ईसाई मिशनरियों के साथ तथा संस्कार में पले बढ़े लेकिन उन्होंने हिंदु धर्म छोड़कर ईसाई धर्म स्वीकार नहीं किया था। हिंदु धर्म में ही रहकर उन्होंने हिंदु धर्म की पुरानी, जीर्ण, कालबाह्य, रूढ़ी, प्रथा, परंपराओं का खुला विरोध किया। सच तो यह है कि वह आत्मोन्नति के उद्देश्य से किया गया आत्म कटाक्ष ही था फिर भी विरोधियों ने उन पर धर्मद्रोही कहकर टिपप्णी की।सत्य असत्यासीमन केले ग्वाही, ऐसा तुकारामी उद्घोष महात्मा ज्योति बा फुले के सत्यशोधक समाज संस्था का अधिष्ठान था। दलित, बहुजन समाज तथा स्त्रियों के सर्वागीण विकास के लिए अंग्रेजों की सरकार वरदान ही है, वह कुछ और वर्ष रहे, ऐसा उनका स्पष्ट मत था। लोकहितवादी देशमुख भी इसी विचारधारा के थे। महात्मा फुले द्वारा हंटर आयोग के सामने प्रस्तुत किए गए शिक्षा संबंधी विचार आज भी मार्गदर्शक साबित हों, ऐसे ही हैं। लड़कियों की निशुल्क शिक्षा की पहली मांग भी महात्मा फुले ने ही की थी। वर्ष 1882 में ब्रिटिश सरकार ने ज्योतिबा फुले कार्यो का अभिनंदन किया। वर्ष 1888 में मुंबई में हुए एक सम्मान समारोह में लोगों ने ज्योतिबा फुले को महात्मा का उपाधि प्रदान की। महात्मा ज्योतिबा फुले के कार्यों के अनेक पहलु हैं। महान समाज सेवक, क्रांतिकारी धर्मसुधारक, दार्शनिक लेखक, कवि नाटककार, ग्रंथकार तथा संपादक इन सभी पहुलओं पर स्वतंत्र लेख लिखने जितना ही उनका काम व्यापक है, लेकिन मिली जगह की मर्यादा में ही। गागर में सागर। 19 वीं शताब्दी के अग्रणी, क्रांतिकारी, समाजसेवक, स्त्री शिक्षा के जनक, महात्मा फुले तथा उनकी विदूषी पत्नी सावित्री बाई फुले का विनम्र अभिवादन!

This Post Has One Comment

  1. Prashant

    विद्येविना मति गेली। मती विना नीति गेली।
    नीति बिना गति गेली। गति विना वित्त गेली।

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